रचल प्रदीप हमहुँ से जानल (षष्ठिपूर्ति पर विशेष)
सम्पादक: ऋषि बशिष्ठ, दीप नारायण , | प्रस्तुति चतुरंग प्रकाशन बेगूसरायप्रकाशकीय
प्रस्तुत पोथीक प्रकाशनक पहिलुक एकटा छोटछीन खिस्सा कहऽ चाहैत छी। बेगूसरायक किछु रंगकर्मीसँ गपसपमे अनचोके ई बात बहरयलैक जे 05 मार्च 2023 कऽ प्रदीप बिहारी जी अपन जीवनक साठिम वर्ष पूरा कऽ रहलाह अछि। भेलैक जे एहि अवसरकें अविस्मरणीय बनाओल जाय।
Contents
- रचल प्रदीप हमहुँ से जानल (षष्ठिपूर्ति पर विशेष)
- प्रकाशकीय
- सम्पादकीय
- अपन पीढ़ीक संग आ ओहिसँ एक डेग आगाँ
- ‘हे रौ’ पढ़लाक बाद
- प्रदीपक मादे किछु-किछु…
- प्रदीप बिहारी अखण्ड मिथिलाक कथाकार छथि
- अपन बाटक बटोही
- कोखि: कथ्य आ शिल्प
- कलाप्रेमी लोकक नियति
- प्रवासीक व्यथा, वेदना, विवशता
- नव प्रौद्योगिकीक अथवा ‘फील गुड’क?
- लोक-आस्थाक समांग: प्रदीप बिहारी
- विसंगतिक बीचमे सहज सन्धान
- विसंगतिसँ लड़ैत मानवीय साहसक रचनाकार
- प्रदीप बिहारी: हमरा नजरि मे
- साहित्यिक विविधताक संतुलित समीकरण
- ‘कोखि’ पढ़लाक बाद
- उपेक्षित पात्रक सुधि लैत कथाकार
- एकटा जिम्मेदार उपन्यासकार
- नीक लागल ‘कोखि’
- रंगकर्म आ रचनाकर्मक स्रष्टा आ द्रष्टा
- प्राकृतिक नहि राजनीतिक छल मृत्युलीला
- प्रदीप बिहारीक रचनाक भौगोलिक विस्तार
- ‘अपराजिता’ टीमक उमेद नहि तोड़लनि
- फेसबुक पर आयल किछु प्रतिक्रिया
- सऽर-समांगक उद्गार
- मल्लिक परिवार आ मैथिली साहित्यक प्रकाशपुंज
- भैया: हमर घरक गार्जियन
- अहाँक अभिरुचिक साक्षी छी हम
सम्पादकीय
प्रदीप बिहारी एकटा श्रेष्ठ कथाकार, एकटा श्रेष्ठ उपन्यासकार, एकटा श्रेष्ठ अनुवादक, एकटा श्रेष्ठ सम्पादक, एतेकमेसँ जएह कहि सकी सएह समुचित। प्रदीप बिहारीक नाम सभ विधामे अग्रगण्य छनि। आ से, मैथिली साहित्य मात्रामे नहि, हिनक कथा-उपन्यास अनेको अन्य भारतीय भाषामे अनूदित आ प्रकाशित छनि। ओना लिखलनि कविता सेहो। नेपालीक प्रसिद्ध कविता सभक अनुवाद सेहो कयलनि, से प्रकाशितो छनि, मुदा गद्य विधामे जे हिनक विराट परिचिति बनलनि से सूर्यक समान भास्वर भेल।
प्रदीप बिहारी जतय रहलाह अछि ओही जगहकें उर्वर बनबैत रहलाह अछि। सम्पादकीय
अपन पीढ़ीक संग आ ओहिसँ एक डेग आगाँ
प्रदीप बिहारी मैथिलीक एक महत्वपूर्ण कथाकार छथि। कथा कहबाक जे ढंग छैक, तकरा ओ प्रभावशाली बनओलनि अछि। कथाकारक सही परीक्षा थिकैक ओ कथामे कतबा विश्वसनीय लगैत अछि। एहि परीक्षामे ओ सफल भेल छथि। बेसी काल हुनक कथामे उत्सुकता जगयबाक आ ओकरा अंत धरि जगा कए राखबाक गुण भेटैत अछि। कथाकार एहि गुणक कारणें कथा-गोष्ठी सभमे आदरपूर्वक सुनल गेलाह अछि। नारी विषयक कथा मैथिलीमे कम लिखल गेल अछि। राजकमल चैधरी अपन कथा सभमे एहि विषयकें उठओलनि। एहि भाषाक पाठककें अवचंक भेलैक जे ई कोन लेखक एतबा साहस प्रदर्शित कए रहल अछि। एहि साहसक लेल पाठकक एक वर्ग हुनक बहुत निन्दा कयलक, दोसर वर्ग हुनका महत्वपूर्ण आसन प्रदान कयलक। जखन नारी विषयक कथा उठबैत छथि, तँ हिनको साहसकें रेखांकित करबाक स्थिति बनैत अछि।नारीकें मनुक्ख बुझबाक, ओकरा पुरुषक समकक्षी बुझबाक साहस प्रदीप बिहारीक कथा सभमे अछि। तें ई लेखक महत्वपूर्ण छथि। जीवकान्त
‘हे रौ’ पढ़लाक बाद
अंग्रेजीक शौर्ट स्टोरी के अपना ठाम कथा कहल गेलै। तखन अयलै लघु कथा। आब तँ बीहनि कथा सेहो चललैए। एखन हमरा सोझाँ एक गोट सद्यः प्रकाशित लघु कथा संग्रह अछि- हे रौ। एही शीर्षकक लघु कथाक नाम पर पोथीक नाम राखल गेल अछि। कथाकार छथि बहुआयामी व्यक्तित्वक स्वामी कन्हौली मल्लिक टोल, खजौलीक निवासी प्रदीप बिहारी। नेपाल सँ कहियो हिलकोर नामक त्रौमासिक पत्रिका बहार करैत रहथि। नेपाली सँ मैथिली आ हिन्दी मे अनुवाद करैत रहैत छथि। खजौली स्कूल मे जीवकान्त जीक प्रिय छात्रा रहल छथि। अपना नाम जीवकान्त जीक तमाम पत्राक एक पुस्तक प्रकाशित कयने छथि, नाम छैक- स्वस्ति श्री प्रदीप बिहारी। साहित्य संस्कृति आ भाषा प्रसंग जीवकान्त जीक विचार के बुझबाक लेल बेश सहायक अछि ई किताब। एखन सरि भऽ साठि वर्षक नहि भेलाह अछि तथापि मैथिली, नेपाली आ हिन्दीक आँगन मे जतबा काज हिनका सँ संभव भेल अछि, से ठीके स्पृहनीय। उचिते बहुत पूर्वे हिनका साहित्य अकादेमी पुरस्कार सँ सम्मानित कैल जा चुकल अछि। भारतीय स्टेट बैंकक व्यस्त नौकरी करैत जतबा ई लेखन आ सम्पादन संभव कयलनि से ककरो लेल अनुकरणीय। विसूवियस प्रभृति छओ गोट उपन्यास प्रकाशित छनि, औतीह कमला जयतीह कमला कथा संग्रह छनि। खण्ड खण्ड जिनगी नामक लघुकथा संग्रहक बाद ई विचारणीय किताब आयल अछि। स्वागत। लघु कथा की थिकैक? कम शब्द मे अधिक कहबाक सौकर्य थिकैक। आजुक व्यस्त लोकक लेल अनुकूल। व्यंजना प्रधान ई अणुगल्प औपन्यासिक कथ्य लेने भेटत। देखन मे छोटो लगे, घाव करे गंभीर। सम्मान समारोह मे सम्मानक पाछाँक राजनीति देखल जा सकैत अछि। ‘सत्संगी’ केहन बढियाँ छूआछूत पर चोट करैत अछि। ‘थापड़’क बेदराक स्वाभिमान कोना प्रत्यक्ष भऽ जाइछ जखन ओ कहैत छै जे हमे हथ उठाइ नहि लै छिकियै साहेब। बूड़ि कथा केहन व्यंग्य करैछ ई कहि जे जनकल्याणक काज करब बूड़ित्व थिक। बेटीक प्रति समाजक सोच के देखार करैत ‘संतान’ आ नौरिन के ‘मीना अंटी’ कहि कुसंस्कारी होयबाक विचार केहन दिव्य। नीक लागल किताब। ठीक लागल विचार। कीत्र्ति नारायण मिश्रक बेगूसराय के प्रदीप मे एक सुयोग्य आ सक्रिय उत्तराधिकारी भेटलैक अछि। अपन लेखन तँ करिते छथि संगहि मैथिली के अनुवाद द्वारा जे व्यापकता प्रदान करैत छथि, ताहि हेतु प्रशंसाक पात्रा छथि। हमरा सदा हिनक लेखक प्रिय रहल अछि, हिनक काज जँचल अछि। भीड़ मे रहैत अपना के बचा राखब नान्हि टा बात नहि। पोथीक हार्दिक स्वागत। एखन अंतरंगक उन्नैसम अंक पढि रहल छी। अभिनन्दनीय छी अहाँ। एहन चैचक समांगक आर आवश्यकता बुझाइछ। जय मैथिली। कहबाक प्रयोजन नहि जे स्वातंत्रयोत्तर साहित्यक यथार्थ वास्तव मे प्रगतिवादी यथार्थ थिक। यैह यथार्थ आइयो साहित्य के प्रासंगिक बनबैछ, समय सापेक्ष रहनहि समाजक व्यथित रग पर हाथ देबाक प्रयोजन। आदर्श आ यथार्थक द्वन्द्व आजुक लेखन मे विलीन होइत भेटत। अपन विभिन्न साहित्यिक विधाक ई नवीनीकरण हमरा सदैव प्रमुदित करैत रहैत अछि। जखन कखनो हम अशोक, तारानन्द वियोगी, विभूति आनन्द आ कि शिवशंकर श्रीनिवास के पढैत छी, ई सत्य झलकि कऽ हमरा अपना दिस आकृष्ट कऽ लैत अछि। भाषा परिवेश पर बाद मे ध्यान जाइत अछि। प्रदीप बिहारी मैथिली लेखनक एक महत्वपूर्ण नाम थिक। बहुत रास अनुवाद कयने छथि। हिन्दी मे सेहो गति छनि, गोटे पत्रिको बहार करैत छथि। हिनक विसूवियस उपन्यास एक परतार खूब चर्चा मे रहल छल। एखन पढ़ल अछि हिनक सद्यः प्रकाशित उपन्यास कोखि। विलक्षण। कोखिक महत्व के जेना ई वृहत्तर समाजक हित मे तिरोहित कयलनि अछि, से नव थिक। पल्लवी, श्वेता, शुभा, प्रतीक, अनुपम तमाम पात्रा विश्वसनीय। होटल हो वा घर, सभ ठाम लेखक सावधान छथि। भौमिकक चरित्रा अलगे बंगालक शरत चन्द्रीय आभा के मोन पाड़ि दैत छैक, मुदा लगले ताहि आभामंडल सँ कुशलता पूर्वक बहरा जाइछ। बहुत दिन पर मैथिली मे फेर एकटा नीक उपन्यास पढबाक अवसर भेटल जाहि मे सरोकारक संग समुचित सहकारो छै, भावना संग औचित्यक विचारो छै, मात्सर्य संग मलारो छै। हम अपन अनुज रचनाकारक अभिनन्दन करैत गौरवान्वित छी, चाहैत छी जे एहिना अविरल गंगा जकाँ बहैत रहथि। सरोगेसी नहि, कोखि। पठनीय कृतिक हार्दिक स्वागत। —उदय चन्द्र झा ‘विनोद’ विभूति आनन्दप्रदीपक मादे किछु-किछु…
आब ठीक सँं स्मरणो नहि अछि. कत्ता वर्ष भऽ गेलै। ओना तकर प्रयोजन सेहो नहि रहल। कारण, मेनका एक दिन फोन कयलनि- ‘प्रदीप साठिक भऽ रहल छथि! सोचै छिऐ जे एहि अवसर कें स्मरणीय बनयबाक लेल हुनकापर केंद्रित एक पुस्तिका प्रकाशित करी…’ आ से तें विश्वास नहियों करैत विश्वास करय पड़ल। कारण हुनक फोटो आ रचनात्मकता सँं ई कखनो बूढ़ नहि लगलाह। छथिहो नहि। जँं रहितथि तँं कथमपि नहि कहने रहितथि, ‘भाइ! हमर पुत्रा अपन सहकर्मिणी संग विवाह करताह! आबी तँं नीक लागत!’ ओना एकबेर कहने रहथि,दृ‘भाइ! एखन एसगरे छी। मेनका अपन पौत्राक परिचर्या लेल पुत्रा-पुत्राबधूक संग रहि रहलि छथि!’ एही क्रम मे ईहो कहलनि,दृ‘भाइ, भाबहु एहि बेर सँं छठिक हाथ उठौतीह! ताही मे जा रहल छी। हम मुदा घुरि आयब, पत्नी पुत्रा लोकनिक संग ओतहि चल जयतीह।’ तैयो मोन नहि मानैत अछि! कारण हमरा आँखि मे प्रदीपक एकटा एहन फोटो सुरक्षित अछि, जे हमरा अपन एक कथाक संग ओ पठौने रहथि। तहिया हम ‘लालधूआँ’ नामक पत्रिकाक संपादन करैत रही। ओ फोटो एकदम सँ काॅंच, मुदा ‘कैचिंग’ छल! आ से एखनो ओ ‘कैचिंग फेस’ हमर आँखि मे अनामति अछि! बाल-सुलभ भाव छलकैत रहैत छनि, चेहरा पर सेहो, बात-व्यवहार मे तँं सहजहिं। से हमरा लगैत अछि, लगैत की अछि, मानैत छी जे प्रेमिल हृदय अधिक रचनाशील, कल्पनाशील होइत अछि। आ ओ व्यक्ति जँं सही मे प्रेम करैत अछि, अथवा कहियो कएने रहैत अछि, आ तकरा अपन हृदय मे जोगने जावंतो स्वप्निल भेल रहैत अछि, ओ व्यक्ति कथमपि बूढ़ नहि भऽ सकैत अछि! ओना भनहि नोकरी लेल ओ अनफिट कऽ देल जाइत हो, आ ओकर नाम संग ‘रिटायर’क तमगा लगा देल जाइत होइ, सही अर्थ मे चिर-युवा रहैत अछि। प्रदीप, माने प्रदीप बिहारी, एकर सद्यः बानगी छथि! हम एमहर ‘रिटायरमेंट’क बाद (ई शब्द मजबूरी मे लिखऽ पड़ि रहल अछि। विश्वविद्यालय हमरो संग प्रदीपे सनक दुव्र्यवहार कऽ चुकल अछि) कही तँं काफी मात्रा मे ‘टीनएजर्स कथा’ लिखलहुँ! एना कही जे मैथिली समाज लेल मोटा-मोटी अपैत आ अपवित्रा प्रसंग सभ पर कथा लिखब मैथिली मे वर्जिते जकाँं रहैत अयलैक अछि, किछु अपवाद कें छोड़िकऽ। चर्चाक क्रम मे घुमा-फिरा कऽ वएह ललितक ‘मुक्ति’, आकि कल्पना शरण (लिली रे)क ‘रंगीन परदा’ वा राजकमल चैधरीक गोटेक, अथवा धूमकेतुक आकि प्रभास कुमार चैधरीक कथा… एखन ओ सभ वर्जना टुटलै अछि। एमहर देखादेखी हम सेहो किछु रिस्क उठौलहुँ अछि! आ से कही तँ किछु बेसिये उठबैत अयलहुँ अछि। भरिसक सएह सभ पढ़लाक बाद प्रदीप एक दिन फोन पर कहलनि,दृ‘भाइ, हमरो पर केंद्रित एकाध कथा लिखियौक ने!’ हम पहिने चैंकलहुँ। फेर त्वरित प्रतिक्रिया आयल,दृ‘जुलूम भऽ जेतै!’ ‘तऽ की हेतै, लिखियौक ने!’ से एतऽ हम ई साफ करऽ चाहैत रही जे एहन करेज लऽ कऽ जीनिहार कतहु रिटायर होअय! तें हम व्यक्तिगत रूप सँ एहन रूढ़ मान्यता कें सोझे, सिराउरे पर सँ खारिज करैत छी! फेर एहि ठाम अबैत-अबैत हम प्रदीपक विरुद्ध एक ललकार देबाक लेल बाध्य होइत छी जे ओ अपन कथा अपने किएक नहि लिखैत छथि! आ से ताही मूड मे एक दिन कहलियनि,दृ‘अहाँ अपने किएक नहि लिखैत छी?’ ओ पहिने बालसुलभ स्वभाव संग बिहुँसलाह। फेर अस्पष्ट सन स्पष्ट होइत बजलाह,दृ‘लिखबै भाइ, लिखबै…’ ‘आकि डर होइए?’ हम प्रत्यक्ष रूप सँ ललकारि देलियनि। तखन ओ मजबूत स्वर मे कहलनि,दृ‘नै नै, डर कथी लेल हेतै भाइ! समय आबऽ दियौ, सभ टा चिट्ठी सुरक्षित अछि! आ से गाम सँ लऽ कऽ…’ आ हम आस्वस्त भेल रही। तें आइ पुनः सोचैत छी जे आत्मसंस्मरण ओ स्वयं लिखथि तँ से काफी समीचीन होइतय! कारण हिनक रचना सभक चित्रात्मकता ईष्र्ये होइत छनि। हमरा तें कखनो-काल हिनका सँ एहि गुण लऽ कऽ ईष्र्या सेहो होइत रहैत अछि! प्रायः एहने सनक कोनो मानसिकता रहल होयत जे हिनक पहिल कथा ‘लालधूआँ’ मे छपने होयब! एतऽ एखन हम आत्मसंस्मरणक चर्च कयलहुँ छल। हम मानैत छी जे आत्मसंस्मरण आकि आत्मकथा वस्तुतः एक तरहक आत्मसाक्षात्कार करब सनक होइत अछि! जँ कोनो लेखक एना कऽ कऽ सोचैत छथि, आ जे अन्दर सँ तथाकथित कोनो टा वर्जित क्षेत्रा कें नहि मानैत अछि तँ ओहन रचना सभदिना पठनीय रहैत अछि। प्रदीप बहुत रास घाटक पानि पीने छथि! जँ साहस करथि तँ मैथिली कें सेहो रसीदी टिकट, आकि कमला दासक डायरी सनक कृति भेटि सकैत अछि। कदाचित राजकमल चैधरीक एकाधिकार सेहो टुटि सकैत अछि! ओना हम अनुभव करैत छी जे प्रदीप जी एहि प्रसंग पारम्परिक मैथिल-भाव मे आबि जयताह! तें हमरा कलम सँ लिखाबऽ चाहलनि! हम लीखि सकैत रही, आ जे किछु बूझल अछि, किछु पूछि कऽ सेहो कोनो बेजाय नहि लिखि सकितहुँ। मुदा हमरा संग संकट ई अछि जे ओ हमरा अपन जेठ भाय मानैत छथि! चलू ई सेहो कोनो तेहन संकट नहि छल। मूल संकट ई अछि जे हमर दिवंगता पत्नी ज्योत्स्ना चंद्रम हिनक धर्मपत्नी मेनका कें अपन छोट दियादिनी सम मानैत रहलथिन! आ एहि मामला मे ओ काफी पारंपरिक रहथि… तखन एहि स्थल पर आबि हमर सोझा एक त्रिकोण सन बनैत अछिदृप्रदीप, वियोगी आ नवीन! ई तीनू अपन अपन अवस्थाक अंतरंग रहल छथि! तें हम सोचैत छी जे ई तीनू मित्रा यदि पत्रात्मक शैलीक आधार लऽ कऽ अपन-अपन जीवनानुभव लिखथि, तँ ‘तीन पंथ, एक काज’ भऽ जैतय! ओना हमरा एना कऽ सोचबाक संदर्भ मात्रा प्रदीप छथि। होयत की, कहब मुश्किल अछि… खैर जे-से, हम कतय-सँ-कतय चलि गेलिऐ! एहनो कतहु सोचब भेलैए! अनुज मित्रा प्रदीप बिहारी आइ अपन साहित्य-यात्राक अनेक-अनेक पड़ाव कें पार कऽ चुकल