मातृभाषाक प्रति जीवन-समर्पण
ई हमर सौभाग्य थिक जे हमर जन्म जनकनंदिनी जानकीक जन्मभूमि मिथिलाक पावन भूमि पर भेल अछि। एहि माटिक अन्न-जलसँ हमर ई काया पोषित अछि। मोनमे सदिखन ई विचार उठैत रहल जे जँ मिथिलामे जन्म ल’ क’ अपन मातृभाषाक लेल किछु नहि क’ सकलहुँ, तँ हमर ई जन्म व्यर्थ भ’ जाएत। हम मिथिलाक पुत्र छी आ मैथिली हमर माए थिकि। एकटा पुत्रक नाते अपन माएक सेवा निरंतर आ निष्काम भावसँ करब हमर परम कर्तव्य आ धर्म थिक।
एही अनुरागक यात्रामे हमरा किछु दिन मिथिलाक सांस्कृतिक राजधानी जनकपुरधाममे रहबाक अवसर भेटल। ओही समय जनकपुरमे मैथिली एफ.एम. (FM) रेडियो सभक शुरुआत भ’ रहल छलै। मैथिली भाषाक सेवा आ प्रचार-प्रसारक भावसँ हम ओतए रेडियो जनकपुर (97 मेगाहर्ज)मे सेहो किछु दिन काज कएलहुँ। जनकपुरक ओ अनुभव आ श्रोतासभक प्रेम हमरा मोनमे मैथिलीक प्रति समर्पणक भावकेँ आओर सकक्त क’ देलक। एफ.एम.सँ जे यात्रा व्यय आ नास्ता आदिक लेल टका भेटैत छल, ताहिमेसँ कपचि क’ हम मैथिलीक पोथी-पत्रिका किनैत छलहुँ।
अपन भाषा-संस्कृतिका प्रति अनुराग हमरा नेनपनेसँ रहल। जखन हम छओ-सातम कक्षामे पढ़ैत रही, तखन मैथिलीक पुस्तकसभक खोजमे रहैत रही। अपन मातृभाषाक प्रति ई अभिरुचि आ स्नेह समयक संग अगाध होइत गेल। नवम-दसम कक्षा धरि पहुँचैत-पहुँचैत हमरा मोनमे मैथिली साहित्य आ संस्कृतिक प्रति स्नेह आओर गाढ़ भ’ गेल छल।
दीप नारायण ‘विद्यार्थी’ हमर नेनपनक मित्र छथि, कॉलेज धरि अबैत-अबैत ई मित्रता आओर गाढ़ भ’ गेल छल। हमसभ एक-दोसरकेँ ‘बन्धु’ कहि सम्बोधित करैत छी, सेहो नेनपनेसँ। बंधुक संग जखन-केखनो बैसैत छलहुँ तँ साहित्य सुनबाक अवसर भेटैत छल, नीक सेहो लगैत छल। ई हमर एकटा अतिरिक्त संयोग सेहो कहल जा सकैत अछि; अथवा सम्भव अछि जे एहि संसर्गसँ हमरा भीतरक माटिमे साहित्यक बीआ बाउग भ’ गेल हो। खैर, जे भेल हो— बन्धु ताबत मैथिली साहित्यमे अपन एकटा विशिष्ट ख्याति अरजि लेने छलाह, 2016 ई.मे हिनका साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कारक घोषणाक बाद हमरा भीतरक आत्मविश्वास उच्च भ’ गेल। हम बन्धुक संग नेपाल-भारतक विभिन्न साहित्यिक कार्यक्रमसभमे जाए लगलहुँ। ओही क्रममे आदरणीय साहित्यकार लोकनिसँ भेंट-घाट होइत रहल आ हमरा भीतरक साहित्यकार साकांक्ष होइत गेल। आदरणीय महेन्द्र मलांगिया सर आ प्रसिद्ध भाषाविद् प्रो. (डा.) रामावतार यादवजीक सानिध्य बहुत किछु सिखौलक अछि। धीरेन्द्र प्रेमर्षि आ रूपाझा द्वारा प्रसारित हेलो मिथिलाक प्रभाव सेहो हमरा साहित्यपर पड़ल अछि। ऋषि बशिष्ठजीक बहुत रास सलाह-सुझाओ भेटैत रहैत अछि। सभक प्रति आदर भाओसँ प्रणम्य होइत छी।
जखन केखनो बन्धुक संग भेंट होइत छल वा संगे कोनो यात्रा पर जाइत रही, तँ साहित्यिक गप-सप होइत छल। प्रायः प्रत्येक भेंट-घाटमे किछु लिखबाक लेल ओ आग्रह कारिते छलाह। हम कविता आ लघुकथा दिस डेग बढ़ेलहुँ, मुदा दुनू गोटे बेरोजगारीक बाटमे रही, तेँ स्थिर नहि भ’ पाबी। ओना किछु समय बाद बन्धुक चाकरी लागि गेल रहनि आ ओ अपन चाकरीक बाद ‘अनुप्रास’ नामसँ पत्रिका आरम्भ कएने छलाह। एकाध अंक आबेरसँ हमरा सेहो अनुप्रासक संग उपसंपादक रूपमे जुड़बाक अवसर भेटल। तब लागल जेना साहित्यक उत्तरदायित्व हमर कान्ह सहला रहल हो। किछु दिन बाद किछु-किछु लिखाए लागल छल। बीचमे स्मारिका-पत्रिका सभमे छपबो कएल। हम मैथिली साहित्यसँ स्नातकोत्तर केलहुँ आ एखन बिहार लोक सेवा आयोग (BPSC)क परीक्षा उत्तीर्ण क’ उच्च माध्यमिक (+ 2) विद्यालय पद्मा, लदनियाँ, मधुबनीमे मैथिली विषयक अध्यापक रूपमे सेवारत छी।