छथि। तथापि यात्राशील छथि। भूख एखनो यथावत छनि। तें ई रिटायरमेंट हिनका मे अलग बोध कराबय, ई ‘री टायर’ होथि, से के नहि चाहत! हम तँ चाहिते छी। नेनपने सँ एक टा लोकोक्ति सुनैत आबि रहल छी साठा तब पाठा! प्रदीप बिहारी ट्यूशनियाँ मास्टर रहलाह, रंगमंचक कलाकार भेलाह, देश-विदेशक विभिन्न पत्रा-पत्रिका केर माध्यम सँ साहित्यकारिता कयलनि, बैंकिंग सेवा मे तँ छथिहे, शाही-गैर शाही पुरस्कार/सम्मान भेटिते रहलनि। आ से एहि छोट सन जीवन मे आर की चाही! ओना तँ भूखक कोनो इयत्ता नहि छै, तथापि हमर कामना अछि जे हमर अनुज सखा आर-आर नब क्षितिज कें पयबाक चेष्ठा करथि, आ बेर-बेर हमरा गौरब-बोध भेल करय जे हम आ प्रदीप बिहारी दूनू एक्कहि समकाल मे रचनाशील रहि आगू-पाछू चलैत रहलहुँ… भऽ सकैछ, प्रदीप कें हमर उक्त पंक्ति पर आपत्ति होनि! मुदा हम दूनू समकालीन तँ छीहे! आ कतहु-कतहु तें मन प्रसन्न भऽ गेल करैत अछि जे बेसीठाम हमरा सँ ओ बीस पड़ि जाइत छथि! आ से एना कऽ कऽ सोचब हमरा अपना अंदर सँ आर पुष्ट करैत अछि! एकदिन प्रदीप स्मरण दियौलनि जे एकबेर हम अहाँ संग ट्रेनक यात्रा मे रही। ओहि क्रम मे अहाँ हमरा भरि बाट समकाल, समकालीनता आ सोचक अद्यतन ‘ट्रेण्ड’ सभ सँ सोझा-सोझी करबैत, आधुनिक साहित्य-लेखनक प्रसंग बहुत रास ‘टिप्स’ देने छलहुँ! ठीक छै, कहलनि तँ मानि लेलियनि। मुदा ईहो भाव आब आजुक पीढ़ी कहाँ स्मरण रखैत अछि! वस्तुतः एहि अतीत कें मोन रखैत ओ ई कहबाक चेष्टा कयलनि छलाह जे भाइ, हमर रचनाकार बइमान नहि अछि! से सही कही तँ रचनाकार बइमान होइतो नहि छथि! आ इएह कारण अछि जे प्रदीप अपन साहित्ययात्रा मे अविवादित रहि एकनिष्ठ भाव सँ लेखन-मनन-चिंतन मे निरत रहलाह अछि। सदा प्रसन्न, आ कोनो टा कटुसत्यो कें हँसैत-मुस्कैत, मुदा अपन निज विचार कें व्यक्त करबा मे तोतराइत नहि छथि! एकर कारण हमरा इएह लगैत अछि जे, जेंकि सकारात्मकता हिनक स्थायी भाव रहल छनि, ई साहित्यिक गुटबंदी मे कतहु नहि देखाइत छथि. मतलब ई जे साहित्यिक गुटबंदी सँ दूरी राखब, सफलता आ सही लेखनक हथियार अछि! अशोकप्रदीप बिहारी अखण्ड मिथिलाक कथाकार छथि
प्रदीप बिहारीक कथामे मिथिलाक आम लोकक सुख-दुख, इच्छा-आकांक्षा आ मनोरथक अभिव्यक्ति भेल अछि। एहि तथ्य कें हिनक कथा ‘मोटबाह’, ‘नौरी’, ‘सरोकार’, ‘गमला मे धान’ आदि कतोक कथा सभ मे देखल जा सकैत अछि। एहि ‘आम’ आदमी मे मिथिलाक स्त्राी सेहो छथि। प्रदीपक सरोकार स्त्राीक शक्ति-संपन्नता सँ सेहो संपृक्त रहल अछि。 अंग्रेज मिथिला कें दू भाग मे बाँटि देलक। नेपाली मिथिला आ भारतीय मिथिला। मुदा, ई बंटवारा राजनीतिक आ प्रशासनिक स्तर पर भलें होअए, सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर कहियो नहि भऽ सकल। मैथिलीक एहि विभाजन के दुनू देशक साहित्यकार मन सँ कहियो ने स्वीकारलनि। किछु साहित्यकारक लेखन मे दुनू कातक मिथिलाक जनजीवन आयल अछि। मैथिली कथा मे डाॅ. धीरेन्द्रक बाद प्रदीप बिहारीक कथा सभ मे मिथिलाक जनजीवन आयल अछि, जतऽ नेपाल आ भारतक भेद नहि अछि। अतः प्रदीप अखण्ड मिथिलाक कथाकार छथि। हिनक कथा मे पाया (सीमा) वा ‘देबाल’ नहि अछि। ई बात प्रदीप बिहारी के कथाकारक रूप मे कोनो समकालीन कथाकार सँ फराक करैत अछि। प्रदीप बिहारी साहित्यकर्मीक संग-संग रंगकर्मी सेहो छथि। रंगकर्म मे हिनक संलग्नता, अनुभव आ सोच हिनक कथा सभ मे अपन प्रभाव छोड़ैत अछि। एहि प्रभावक प्रसार कथ्य सँ कतोक कथाक शिल्प धरि मे देखल जा सकैत अछि। कथाक संग मैथिली उपन्यासमे सेहो प्रदीपक विशिष्ट अवदान अछि। हिनक पहिल उपन्यास मिथिला मिहिरमे 1983 ई. मे प्रकाशित भेल ‘गुमकी आ बिहाड़ि’। ई पोथी वर्ष 2022 मे पुस्ताकाकार छपल अछि। उपन्यास मे एक पीड़ित प्रताड़ित नवयुवतीक आत्मविश्वास आ प्रतिरोध उजागर भेल अछि। एही संग प्रदीप एहि उपन्यास मे धर्ममे पैसल शोषण तंत्राक वास्तविकता आ शोषकक अनैतिक आचरण के सेहो देखार केलनि अछि। ‘विसूवियस’ (1986) उपन्यास नेपालक जनजीवन पर आधारित अछि। उपन्यास मे मधेशी क्षेत्राक समाज, पहाड़ी आ मधेशीक बीच भेदभावक चित्राण अछि तँ बेरोजगारी आ मिल मालिकक द्वारा जन-मजदूरक शोषणक विरुद्ध प्रतिरोधक स्वर सेहो अछि। ‘शेष’ (2012) उपन्यास मिथिला मे आयल सामाजिक-सांस्कृतिक आरोह आ अवरोह के देखबैत अछि। ई उपन्यास रंगमंच आ रंगकर्म पर एक सार्थक विमर्श प्रस्तुत करैत अछि जे मैथिली उपन्यास सभमे एकरा एक फराके परिचिति प्रदान करैत अछि। ‘जड़ि’ (2013) उपन्यासमे तीन पीढ़ीक सोच-विचारमे आयल परिवर्तन के रेखांकित कयल गेल अछि। एहिमे सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन के सामूहिकताक भावना मे लोप होइत जेबा पर सेहो चिन्ता प्रकट कयल गेल अछि। ‘कोखि’ (2020) उपन्यास मे एक व्यापक मानवीय विमर्श अछि। कोखि के एक फराक आ सम्माननीय नजरिसँ देखल गेल अछि। प्रेम, दाम्पत्य, संस्कृतिकर्म, महत्वाकांक्षा आदिक बीच एक उदात्त मानवीय संवेदना एहि उपन्यास मे उभरि कऽ आयल अछि। ‘मृत्युलीला’ (2021) कोरोना त्रासदी पर आधरित एक अनुभूति सम्पन्न उपन्यास थिक। एहिमे भोगल दुख, कष्ट, भय, आशा-निराशा, मानसिक तनाओ आदिक मनोवैज्ञानिक चित्राण अछि। एहि उपन्यासक महत्ता एहिमे आयल यथार्थक कारणें कालांतरमे आर जीवंत आ सार्थक रूपमे सिद्ध होयत। प्रदीपक सभ उपन्यास अपन समयक संवेदनासँ एकाकार होइत एक सामाजिक-सांस्कृतिक मनुक्ख होयबाक लेल प्रेरित करैत अछि। कथा हो वा उपन्यास प्रदीप बिहारी सभ दिन ओहि समयक ज्वलंत प्रश्न सभसँ टकराइत मनुखताक पक्षमे ठाढ़ भेटैत छथि। बिना कोनो तामझाम, शिल्पक दुरुहता के प्रदीप अपन रचनामे सहजतासँ बात करबाक लेल जानल जाइत छथि। अपन जीवन आ रंगकर्म मे सक्रियतासँ उपजल जीवन-दृष्टि हिनक रचना-दृष्टि बनल अछि। एक संस्कृति कर्मी के रूपमे ई जे अनुभव करैत छथि, भोगैत छथि, ओकरा एक व्यापक मानवीय संदर्भमे प्रस्तुत करैत छथि। यैह ओ तत्व थिक जे कोनो सीमा, धर्म आ क्षेत्रासँ ऊपर उठा सामान्य मनुक्खक पक्ष मे ठाढ़ करैत अछि। ओ अखण्ड मिथिलाक मानवीय संवेदनाक कथाकार छथि। शिवशंकर श्रीनिवासअपन बाटक बटोही
प्रदीप बिहारी आब अपन नोकरीसँ अवकाश ग्रहण करता, किंतु एखनो ओ युवा छथि। युवा छथि अपन वैचारिकतासँ, अपन लेखनसँ, जाहिमे हिनक विचार प्रकट होइत अछि। पहिरन-ओढ़न सेहो युवा सन रहैत छनि। अपन मातृभाषाक प्रति अद्भुत लगाव छनि। गाम छनि कन्हौली (मधुबनी) रहैत छथि बेगूसरायमे, किन्तु गामक प्रति जुड़ाव हिनक उपन्यास ‘शेष’ मे देखि सकैत छी। गामक विकासक सुन्दर कथा एहि उपन्यासमे आयल अछि। अपन ढंगक अद्भुत उपन्यास अछि ओ। ओना प्रदीप बिहारी कथाकार, उपन्यासकार आ रंगमंचसँ जुड़ल कलाकार सेहो छथि। ‘अंतरंग’ नामक हिंदीक अनुवाद पत्रिकाक सम्पादक सेहो छथि। जाहि माध्यमे भारतक विभिन्न भाषाक अनुवाद, जाहिमे अपन भाषा मैथिलीक अनुवाद सेहो प्रकाशित होइत अछि। उक्त पत्रिका माध्यमे ई भारतीय भाषा सभके आपसमे जोड़ैत छथि, जे अद्भुत कार्य अछि। अनुवादक रूपमे सेहो हिनक पोथी सभ आयल अछि। हिनक कथा हो या उपन्यास, ओहि सभकें पढ़लासँ स्पष्ट हैत जे हिनक लेखन ओहि विषय सभ पर होइत अछि, जाहि पर एखनि तक नहि लिखल गेल छल। हिनक ढंग ओ कथ्यक टटकापन निश्चित रूपसँ मोहि लेत। ई मैथिलीक प्रसिद्ध लेखक जीवकान्तक मेट्रिकक छात्रा रहलाह। जीवकान्त पर हिनक कार्य सेहो प्रशंसनीय अछि, किंतु प्रदीप अपन लेखनक बाट बनयबामे अपन गुरुक प्रभावमे नहि अयलाह। ई अपन बाट स्वयं बनौलनि आ हिनका सैह हिनक अपन पहचान ओ विशिष्टता प्रदान कयलक। कहबाक तात्पर्य अपन साहित्यिक यात्रामे अपन बाटक बटोही छथि जे भीड़सँ फराक करैत अछि। हिनक पहचान कायम करैत अछि, विशिष्ट बनबैत अछि। हिनक कथाक अध्ययनसँ स्पष्ट हैत जे ई अपन कालक सांस्कृतिक चेतनाक कथाकार छथि। हिनक पहिल कथा 1976 ई. मे आयल। ओकर बाद ई निरन्तर कथा लिखि रहलाहे। एखनि तक हिनक पाँच गोट कथा-संग्रह प्रकाशित अछि--
- 1. औतीह कमला जयतीह कमला (1993)
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- 2. मकड़ी (2000)
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- 3. सरोकार (2005)
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- 4. पोखरिमे दहाइत काठ (2017)
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- 5. सपन एक देखल (2022)
कोखि: कथ्य आ शिल्प
अंग्रेजी शब्द ॅवउंद कें एहि रूपमे देखी ॅवउ;इद्धउंद तँ बूझि पड़त जे नारी जातिक परिचय लेल कोखि ;ूवउइद्ध कें आधार मानल गेल। जतेक जीव-जन्तु अछि, सभ अपन-अपन मायक कोखिसँ बहरायल। श्री प्रदीप बिहारी अपन पाँचम उपन्यासक केन्द्रमे स्थापित कयलनि कोखि। एके शब्दक अनेक सम्पृक्तार्थ (बवददवजंजपवद) होइत छै। एहि उपन्यासमे श्वेता लेल ‘कोखि’ केर महत्त्व आ पारुल लेल जे महत्त्व अछि, तकरे रेखांकित करैत अछि। पूर्ण तार्किक विन्याससँ दुनूकें बेराबेरी शिशु कल्याण आश्रम आनल जाइत अछि। दत्तक संतान लेल श्वेता आवेदन पंजीयन फार्म जमा कऽ देलक आ दोसरे दिन फिर्ता लेलक। दत्तक संतानक पालन करबामे कचोट रहतै जे अपन कोखिक नहि अछि। एहिसँ नीक जे बेसी सँ बेसी अनाथ बच्चा सभकें अपन संतान बुझि दुलार करत। पंजीयन फार्म श्वेता फिर्ता लेनहि छल, तखनहिं जुमैत अछि पारुल, जे कहियो ‘कोखि’कें नकारात्मक धरातल पर राखि कए उपेक्षा कएने छल। आब बुझलक कोखिक महत्त्व। मोहन बाबू (भौमिक)कें कहैत अछि- ‘हमर कोखि एखनो अहींक प्रतीक्षा मे अछि।’ मोहन बाबू (भौमिक) कहैत छथि- ‘कोखि सम्माननीय शब्द होइत छैक, मैडम।’ ‘मैडम’ शब्द मे सानल कटूक्ति पारुलक कोंढ़-करेज मे लागल हेतै। ओ समय पर कोखिक महत्त्व नहि बुझलक। एहि उपन्यासमे तीन-चारिटा परिवार अछि। ओहि परिवार सभक सुख-दुख आ हर्ष विषाद एकटा कलात्मक सूत्रा मे बान्हल गेल अछि। आब की हेतै? से बुझबाक जिज्ञासा अंतिम वाक्य धरि सानल अछि। ई जिज्ञासा अनुत्तरित रहल जे पारुल आब की करत? महानगर मे नोकरिहारा वृत्त एहि रूपमे देखल गेल- ‘…आॅफिसक महिला कर्मी मे किछु विवाहिता छथि। साँझ मे बऽर आ बच्चाक सुरता लागल रहैत छनि, से आवश्यको छैक। किछु गोटे दुनू प्राणी नोकरी करैत छथि। दुनू मे पहिने जे पहुँचय, दोसराक प्रतीक्षा करैत रहैत अछि। किछु गोटेक मित्रा प्रतीक्षारत रहैत छैक। एहन मे बेसी कुमारि रहैत अछि। (पृष्ठ 99)कलाप्रेमी लोकक नियति
‘हम सभ ककरा लेल रंगकर्म करैत छी मित्रा? तों ककरा लेल लेख लिखैत छें? ककरा लेल नाटक लिखैत छें? तोहर मातृभाषामे ई आर नमहर प्रश्न छौक। तोहर लेखक अनुवाद भेलौक, किछु दोसर भाषामे लिखलें, तें चर्चित भेलें। मुदा किछु दिन छोड़ि दही तँ देखही जे के तकैत छौक तोरा? तोरे सन किछु इमानदार लोक होयतैक, जे कतहु लेख वा थीसिसमे चर्च कऽ देतौक (पृष्ठ – 189)प्रवासीक व्यथा, वेदना, विवशता
आपति-बिपतिमे गान मोन पड़ैए। सभ दिन बाहरे-बाहर रहलहुँ। कहियो गामक बारेमे सोचलियै? घराड़ी भत्थन भऽ गेल। दूटा पजेबो जोड़ि देने रहितियै तँ आबऽ-जाय के सूत्रा बनल रहैत। बड़ कमयलनि फल्लाँ बाबू! नोकरी छोड़ि कऽ बिजनेस कयलनि। अनठीया ठाम मे कोठा ठाढ़ कयलनि आ गामकें अबडेरने रहलाह…आइ एकटा घर रहैत तँ अपना घर मे पयर दितहुँ ने। (पृष्ठ 74) ई तीनू प्रसंग घटनामे गति देबा लेल आवश्यक नहि अछि, किन्तु उपन्यासक व्यापकता बढ़बैत अछि। ठाम-ठाम शब्द चयन आ वाक्य रचना मुग्ध करैत अछि। जेना- अनुपम कनेकाल एकटक सासुकें तकैत रहल आ तकर बाद जबदाह मोने बहरायल। (पृष्ठ 83) समधिन छोलनी धिपा कऽ दागि देलखिन…समधिनक शब्द सभ फनिगा बनि हुनक कानमे पैसि गेलनि अछि आ फरफरा रहल छनि। (पृष्ठ 88) तामस एँड़ी सँ जुट्टी धरि पसरि गेलनि। (पृष्ठ 89) आफिस सं अयलाक बाद थाकल सन लगैत रहैत छें। मोन पर किछु उघने सन। (पृष्ठ 90) मोन नपना नहि होइत छैक, बटखरा नहि होइत छैक। मोन स्वाभाविक रूपें जे कहय, तकर संग रही। (पृष्ठ 103) शुभा कें हलदिली पैसि गेलनि। (पृष्ठ 107) हम अपना माथ पर कतेक दिन ढांठि कऽ राखी? (पृष्ष्ठ 124) भोर सन फरहरि नहि लगैत छें। (पृष्ठ 129) मम्मी-पापा कें अपन-अपन पेटक पानि नहि पचि रहल छनि। (पृष्ठ 130) एहि सम्बन्ध कें उघि किएक रहल छें? (पृष्ठ 136) पारुल कतऽ मंगा कऽ पाथि देलकैए ओकरा। (पृष्ठ 156) ई तेसर पहर हमरा दुनूक नाम केबाला भऽ गेल। (पृष्ठ 163) ….सासु ओकरा तरुआ बूझि बरकल तेल मे राखि तरि रहल होथि। (पृष्ठ 182) डेली खोंघी लेने जाल समेटि लेलें। (पृष्ठ 189) लागय जे देह खुने खुनामय भऽ गेल। आ हम लुद्द दऽ बैसि जाइ। (पृष्ठ 191) प्रायः तीन किलोमीटर धरि ओ भोरहरबा मे चलि गेल। (पृष्ठ 191) झाड़-झंखार, दोग-दोसानि मे कतऽ सऽ भेटैत छौक? (पृष्ठ 193) सभ एक दोसराक भले-जी-भले कयलक। (पृष्ठ 194) ओहिना राखल अछि। बिनु उराहल। (पृष्ठ 195) एहि सभ मे भाषाक अभिव्यक्ति क्षमता आ लेखक केर रुचि झलकैत छै। उपन्यास मे मनोरम तिलिया-फुलिया लागि जाइत छै। अबडेरल वाग्धारा सोझाँ आबि जाइत अछि। Ú रमेशनव प्रौद्योगिकीक अथवा ‘फील गुड’क?