एकटा शिक्षक आ मैथिली अनुरागीक रूपमे हम सदिखन सोचैत रहलहुँ जे अपन भाषाक समृद्धि लेल किछु नवीन आ विशिष्ट कएल जाए। यद्यपि हम मैथिलीमे लघुकथा आ कविता सभक रचना कएल, मुदा मनमे एकटा ध्येय छल जे विश्व साहित्यक महान रचनासभकेँ मैथिलीक पाठक धरि पहुँचाओल जाए। आगू मौलिक पोथीक संग सेहो उपस्थित होएबाक साहस करब, एखन हम एहि पोथी पर अबैत छी जे एखन अपने लोकनिक हाथमे अछि आ जकर हम मैथिलीमे अनुवाद कएल अछि— ‘द वेस्ट लैंड’।
नोबेल पुरस्कार प्राप्त टी. एस. इलियट (T.S. Eliot)क प्रसिद्ध कालजयी काव्य-कृति ‘द वेस्ट लैंड’ आधुनिक विश्व साहित्यक ओ रचना अछि जे आधुनिक मानवक जिजीविषा, निराशा, आध्यात्मिकता आ जीवनक जटिलताकेँ अत्यंत गंभीरताक संग रेखांकित करैत अछि। एहि बिम्ब-प्रधान काव्यक मैथिलीमे अनुवाद करब हमरा लेल एकटा चुनौती आ तपस्या छल। उद्देश्य इएह छल जे मैथिली भाषाक क्षमता आ गंभीरता विश्व स्तरक साहित्यकेँ अपन भीतर समेटबाक लेल समर्थ अछि, से सिद्ध भ’ सकैक।
अनुवाद करैत काल हमर ध्यान मूल कविताक आत्मा, प्रवाह आ दर्शन सुरक्षित रहए, एहि विषयपर विशेष रूपसँ छल। संगहि मैथिलीक स्वाभाविक मिठास आ अभिव्यक्तिमे सेहो कोनो बाधा नहि अबैक।
ई पुस्तक मात्र एकटा अनुवाद नहि, बल्कि मातृभाषाक प्रति जीवन-समर्पणक एकटा प्रयास थिक। हमर विश्वास अछि जे मैथिलीक प्रबुद्ध पाठक लोकनिक आशीष प्राप्त होएत।
ई पोथी हम अपन पूजनीया माए स्मृतिशेष उर्मिला देवीक सादर चरण-कमलमे समर्पित कएल अछि। दुनियामे जँ सबसँ निःस्वार्थ आ सुंदर किछु होइत अछि, तँ ओ माए होइत अछि। ओना माए पर बहुत किछु लिखल गेल अछि आ लिखाइत रहत, हमर कोन सामर्थ्य अछि! मुदा एखन तोहर बड्ड मोन पड़ैछ माए… जँ तोँ रहितीही एखन…
पूजनीय पिताजी (प्रोफेसर सत्य नारायण यादव)क प्रति नतशिर छी, हमर जीवन आ साहित्य दुनूमे हिनक आशीर्वादक हाथ सदिखन हमरा माथ पर रहल अछि। आदरणीय काका श्री चंद्रदेव नारायण यादव (जे.पी. सेनानी) सेहो लिखबाक लेल प्रेरित करैत रहलाह। काकाक प्रति हृदयसँ आभारी छी। पैघ भाइ श्री राजशेखर रंजन ‘पप्पू’क सहयोग हमर जीवन यात्रामे बहुत सहयोगी सिद्ध भेल अछि पप्पू भैयाक प्रति सादर आभार। धर्मपिता (ससुर) श्री देव नारायण यादवक प्रति सेहो हृदयसँ आदर आओर सम्मान अर्पित करैत छी। मैथिली विषयसँ स्नातकोत्तर करएबामे हिनक सहयोग-सलाह सराहनीय रहल अछि।
धर्मपत्नी श्रीमती नीलम कुमारी (शिक्षिका), बहिन गुड़िया (अर्चना कुमारी), पुत्र तुषार आ पुत्री अम्बिकाक सहयोगक बिना ई काज सम्भव नहि छल। हमर जीवनमे सौन्दर्य घोरबाक लेल हिनका लोकनिकेँ स्नेह आ हृदयसँ आभार।
‘अनुप्रास’ परिवारक हमर प्रबंध सम्पादक भाइ फुलकान्त ठाकुर, उपसम्पादक कुमार आलोक आ सम्पादक दीप नारायणजीक प्रति सेहो आभारी छी। हिनका लोकनिक संग रहैत-रहैत हमरा भीतर साहित्यक प्रस्फुटन भेल। मिथिलाक माटि-पानि, माँ मैथिली आ मातृभाषाक संग अपन सभ गुरुजन, शुभचिंतक आ मैथिली प्रेमी पाठक लोकनिक प्रति आभार व्यक्त करैत छी, जिनक आशीषसँ ई काज संभव भ’ सकल।
5 सितम्बर 2026 — शशि कुमार शशि
(शिक्षक दिवस)
अंतिम संस्कार
अप्रैल सबसँ निष्ठुर मास होइत अछि,
जे अँकुरबैत अछि परती जमीनसँ लिलीक फूल
आ मिज्झर करैत अछि स्मृति आ इच्छाकेँ
जगबैत अछि बसंतक फूहाड़सँ
सुखल जड़िसभकेँ।
सर्दीमे हमरा लोकनिकेँ गर्म रखलक अछि
धरतीकेँ विस्मृतिक बर्फसँ झँपैत
आ सूखल कंद-मूल खुआ
पोसलथि हमर छोटछीन जीवन।
गर्मी हमरा सभकेँ अचरजमे द’ देलक,
‘स्टार्नबर्गरसी’सँ होइत
बरखा फूहाड़क संग आएल;
हमसभ बारामदामे रुकलहुँ,
आ फेर रउदमे ‘हॉफगार्टन’ दिस जाए
कॉफी पिबलहुँ आ घंटाभरि
गप-सप कएलहुँ।
हम रूसी नहि छी,
लिथुआनियासँ आएल विशुद्ध जर्मन छी
आ जखन हमसभ नेना रही,
अपन ममिऔत भाइक ओहिठाम रहैत रही
ओ हमरा स्लेड (बरफक गाड़ी) पर ल’ गेल,
आ हम डेरा गेल रही।
ओ कहलक, मैरी, मैरी, कसि क’ पकड़ू।
आ हमसभ नीचाँ ससरि गेलहुँ।
पहाड़मे,
ओहिठाम अहाँ आजाद महसुस करैत छी।
हम राति भरि पढ़ैत छी,
आ जाड़मे दक्षिण दिस चलि जाइत छी।
कोन जड़ि अछि जे जकड़ने अछि,
कोन गाछ अछि
जकर डारि पनुघैत अछि परती जमीनमे
हे मनुष्य ! अहाँ कहि नहि सकैत छी
अंदाजो नहि लगा सकैत छी अहाँ
किए तँ अहाँ मात्र एतबे जनैत छी
जे टुटल मूर्तिक ढेरी अछि
जतए पड़ैत अछि सुरुजक किरीन
सूखल गाछ कोकरो छाहरि नहि दैत अछि,
आ झींगुर नहि दैत अछि चैन
सुखल पाथरसँ
पानिक कोनो आवाज नहि आबैत अछि
मात्र एहि लाल चट्टानक नीचाँ छाहरि अछि,
आउ, एहि लाल चट्टानक छाहरिमे
आ हम अहाँकेँ किछु अलग देखाबए चाहैत छी
एहि सभसँ बिल्कुल अलग
ने तँ अहाँक ओ छाहरि जे चलैत अछि अहाँक पाछाँ
आ ने ओ छाहरि जे साँझ खन अबैत अछि अहाँसँ भेटए,
हम अहाँकेँ मुट्ठीभरि छाऊरसँ डर देखाएब।
ताजा हवा बहैत अछि
घर दिश
हमर प्रिय
अहाँ कतय छी?
अहाँ हमरा एक साल पहिने
पहिल बेर बनफूल देने रही
सभ हमरा बनफूल बाली लड़की कहैत छल।
मुदा जखन हम
बनफूल बगीचासँ घूरि अबेरसँ एलहुँ
अहाँक बाँहि भरल छल फूलसँ,
आ भीजल छल अहाँक केश,
हम किछु कहि नहि सकलहुँ,
आ हमर आँखि जबाव द’ देलक,
हम ने तँ जीवित रही आ ने मुइल,
आ हमरा किछु नहि बुझल छल,
इजोतक हृदयमे देखैत,
ओहि आगाध मौनमे।
मैडम सोसोस्ट्रिस,
प्रसिद्ध भविष्यवक्ता छली
हिनका बहुत बेसी सर्दी भ’ गेल छलनि,
ई यूरोप भरिमे
सबसँ बुद्धिमान महिला मानल जाइत छथि,
ताशक एकटा कुटिल गड्डीक संग।
हिनक कहब छनि,
ई अहाँक कार्ड अछि—
‘डूबि गेल फोनीशियन नाविक’,
ओकर आँखि आब मोती भ’ गेल अछि, देखू!
ई ‘बेलाडोना’ अछि,
चट्टानक देवी
परिस्थितिक देवी।
ई तीन टा लाठी वाला आदमी अछि,
आ ई समयक पहिया अछि,
आ एतए कन्हा बनिया अछि
आ ई कार्ड, जे बिल्कुल खाली अछि,
ई किछु तँ अछि जे ओ अपन पीठ पर ढोइत अछि,
जकरा देखब हमरा लेल मनाही अछि।
हमरा फाँसीपर लटकल आदमी नहि भेटल।
पानिसँ होबए वाली मृत्युसँ डेराउ।
हम लोकक भीड़ देखि रहल छी,
जे एकटा घेरामे गोल-गोल घुमि रहल अछि।
धन्यवाद! जँ अहाँ प्रिय ‘मिसेज इक्विटोन’सँ भेटब,
तँ हुनका कहबनि जे हम स्वयं
जन्म-कुंडली ल’ क’ आएब
आइ-काल्हि बहुत सावधान रहए पड़ैत अछि।
अवास्तविक शहर,
जाड़क भोरका गाढ़ धोन्हिमे
लंदन ब्रिजक ऊपरसँ जा रहल एकटा भीड़
एतेक लोक,
हम नहि सोचने छलहुँ जे
मृत्यु एतेक लोककेँ तबाह क’ देने अछि।
ओह! कतेक अफसोच क’ रहल अछि लोक
आ सभ लोक अपन आँखि अपन पएर पर गड़ौने छल
(निचाँ देखि थाहि-थाहि क’ चलि रहल छल)।
भीड़ पहाड़ीक ऊपर चढ़ि आ
‘किंग विलियम स्ट्रीट’सँ नीचाँ उतरल
ओतए धरि जतय ‘सेंट मैरी वूलनोथ’
समयक हिसाब रखैत छली
नौ बजेक अंतिम पहरपर
एकटा ‘मृत आवाज’ क’ संग।
ओतय हम एकटा परिचितकेँ देखलहुँ,
आ ओकरा रोकलहुँ,
शोर क’ क’ कहलीयनि— ‘स्टेटसन!’