प्रदीप बिहारी बीसम शताब्दीक नवम दशकक ख्यातिलब्ध मैथिलीक लेखक छथि। ओ तीन पत्रिका आ दू पोथीक संपादक, छः पोथीक अनुवादक, एक पोथीक नाट्य-रुपांतरकार, एक पत्रा-साहित्य-संकलनकत्र्ता, पाँच उपन्यासक लेखक, दू लघुकथा- पोथीक लेखक आ अंततः पाँच कथासंग्रहक कथाकार छथि। ओ मैथिली साहित्यक पैघ लेखक छथि। हुनकर जीवन, मैथिली साहित्य, मैथिली भाषा आ नाट्य-क्रियाकलाप लेल समर्पित अछि। ओ साहित्य अकादेमी पुरस्कार (2007) समेत, पाँच टा ‘सम्मान’ सँ विभूषित छथि। मुदा, अपन सब तरहक साहित्यिक क्रियाकलाप आ समस्त लेखनक संग, ओ मूलतः कथाकार छथि, जाहि लेल ‘सरोकार’ नामक कथासंग्रह पर ओ साहित्य अकादेमी पुरस्कार सँ अलंकृत छथि। प्रदीप बिहारी के ई साहित्यिक ‘लसेढ़’(संक्रमण) जे लगलनि, से पूरा जीवन नहि छुटलनि। ई ‘लसेढ़’ होइतहिं अछि सैह आ तेहने, जकर एक बेर सकारात्मक संक्रमण भऽ गेला पर, ओ लेखक समाजक निधि बनि जाइत छथि। आ जिनकर ‘लसेढ़’ नकली रहैत अछि, से जीवनक भौतिकवादिता मे हेरा आ डूबि जाइत छथि। मुदा मैथिलीक तेहेन महत्वपूर्ण कथाकार प्रदीप बिहारीक जीवनायुक षष्ठिपूत्र्तिक अवसर पर आइ, हुनकर ताहि साहित्यिक ‘लसेढ़’क, आ ‘लसेढ़’ नामक कथा पर सेहो, विमर्श करबाक सौविध्य प्राप्त भेल अछि। ई कथा जहिया नव संस्करणक दिवारात्रि कथागोष्ठी मे पढ़ल गेल छल, खूब नीक बहस आमंत्रित केने छल। प्रदीप बिहारी मैथिलीक एहेन कथाकार-संवर्ग सँ अबैत छथि, जिनकर सामाजिक कछमछी, हुनकर कथालेखनक कथा प्लौट के, ज्वलंत विषय सबहक अद्यतन दिशा मे, निदेशित करैत रहल अछि। टटका विषय-वस्तु हुनकर उपन्यास आ कथा-लेखन मे, बरमहल हुलकी मारैत रहल अछि। प्रदीप बिहारीक नाट्यशास्त्रीय ज्ञान, नाटकीयता, मंचधर्मिताक आ आन-आन नाट्य क्रियाकलापक ‘लसेढ़’, जहिना सफलतापूर्वक बेगूसराय-क्षेत्राक ‘तथाकथित दक्षिण मिथिला’मे नाट्य-संस्कृति के संस्थापित केलक अछि, तहिना भाषाक स्तर पर, ओइ क्षेत्राक मैथिलीकरण आ साहित्यक स्तर पर, ओइ क्षेत्राक साहित्यिकीकरण सेहो केलक अछि। तहिना ‘अंतरंग’ पत्रिकाक माध्यमें, मैथिली के हिन्दी संसारक संग जोड़ब आ मैथिली साहित्य भाषाक क्रियाकलाप के हिन्दी-संसार मे पहुँचायब, मात्रा प्रदीप जी सँ संभव भऽ सकल अछि। ‘तथाकथित दक्षिण मिथिला’ के, पत्राक माध्यमें बहुत दिन धरि जन-आवाज देब सेहो, हिनकर लेखकक उपलब्धि रहल अछि। हिनकर सामाजिक क्रियाकलापक सकारात्मक ‘लसेढ़’, कोनो टा साहित्यिक क्रियाकलापक सकारात्मक ‘लसेढ़’ सँ, एकदम्मे फराक नहि अछि। तकरे परिणाम थिक, जे बेगूसरायक साहित्यिक परिवेशक स्तरीय विकास मे, महाकवि दिनकर, आ कीत्र्ति नारायण मिश्र आ प्रदीप बिहारीक बदौलत, निशाकर, मनोज कुमार झा, रुपम झा आदि साहित्यकारक निर्माण आ विकास भेल अछि/भऽ रहल अछि। एतावता ई प्रमाणित भऽ रहल अछि, जे ‘लसेढ़’ मात्रा नकारात्मके नहि होइत अछि, अपितु ओकरा सामाजिक, सांस्कृतिक आ साहित्यिक स्वरुप प्रदान केला पर, ओकर संक्रमण लोक-कल्याणकारीयो भऽ सकैत अछि। जेना खान सँ खनिज पदार्थक ‘शोषण’, औचित्यसम्पन्न आ जनकल्याणकारी होइत अछि, तहिना! साहित्यकारक यैह विशेषता ओकरा बुद्धिजीवीक आन संवर्गो धरि सँ फुटका दैत अछि, जे ओ मूल्यांकनपरक नकारात्मकता आ आलोचना के लिखितो, वस्तुतः सकारात्मकताक लक्ष्यपूत्र्तिए के स्थापित करैत रहैत अछि, जे अंततः समाजक हिते मे होइत अछि। आ ताहि सकारात्मक ‘लसेढ़’/साहित्यिक संक्रमण के जँ निरंतरता आ गतिशीलता दऽ कऽ कोनो लेखक कोनो विशेष क्षेत्राक साहित्यकारिता के ओइ क्षेत्राक स्थायी-भाव बना दिअय, तँ प्रदीप बिहारी सन तेहेन लेखकक योगदान, बेगूसराय-क्षेत्राक प्रसंग मे स्वयंसिद्ध भऽ जाइत अछि। मुदा एतऽ विवेच्य ई अछि जे, की ‘लसेढ़’ नामक अइ कथाक ‘लसेढ़’, मात्रा मोबाइलक/स्मार्ट फोनक भौतिकवादी लिलसाक क्षिप्र-संक्रमण वा ‘लसेढ़’ लगबाक ‘प्रक्रिया’ धरि सीमित अछि? नहि, निश्चित ई नवल बाबूक भौतिकवादी सुखक लिलसा नहि थिक। ओ तऽ एकटा सामान्य जीवनक पक्षपाती पेंशनभोगी, ग्रामीण जीवनप्रेमी आ मोबाइल-विरोधी विधुर छलाह, जे वृद्धावस्थाजन्य शारीरिक स्वास्थ्य खसबाक कारणें, बेटा-पुतोहु द्वारा नागर जीवन मे बलजोरी लऽ जायल गेल छलाह। ओ बेटा-पुतोहु-पोता, तीनूक मोबाइल-क्रयबला प्रस्ताव के काटियो देने छलाह। अपन रुटीनबला पार्कीय-जीवनशैली सँ ओ, महानगरो मे सहयोजन बैसा लेने छलाह। ओ तँ संयोगवशात् विद्यालयी जीवनक मीत जीबछ सँ अनायासक भेंट भऽ जायब, महानगरो मे भाया मोबाइल फोन, हुनकर जीवन बदलि देलक। जीबछ हुनकर पूर्व-सहपाठिनीक प्रेम-स्मृति नवल बाबू मे जगा कऽ, फेसबुक आइडी बना कऽ, मोबाइल-दुनियां दिस प्रेरित कऽ दैत छथि। बस्स, बेटा-पुतोहु-पोताक पर्यटन-कार्यक्रम बनिते, मोबाइल किनबाक बहन्ना नवल बाबू के भेटि जाइत छनि, जाहि सऽ ओ अपने कहियो मना केने रहथिन। आ मोबाइलक क्रय होइते, नवल बाबू के मोबाइल फोनक ‘लसेढ़’ लागियो जाइत छनि। ई भेल मोबाइल-क्रय केर ‘लसेढ़’ लगबाक ‘प्रक्रिया’! मुदा अइ ‘लसेढ़’ लगबाक बहन्ना, छात्रा-जीवनक सहपाठिनीक ‘मधुर आकर्षणक स्मृति’ बनैत अछि। तखन ई ‘लसेढ़’ मोबाइल-संक्रमणक नकारात्मकता कोना भेल? आ ‘स्नेह-संक्रमणक सकारात्मकता’ कोना नहि भेल? दुनू बात कथाक अन्तर्गुंफन सँ एक संग अभरैत अछि। कथा मे जीबछ जी आ नवल बाबू, दुनू दू वर्ग सँ अबैत मीता-पात्रा छथि। मुदा मैत्राीक स्नेह-रसायन एहेन बनल छनि दुनू गोटे मे, जे ओ हिनका एकाध बेर ‘नवला’ कहैत छथिन आ ई हुनका हरदम ‘जीबछा’ कहैत छथिन। दुनू गोटेक संवादक उतरा-चैरी, छात्रा- जीवनक मैत्राीक मधुर उठापटक, परीक्षा-रिजल्टक उठापटक, आदिक मोहक स्मृति सऽ कथा बोरल अछि। मुदा जीबछ जी एकाध बेर नवला कहैत छथिन आ नवल जी बेर-बेर, हरदम हुनका ‘जीबछा’ कहैत छथिन, से किए? की ई मिथिला समाजक ‘जातिवादी संस्कारक विकृत यथार्थ’ थिक, कथाकारक चूक थिक अथवा सायास प्रयोग थिक? मुदा की ई कथा मोबाइल-प्रौद्योगिकीक प्रसार सन सतही कथा-प्लौट पर लिखल थिक? तखन तऽ नव बात होइतो, कोनो तेहेन पैघ बात नहि भेल ई? प्रौद्योगिकीक पक्ष आ विपक्ष मे तँ अनेक कथा, एक-सँ-एक कथा, मैथिली मे लिखायल अछि आ लिखल जाइत रहल अछि। आइ ‘मोबाइल मोबाइल’ खेलायब, कोनो तेहेन पैघ बात नहि, सतही बात थिक। ओ तँ विकृत युग-परंपरा जकाँ बनि गेल अछि। जेना कहियो श्वेत-श्याम टी.वी.छल, भीसीआर आ भीसीपी छल, सीडी आ डीभीडी छल, फ्लौपी छल, चोंगाबला बेसिक फोन छल! अनेक प्रौद्योगिकी बिहाड़ि जकाँ आयल आ अपने रस्ते, कालक गाल मे समा गेल! तहिना बहुत कथा अबैत अछि आ कालक गाल मे समा जाइत अछि। अनेक पुरस्कृत कथासंग्रह धरि कालक भक्ष्य बनि जाइत अछि आ स्मृति बनिकऽ रहि जाइत अछि अथवा सेहो धरि बनल नहि रहि पबैत अछि। वस्तुतः कोनो कथा युग-विजयी कथा तखने बनि पबैत अछि, जखन ओकर कथ्य जीवनक गहींर आ मेंही रहस्यक तानी पर, युगसत्यबला समकालीनताक भरनी सऽ, ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ जकाँ, बूनल रहैत अछि। से कोनो कथाकारक ‘गहींर आ अद्यतन’ जीवन-दृष्टिक बिना संभवे नहि अछि। कोनो ज्वलंत विषय के कथालेखनक लेल चूनब तँ, कथालेखनक ‘ए बी सी डी’ थिक, चरम-कलाक ‘एक्स वाइ जेड’ नहि थिक। सगर दुनियाँ जकाँ, मिथिलो के आ मैथिलो के, मोबाइल फोन-क्रयक ‘लसेढ़’ लागब, आमबात थिक। तकर ‘प्रक्रिया’, अइ कथा मे वर्णित प्रक्रिया सेहो भऽ सकैत अछि आ तकरा सँ भिन्न प्रक्रिया सेहो, भऽ सकैत अछि। ईहो बहुत पैघ बात नहि थिक। कथाकार-कथाकारक कथा-ट्रीटमेंट-कला मे अन्तर हैब, सामान्य स्वाभाविकता आ अपन-अपन सक्षमता, दुनू भऽ सकैत अछि आ से होइतो अछि। तखन पैघ बात की थिक, एहेन नव प्रौद्योगिकी-आधारित कथा मे? पैघ बात थिक, नव प्रौद्योगिकी सँ अन्तर्सम्बन्धित आ प्रभावित जीवनक सही दिशा मे चित्राणक सघनता! जीवनक सुविधापूर्ण संचालन मे, नव प्रौद्योगिकीक सकारात्मक स्वीकार्यता! से ‘लसेढ़’ नामक अइ कथा मे भेल अछि। मोबाइल प्रौद्योगिकीक नवल बाबू द्वारा स्वीकार्यता, हुनकर एकाकी जीवनक निश्चिते एकटा अनमना बनैत अछि। मुदा से बनैत अछि, पोताक चेतावनीक संग, जे ‘आप भी इसी मे नहीं डूब जाइएगा!’ एकदम्मे नव पौधबला पीढ़ी, जे अपने मोबाइलक निसां सँ चिन्ताजनक रुपें पीड़ित भऽ गेल अछि, स्मार्ट-फोनक पक्ष मे अनेक तर्क दैतो, अपन बाबा के चेतौनी दैत अछि, जकरा कोनो आधुनिक कथाक ‘अविश्वसनीय यथार्थ’ मानलो जा सकैत अछि, आ नहिंयों मानल जा सकैत अछि। कथा के अनेक उप-कथा आ संस्मरण सँ धनीक बनाओल गेल अछि। कथा मे औसत प्रवासी मैथिल परिवार मे लगैत ‘हिन्दीक द्वैभाषिक ‘लसेढ़’क विकृति’ सेहो, सार्थक रुपें हुलकी मारलक अछि। नवागन्तुक बाल-पीढ़ी मे आयल अइ विसंगतिक दोषी ओ बाल-पीढ़ी नहिं, बच्चाक माता-पिता अछि, जे बच्चा के मातृभाषाक अधिकार सऽ, अपने बच्चा के वंचित कऽ रहल अछि। सेहो ‘लसेढ़’, मोबाइल फोनक ‘लसेढ़’क संग-संग, समानान्तर रुपें चलैत अछि अथवा कथाक संस्थापना मे भाँज पुरैत अछि। मुदा एतऽ अइ दुनू ‘लसेढ़’क स्वरुप नकारात्मक रहबाक कारणें, आलोच्य अछि, जखनकि, नवल बाबूक पूर्व-सहपाठिनीक संग स्नेह-सौजन्यक संस्थापनाक ‘टूल’ बनबाक कारणें, एकहि कथा मे, सैह मोबाइल फोन, सकारात्मक ‘लसेढ़’क स्वरुप ग्रहण कऽ, वरीय नागरिकक एकाकी जीवन मे ‘फील गुड’ कराबैत अछि। तँ की ई दू स्वरुपक परस्पर-विरोधी ‘लसेढ़’क, एकहि कथा मे सह-अस्तित्व हैब, विरोधाभास उत्पन्न करब थिक, अथवा विरोधाभासी परिस्थितिक संश्लिष्ट बुनावटिक कथोपयोग थिक, जखनकि मैथिली नहिं सिखा पेबाक पौत्राक उलहन आ मोबाइल फोनक दुरुपयोग सँ बांचबाक पोताक चेतौनी, दुनू एकहि संग कथा मे अबैत अछि…? ई कथा संक्रमण/‘लसेढ़’क, विविध आयामक उद्घाटने नहिं, तकर अनेक स्वरुपक यथोचित विश्लेषणो, अनेक दिशा मे करैत अछि। कथा, समाजक आँखि सेहो फोलैत अछि आ ‘भविष्यक चेतौनी-संकेत’ सेहो दैत अछि। सैह कथाक सार्थकतो होइत अछि। सैह अहू कथाक सार्थकता थिक! जेना उदय प्रकाशक ‘पालगोमराक स्कूटर’ कहियो आँखि फोलने छल। मुदा अइ कथा मे विज्ञानक विध्वंसात्मक चरित्रा(जेना, ‘दिनकर बाबू के भ्रम भेल छलनि?’मे) आ विज्ञानक सकारात्मक उपयोगबला स्वरुप, दुनूक एक संग, कथा-उपस्थापन होयब, अइ कथाक विशेषता थिक। आ विशेषताक तँ, नकारात्मक आ सकारात्मक दुनू दिशा आ दुनू स्वरुप, सब दिन सँ होइत रहल अछि। ‘लसेढ़’ तेहने एकटा संक्रमण-‘विशेषता’ आ ‘कथा’, दुनू एक संग थिक! Ú तारानन्द वियोगीलोक-आस्थाक समांग: प्रदीप बिहारी