“अहाँ जे ‘मायले’क जहाज पर हमरा संग छलहुँ!
“ओ लाहास जे अहाँ पछिला साल
अपन बगीचामे रोपने रही,
“कि ओ पनुघए लागल अछि?
कि ओ एहि साल फूलाएत?
“कि अचानक पड़ल ठाढ़ ओकर क्यारीकेँ
बिगाड़ि देलक अछि?
“ओह! ओहि कुकुरकेँ ओतएसँ दूर राखब,
जे मनुखक दोस्त अछि,
“नहि तँ ओ अपन चाँगुरसँ
ओकरा फेर खोधि क’ निकालि लेत!
“अहाँ! पाखंडी पाठक! — हमरे जकाँ, हमर भाइ”
शतरंजक एकटा खेल
ओ कुर्सी जहि पर ओ बैसलि छलीह,
जेना कोनो चमकैत सिंहासन हो,
आ संगमरमर जेना कोनो अएना
फलसँ लुब्धल एकटा डारि सजल छल
जतयसँ एकटा सुन्दर कामदेव
द’ रहल छलाह हुलकी
(दोसर अपन आँखिकेँ झँपने छल अपन पाँखिसँ)
सातमुखी बला दियटि केर लओ
टेबुलपर छिड़िया रहल छल जोति
जेना ओकर गहनाक चमक
ओकरासँ मिलबाक लेल
उठि रहल हो उपर,
साटन केर बक्सासँ
अगाध हाथीदाँत उझील देल गेल छल।
आ रंगीन शीशाक खुजल शीशीमे,
ओकर अजीब कृत्रिम इत्र छबकल छल,
मलहम, पाउडर आ तरल—
व्याकुल आ भ्रमित गंधमे इंद्रीक डुबबैत
खिड़कीसँ अबैत ताजा हवासँ हिलैत
ओ ऊपर उठैत दियरि केर लओकेँ बढ़बैत,
अपन धुँआ छतक नक्काशीपर फेकि रहल छल।
छत पर बनल पैटर्नकेँ झकझोड़ैत।
तामसँ भरल विशाल समुद्रक लकड़ी
हरिअर आ नारंगी धधरामे जरि रहल छल,
रंगीन पाथरसँ घेरल,
ओहि उदास रोशनीमे
एकटा सुन्दर ‘डॉल्फिन’ हेलि रहल छल।
पुरान अँगीठीक ऊपर एकटा चित्र अंकित छल
मानु जेना कोनो खिड़कीसँ
जंगलक दृश्य देखाइत हो,
‘फिलोमेल’ केर रूप परिवर्तन,
जकरा ओ क्रूर राजा
निष्ठुरतासँ मजबूर कएने छल;
मुदा ओतए बुलबुल अपन पवित्र स्वरसँ
ओहि वीरान परतीकेँ भरि देने छल
आ ओ एखनो कनैत अछि
दुनिया एखनो पाछाँ लागल अछि,
गन्दा कानक लेल “जग जग”
आ देवाल पर समयक
आन सुखाएल ठूँठ कहल गेल छल;
घूरैत आकृति सभ
झुकल छलीह बहरा दिस,
बन्न कोठलीकेँ शांत करैत
सीढ़ी पर पएरक आहट सुनाइ देलक।
आगिक रोशनीमे,
कंघीक नीचाँ, ओकर केश
आगिक बिन्दु दिस पसरि गेल,
शब्दमे चमकल,
आ फेर एकदम शांत भ’ गेल।
“आइ राति हमर नस ढील अछि
(तबीयत ठीक नहि अछि)।
हँ, खराब अछि।
हमरा संगे रहू।”
“हमरासँ बात करू।
अहाँ कखनो कियैक नहि बजैत छी।
बाजु।”
“अहाँ की सोचि रहल छी?
की?”
“हमरा कखनो पता नहि चलैत अछि
जे अहाँ की सोचि रहल छी।
सोचू।”
हमरा लगैत अछि
हम सब ‘मूसक गली’मे छी
जतए मरल लोक अपन हड्डी
उत्सर्ग कएने छथि।
“ओ केहन आवाज अछि?”
दुआरिक नीचाँसँ बहैत बसात।
“ओ केहन आवाज अछि?”
हवा की क’ रहल अछि?”
किछु नहि, फेरसँ किछु नहि।
की?”
अहाँक किछु नहि पता?
की अहाँक किछु नहि देखाइत अछि?
की अहाँकेँ किछु मोन नहि अछि?”
हमरा मोन अछि
ओ मोती अछि जे ओकर आँखि छल।
“की? अहाँ जीबैत छी वा नहि?
की अहाँक माथमे किछु नहि अछि?”
मुदा
ओ, ओ, ओ ओएह ‘शेक्सपियरियन’ राग—
ई कतेक भव्य अछि
कतेक बुद्धिमान अछि।
“आब हम की करब?
हम की करब?”
“हम एहिना बाहर निकलि जाएब,
आ सड़क पर टहलब,
अपन केश खोलि क’ एहिना।
हम काल्हि की करब?
हम आखिर करब की?”
दस बजे गरम पानि।
आ जँ बरखा भेल, तँ चारि बजे बंद गाड़ी।
आ हमसभ शतरंजक एकटा खेल खेलब,
बिना पिपनी झपकौने आँखि मिझकबैत,
आ दुआरि खटखटएबाक बाट ताकब।
जखन लिलक पति सेनासँ आपस आयल
तँ हम कहलियनि—
हम सोझ-सोझ कहलियनि
जल्दी करू, समय भ’ गेल अछि
आब अल्बर्ट आपस आबि रहल छथि,
कने स्वयंकेँ नीक बना लिय।
ओ पूछए चाहत जे
ओहि टकाक अहाँ की केलहुँ
जे ओ अहाँ के देने छल
दाँत ठीक करएबाक लेल।
ओ देने छल, हम ओतहि रही।
अहाँ सभ दाँत निकलबा लिय लिल,
आ एकटा नीक सेट लगा लिय,
ओ कहलक, हम सप्पत खाइत छी,
हम अहाँकेँ एना नहि देखि सकैत छी।
आ हमहूँ नहि देखि सकैत छी, हम कहलियै,
आ बेचारा अल्बर्ट के बारेमे सोंचू,
ओ चारि सालसँ फौजमे छल,
आब ओ हँसी-खुशी चाहैत छथि,
आ जँ अहाँ ओकरा ई नहि देबै,
तँ दोसर केओ देतै, हम कहलियै।
ओ! एहन बात अछि की, ओ कहलक।
किछु एहने सन, हम कहलिय।
तखन तँ हमरा बुझल अछि
जे किनका शुक्रिया कहबाक अछि ओ कहलनि,
आ हमरा कनडेरिए देखलक।
जल्दी करू, समय भ’ गेल अछि।
जँ अहाँकेँ बेजा लगैत अछि
तँ लागाओ ! हम कहलियनि।
जँ अहाँ नहि चुनि सकैत छी,
तँ दोसर लोक चुनिए लेत।
मुदा
जँ अल्बर्ट भागि गेल,
तँ ई नहि कहब जे हम कहने नहि रही
हम कहलियनि अहाँकेँ लाज होएबाक चाही,
एतेक उमेरगर बुझाइत।
(आ ओ मात्र एकतीस सालक छलीह।)
हम की क’ सकैत छी,
ओ मुह लटका क’ कहलकै,
ई ओहि दबाइक असरि अछि
जे हम गर्भ खसएबा लेल लेने रही, ओ कहली।
ओकरा पहिनहिसँ पाँचटा बच्चा छल,
आ छोटका ‘यंग जॉर्ज’क समयमे तँ
मरैत-मरैत बाँचल छल।
दबाइ दोकान बला कहने छल जे सब ठीक भ’ जाएत,
मुदा हम पहिले सन कहियो नहि भेलहुँ।
अहाँ एकदम मूर्ख छी, हम कहलियनि।
जँ अल्बर्ट अहाँकेँ नहि छोड़त,
तँ ई ठीक अछि, हम कहलियनि,
अहाँ बियाह किएक केलहुँ
जँ अहाँकेँ बच्चा नहि चाहैत छल?
जल्दी करू, समय भ’ गेल अछि।
ठीक,
ओहि रवि क’ अल्बर्ट घरपर छल,
ओ गरम-गरम मांस बनौने छल,
आ ओ हमरा डिनरपर बजौने छल,
ओकर ताजा स्वाद लेबय लेल—
जल्दी करू, समय भ’ गेल अछि
जल्दी करू, समय भ’ गेल अछि
शुभ राति ‘बिल!’
शुभ राति ‘लू!’
शुभ राति ‘मे!’
शुभ राति!
शुभ राति टा-टा।
शुभ राति! शुभ राति!
शुभ राति लेडी,
शुभ राति, स्वीट लेडीज,
शुभ राति! शुभ राति!
अग्नि उपदेश
नदीक शामियाना टूटि गेल अछि
पत्ताक अंतिम अँउरी पकड़ैत अछि
आ किनगेरीक गील माटिमे
धसि जाइत अछि।
हवा कत्थइ धरतीकेँ पार करैत अछि,
अप्सरासभ विदा भ’ गेलीह।
मधुर टेम्स, धीरे बहू,
जखन धरि हम
अपन गीत समाप्त नहि क’ ली।
नदीमे आब कोनो खाली बोतल,
सैंडविचक कागज,
रेशमी रुमाल, कूटक डब्बा,
सिगरेटक ठूँठ
आ गर्मीक राति केर
कोनो दोसर प्रमाण नहि अछि।
अप्सरासभ विदा भ’ गेलीह।
आ हुनक मित्र,
शहरक मालिक-मुराद सभक
आवारा वारीस;
चलि गेलाह अछि,
कोनो पता नहि छोड़लनि।
लेमनक जलक कातमे
हम बैसि क’ कनलहुँ…
मधुर टेम्स, धीरे बहू,
जखन धरि हम
अपन गीत समाप्त नहि क’ ली।
मधुर टेम्स, धीरे बहू,
किएक तँ हम
बेसी जोरसँ नहि बजैत छी
आ नहि बेसी काल धरि।
मुदा हमर पीठक पाछाँ
एक ठंढा झोंकामे हम सुनैत छी
हड्डिक खड़खड़ाहट,
आ कानसँ कान धरि पसरल ठहाका।
एकटा मुस धीरेसँ
झाड़-झंखाड़मेसँ रेंगैत निकलल
अपन लसलसा पेट माटिपर घिसियबैत
जखन हम ओहि उदास नहरिमे
माछ मारि रहल छलहुँ
जाड़क एक साँझ,
गैस-हाउसक पाछाँ
अपन राजा भाइक
विनाशक बारेमे सोचैत
आ हुनकासँ पहिने
अपन पिता राजाक मृत्युपर
उज्जर नग्न देह नीचाँ नमी वाली धरतीपर
आ हड्डि सभ
एकटा छोट सुखल अटारीमे फेकल,
मुसक पैरसँ खड़खड़ाइत,
साल दर साल।
मुदा हमर पीठक पाछाँ
समय-समय पर हम सुनैत छी
हॉर्न आ मोटरक आवाज,
जे ल’ क’ आएत
बसंतमे स्वीनीकेँ मिसेज पोर्टर ल’ग।
ओह, चान मिसेज पोर्टरपर चमकल
आ हुनकर बेटीपर
ओ सभ अपन पएर
सोडा पानीसँ धोइत छथि
(आह, ओ बच्चा सभक स्वर, गुंबदमे गबैत!)