प्रदीप बिहारी जीवनक बहुरंगी संभावनाक गहींर पारखी कलाकार छथि। अपन लेखनक आरंभिके काल सँ कथासाहित्य कें ओ अपन सृजनक दिशा बनेलनि। कथासाहित्यक जतेक जे कोनो विधा छैक– कथा, उपन्यास, लघुकथा, कथेतर गद्य– सब विधा मे प्रदीप लेखन केलनि अछि आ ओहि-ओहि विधा मे सफलता हासिल कयलनि अछि। ई सब विधा शुरुहे सँ हुनक अभिरुचिक केन्द्र मे रहल। दोसर दिस, हुनकर अवलोकनक क्षेत्रा सेहो बेस व्यापक रहल अछि। निःस्व भिखमंगा सँ लऽ कऽ सर्वसाधनसंपन्न उच्चवर्गीय लोकक जीवन-प्रसंग धरि समान रूप सँ हुनकर साहित्यक विषय बनल अछि। हुनकर लेखनक प्रधान जीवनमूल्य रहलनि करुणा, जे एक दिस तँ हुनकर अवलोकन मे गहराइ अनलक तँ दोसर दिस जीवनक विडंबना सब सेहो अपूर्व व्यंजनाक संग हुनकर कथासाहित्य मे उतरल अछि। जीवनक एक-एक खण्ड हुनक कथा मे आबि कऽ तेना पुनर्सृजित होइत चलैत छैक, जे बहुधा यैह लगैत अछि जे प्रदीप अपने कथा नहि लिखैत छथि, अपितु हुनकर कथा स्वयं अपना कें लिखैत अछि。
विसंगतिक बीचमे सहज सन्धान
बीसम शताब्दीक आठम दशकमे लेखन प्रारम्भ कए जे युवा लोकनि अपन हस्तक्षेप मैथिली कथामे केलनि, ताहिमे प्रदीप बिहारीक महत्त्वपूर्ण स्थान छनि। लगभग डेढ़ सय कथा, एक सय लघुकथा, दर्जन भरि एकांकी, छ गोट उपन्यास, पाँच गोट कथा संग्रह, सात गोट अनूदित पोथीक संग मैथिली साहित्यक वर्तमान लेल प्रदीप बिहारी एकटा अनुपम रचनाकार छथि, जे भविष्णु रचनाकार लेल एक प्रेरणा-पुंज सेहो छथि। हिनकर कतोक रास रचनाक अनुवाद अन्य भारतीय भाषा सभमे पर्याप्त सम्मानक संग पढ़ल जा रहल अछि। देश, काल, वातावरण कथोपकथनक सचेष्ट समावेश हुनकर अपन रचनाक विशेष आकर्षक बात होइत रहल अछि। हुनकर अपन रचनाक वैशिष्ट्यक संकेत चरित्रा-चित्राणमे सेहो देखाइत रहैत अछि। सामाजिक, भौगोलिक आ भौतिक परिवेशक वैविध्य, रीति-रिवाज, वेश-भूषा, आचार-विचार आदिकें ओ अत्यन्त कलात्मकतासँ रेखांकित करैत रहलाह अछि। मध्य आ निम्न मध्य वर्गीय जनजीवनक जीवन-संघर्ष आ विसंगतिसँ सम्बद्ध संवेदना हुनका ओतए भावककें मोहि कऽ रखने रहैत अछि। अही कारणें भावक लोकनि हुनकर रचनामे डूबि जाइ छथि, नायकक जीवन-संघर्षक सहयात्राी बनि जाइ छथि। प्रारम्भिक जीवनक नेपाल-प्रवासक सुच्चा अनुभव हुनकर कथा-भूमिमे भकरार भेल रहैत अछि। निर्णय करब कठिन अछि जे पेशासँ बैंककर्मी, रुचिसँ रंगकर्मी, कर्मसँ कथाकर्मी आ स्वभावसँ आयोजनधर्मी प्रदीप बिहारीक बहुआयामी क्रियाशीलतामे हुनकर समय आ ऊर्जाक छियानति भेल, कि सृजनात्मक उपयोग। अइसँ हुनकर रचनाशीलता आहत भेल कि उन्नत। मुदा एतबा तय अछि जे ई सब प्रकारक गतिशीलता हुनकर जीवन-दृष्टिकें निरन्तर पुष्ट आ ऊर्जस्वित करैत रहलनि अछि। अइ समस्त व्यस्तता आ अस्तव्यस्ततामे हुनकर कथा-लेखन समृद्ध होइत रहल अछि। निस्सन्देह प्रदीप बिहारी तुमुल कोलाहल आ जटिल व्यवधानक पहाड़कें चीड़ैत आगू बढ़ैत रहलाह अछि। असलमे प्रदीप बिहारीक पीढ़ी अपन ऊर्जस्वित रचनात्मकताक संग एकटा दारुण आ दमघोंटू वातावरणमे ठाढ़ भेल छल, जकरा सोझाँ मुट्ठी भरि सुविधा आ क्षितिज भर दायित्व मुँह बौने ठाढ़ छल। दहोदिशक आगि समकालीन जनसमुदायक अस्तित्वकें अहरा पर चढ़ौने छल। प्रदीप बिहारी अही विकल समाजक सहभोक्ता छथि, आ इएह परिवेश हिनकर कथा-संसारक जन्मभूमि थिक। हुनकर कथा सबमे एकर ममत्वपूर्ण चित्राण अपन समस्त छविक संग भेटैत अछि। घटनाबहुल समाज-व्यवस्थाक अनेक नवीनतम परिस्थिति कालान्तरमे हुनकर कथावस्तुकें छोट आ विषयक संग लेखकीय बेवहारकें चुनौतीपूर्ण बनबैत गेल। प्रदीप अइ चुनौतीकें दायित्वपूर्वक निमाहलनि। मकड़ी आ उग्रास कथामे कथाकारक अइ तनावकें देखल जा सकैत अछि। मकड़ीक नायिका सुनीता आ बौका एहने घटनाक भोक्ता अछि। सुनीताकें अपन जीवनी आ जैविक परिस्थितिक अवबोध छलनि अथवा नइँ, अनुमान कठिन अछि। अवगाहन कालमे पाठककें बहुस्तरीय कथा-यात्रा कराएब प्रदीप बिहारीक कथा-कौशलक खास वैशिष्ट्य होइ छनि। सुनीताकें जखन प्रधान पंच बजौलखिन, तखन पाठक अनेक आशंकासँ भरि गेल। व्यतीत जीवनमे आएल पुरुख समाजक आचरणक भुक्तभोगी सुनीता सेहो बेशुमार आशंकासँ ग्रस्त रहथि, मुदा परिणाम किछु आओरे निकलल। कोनो कथामे वस्तुतः कथाकार द्वारा लिखल कथाक हरेक घटनाक समानान्तर कथा, पाठकक मोनमे चलैत रहैत अछि, ओकर विकासमान अँखुआ विकसित होइत रहैत अछि। मानोवैज्ञानिक स्तर पर अहिना कथा-चरित्राक मोनमे सेहो नब-नब कथाक सृजन होइत रहैत अछि, जेना सुनीताक मोनमे प्रधान पंचसँ गप करबा काल होइत रहल हएत।समकालीन जनजीवनक कोनहुँ टा अंश प्रदीप बिहारीक कथामे अछूत नइँ मानल गेल अछि। देवशंकर नवीन
विसंगतिसँ लड़ैत मानवीय साहसक रचनाकार
रचनाकार प्रदीप बिहारीक रचना हमरा सभ दिनसँ प्रिय रहल अछि। हुनकर रचना सभकें हम अत्यन्त मनोयोगपूर्वक पढ़ैत छी, आ उत्सवित होइत रहैत छी। से, हुनकर अनुवाद कार्य होअय, पत्रिकाक सम्पादकीय, उपन्यास अथवा हुनकर लिखित कथा सभ, तकर पृष्ठभूमिमे हुनकर रचना सभक भाषा थिक, से एतेक पारदर्शी रहैत अछि, जे ओ अपन अनुभवसँ अर्जित सत्यकें उद्घाटित करय चाहैत छथि, से एनकेएन हृदयमे उतरि जाइत अछि। से कहबाक ढंग सेहो हुनकर एतेक अप्रतिम आ विशिष्ट छनि, से नहि मात्रा अपन गुणक बल पर अपन समकालीनसँ पृथक करैत छनि, अपितु रचनाक निहित भाव-बोधक समुचित अभिव्यक्ति लेल दिशाक संधान सेहो करैत अछि। आ से थिक, अपन लेखन लेल हुनकर उत्खनित दृश्य-श्रव्य शैलीक प्रयोग। अपन रचनामे एहि प्रयोग द्वारा बुझाइत रहैत अछि जे आँखिक आगू सभ घटना चलचित्रा सदृश उपस्थित भए गेल अछि। आ से आकर्षणमे बान्हि आगू पढ़बाक लेल उत्सुकता निरंतर प्रवाह बनौने रहैत अछि। लेखन लेल तकर पाछू हुनकर विषयक चुनाव सेहो थिक। विशेष रूपें कथा पर गप करी। हुनकर कथाक ओ विषय रहैत अछि जे परिवर्तनशील परिवारक आजुक जीवन-चर्या थिक। जे परिवार कहियो गाममे रहैत छल, आ आब किछु विवशताक कारणें अथवा तीव्र गतिसँ बदलैत समयमे समयक संग पयर मिला कऽ चलबाक लेल शहरमे आबि बैसि गेल अछि, मुदा ओहि व्यक्ति अथवा परिवारक नाभि-नाल एखनहुँ गाममे गाड़ल अछि, तकर जीवन व्यथा आ साहसकें अत्यन्त सजीवतासँ अपन कथा सभमे कथाकार प्रकट करैत छथि। से एहन विषय रहैत अछि, जाहिमे पाठककें बहुसंख्यक जनसमुदायक घटित घटना जीवन-गति भेटैत छनि आ ओ सभ तन्मय भए पढ़ैत छथि। जे कथाकार प्रदीप जीक कथाकें पठनीय बनबैत छनि। हेबनिमे हम हुनकर एकटा कथा पढ़ल अछि, ‘दिव्यांग’। कथा परिवारिक समस्याक संकुचित परिधिसँ सर्वथा फुट रेलवे प्लेटफाॅर्म पर भेटल, ओहि एकटा दिव्यांगक कथा थिक, जे दिव्यांग लोकनिकें नागरिकताक आधार पर प्राप्त सुविधाक मांग लेल प्रदर्शनमे भाग लेबाक लेल संकल्पित अछि, एहि साहस आ विश्वास संग (जाहिमे जयी होयबाक भावना अछि) जे दिव्यांग लोकनिक मांग जँ सत्ता नहि सुनत तँ ओ लोकनि (दिव्यांग लोकनि) ‘ताण्डव’ धरि पर उतरि अओताह। कदाचित, ओहि दिव्यांगक कहबाक आशय अछि, जे ओ लोकनि हिंसा धरि पर उतरि अओताह। कथा अंगसँ हीन व्यक्तििक पराक्रमी भावनाकें सहजतासँ भखैत कथाकारक रचनाक कौशलकें परम विश्वसनीयतासँ उजागर करैत अछि। प्रिय कथाकार प्रदीप बिहारीक हमरा सभ कथा प्रिय अछि, एतऽ हम हुनकर एकटा मूल्यधर्मा कथा ‘मकड़ी’ चर्चा करैत छी। ‘मकड़ी’ एकटा सम्पूर्ण स्त्राीक जीवनक दारुण कथा थिक, ओहि स्त्राीक जकर माय नेनहिमे मरि गेल रहैत छैक। सुनीता नामक ओ बचियाक तरुणपन बीति नहि पाओल छल, आ कि पिताकें भार बुझाय लगैत छल, संगहि गाँजा-शराब पीबामे बेटीक उपस्थिति बुझाइत छनि बाधा। तें पिता अपन स्वच्छंद जीवन जीबाक लेल, बेटीसँ मुक्त भऽ जीवनमे अपना ढंगक आनन्द उठयबाक लेल बेटीकें बियाहि दैत छथि। मुदा, ककरो-ककरो संग होइत अछि, आ कखनो काल होइत अछि, जेना सुनीता विधवा भऽ जाइत अछि। मुदा, जे सुुनीता गायक सेवामे निमग्न रहैत भावावेशमे आबि कोनो पुरुषक जालमे नहि फँसबाक लेल संकल्पित हेमबहादुर सन शराबी पुरुषक जालमे फँसि जाइत अछि, आ एकटा स्त्राीक सम्पूर्ण आत्मोत्सर्ग देखबैत पुनः विधवा भऽ जाइत अछि। जे कि कथाकार प्रदीप बिहारी गामसँ रोजगार लेल विस्थापित मनुष्य, जे शहरमे आबि अपन श्रम आ लगनशीलतासँ स्थान बनौनिहार व्यक्तिक कथाकार छथि, एहि कथामे सेहो सुनीता गामसँ शहर आबि अनेक गलंजरकें निर्भीकतासँ सहैत, कुचर्यामे जीबैत स्त्राीक ओहिठाम डेरा राखि, बाजारमे मशीनसँ सिलाइक काज कए अपन जीवन-यापन करैत अछि, से एहन चरित वास्तवमे कोनो विसंगति-बोधसँ दूर प्रगतिशीलताक आदर्श उपस्थित करैत अछि। मुदा, जेना कि हम पूर्वमे कहने छी जे निस्सन कथाकार प्रदीप बिहारीक ई कथा आधुनिक परिवेशमे एकटा सम्पूर्ण स्त्राीक कथा थिक, अहाँकें भेटत, जे सुनीता जे जीवन-यापन लेल बाजारमे गामसँ आबि सिलाइ करैत छैक, ओकर हृदयमे कतेक दया अछि, आ हृदय कतेक विशाल छैक, तकरा बुझल जा सकैत अछि जे नगरपालिकाक मेहतरक बेटीकें बियाहमे बिनु मजदूरीक ओ ओकरा बेटीक लेल कपड़ा सीबाक लेल तैयार भए जाइत अछि, एहि लेल स्नेहक भूखलि सुनीताकेें केओ ‘बहिन’ जे कहलकैक। सम्पूर्ण कथामे ‘मकड़ी’ शब्द नहि आयल अछि, मुदा, एहि कथाक शीर्षक मकड़ी थिक। से, ई शिल्प थिक रचनाक जे रचनाक भावभूमिक आधार पर एहन शीर्षकसँ तादात्य स्थापित कए रचनाक कथ्यकें उद्घाटित करब। आ से व्यापक फलकक ई बिम्बधर्मी कथा ‘मकड़ी’ स्त्राीक मकड़ी सन ओहि नैसर्गिक भावनाकें प्रकट करैत अछि जे मकड़ी जाल बुनैत अछि, अपन रूप-गंध अथवा ममतासँ दोसर पुरुषकें फँसबैत अछि, आ अपनहि बुनल जालमे मरैत अछि। से, ई कथा स्त्राीक जीवनक दारुण यथार्थकें एकटा सुन्दर रोचक कथानक द्वारा दर्शबैत अछि। Ú लक्ष्मण झा ‘सागर’प्रदीप बिहारी: हमरा नजरि मे
प्रदीप बिहारी सँ हमर परिचय 42 साल सँ अछि, से मिथिला मिहिर के माध्यम सँ। नेना भुटकाक चैपाड़ि’ मे हमर हास्य व्यंग छोट-छोट रचना छपैत छल। प्रदीप जी कथा लिखैत रहथि से छोट-छोट मुदा, गंभीर। हमर रचना अपने हमरा झुझुआन लगैत रहय। मुदा, प्रदीप जीक कथा हमरा बड़ पसिन्न पड़ैत रहय। से छोट-छोट कथा लिखैत-लिखैत प्रदीप जीक कथा संग्रह प्रकाशित होइत रहल आ कथा संग्रह ‘सरोकार’ लेल हिनका साहित्य अकादेमीक मूल पुरस्कार प्राप्त भेलनि। से पुरस्कार मैथिली साहित्य जगत मे धमाका मचा देलक। कारण प्रदीप जी दोसर एहेन मैथिलीक साहित्यकार भेलाह जिनका एतेक कम वयस मे साहित्य अकादेमीक मूल पुरस्कार भेटलनि। हिनका सँ कम बयस मे मार्कण्डेय प्रवासी कें भेटल छलनि। ई एकटा एहेन पुरस्कार छल जाहि पर कोनो चू चपर नहि भेल मैथिली साहित्य जगत मे। कारण ईहो रहै जे एहि सँ पहिने अपन ‘औतीह कमला जयतीह कमला’ आ ‘मकड़ी’ प्रकाशित कय ओ अपन कथाकार वाला छवि रूप मे मैथिली साहित्य मे अपना के स्थापित कय लेने छलाह। हमरा मोन मे, आत्मा मे, प्रदीप जीक स्थान एहि लेल खूब ऐल फैल सँ जगह बना लेलक जे ओ अपन रचना लेल अपन मातृभाषा मैथिली के चुनलनि। चाहितथि तँ नेपाली आ हिन्दीक पैघ रचनाकार बनि सकैत छलाह। कियैक तँ नेपाली सँ मैथिली आ नेपाली सँ हिन्दी मे कय टा पोथी के अनुवाद प्रकाशित छनि। मुदा, मैथिलीक प्रति समर्पित भाव आ मोह माया प्रदीप बिहारी के मैथिलीक बेस चर्चित आ लोकप्रिय कथाकार, उपन्यासकार, नाटककार (मण्पिद्म जीक उपन्यास ‘फुटपाथ’क नाट्य रूपांतर), अनुवादक, सम्पादक, रंगकर्मी बनाय देलकनि जे अपना आप मे बड़ पैघ सफलता आ जीवनक अनुपम उपलब्धि छनि। साहित्य अकादेमीक मूल