ट्विट, ट्विट, ट्विट
जग, जग, जग, जग, जग, जग
एहन निर्दयतासँ मजबूर कएल गेल।
तेरियू,
अवास्तविक शहर
जाड़क दुपहरियाक कत्थइ कुहेसक नीचाँ
मिस्टर यूजेनाइड्स, स्मिर्नाक व्यापारी
बिनु बनौल दाढ़ी, पॉकेटमे किशमिश भरने
सी.आई.एफ. लंदन : देखिते दस्तावेज पेश,
हमरासँ साधारण फ्रेंचमे कहलनि
कैनन स्ट्रीट होटलमे
दुपहरक भोजन लेल
आ ओकर बाद मेट्रोपोलमे
एकटा वीकेंड लेल।
बैंगनी बेलामे,
जखन आँखि आ पीठ
डेस्कसँ ऊपर उठैत अछि,
जखन मानुसक इंजन रुकैत अछि
एकटा धड़कैत टैक्सी जकाँ
जे प्रतीक्षारत अछि,
हम ‘टायरेसियस’,
आन्हर भेलाक बादो,
दू टा जीवनक बीच धड़कैत,
झुर्रीदार स्त्री वक्ष वाला बूढ़,
देखि सकैत छी
बैंगनी बेलामे,
साँझक ओ पहर जे
प्रयास करैत अछि
घर दिस, आ नाविककेँ
समुद्रसँ घर अनैत अछि,
टाइपिस्ट चाहक समय घर अबैत अछि,
अपन नाश्ता साफ करैत अछि,
अपन चूल्हा जड़बैत अछि,
आ टिनसँ निकालि क’
भोजन रखैत अछि।
खिड़कीक बाहर
खतरनाक रूपसँ पसरल अछि
हुनकर सूखैत कपड़ा
जे सूर्यक अंतिम किरणसँ छुओल अछि,
दीवान पर ढेरी लागल अछि
(रातिमे ओकर बिछाओन)
मोजा, चप्पल, आ अंतःवस्त्र।
हम टायरेसियस, झुर्रीदार वक्ष वाला बूढ़
एहि दृश्यकेँ देखलहुँ,
आ बाँकीक भविष्यवाणी कयलहुँ—
हमहू ओहि प्रतीक्षित
अतिथि क’ बाट तकलहुँ।
ओ, फुंसी वाला युवक आबैत अछि,
एकटा छोट हाउस एजेंटक क्लर्क,
एकटा ढीठ नजरिसँ,
ओहि नीच लोक सभमेसँ एक
जाहि पर आत्मविश्वास एहन अछि
जेना कोनो अमीर पर रेशमी टोपी।
समय आब अनुकूल अछि,
ओकर अनुमान अछि,
भोजन समाप्त भ’ गेल अछि,
ओ ऊबि गेल अछि
आ थाकि गेल अछि,
ओकरा दुलारमे
ओझड़एबाक कोशिश करैत अछि
जे एखनो धरि नहि रोकल गेल अछि,
यद्यपि अवांछित अछि।
उत्तेजित आ दृढ़,
ओ तुरंत हमला करैत अछि;
टटोलैत हाथक कोनो बचाओ नहि भेटैत अछि;
हुनकर घमंडकेँ
कोनो प्रतिक्रियाक दरकार नहि अछि,
आ ओ विमुखताकेँ स्वागत मानि लैत अछि।
(आ हम टायरेसियस पहिने सब सहि चुकल छी
जे एहि दीवान या बिछाओन पर भ’ रहल अछि;
हम जे थीब्सक देबालक कातमे बैसल छलहुँ
आ मृत लोकक नीच स्थान पर टहलल छी।)
एक अंतिम उपकार वाला चुंबन दैत अछि,
आ सीढ़ी दिस अन्हारमे
रास्ता ठीकिअबैत चलि जाइत अछि…
ओ घुमैत अछि आ एक पलक लेल
अएनामे देखैत अछि,
अपन गेल प्रेमीक बारेमे
ओकरा किछु खास होश नहि अछि;
हुनकर दिमाग एकटा
आधा बनल विचारकेँ ससरय दैत अछि:
‘धौ, आब ई भ’ गेल:
आ हम खुश छी जे ई खतम भ’ गेल।’
जखन सुंदर स्त्री मूर्खता करैत अछि आ
अपन कोठरीमे फेरसँ
एसगरे टहलैत अछि,
ओ अपन केशकेँ मशीन जकाँ
हाथसँ ठीक करैत अछि,
आ ग्रामोफोन पर
एकटा रिकॉर्ड बजा दैत अछि।
‘ई संगीत हमर बगलसँ
पानिपर छिछलैत आएल’
आ स्ट्रैंडक संग-संग,
क्वीन विक्टोरिया स्ट्रीट धरि।
ओ शहर,
हम कखनो काल सुनि सकैत छी
लोअर टेम्स स्ट्रीटमे
एकटा सार्वजनिक बारक कातमे,
मैन्डोलिनक मधुर रोदन
आ भीतरसँ खड़खड़ाहटि आ गप्प-सप्प
जखन मछुआर सब दुपहरियामे
आराम करैत छथि:
जतय मैग्नस मार्टिरक देबाल
आयनियन उज्जर आ
सोनाक अकथनीय वैभव राखने अछि।
…नदी पसेना छोड़ैत अछि
तेल आ कोलतार
नाओ बहैत अछि
बदलैत ज्वारक संग
लाल पाल
चाकर
हवाक अनुकूल, भारी मस्तूल पर झूलैत।
नाओ सब धोइत अछि
बहैत लकड़ीक कुन्दा
ग्रीनविच दिस नीचाँ
डॉग्स आइलैंडक पार।
वेयालाला लेइया
वालाला लेइयालाला।
एलिजाबेथ आ लीसेस्टर
चलैत डाँड़
पाछाँक भाग बनल छल
एकटा सुनहला शंख
लाल आ सोना
फुरतीली लहरि
दुनू कातकेँ हिलोड़ैत
दक्षिण-पश्चिमक हवा
धाराक संग लए गेल
घंटीक आवाज
उज्जर मीनार
वेयालाला लेइया
वालाला लेइयालाला।
‘ट्राम आ गरदसँ भरल गाछ।
हाईबरी हमरा जन्म देलक।
रिचमंड आ क्यू
हमरा तबाह क’ देलक।
रिचमंडमे हम अपन ठेहुन उठेलहुँ
एकटा संकीर्ण डोंगीक फर्श पर चित्त पड़ल।’
‘हमर पैर मूरगेट पर अछि,
आ हमर हृदय हमर पैरक नीचाँ।
घटनाक बाद ओ कानल।
ओ एकटा ‘नब शुरुआत’ क’ वादा कयलक।
हम कोनो टिप्पणी नहि कयलहुँ।
हम किएक रीस करी?’
‘मार्गेट सैंड्स पर।
हम जोड़ि सकैत छी
किछु नहिसँ किछु नहि।
मोइल हाथक टूटल नह।
हमर लोक विनम्र लोक
जे उम्मीद करैत छथि
किछु नहि।’
ला ला
तखन हम कार्थेज अयलहुँ।
जरैत, जरैत, जरैत, जरैत
हे प्रभु, अहाँ हमरा उखाड़ि लिय’
हे प्रभु, अहाँ उखाड़ि लिय’।
पानिसँ मृत्यु
फोनीशियन फ्लेबस,
जकर मृत्युक
एक पख बिति गेल छल।
बिसरि गेल छल
समुद्री पक्षीक कलरव
गहींर समुद्रक लहरि,
आ सभ लाभ-हानि।
एक समुद्री अन्तर्धारा
नहुएसँ ओकर हड्डीकेँ छुबि लेलक।
जेना-जेना ओ
ऊपर-नीचा भ’ रहल छल,
ओ अपन बुढ़ारीसँ जवानीधरिक हर पड़ाओकेँ
स्मृतिक भँवरमे खहरैत चलि गेल।
यहूदी वा गैर-यहूदी,
अहाँ जे जहाजक पहिया घुमाबैत छी
आ हवाक रुख देखैत छी,
फ्लेबसक बारेमे विचार करू,
जे कहियो अहाँ जकाँ
सुंदर आ नमगर-छड़गर छल।
की कहलक ठनका
लाल बीजलोकाक रोशनीमे
घामसँ तीतल चेहरापर
फुलबारीमे अगाध चुप्पीक बाद
पथराएल जगहपर ओहि छटपटाहटिक बाद
ओ चिचिआएब आ कानब
जेल आ महल आ गूँज
दूर पहाड़पर वसंतक बाद गरजैत मेघक
ओ जे जीबीत छल आब मरल छथि
हम जे जीबीत छलहुँ आब मरि रहल छी
कनेक धैर्यक संग।
एतए पानि नहि अछि मात्र पाथर अछि
पाथर आओर पानि नहि
आँकड़-पाथरक सड़क
पहाड़क बीच ऊपर दिस घुमैत सड़क
जे बिनु पानिक नहि सकैछ पहाड़ अछि
जँ एतए पानि होइत तँ हम रुकितहुँ पीबतहुँ
पाथरक बीच केओ रुकि नहि सकैछ
सोचि नहि सकैछ
घाम सूखि चुकल अछि आ
पएर रेतमे अछि
जँ एहि पाथरक बीच केवल पानि होइत
सड़लहा दाँत बला मुइल पहाड़क मुँह
जाहिपर थूको नहि फेक सकैत छी
एतए ने कियो ठाढ़ भ’ सकैछ,
ने ओँधरा सकैछ आ ने बैसि सकैछ।
पहाड़मे शांति सेहो नहि अछि
खाली बिना बरखाक
सूखल बाँझ गड़गड़ाहटि अछि
पहाड़मे एकांत सेहो नहि अछि
बेजा माटिक दरारि फाटल घरक दरवाजासँ
लाल उदास चेहरा मुँह दुसैत अछि
आ गोंङिआइत अछि।
…जँ पानि होइत
आ पाथर नहि होइत
जँ पाथर होइत
आ पानि सेहो होइत
आ पानि
एक झरना
पाथरक बीच एक लय
जँ मात्र पानिक स्वर होइत
झींगुर नहि!