पुरस्कार सँ पहिने हिनका बिहार सरकार सँ सर्वोत्तम अभिनेता पुरस्कार(1993), माहेश्वरी सिंह महेश ग्रंथ पुरस्कार (2001) आ आरो कय टा महत्वपूर्ण पुरस्कार आ सम्मान भेट चुकल रहनि। खास बात ई जे कोनो पुरस्कार आ सम्मान लेल हिनका पर ई आरोप कहियो नै लागल जे ओ पैरबी पैगाम सँ लऽ लेलनि अछि। महत्वपूर्ण बात ईहो जे प्रदीप बिहारी जी के यदि अहाँ देखबनि कि वा हुनका सँ अहाँ कोनो विषय पर गप करब तँ ओ अपन वानी आ व्यवहार सँ ई नहि पता लागय देताह जे ओ एकटा बड़ पैघ मैथिली साहित्यक हस्ती छथि। साधारण बगय बानि। सरल सहज मुस्कुराइत भेटताह। अग्रजक प्रति आदर आ सम्मान भाव आ अनुजक प्रति स्नेह आ आवेश देखबनि। एक पाइक घमंड नहि देखबनि। ने कोनो विवाद मे पड़ैत छथि आ ने कोनो तेहेन बात बजैत सुनबनि जाहि सँ विवाद उत्पन्न हो। कोनो आन बिषय पर बात करैत हुनका नहि देखबनि सिवाय साहित्य, पत्रा-पत्रिका, नाटक, भाषा, संस्कृति के। मुदा, हुनक कथा-वस्तु वा उपन्यास के प्लाॅट मे अहाँ के मिथिला किंवा देशक ताजा घटना के जिक्र भेटत। सामाजिक आ पारिवारिक छोट सँ छोट बात आ समस्या, गरीब गुरबाक जिनगीक नान्हियो टा बात के तेना ने मेंही सँ कहि देताह जकर अहाँ कल्पनो ने करैत हैब। प्रदीप जी कोनो अपन रचना सरदर नै लिखैत छथि। लिखबा सँ पहिने कथा आ उपन्यासक सम्पूर्ण खाका मोन मे खीचि लैत छथि। फेर अपने कय बेर समीक्षा करैत छथि। जहन मोन गबाही दय दैत छनि तखने लिखैत छथि। ओ पहिने पेन सँ कागज पर लिखैत छलाह आ आब लैपटाॅप आ मोबाइल पर लिखैत छथि। प्रदीप जी जीवकांत जीक शिष्य रहल छथि। से शिष्य एहेन जे हुनका एहि युगक एकलव्य कहबा मे कोनो अतिशयोक्ति नहि होयत। जीवकांतो जी हिनका बड़ मानैत छलथिन। अपन आरम्भिक जीवन मे प्रदीप जी नेपाल मे रहैत छलाह। हम तहिया असाम मे रही। जीवकांत जी पत्रा लिखैत छलाह जे प्रदीप बिहारीक कथा मे हम, हमर नै रहैत अछि। प्रदीप कय टा अपन उपन्यासक प्लाॅट के कथा मे समेटि लैत अछि। कागज मे कंजूसी करैत अछि। जीवकांत जी लिखथि जे प्रदीप नेपाल मे रहैत अछि। अहाँ असाम मे रहैत छी। कहलियै प्रदीप के जे ओ नेपालक जन जीवन पर कथा लिखय। ओ से लिखैत अछि। अहाँ के कहने रही जे असामक जन जीवन पर लिखू। अहाँ कान बात नै देलहुँ। प्रदीप जीक उपन्यास विसूवियस यदि पढ़बैक तँ लागत जे तहिया जीवन कतेक कठिन छल। हाले मे हिनकर ‘कोखि’ उपन्यास बहुत चर्चित भेल अछि। हिनक विशेषता छनि जे ई रिपीट नहि करैत छथि। एखने हिनकर एकटा लघुकथा संग्रह ‘हे रौ’ पाठक लोकनिक प्रशंसा लूटि रहल अछि। हिनक एकटा आर लघुकथा ‘खण्ड खण्ड जिनगी’ के अतिरिक्त कथा संग्रह ‘पोखरि मे दहाइत काठ’, ‘सपन एक देखल’ आ उपन्यास ‘गुमकी आ बिहाड़ि’, ‘विसूवियस’ए ‘जड़ि’, ‘शेष’ आ ‘कोखि’ हम पढ़ने छी। हिनक किछु कथा बेगूसराय अंचल के बोली मे लिखल अछि जे अहाँ के मुग्ध आ चकित कय देत। हम बंगाल मे रहैत जे नहि कयल से प्रदीप जी खगरिया, भागलपुर, पटना आ बेगूसराय मे रहैत केलनि। ओ सिंगुर आ नंदीग्राम पर लिखलनि तँ सिलीगुड़ी आ कोलकाता पर सेहो लिखलनि। हम जीवकांत जीक पड़ोसी रहैत जे नहि कयल से प्रदीप जी हुनकर छात्रा रहैत कयलनि। ओ जीवकांत जीक ‘गाछ झुल झुल’ छपेलनि। हुनक पाँचो उपन्यास के एक जिल्द मे ‘जेना कोनो गाम होइत अछि’ छपेलनि। हुनक सभटा आयल पत्रा के ‘स्वस्ति श्री प्रदीप बिहारी’ नामक पोथी रूप मे प्रकाशित करेलनि। एकलव्य कोना ने कहबनि? प्रदीप बिहारी अपन प्रकाशन चतुरंग नाम सँ रखने छथि। अंतरंग नामक पत्रिकाक सम्पादन करैत छथि, जाहि मे भारतीय भाषाक अनुवाद साहित्य रहैत अछि। एहि सँ हिनक सम्पर्क देशक विभिन्न भाषाक साहित्यकार संग बढ़ैत गेलनि। फायदा ई भेलनि जे हिनको मैथिली पोथीक अनुवाद देशक विभिन्न भाषाक साहित्यकार लोकनि अपन-अपन भाषा मे करैत रहैत छथिन। तें प्रदीप बिहारी जी कें भारतीय साहित्यकार मे लेखा होइत छनि। बेगूसराय सँ ‘मिथिला सौरभ’, ‘दक्षिण मिथिला’ आ नेपाल सँ ‘हिलकोर’ नामक पत्रिकाक सम्पादन करैत मैथिली टेलीफिल्म के पटकथा लिखलनि आ हिन्दी टेलीफिल्म मे अभिनय सेहो केने छथि हमरा लोकनिक प्रदीप बिहारी। सब सँ सुखद आश्चर्य ई अछि हिनक जिनगीक जे अबोध नेना प्रदीप के वाल्यकाल बहुत कष्ट आ संघर्ष सँ भरल रहल। पिताक असमय देहांत भऽ जायब। विधवा माय द्वारा अभाव मे लालन-पालन हैब। एहेन स्थिति मे बालक प्रदीप खजौली हाइ स्कूल सँ मेट्रिक पास केलनि। पैतृक गाम कन्हौली मल्लिक टोल छनि। चलि एलाह बेगूसराय। नेने सँ मैथिली मे छपैत छलाह। अग्रज साहित्यकार सब नाम सँ परिचित रहनि। नाट्यशास्त्रा सँ एम ए केलाह। अपन पसन्द सँ नेपाली युवती मेनका सँ बियाह कय लेलनि। मेनका नामे गुण जेहने सुन्दर तेहने सुशिक्षित आ सुशील। घर सम्हारि लेलखिन। उलाव, बेगूसराय मे अपन स्थायी घर ‘मेनकायन’ बनौलनि। अपन छोट भाय के लिखाय पढ़ाय के इंडियन आयल मे नोकरी लगौलनि। दू टा बालक छथिन। दुनू बैंक मे वरीय अधिकारी छथिन। मेनका जीक बहुत सहयोग छनि प्रदीप जीकें प्रदीप बिहारी बनाबय मे। मेनका मल्लिक अपने मैथिली साहित्यक एक यशस्वी आ स्थापित कवियित्राी, कथाकार छथि। माने प्रदीप मेनकाक सफल जोड़ी मैथिली साहित्य के बहुत किछु देलक अछि आ दऽ रहल अछि। प्रदीप जीक जीवनक एकटा सबल पक्ष ईहो छनि जे ओ बहुतो गोटे के साहित्यकार बनौलनि। स्व श्याम दरिहरे सँ मैथिली साहित्य कें परिचय करौलनि। बेगूसराय अंचल मे हुनकर अनुकरण करैत श्यामानन्द निशाकर, प्रेमचन्द्र मिश्र,श्री मती रूपम झा आ श्री मनोज कुमार झा लोकनि साहित्य मे नीक काज कय रहल छथि। सिमरिया मे दिनकर साहित्य के संरक्षण हो वा कीर्ति नारायण मिश्रक शोकहरा मे अपेक्षित सम्मान हो प्रदीप जीक सक्रियता प्रशंसनीय रहल अछि। प्रदीप जी सेमिनार मे आलेख पाठ सेहो करैत छथि। प्रदीप जी कविता नहि लिखैत छथि आ से हुनका बुतें पार सेहो नहि लगैत छनि। मुदा, ताहि सँ हुनकर साहित्यिक ऊँचाइ कम नहि होइत छनि। ओ अपन पहिल उपन्यास ‘गुमकी आ बिहाड़ि’ उनैस बरखक बयस मे लिखलनि आ सेहो मात्रा तेरह दिन मे। तहिना चालीस दिन मे आॅफिस सँ बिनु छुट्टी लेने ‘कोखि’ सन दू सय चारि पृष्ठक उपन्यास पूरा कयलनि। कोरोना पर केन्द्रित उपन्यास ‘मृत्युलीला’ सेहो एके मास मे लिखलनि। एहेन जुनूनी लेखक छथि प्रदीप बिहारी। बैंक सन जबाबदेही वाला नोकरी करैत प्रदीप जी मैथिली साहित्य के उम्मीद आ अपना प्रयाास सँ बहुत बेसी अनुपम आ विशिष्ट साहित्यक विपुल योगदान देलनि। कारण अछि हुनक टाइम मैनेजमेंट। एक्को मिनट समय बर्वाद नहि करैत छथि। एकहक क्षणक सही उपयोग करैत छथि। बदली भऽ कऽ पटना एलाह। एतुक्का साहित्यकार समाज सँ सम्पर्क कय उपमान साहित्यिक गोष्ठी मे अपन सक्रिय योगदान दऽ रहल छथि। उपमान नाम सँ मैथिलिक विशुद्ध साहित्यिक त्रौमासिक पत्रिकाक प्रकाशन लेल सहयोग कय रहल छथि। हमरा लोकनिक सम्पर्क के माध्यम फोन आ पत्राचार रहल अछि। भेंट घाँट सेहो कय बेर भेल अछि। ई जहन स्टेट बैंकक बरौनी रिफाइनरी कैम्पस शाखा मे पदस्थापित छलाह तँ हम अपन कंपनी के काज सँ बरौनी रिफाइनरी जाइत-अबैत रही। बेगूसरायक ममता होटल मे रुकल करी। फोन करियनि त साँझ के भेंट करय आबि जाथि। दुनू गोटे रेस्टोरेन्ट मे चाय नाश्ता करी। घंटो गप सरक्का करी। गपक बिषय मैथिली साहित्य, मैथिलीक समकालीन साहित्यकार आ विद्यापति रहैत छलाह। एक दिन गपक क्रम मे कहलनि जे हम एहि ठामक लोक के कहैत रहैत छियनि जे बेगूसराय मिथिला मे अछि आ एहिठामक भाषा मैथिली अछि। उदाहरण दैत छथि जे विद्यापतिक नचारी छनि तोंहे शिव धरओ नट वेश, हमें डमरू बजाएब हे…। बेगूसरायक लोक तोंहे बजैत छथि। आदि, आदि…। अहिना हास्य विनोद चलैत रहैत छल। एक दिन होटल के मालिक हिनका देखि के लग आयल। बेयरा सब के कहि के गेल जे नीक सँ खातिरदारी करै ले। हमरा अचंभित देखि कहलनि जे हमरे बैंक सँ लोन लेने अछि होटल लेल। हम चाहितियैक तँ डेली आबि के मुफ्त मे एतय खाय पी सकैत रही। मुदा, तहन ई खातिरदारी नै होइत। से ठीके जहन प्रदीप जी घर चलि गेलाह तँ होटल मालिक हमरा कहलनि जे सर बहुत नेक इंसान छथि। ड्राइ ओनेष्ट। हमरा से सुनि के नीक लागल छल। एक बेर हम दुनू परानी अपन छोटकी बेटी के ओकर दोस्तनीक घर पर रखबाक लेल उलाव गेल रही। रिफाइनरी मे मास दिनक ट्रेनिंग रहै। बेटीक बहिनाक बाप कोनो यादव जी रहथि। हुनका प्रदीप जीक बारे मे पुछलियनि। ओ तुरत प्रदीप जीक घर देखाय देलनि। सटले दक्षिण। मोन चपचपाय गेल। लगले फोन केलियनि। कहलनि प्रदीप जी जे एखने पटना सँ अयलहुँ अछि। दिनका भोजन अही ठाम बनि रहल अछि। आ लगले आबि गेलाह बजबय ले। हुनका घर जहन गेलहुँ हम सब, तहन कहलनि जे हुनक अपन कोनो दियादी भाय के दिल्ली मे रोड एक्सीडेंट भऽ गेलनि आ ओ मरि गेलनि। एहेन सन स्थिति मे दोसर कियो किए पुछितय? मुदा, ताहि शोक आ गम के बिसरि मेनका जी आ प्रदीप जी जे हमरा सभक जे स्वागत-सत्कार केने रहथि से लोक के अपन सहोदरो नहि करै छै। एक बेर सहरसा आ पटना मे सेहो हमरा दूनुक भेंट मुलाकात भेल अछि। मुदा, से कनिये कालक लेल। हम जहन 1980-81 बला प्रदीप बिहारी सँ अपना के आइ मिलान करै छी तँ पबैत छी जे संगे संगे गाय चरेलहुँ कृष्णा भेल भगवान! हम अपन ताहि भगवान सदृश्य अनुज के हुनक साठि बरख पुरि जेबाक पावन अवसर पर बहुत-बहुत स्वागत करैत छियनि! हार्दिक बधाइ दैत छियनि!! आत्मिक शुभकामना करैत छियनि!!! Ú कमल मोहन चुन्नूसाहित्यिक विविधताक संतुलित समीकरण
नाटकक दर्शक दीर्घा सँ उठि कऽ मंच धरि अयबा मे बेसी दिन नहि लागल छल। दुइए-तीन वर्ष मे हम दर्शक सँ प्रस्तोता भऽ गेल रही। मंच पर हमर प्रवेश अभिनय सँ अवश्य भेल मुदा एकरहि समानान्तर हम एकर नेपथ्य-कर्म दिस सेहो अपन सक्रियता बढ़ा लेने छलहुँ। एकर पाछाँ उद्देश्य ई छल नाट्यकर्म कें ओकर सम्पूर्णता मे गहब। तहियाक नाट्यकर्म मे जे किछु वरेण्य नाम सभ अभरथि तिनक व्यक्तित्व आ ख्याति-व्याप्ति सँ मुग्ध भेल करी। हिनकालोकनि मे एकटा विशिष्ट पक्ष ई अभरय जे ओ लाकनि मात्रा रंगमंचे धरि सीमित नहि छलाह अपितु नाट्य जगत सँ बाहरोक साहित्यिक प्रभाग मे हिनका लोकनिक हस्तक्षेप छल। नाटक सँ बाहरोक साहित्य के ई लोकनि पढ़ल करथि। तें हिनका लोकनिक व्यक्तित्व मे एकटा संतुलित रचनाकार परिलक्षित होइत रहैत छल। हिनका लोकनिक ई संतुलित व्यक्तित्व हमरा लेल सदति स्पृहणीय होइत छल। एतहि ई भावना दृढ़ भेल जे मैथिली रंगमंच मे दृढ़ताक संग दीर्घकाल धरि टिकल रहबाक लेल अपन सािहत्य कें पढ़ब अत्यन्त आवश्यक अछि। तदुपरांत हम अपन साहित्य अध्ययनक सीमा-विस्तार कयल। विविध भाषाक नाट्य-साहित्यक संगहि अपना भाषाक साहित्य, विशेष कऽ कथा, कविता, आलोचनादिक अध्ययन प्रारम्भ कयल। ताहि क्रम मे मारितेक रास कथाकार, कवि, नाटककार, समीक्षक लोकनिक नाम आ काज सभ अभरैत गेल। ताही क्रम मे जे किछु कथाकार विशेष रूप सँ ध्यान घिचैत छलाह ताहि ते श्री प्रदीप बिहारी जी सेहो छलाह। हिनका सँ सदेह देखा-सुनी तँ बहुत बाद मे भेल मुदा हिनक साहित्य सँ पहिले सँ परिचित रही। हिनक कथा पढ़ि हिनका सँ एकटा अदृश्य आपकता बुझाइत छल। ताही क्रम मे ई बुझय जोग भेल जे ई बेगूसराय मे रहैत छथि ओ ओतहि रहि अपन आजीविका सँ समय निकालि एकहि संग ओतहुक साहित्य आ रंगमंच दुनूक गतिविधि मे समान रूप सँ सक्रिय रहैत छथि। एकहि संग रंगमंच आ साहित्य मे ठठब तहियो आजी-गुजी बात नहि छलैक, आइयो नहि छैक। हिनकर ‘सरोकार’ कथा-संग्रह हमर पाठक मन पर निश्चये एकटा छाप छोड़ने छल। ओहि कथा सभ मे लागय जे एकदम टटका आ सुच्चा कथा वर्णित भेल अछि। एहि संग्रह सँ हिनक कथाकार रूप साकार आ सुदृढ़ भेल छल। हिनक कथा मे व्यंग्य सँ बेसी चिन्ता देखल करी। से चिन्ता अपन सर-समाजक बढ़ैत अदिनता पर बेसी देखल करी। व्यंग्य करब आसान होइत छैक। ओहि क्रम मे घटना सँ, परिस्थिति सँ किछु बेसीए संलिप्तता अपेक्षित रहैत छैक। ई संलिप्ति-क्रिया स्वयमेव एकटा विशेष प्रकारक प्रतिबद्धताक मांग करैत छैक। एकटा जिम्मेदार कथाकार-रचनाकार लेल ई प्रतिबद्धता बेस महत्वपूर्ण होइत छैक। से जिम्मेदारी आ कि से प्रतिबद्धता हमरा हिनको कथा दिस बेसी घिचैत छल। एतय हमर सोचबाक अभिप्राय ई कदापि नहि अछि जे व्यंग्यकार लोकनि मे जिम्मेदारी आकि प्रतिबद्धताक अभाव होइत छनि। हमर अभिप्राय ई छल जे जँ व्यंग्य-लेखन करैत काल एहि तत्व सभक खगता कमो-सम हो तँ कथा लिखैत काल ई तत्व सभ बेस निर्णायक भूमिकाक संग कथाकार मे सम्मिलित रहैत अछि। दोसर बात इहो रहैत अछि जे कोनहु दुःस्थिति पर चिन्ता करैत काल अथवा ओहि स्थितिक परिवर्तन लेल समर्थ उद्यम करैत काल कने बेसीए गंभीर होबय पड़ैत छैक। ‘सरोकार’ कथा-संग्रहक कथा सभ हमरा एहिए स्तर सँ प्रभावित कयने छल। हिनक लगले-लागल ‘शेष’ आ ‘जड़ि’ उपन्यास सेहो आयल। मिथिलाक समाज मे सामाजिक स्खलन आ सांस्कृतिक विद्रूपण-विलोपन पर हिनक चिन्ता ओहि उपन्यास सभ कें महत्वपूर्ण बनौने छल। ताधरि हिनका संग हमर व्यक्तिगतो हेम-छेम बढ़ि गेल छल। दू-चारि ठाम, साहित्यिक कार्यक्रम मे हिनका संग भेंटो-घाँट भऽ चुकल छल। ताहि भेंट-घाँट सँ ई धारणा स्पष्ट भऽ गेल छल जे प्रदीप बिहारी नामक ई रचनाकार एकटा मितभाषी, मृदुभाषी, अमानी आ दोसरोक मान-सम्मानक चाँकि रखनाहर एकटा कलाविज्ञ-कलामर्मज्ञ व्यक्ति छथि। इहो स्पष्ट भऽ चुकल छल जे ई जाति-वर्ण-क्षेत्रादि दुर्भावना सँ ऊपर उठल रचनाकार छथि। हिनका लेल सदति एकटा समग्र मिथिला भावना प्रधान रहैत छल। जिला-परगन्ना मे बँटल मिथिलाक लेल आकि एहि प्रकारक खंडित मिथिलावादीक लेल हिनका लग कोनहु जग्गह नहि छलनि। हिनक कथा सभ मे सेहो ई प्रमाण सभ अभरैत छल जे ई सदति एकटा विराट मिथिला आ अखण्ड मिथिलाक पक्षधर छथि। मिथिलाक भौगोलिक सीमा हिनक मिथिला के भावनात्मक सीमा तहियो नहि बनि सकल छल। ई यथार्थ हिनक विराटकाय विचार आ व्यक्तित्वक यथार्थ छल। अपन चाँकि आ चिन्ता कें एकटा सार्थक कथावस्तु बनाकऽ अपन रचना मे परसबाक ढंग अद्भुत लागय। तें हिनक विचारक धरातल पर नितान्त हिनक कथावस्तु कथा-उपन्यास मे आबि कऽ सगर समाजक कथा बनि जाइत छल। हिनक चिन्ता मे अतीतजीविता आकि यथास्थितिवादिताक तत्व कहियो प्रभावित करैत नहि अभरय, कहियो बाट छैकैत नहि अभरय। ‘सरोकार’क प्रभाव उतरलो नहि छल कि ‘शेष’ आ ‘जड़ि’ अपन प्रभाव देखाबय लागल। लागय लागल जे ई आब उपन्यासे लिखताह। कारण उद्यमक स्तर सँ ई दुनू उपन्यास बेस सुदृढ़ रचना लागि रहल छल। निर्णय करब आसान नहि छल जे ई कथाकार नीक आकि उपन्यासकार नीक। आब स्थिति ई छल जे हिनक उपन्यास पढ़ैत काल कथा सँ मोहभंग नहि भऽ पाबय आ कथा सुनैत काल उपन्यास सँ छुटकारा नहि भेटय। तथापि हमरा लागय जे आब ई उपन्यासे लिखताह तँ बेसी छजतनि। मुदा जखन ‘पोखरि मे दहाइत काठ’ (कथा-संग्रह) आयल तँ अपन धारणा कें परिमार्जित कयल जे ‘सरोकार’क कथाकार भनहि उपन्यासे लिखि रहल छथि, मुदा ओ कथा-लेखन दायित्व आ चमत्कार सँ अभ्यास-विरत नहि भेल छथि। हिनक कथा सभ मे पुनः दुर्लभ क्षेत्रा आ नितान्त अप्रचलित-अपरिचित पात्रा, सर्वहारा-गृहहारा पात्रा सभक वेदना-संवेदना अत्यंत मार्मिक रूपें चित्रित-अंकित भेल। कोरोना विभीषिका मे लगले-लागल पुनः दूटा उपन्यास ‘कोखि’ आ ‘मृत्युलीला’ आयल। ‘कोखि’ उपन्यास अपन मानवतावादी दृष्टिकोणक संग एकटा यथार्थक भूमि पर नारी-विमर्शक आह्वान करैत छल। एहि मे एकटा विशेष प्रकार सूक्ष्मताक संग आ एकटा दूरदर्शी विवेकक संग स्त्राीक स्त्राीत्व कें आ ओकर मातृत्व कें नव तरहें विमर्शक धरातल पर आनल गेल। कहबा मे हर्ज नहि जे उपन्यासकारक ‘काखि’क विमर्श-स्वर एक प्रकारें तलवारक धार पर चलब छल। मुदा उपन्यासकार ताहू पर चलय सँ परहेज नहि कयल। ‘सेरोगेसी’ पर जाहि दृढ़ताक संग वैचारिक विमर्श कें आमंत्रित कयल से हिनक सबल आत्मविश्वासक प्रतिफलन थिक। यद्यपि प्रचलित युगक आधुनिक चालि-चलन के आधार बना कऽ हिनक स्थापना सँ असहमतो भेल जा सकैत छल। मुदा हिनक ‘कोखि’-विचार कें सहजे ने तँ अनठाओल जा सकैत छल आ ने निरस्त कयल जा सकैत छल। ‘मृत्युलीला’ तँ कोरोना संकटक एकटा औपन्यासिक दस्तावेज सन आयल। एहि उपन्यास मे मानवक तुच्छता, परिस्थितिक उग्रता, भयानक-भयग्रस्त परिवेश, पैशचिकता भरल मृत्यु-क्षुधा, असहाय बनल सम्बन्ध-बन्ध, पर्वताकार मृत्यु-भय आदिक तँ सटीक चित्राण भेले छल, मुदा सम्पूर्ण उपन्यास मे जे मानवक सीमित प्रभाव सँ उपकल चैबगली भय तेना ने सृजित भेल छल जे लगैत छल जे भय स्वयमेव एकटा अदृश्य पात्रा हो। मुदा तकर संगहि, जे मानवक जिजीविषा आ मानवीय संघर्षक गरिमा प्रस्तुत भेल से सर्वथा प्रशंसनीय छल। तकर संगहि पुनः एकटा संग्रह ‘हे रौ’ (लघुकथा-संग्रह) आयल। इहो संग्रह अपन अपेक्षित तीक्ष्णताक संग आयल। एकर लघुकथा सभ मात्रा काया मे लघुकथा छल, प्रभाव मे ई बेस मजगुत बनैत छल। विशेषतः जखन ई लघुकथा सभ अपन क्षिप्रताक संग पाठकक मोन मे अपन अर्थ-अभिप्राय खोलैत छल तँ लगैत छल जे एहि लघुकथा सभक एक-एक शब्द सभ कते आवश्यक आ कतेक महत्वपूर्ण अछि। ई लघुकथा सभ अपन विषयक स्तर पर जतेक व्यापक छल, प्रभावक स्तर पर ताहू सँ बेसी ठोस देखाइत रहैत छल। एतावता हमर ई धारणा पुष्ट भऽ गेल छल जे श्री प्रदीप बिहारी जी कथाक छोट-पैघ तीनू ‘फाॅर्म’ (कथा, उपन्यास, लघुकथा) मे सिद्धहस्त छथि। हिनक ई तीनू ‘फाॅर्म’ आ तीनू स्तरक रचना अपन विधागत आकि विषयगत-शिल्पगत स्तर पर ककरो-केओ अतिक्रमण नहि कऽ रहल छल। ई रचनाकार जतेक साकांक्ष विषयक चयन मे लागथि ताहि सँ कतोक गुणा बेसी ओकरा लेल शिल्पक चयन मे लागथि। एहि क्रम मे हिनक संयम आ धैर्य प्रशंसनीय लागय। जेना-तेना आ जे-से लिखि देबाक चर्या कें कहियो प्रश्रय दैत नहि लगलाह। हिनक यैह साहित्यिक आ विधागत सुविचार हमरा प्रभावित करैत छल। हिनक सभ कृति मे ई योजना-तत्व एकटा गंभीर दृष्टिक संग कार्यरत भेटैत छल। ई रचनाकार ने तँ लघुकथाक योजना बना कऽ कथा लिखैत छलाह आ ने कथाक योजना बना कऽ उपन्यासे लिखैत छलाह। ई लघुकथा लेल लघुकथा लिखैत छलाह, कथाक लेल कथा लिखैत छलाह आ उपन्यासक लेल उपन्यास। तें हिनक लघुकथा, कथा आकि उपन्यास अपन-अपन आकार, प्रकार आ विचार कें सदति सुरक्षित रखने लगैत छल। अपन रचनाक कथ्य आ तदनुरूप काया लेल एहेन सचेत-सजग रचनाकार मैथिली-साहित्यक लेल गर्वक विषय छल। एहने सन किछु सजग-सचेत रचनाकार लोकनि सँ आधुनिक मैथिली साहित्य सुदृढ होइत रहल छल। हिनक कथा सभक मारिते रास पात्रा सभ सँ हमरा वैयक्तिक अपनैती लागय। हमरा सदरि काल एहेन अनुभव होअय जे एहि पात्रा के हम कतहु देखने छी, एहि पात्रा सँ कतहु हमरो भेंट-घाँट भेल अछि। ई पात्रा कहियो हमरो टकरायल अछि। अपन समाजक प्रति एकटा सजग रचनाकारक ई एकटा महत्वपूर्ण प्रमाण लागय। लागय जे ई कथाकार अपन विषय आकि पात्रा चयनक लेल कतेक जाग्रत छथि, कते उद्यमी छथि। हिनक कोनहु रचना मे ई नहि लागय जे रचनाकार कखनो औंघा गेल छथि। कथा-उपन्यास बुनबाक क्रम मे जे ‘माइन्यूट डिटेल्स’ अबैत छल से एकटा जाग्रत लेखकक प्रबल पक्ष छल। कोनहु कथा मे, कोनहु बात कें ई ‘मोटामोटी स्तर पर’ कहबा सँ सायास परहेज कयने रहथि। जे बात कहथि से अपन पूरा ‘होमवर्क’क संग कहथि। ओ बात हिनक कथाक केन्द्रीय कथ्य होइत छल। ‘एकटा आओर सान्ताक्लाॅज’ कथा मे हिनका अन्तर्राष्ट्रीय आतंकबाद पर गप करबाक छलनि मुदा पात्रा छल एकटा बस ड्राइवर। ई बस ड्राइवर वस्तुतः एकटा वास्तविक पात्रा छल जे पटना-जटही चलैत ओम ट्रेवेल्स बसक ड्राइवर छल। ई ड्राइवर पोखरौनी मे ओहि बस मे चढ़ैत छल आ जटही धरि लऽ जाइत छल आ वापस सेहो होइत छल। ओहि ड्राइवर कें हमहूँ कएक बेर देखने रही, कएक बेर ओकरा ड्राइवरी मे गाम आयल रही। ओकरा सभ सरदारजी कहैक। ओ सरदारजी बच्चा सभक प्रिय ड्राइवर छल। पोखरौनी सँ लऽ कऽ जटही धरि, सभ गामक बच्चा ओकरा सँ एतेक स्नेह करैक जे ओकरा अभिवादन करय लेल दुबगली ठाढ़ रहैत छल। ‘एकटा आओर सान्ताक्लाॅज’ मे यैह सरदारजी ड्राइवर मुख्य पात्रा देखल जे एकटा प्रिय बच्चाक माय छैक, जकर घरवला जे कमाय लेल परदेश गेलैक से आइ कएक वर्ष सँ घुरि कऽ गाम नहि अयलैक। सरदारजी कें बूझल छैक जे ओकर घरबला अतिवादी-आतंकवादीक गोलीक शिकार बनि गेल छैक, मुदा ई दुखक बात ओ अपन ओहि मुँहबोली बहिन कें कोना कहतैक? कथाकार एहि ड्राइवरक चिन्ता कें, क्रमेण बढ़ैत आतंकवाद कें अपन विलक्षण तानी-भरनीक संग एकटा ठोस कथा रूप मे कहने छथि। ओहि ड्राइवरक मानवतावाद सहजे ओकरा एकटा विराट चिन्तक रूपमे ठाढ़ कऽ दैत छैक जकर श्रेय एहि कथाकार कें जाइत छनि। एकटा सामान्य जन कें अपन कथा मे उतारि ओकर भावना-संवेदना कें एतेक विस्तार देब, ओकर मानवीय सरोकार कें एतेक पैघ क्षितिज पर स्थापित-व्याख्यायित करब हमरा लेल सहज आकर्षणक केन्द्र भऽ गेल छल। एहेन-एहेन कथा पढ़ि कऽ हम तहियो अचम्भित भेल छलहुँ। हमरा तहियो लागय आ से आइयो लगैत अछि जे हमरा भाषा-साहित्य मे एहेन-एहेन रचनाकार सभ छथि जे मैथिली कें ओकर कूपमण्डूकता मे नहि ओकर वैश्विकताक संग अंगेजने छथि। हिनक प्रायः सभ कथाक ‘कैनवास’ एही वैश्विकता-भावना सँ प्रेरित लगैत छल। मारिते रास कथा मे तँ इहो लागय जे हिनक कथापात्रा सभ बहुत जिम्मेदार आ बहुत उदार छनि। अपन गौण पात्रा सभ कें सेहो ई ‘वंचित-वर्ग’क आकि ‘वंचित कोटि’क पात्रा नहि बुझलनि। एहि पात्रा सभ कें सेहो ई अपेक्षित विस्तार दैत रहलाह। एहि पात्रा सभ कें ओ ‘अपटी खेत’ मे छोड़ि देबाक पक्षधर नहि लागथि। ई प्रवृत्ति हिनक ‘पात्रोचित न्याय’ भावनाक पर्याय बनल। कथात्मक गद्य लिखैत काल बहुत दायित्व रहैत छैक। ई तँ क्रिकेटक ‘बैटिंग’ करब सन होइत अछि जाहि मे बैट्समैन कें रन सेहो बनेबाक छैक, क्रीज पर सेहो टिकल रहबाक छैक, अपन सहकर्मी बैट्समैन कें मदति सेहो करबाक छैक, चारूकात फिल्डर कें सेहो ध्यान मे रखबाक छैक आ अपन टीम कें सेहो जितेबाक छैक। एकटा कथाकार कें कथात्मक गद्य लिखैत काल एहने भरिगर-भरिगर दायित्व सभ निभहय पड़ैत छैक। हिनक कथात्मक गद्य सेहो ताहि दाियत्व कें निमाहैत सन लागय। से कएक स्तर लागय। जखन ई पात्रा सभक गपशप लिखैत छलाह, जखन ई कथाक्रम कें आगू बढ़बैत छलाह, जखन ई कथाक परिवेश कें लिखैत छलाह आ कि जखन ई अपन वैचारिक भाव लिखैत छलाह, सभ स्तर पर अपन चमत्कारिक गद्यक संग ई भेटैत छलाह। कोनहु ठाम कोनहु गद्य झूस नहि, कोनहु गद्य अकछाह नहि। मैथिली मे किछु कथाकरक कथात्मक गद्य आकर्षित करय ताहि मे श्री प्रदीप बिहारी सेहो छलाह। हिनक कथात्मक गद्य कहियो आलोचनात्मक गद्य नहि बनय। हिनक ई सायास उद्यम आ चिन्तन-मनन हमरा बेर-बेर आकर्षित करय। आइ जखन हिनक लगभग सभटा कृति पढ़ि लेने छी तखन कहबा मे प्रसन्नता तँ होइत अछि जे श्री प्रदीप बिहारी आजुक मैथिली साहित्यक ओहि किछु मजगुत रचनाकार मे सँ छथि जिनक साहित्य-रचना सँ हमरा लाकनि आइयो गर्व करबाक स्थिति मे छी। श्री प्रदीप बिहारी ओहि रचनाकार सभ मे छथि जे मैथिलीक कथा-साहित्य आ उपन्यास-साहित्य कें एकटा प्रशंसनीय स्तर पर सुस्थापित कयने छथि। हिनक एहि षष्ठिपूर्तिक अवसर पर हम अपन एहि अग्रज रचनाकारक साहित्यिक स्वास्थ्यक संगहि हिनक भौतिक, आध्यात्मिक प्रभृति सभ स्वास्थ्यक प्रति अपन शुभकामना व्यक्त करैत छी। ई शतायु होथि आ हमरा लोकनि सदति हिनक साहित्य सँ आ हिनक साहचर्य सँ लाभान्वित-ऊर्जस्वित होइत रही। Ú दिलीप कुमार झा‘कोखि’ पढ़लाक बाद