आओर गाबैत सूखल घास नहि
पाथरपर गिरैत पानिकी स्वर
जतए देवदारक गाछमे
‘हर्मिट-थ्रश’ पक्षी गबैत अछि
ड्रिप, ड्रॉप, ड्रिप, ड्रॉप, ड्रॉप, ड्रॉप, ड्रॉप
मुदा एतए पानि नहि अछि।
ओ तेसर के छथि जे
सदिखन अहाँक संग चलैत अछि ?
जखन हम गनैत छी तँ खाली अहाँ आ हम छी
मुदा जखन हम आगु सड़कपर देखैत छी
ओतए सदिखन एकगोटे आओर छथि
जे अहाँक बगलमे चलि रहल छथि
एकटा भूरा चोगा लपेटने, माथ झपने
हम नहि जनैत जे ओ पुरुख छथि वा स्त्री
—मुदा ओ के छथि जे अहाँक दोसर कात छथि?
हवामे ओ केहन स्वर अछि
मातृवत विलापक बुदबुदाहटि
ओ कोन नकाबपोशक हेँज उमड़ि रहल अछि
अंतहीन मैदानपर, फटल धरतीमे लड़खड़ाइत
मात्र सोझ क्षितिजस घेराएल
पहाड़क ओहिपार ओ कोन शहर अछि
जे बैंगनी बसातमे दरकैत अछि,
बनैत अछि आ फाटि जाइत अछि
गिरैत मीनार
‘जरूशलेम एथेंस अलेक्जेंड्रिया वियना लंदन’
अवास्तविक।
एकटा स्त्री अपन पैघ कारी केश
कसि क’ खींचलक
आ ओहि तरेगनपर फुसफुसाइत
संगीत बजओलक
आओर बैंगनी जोतिमे चमगादड़
जकर चेहरे नेना जँका छल
सीटी बजबैत अपन
पांखि फड़फड़ब’ लागल
आओर एक करिया देबालपर
माथक केश नीचा लटकए लागल
आ हवामे उनटा लटकल मीनार छल
जे स्मृतिक घंटा बजा रहल छल
आओर खाली हौज आ
सूखल इनारसँ निकलैत गबैत स्वर।
पहाड़क बीच एहि सड़ल बिहुरमे
मद्धिम चांदनीमे, घास गाबि रहल अछि
छिड़ीआएल कब्रकेँ ऊपर,
ओहि प्रार्थनालय ल’ग
ओतए खाली प्रार्थनालय अछि,
खाली हवाक घर।
एकर खिड़की नहि अछि,
आओर दरवाजा झूलि रहल अछि,
सूखल हड्डी ककरो
नोकसान नहि पहुँचा सकैत अछि।
छतपर मात्र एक मुर्गा ठाढ़ छल
को को रिको को को रिको
बिजलीक एक कौंधमे।
फेर एक सिमसल हवाक झोंका
बारखा ल’ क’ आएल।
गंगा सूखल छली आ सुस्त पात
बारखाक बाट जोहै छल,
जखन की कारी मेघ
दूर हिमालयक ऊपर
जमा भ’ रहल छल।
जंगल दुबकि गेल, चुपचाप
निहुरल
तखन बीजलोका बाजल
दा
दत्त : हम की कहलहुँ ?
हमर मित्र, हमर हृदयकेँ कंपकपबै बला रक्त
आत्मसमर्पण! एक पल केर ओ डेराओन साहसि
जकरा समझदारीक एक युग सेहो
केखनो घूरा नहि सकैत अछि
एहिसँ, आओर मात्र एहिसँ,
हमर अस्तित्व रहल अछि
जे हमर शोक-संदेशमे नहि भेटत
वा मकड़ी द्वारा झाँपल स्मृतिमे
स्मृति वा विरासत वास्तवमे
कोनो वकील द्वारा कएल गेल
औपचारिक, सीलबंद कानूनी दस्तावेजमे
नहि पाओल जाइत अछि
दा
दयध्वम् : हम कुँजीक स्वर सुनल अछि
दरबज्जामे एक बेर घूमबैत आ मात्र एक बेर
हम कुँजीक सम्बन्धमे सोंचैत छी,
सभ केओ अपन जेलमे
कुँजीक सम्बन्धमे सोंचि क’,
सभ केओ अपन कैदि पक्का करैत अछि
मात्र राति बितलापर, अलौकिक अफवाह
एक घड़िक लेल टुटल
‘कोरियोलेनस’क पुनर्जीवित करैत अछि।
दा
दम्यत : नाओ प्रतिक्रिया देलनि
प्रसन्नतासँ, पाल आ चप्पू चलबए बला
कुशल हाथक समुद्र शांत छल,
अहाँक हृदय सेहो प्रतिक्रिया दैछ
प्रसन्नतासँ, आमंत्रित कएलापर,
आज्ञाकारी धड़कैत
नियंत्रित करए बला हाथक प्रति।
हम किनहेरी पर बैसल छलहुँ
माछ पकड़ैत,
अपन पछारी सुखल मैदान लेल
की कमसँ कम हम
अपन जमीनकेँ व्यवस्थित क’ लिय?
लंदन ब्रिज खसि रहल अछि
खसि रहल अछि, खसि रहल अछि
फेर ओ ओहि आगिमे
विलीन भ’ गेल जे ओकरा शुद्ध करैत अछि
—ओ अबाबील अबाबील
(हम कहिया अबाबील पक्षी जँका बनब)
ध्वस्त मीनार बला एक्विटाइन केर राजकुमार
एहि टुकड़ाकेँ हम अपन
खंडहर बुझि क’ जोगौने छी
“तँ फेर हम अहाँक इच्छा पूरा करब।”
हीरोनिमो फेरसँ बताह भ’ गेल अछि।
दत्त। दयध्वम्। दम्यत।
शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!!
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