एखने-एखने पढ़ि कऽ समाप्त कयलहुँ अछि मैथिलीक सुप्रसिद्ध कथाकार, उपन्यासकार श्री प्रदीप बिहारी जीक लिखल चतुरंग प्रकाशनसँ प्रकाशित उपन्यास ‘कोखि’। प्रदीप बिहारी अपना कथा ओ उपन्यासमे नव विषय उठबैत रहलाह अछि, से एहु उपन्यासक माध्यमसँ पाठककें देश-दुनियाँमे भऽ रहल सामाजिक परिवर्तन दिश धियान दियेबाक प्रयास केलनिहें। कथा फेसबुकपर एकटा महिलाक मित्रातासँ आरंभ होइत अछि। ओ महिला जिनक नाम श्वेता छनि, ओएह एहि उपन्यासक नायिका छथि। श्वेताकें बेर-बेर गर्भमे पालित बच्चाक नोकसान भऽ जाइत छनि, जाहिसँ श्वेता आ हुनक पति अनुपमक परिवारक लोक बच्चाक लेल बहुत चिंतित होइत छथि। अनुपमक परिवारक लोकसभ आ श्वेताक माय बच्चाक लेल कनि बेसिये चिंतित होइत छथि। एहिक्रममे श्वेताक लेल सेरोगेसीक माध्यमसँ बच्चा प्राप्त करबाक सेहो योजना बनैत अछि। अनुपमक परिवार तँ ओकर दोसर बिआह करेबाक नियार सेहो करैत अछि मुदा श्वेता आ अनुपम दुनू गोटा अपना दाम्पत्य जीवन ओ आपसी सिनेहसँ एना ने शिक्त छथि जे हुनका सभकें बच्चा प्राप्त करबाक सभ जोगार, एतय धरि जे पोषपुत बला बात सेहो अस्वीकार छनि। उपन्यासमे शुरू सँ अन्त धरि नाटक ओ रंगमंच कथाक विषय-वस्तु बनल अछि। से उपन्यासक कथावस्तुमे सेहो नाटकीयता परिलक्षित होइछ, जे एकटा अभिनव प्रयोग कहल जा सकैए। एकटा रंग निर्देशक भौमिक ओ नृत्यांगना पारुलक प्रेमकथा सेहो समानान्तर चलैत अछि। पारुल आ भौमिकक प्रेमसँ उपजल कोखिकें पारुल नष्ट करबा लैत अछि। पारुलक एहि बेवहारसँ भौमिककें आघात लगैत छैक। ओ भूमिगत भऽ जाइत अछि, जकरा कथाक सूत्राधार प्रतीक, जे स्वयं रंगकर्मी ओ रंग समीक्षक छथि, अथक प्रयाससँ हुनका ताकि लैत छथि। कथामे आधुनिक मेट्रो संस्कृतिमे भऽ रहल परिवर्तनक सेहो लेखक बहुत सुक्ष्मतासँ ‘लिव इन’ के बात उठौलनि अछि। कहबाक अर्थ ई जे उपन्यास मनलग्गू अछि। अनेक सामाजिक समस्या दिश पाठककें घिचबामे सफल भेल अछि। हम एहि सुन्नर उपन्यासक लेल श्रीमान प्रदीप बिहारी जीकें बधाइ ओ शुभकामना दैत छियनि। अपनेलोकनि पढ़ब तँ अवश्य नीक लागत। धन्यवाद। ú दीप नारायणउपेक्षित पात्रक सुधि लैत कथाकार
विश्व कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुरक अमर निबंध ‘काव्येर उपेक्षिता’ आ महावीर प्रसाद द्विवेदी जीक निबंध ‘कवियों ने उर्मिला के साथ न्याय नहीं किया’ कें चुनौती रूपमे किछु कविलोकनिक ओहि चिर उपेक्षिता पर ध्यान गेलनि। अदौ कालसँ सामाजक उपेक्षित पात्रा सभकें अपन लेखनीमे स्थान दऽ लेखकलोकनि ओहि पात्राकें जीवंत कएलनि। मैथिली शरण गुप्त अपन कालजयी कृति ‘साकेत’मे चिर उपेक्षिता विरहिणी उर्मिलाक ओहि रातिक नोर सभक हिसाब कएलनि जे भातृ प्रेममे लक्ष्मणक चैदह वर्षक बनवासकालमे अयोध्याक राजमहलमे बहल छल। उर्मिलाक संग मांडवी, श्रुतिकीत्र्ति, कैकेयी आदि पात्रा सभक चारित्रिक उत्कर्ष केर दिग्दर्शन ‘साकेत’मे भेल तँ यशोधराक अमर खंड ‘सखि वे मुझसे कहकर जाते’ मे अपूर्व रूपसँ यशोधराक चरित्रा चित्राण भेल अछि। एहिना केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’ कैकेयीकें राष्ट्रमाताक रूपमे वर्णन करैत लिखैत छथि जे जँ रामक वनगमन नहि होइतैक तखन रावण वध संभव नहि छल। मैथिली साहित्यमे सेहो महाकवि पंडित लालदास अपन ग्रन्थ ‘जानकी रामायण’मे राम काव्य परम्परामे अपन चालिसँ उपेक्षित कैकेयीकें कृष्ण कालमे देवकी रूपमे परिष्कृत करैत छथि। ओ बालिक बहिन रत्नाकें पुतना रूपमे मोक्ष दिएबैत छथि तँ सीताक सखी सभकें गोपी रूपमे महारासमे सहभागी बना राम कालक मनोरथ पूर्ण करैत छथि। ई तँ भेल उपेक्षित पात्रा सभक परिष्कार। मुदा सत्य इहो अछि जे समाजमे किछु त्याज्य पात्रा सभ सेहो अछि जकर मनोभावक अभिव्यक्ति मैथिली साहित्यमे नहि सन भेल अछि। सभ्यताक आडम्बर तऽर दबाएल लेखकलोकनि वेश्यालय वा देह व्यापारमे फँसल पात्रा कें अपनक कथाक पात्रा बना परिष्कार करएसँ बिदकैत रहलाह अछि। अपन रचनामे नव-नव कथावस्तु आ भाव-भूमि तकैत रहब जिनक लेखनक स्वभाव छनि। नव-नव आ अद्यतन विषय सभकें प्रमुखतासँ अपन रचनामे समाहित कएनिहार मैथिलीक विरल बहुआयामी साहित्यकार प्रदीप बिहारी अपन कथा ‘मौगियाह’मे एहि सभ भावक एक संग पूर्ति कऽ मैथिली कथा साहित्यकें जे अपन अवदानसँ विस्तृत फलक देलनि अछि, से अपूर्व अछि। प्रदीप बिहारीक चर्चित कथा-संग्रह ‘औतीह कमला जएतीह कमला’मे संग्रहित ‘मौगियाह’ कथाक आरम्भ एकटा तरकारीक दोकानसँ होइत अछि, जतए लेखककें भेंट कथाक मुख्य पात्रा मिरदंगियासँ होइत अछि। मिरदंगिया मौगियाह अछि। ओकर आंगिक, वाचिक आ क्रियाकलाप स्त्रौण्य अछि। एकगोट वेश्यालय जकरा पेट्रोल पम्प लग होएबाक कारणें ओहि क्षेत्राक लोक इंडियन आॅयल वा पेट्रोल पम्पक नामसँ जनैत अछि, ताहिमे ओ भरुआक काज करैत अछि। स्त्रौण्य चालिढालिक कारणें ओ लेखककें एहि विषयक नाटक लेल उपयुक्त लगैत अछि। वेश्यालय केर भावभूमिपर बुनल गेल ई विलक्षण कथा अछि जे पाठककें झकझोरि दैत अछि। समाजमे प्रचलित उक्ति ‘माउग ने मरद बलिगोबना’ कहि एहन पात्राकें बलिगोबना मानि मजाक उड़ाओल जाइत अछि। मुदा एहि पात्राकें कथाकार अत्यन्त संवेदनशील प्रस्तुतिसँ एहि कथामे अमर कएने छथि। हिंदी आ अंग्रेजी साहित्यमे थोड़-बहुत एहि विषय पर लिखल गेल अछि, मुदा मैथिली साहित्यमे हमरा जनैत मणिपद्मक एक कथा ‘बालगोबिंद’मे एहि तरहक पात्राक चर्च भेटैत अछि, मुदा आधुनिक मैथिली साहित्यमे एहि विषय पर कलम चलओनिहार प्रदीप बिहारी संभवतः एक मात्रा लेखक छथि। सुप्रसिद्ध लेखक राजकमल चैधरीक कथा वेश्यालय वा अनुचित प्रेम संबंध सभक यात्रा अवश्य करैत अछि मुदा एहन बलिगोबना चरित्रा चित्राण केर जानकारी हमरा नहि अछि। कथामे कथाकार एकगोट नाटकक पात्रा लेल मौगियाहक चरित्रा देखाबए लेल मिरदंगियाकें बहुत मेहनतसँ राजी करैत छथि। जखन मिरदंगिया रिहर्सल लेल आबए लगैत अछि आ कथाकारसँ हेमक्षेम होइत छनि, तखन कए गोट कथा एकहि संगे सोझाँ अबैत अछि। सभकें एक तागमे गाँथि लेखक एहि कथाकें विलक्षण बना देने छथि। एतए लेखकक लेखन-कलाक जे उच्चता अछि से अन्यत्रा कथा साहित्यमे कमे अभरल अछि। मिरदंगियाक बजबाक शिल्प कथाकें आओर मनलग्गु बना देने अछि। जखन मिरदंगिया लेखकसँ किताब माँगए अबैत अछि तँ कहैत अछि जे- ‘‘ऊ कतेक दिनसँ बोलल करै छलै किताब दऽ।’’ ‘‘के ऊ?’’ ‘‘आर के? हमरा जऽरे जे रहै हइ- मालती।’’ ‘‘के मालती?’’ ‘‘हमे जहाँ रहै छिकियै, ओतै एगो छौड़ी हइ। सभ सँ सुन्नरि हइ। ड्राइभर-खलासी आउर के अपना भीरू बैठैयो ने दै हइ। ओकरा पढ़ै के बड्ड सख है। कहियो काल बाजार सऽ हमे किताब आनि दै छियैक। एहि बेर अहीं सऽ कहलकै माँगि कए लेने आबै लेल।’’ मिरदंगिया मालतीक बड़ाइ करैत अघाइत नहि अछि।…लेखककें जखन ई बुझबामे कोनो भाँगठ नहि रहैत अछि जे मिरदंगियाकें मालतीसँ प्रेम छैक तँ पुछि दैत छथि- ‘‘तोरा बड़ मानै छौ मालती?’’ ‘‘बुझाइ हइ तहिना। मुदा, हमे ई गलती फेरो नै करए चाहै छिकियै।’’ गम्भीर होइत मिरदंगिया कहैत अछि, ‘‘आब एगो बात मुदा होइ हइ…।’’ प्रेमक जे अभिव्यक्ति प्रदीप बिहारी कयने छथि ओ साँचे अपूर्व लगैत अछि। एहि संवादसँ ई स्पष्ट होएत- ‘‘…पहिने मालती गहिंकी भीरू केबाड़ बन्न करै छलै तऽ हमरा कुच्छो ने होइत रहै आ आब जे ऊ गंहिकी के लए कऽ कोठरी मे जाइ हइ आ केबाड़ी बन्द करै हइ, तखने हमरा मोनमे किछ कचकि जाइ हय।’’ ई मौगियाहक हृदयमे प्रेमक प्रस्फुटनक सुन्दर वर्णन अछि। ओहि पात्राकें जकरा समाज मानैत अछि जे प्रेमसँ एकरा दूर दूर धरि कोनो सम्बन्ध नहि छैक, ओहि मिरदंगियाकें प्रेम एक बेर घटनाक रूप लैत अछि जखन कि रिहर्सल करैत नायिकाक माय अपन बेटीकें प्रेम करै सँ मना करैत छथि। आ एहि दृश्यक रिहर्सल देखैत मिरदंगिया रिहर्सलेमे माएक भूमिका करैत ओहि स्त्राीक गरदनि दाबि कऽ अधमरू सन कऽ दैत अछि। वस्तुतः ई घटना ओकर मुंगेरमे रहैत काल ओहि कष्ट केर प्रतिशोध छैक, जकरा कारणें ओकर प्रेयसी इन्दु एड्ससँ मरि गेल आ ओ तखन किछु कऽ नहि सकल छल। ओकर मोनक ओ कुंठा रिहर्सलमे बहरा गेलै आ भावातिरेकमे ओ ओहि पात्राकें अपन इन्दुक मृत्युक जिम्मेवार मानि लेलक। एहि कथामे कए गोट घटनाक जोड़ि कथाकार एहि कथाकें रोमांचक बना देने छथि। एहि कथामे समानान्तर रूपसँ अनेक कथा चलैत अछि जेना तरकारीवलाक कथा, नाटक होयबाक कथा, इन्दु मृदंगियाक कथा, मालती मृदंगियाक कथा, पैघ हाकिमक स्त्राीक मृत्युक बाद बरोबरि मालती लग अएबाक, ओकरा किताब पढ़बाक सऽख, मुजराक लाइसेंस, स्त्राीजन्य रोग एड्स, सरस्वती साधना लग मात्रा साधना छोड़ि कोनो काज संभव नहि आदि। लेखकीय कौशल एहि कथामे एना अभरल अछि जे सभटा कथा एक दोसराकें सहारा दैत अछि। एक प्रसंग दोसर प्रसंगक गतिमे बाधक नहि बनैत अछि। सभ एक दोसराक संग एहि बेहतरीन कौशलसँ बुनल गेल अछि जे कथाक प्रवाह अंत धरि प्राणवन्त बनल रहैछ। नाटक देखबा लेल मालती सेहो एतैक आ लेखकसँ भेंट करतैक। तखन की हेतै से जिज्ञासा बनल रहैछ। अंत धरि एहि कथामे पाठक केर उत्सुकता बनल रहैछ जे लेखकक कथा कहबाक कौशलक सफलता थिक। नाटकसँ तीन दिन पहिने पता चलैत अछि जे मृदंगिया एहि वेश्यालयक मलिकाइनक हत्या कऽ देलक। नृत्य आ मुजरा सिखबाक निर्णय एकरा सभके अरघै नहि छैक。 एहि कथाक ई एकटा विशेष खूबी अछि जे मिरदंगिया आ मालती ई चाहैत अछि जे हमसभ एहि नरकसँ बाहर भऽ जाइ। कहुना छुटकारा पाबि जाइ मुदा से संभव नहि देखि ओ निर्णय लैत अछि। मुंगेरमे रहैत कालमे इन्दुकें नहि बचा सकबाक दुख आ विवशता मोन पड़ैत छै। प्रेममे कतेक शक्ति छैक जे सदिखन बलिगोबना बनल रहएबला मिरदंगिया अपन दोसर प्रेम मालतीक रक्षा लेल मलिकाइनक हत्या करैत अछि आ पुलिसक समक्ष सहजतासँ ई स्वीकार करैत अछि। पाठकक उत्सुकता रहिए जाइत अछि जे फेर नाटक भेल वा नहि? मालतीक की भेल? आदि…। पाठकक मोनक उत्सुकताक चरमपर रहैत अछि आ कथा समाप्त भऽ जाइत अछि। कथाकार एहि कथासँ कथा कहबाक एक विलक्षण शैली विकसित कएलनि अछि जे पाठककें विह्वल करैत अछि। हमरा ई कथा कोनो सत्य घटनाक बहुत लगीच लगैत अछि। यैह कथाकारक सभसँ पैघ सफलताक पैमाना अछि। पात्रा सभक चरित्रा विकास सेहो प्रशंसनीय ढंगसँ बढ़ैत अछि। मिरदंगियाक चारित्रिक ग्राफ सीधा ऊपर जाइत अछि। मालतीक ग्राफ सेहो ऊपर उठैत अछि। अस्वस्थ रहितो ओकरा लग बेसीसँ बेसी गहिंकी पठबैत अछि मलिकाइन। ओ सभटा सहि जाइत अछि। यथार्थमे कथाकार अत्यन्त चातुर्यसँ ओकरा किताब पढ़बाक सऽख दऽ ओकरा गहिंकी सभक संसारसँ अलग एक एहन वृत्त देलनि जे मात्रा ओकर छैक। एहि वृत्तमे ओ अछि, पोथी छैक आ छैक मात्रा मिरदंगियाक स्नेह। पोथी पढ़बाक हिस्सकक सर्जनासँ कथाकार जे मालतीक मनोवैज्ञानिक ग्राफ बनओने छथि ओ साँचे अपूर्व भेल अछि। ई एक मनोवैज्ञानिक तथ्य अछि जे एहन स्त्रौण्य चरित्रा वा विषयपर रचित रचनामे लेखक आ पात्राक स्वाभाविक रुझान समलैंगिकता दिश बढ़ि जाइत अछि। प्रसिद्ध लेखक ई एम फाॅस्टर सन पैघ लेखक अपन। त्ववउ ूपजी ं टपमू आ भ्वूंतके म्दकमे एहि प्रवृत्तिसँ बाँचि नहि सकलाह। ई प्रदीप बिहारीक वैचारिक उच्चताक परिचायक अछि जे ओ एहि प्रवृत्तिसँ बाँचि सकलाह। ओ अपन कथाक मुख्य पात्रा मिरदंगियाकें मौगियाह होयबाक बादो ओकर पुरुषार्थकें बचा कए रखलनि। ओकर सहज आकर्षण विपरीत लिंगक मालतीसँ होइत छैक आ कथाक चरमोत्कर्षपर ओकर नुकायल पुरुषार्थ प्रेमक रक्षा लेल जगैत छैक आ ओ मलिकाइन केर हत्या कऽ अपराध स्वीकार करैत अछि। कथाक कथानक एवं पात्रा सभक चरित्रा चित्राण सटीक भेल अछि आ एकर शिल्प अद्भुत अछि। कथोपकथनक शैली असरदार अछि। मुदा एहि कथाक भाषा-शैली सभसँ बेसी आकर्षित करैत अछि। बृहत्तर मिथिला क्षेत्राक भाषाक बेसी उपयोग भेल अछि। एहि लेल शब्द चयनक कथाकारक काबिलियत प्रशंसनीय अछि। हिबै, भिरु, बड़गाही, लचकैत डाँड़, कचकि जाइ हय, कुभेला आदि शब्द सभक उपयोग कथाक गति, वातावरण आ वास्तविकताकें निखारि देने अछि। कुल मिला कऽ कहि सकैत छी जे प्रदीप बिहारीक कथा ‘मौगियाह’ एक विलक्षण सफल कथा अछि जे कथाकारक कथा कहबाक कौशलक जीवन्त दस्तावेज अछि。 Ú डाॅ निक्की प्रियदर्शिनीएकटा जिम्मेदार उपन्यासकार
“We expect a fiction writer to know his craft and to help us discover something about the would we did not know before or know in the same way, something to be true and that has relevance to our attitudes and conduct.” -William Van O’Conner प्रसिद्ध अमेरिकी विद्वान विलियम वैन ओ’काॅनर उपन्यासकारक दायित्वक संन्दर्भमे कहैत छथिµ ”हम उम्मीद करैत छी जे एकटा उपन्यास लेखक अपन शिल्पके ँ बुझथि आ हमरा ओहि वस्तुक विषयमे किछु तकबामे मदति करथि जकरा हम पहिनेसँ जनैत छलहुँ अथवा ओहि तरहे ँ नहि जनैत छलहुँ जकरा हम सत्य मानि ली आ ओ हमर दृष्टिकोण आ आचरणक लेल प्रासंगिक भऽ जाए।“ मैथिली उपन्यास प्रारम्भहि काल (1913-14)सँ अपन विषयमे समकालीनताकें विद्यमान रखने अछि। जाहि कालमे जे विषय प्रमुखताक संग समाजमे छल तकरा केंद्रमे राखि उपन्यासकार लोकनि अपन बात उपन्यासक माध्यमे समाजक समक्ष अनलनि। केहनो मरखाहसँ मरखाह विषय किएक नहि हो तकरा निधोख भऽ अपन उपन्यासक विषय बनौलनि आ सफल सेहो भेलाह। उपर्युक्त दायित्वक निर्वहन करैत मैथिली साहित्यक हमर प्रिय उपन्यासकारमेसँ एक श्री प्रदीप बिहारी छथि। साहित्यक प्रमुख विधा सभमे हिनक योगदान बहुमूल्य अछि जाहिमे अनेको कथा-संग्रहµ ओतीह कमला जयतीह कमला, मकड़ी, सरोकार, उजास, लघुकथाµ खण्ड खण्ड जिनगी, हे रौ, नाटकµ फुटपाथ, उपन्यासµ गुमकी आ बिहाड़ि, विसूवियस, शेष, जड़ि, कोखि, मृत्युलीला आदि प्रकाशित अछि। एकर अतिरिक्त हिनक कतेको अनूदित आ सम्पादित पोथी मैथिलीक आँचरमे अर्पित अछि। सम्मान-पुरस्कारक गप करी तँ अनेको पुरस्कारक संग साहित्यिक क्षेत्राक प्रमुख पुरस्कार साहित्य अकादमी पुरस्कार 2007 ई.मे प्राप्त छनि। उपन्यासकार श्री प्रदीप बिहारी मात्रा बीस वर्षक आयुमे अपन पहिल उपन्यास ‘गुमकी आ बिहाड़ि’ लिखलनि। ओना हिनक पहिल रचना ‘कथा संकोच’ छल जे 1976 ई.मे ‘लालधुआँ’ नामक पत्रिका, जकर सम्पादक विभूति आनंद छलाह, ताहिमे छपल छलनि। अपन मास्साहेब जीवकान्त जकाँ ईहो पाँच-पाँचटा उपन्यास लिखि हुनक आशीर्वादके ँ फलीभूत कएने छथि। आगू आओरो उपन्यास आओत से विश्वास हमरा सन पाठकके ँ आह्लादित करैत अछि। एहि पाँचो उपन्यासमेसँ टटका उपन्यास ‘कोखि’ पर हम किछु गप करब। ई उपन्यास 2020 ई.मे प्रकाशित भेल। उपन्यासकार श्री प्रदीप बिहारी द्वारा हमरा ई उपन्यास 14 सितम्बर 2020 कऽ उपहृत कयल गेल। उपन्यासकार कतेको बेर भेंट भेलाह। सभबेर व्यवहार-कुशल लगलाह। साहित्यिक समाज मे ई अपन लेखन सँ यश प्राप्त कयने छथि। हमहूँ हिनक पोथी पाबि आंनदित भेलहुँ। मुदा पोथीक शीर्षक देखि कनेक अचंभित भेलहुँ। ‘कोखि’ तँ स्त्राीपक्षक विषय लगैत अछि। पहिल बेर जखन ई उपन्यास पढ़लहुँ तखन ई मात्रा हमरा ‘सेरोगेसी’, जे एकटा डाॅक्टरी बिध अछि आ ओ एखन निःसंतानता लेल भारतो मे खूब प्रचलित भेल अछि, तकर विरोध करैत सन लागल। उपन्यासकारसँ हम अपन सहमति नहि रखलहुँ। मुदा एहिपर विमर्श करबाक मन बेर-बेर होइत छल। मोन ईहो कहए जे ई मैथिली साहित्यक बहुत सशक्त रचनाकार छथि, तँ ई एहि उपन्यासक नाम ओहिना नहि रखने हेताह। लगभग एक साल बाद फेर एहि उपन्यासके ँ पढ़बाक मोन बनेलहुँ। पढ़लाक बाद ‘सेरोगेसी’क विरोधक संग-संग तीनटा आओरो विषय भेटल। ओ छल, लिव-इन-रिलेशनक परिणाम, भ्रूणहत्याक पुरजोर विरोध आ अनाथालयक आवश्यकता। कही तँ उपन्यासमे देखाओल गेल चारू विषय समाजक ज्वलंत समस्याके ँ देखार करैत अछि। उपन्यासकार अपन सभ पात्राक उपयोगिताके ँ सार्थक सेहो करैत छथि। ‘कोखि’ उपन्यासक महिला पात्रा श्वेताक माय, श्वेता, शुभा, पल्लवी, ललिता, पारुल आदि सभ के ँ बेस भावनात्मकताक संग प्रस्तुत कएल गेल अछि। सम्पूर्ण उपन्यास बच्चा आ कोखिक प्रयोजन लेल घुमैत भेटैत अछि। उपन्यासक पुरुष पात्रा प्रतीक, आशुतोष, भौमिक, अनुराग आदि छथि। एहि उपन्यासक स्त्राीपात्रासँ बेसी बुझनुक पुरुषे पात्रा छथि। मुदा उपन्यासक स्त्राी सभ ‘डिसीजन मेकिंग पावर’क संग ठाढ़ भेटैत छथि। ई स्त्राीक सबलताक परिचय दैत अछि। उपन्यासकारक रूचि रंगमंचसँ रहल छनि। से एहि उपन्यासकें पढ़लासँ सेहो स्पष्ट होइत अछि। बेर-बेर नाटकक महत्वक चर्चा उपन्यासमे भेटैत रहैत अछि। उपन्यासकार श्री प्रदीप बिहारी एहि उपन्यासक केंद्रमे कोखिक अनिवार्यता रखने छथि। कएकटा कारणसँ अथवा परिस्थितिवश एकैसम शताब्दीमे कोखि दूषित भऽ गेल छैक। बाजारवादक प्रभावसँ कोखिक व्यापार खूब भऽ रहल अछि। एक तरहें निःसन्तानक लेल ई सुखदायी होइत अछि। मुदा ‘कोखि’क लेखक एकरा अपन पात्राक माध्यमे असहमतिक संग प्रस्तुत कएने छथि। उपन्यासकार सेरोगेसीक पक्षधर नहि रहितहुँ एकर एक-एकटा भ्रांतिकें तोड़ि पाठकक समक्ष रखने छथि। तें उपन्यासकारक जे जिम्मेदारी होइत छैक तकरा खूब नीकसँ निर्वाह कएने छथि। सेरोगेसीक संग-संग उपन्यासकार लिव-इन-रिलेशनोकें नीक नहि मानैत छथि। किछु गप जे एहि उपन्यासक खूब नीक लागल से अछि मित्राता। कहल जाइत अछि जे मित्रा सदैव उचित निर्णय दैत अछि जे अहाँ लेल सर्वथा उचित होयत। दू मित्रा शुभा आ रितिकाक बीच लिव-इन-रिलेशनपर जखन गप होइत अछि तखन रितिका, शुभाकें चेतबैत कहैत छथिµ ”कखनो तोड़ल जा सकैत छैक। प्रायः कोनो समय तोड़ि देबाक लेल ई सम्बन्ध बनल छैक। मुदा ठीके कहलें तों, जे अनुबंध नहि होइत छैक।“ एहिना सेरोगेसीक भ्रांति दूर करैत उपन्यासकारक पात्रा ललिता आ श्वेताक माए कहैत छथि जेµ ”ई काज सभ तँ डाक्टर करतैक। वैह बाबूक शुक्राणु बहार करतैक आ तोरा गर्भमे धऽ देतैक। तोरा दुनूकें तँ कहियो भेंटो ने होयतौक।“ एहि उपन्यासमे हमरा जनैत सबसँ बेसी विरोध उपन्यासकार भ्रूणहत्याक कएलनि। उपन्यासक प्रमुख पात्रा प्रतीक आ भौमिकक माध्यमे पाठककें देखौलनि। भ्रूणहत्याकें रोकब अनिवार्य अछि। देश मे बहुत कानून बनाओल गेल अछि। भ्रूणहत्या कम सेहो भेल अछि मुदा बन्द नहि भेल अछि। एहिसँ विचलित भऽ आ रोकबाक लेल भौमिक एकटा अनाथालय खोलैत अछि। भ्रूणहत्याक परिणामक चर्च करैत भौमिक कहैत छथिµ ”एकदिन दू-तीनटा कुकुरकें बीच धारमे पानिसँ कने पहिने बालू कोड़ैत देखलियैक।…लग गेने देखैत छी जे एकटा अपरिपक्व नेनाक लहासकें कुकुर नोचि रहल छैक।“ एहि उपन्यास मे जे दाम्पत्य जीवनक सहजता देखाओल गेल अछि से भरोस दैत अछि। किएक तँ एखन एकटा कुरीति खूब प्रचलित भऽ गेल अछि ओ अछि दाम्पत्य जीवनक कोनो कारणसँ टूटब। मुदा एहि उपन्यासक जोड़ी सभ बहुत ‘अंडरस्टैंडिंग’ छथि। जेना श्वेता-अनुपम, प्रतीक-पल्लवी, शुभा-आशुतोष आदि। श्वेता आ अनुपम जे एक-दोसराकें बुझबाक स्तर छैक तकर आवश्यकता एखनो समाजमे छैक। उपन्यासकार अपन एहि पात्राक माध्यमे समाजकें कहए चाहैत छथि जे एहि सामंजस्यक आवश्यकता दाम्पत्य जीवनमे सभकें रहबाक चाही। रोमांचसँ भरल अछि ई उपन्यास जिज्ञासासँ सेहो भरल अछि। ई उपन्यास निराश होइत जीवनमे आस जगेबाक एकटा विराट कथा अछि। एहि उपन्यासक चारू विषय, जाहिपर चर्चा कएल गेल अछि, तकर केंद्रमे कोखि आ बच्चा रहल अछि। स्त्राीक सीमा आ परिधि कतबो व्यापक किएक ने भऽ गेल हो मुदा स्त्राी होयबामे जे मूल तत्व अछि ओ थिक ओकर ‘कोखि’ जाहि लेल ओ समाजमे सदैव पूजनीया रहतीह। उपन्यासक माध्यमे उपन्यासकार एहि यथार्थकें प्रस्तुत कएने छथि। लेखकक स्थापना दैत उपन्यासकारक पात्रा भौमिक कहैत छथिµ ”भने तों पोथी लिखैत छें, लिख। सबकिछु समाप्त भऽ जयतैक, तखनो आखर बचले रहतैक।“ उपन्यासकारक रूपमे श्री प्रदीप बिहारी हमरा बहुत समय-सापेक्ष लगैत छथि। व्यक्तिक रूपमे कही तँ ई हमरा कहियो अहंसँ भरल नहि लगलाह। अपन रचने जकाँ ई बहुत सरल आ सहज व्यक्ति लागथि। जतेक बेर भेंट भेलाह से कोनो ने कोनो साहित्यिक आयोजने सभमे, से बहुत आत्मीयता भरल अग्रज-अभिभावकक रूपमे। एक-दूटा आयोजन तँ हमरा लेल अविस्मरणीय छल। भागलपुर मे जखन पढ़ैत रही तखन ओहिठाम प्रत्येक साल एकटा सेमिनारक आयोजन कएल करी। एकटा मुख्य अतिथिकें बजाओल जाए। 2015 मे हिनका बजाओल जएबाक योजना बनल। ओहि सेमिनारक आयोजन मात्रा चंदे सँ होइत छलैक। तें अर्थाभाव होएब कोनो अचरज नहि। श्री प्रदीप बिहारीकें अयबाक आमंत्राण आ स्वीकृतिक लेल फोन कएल। फोनपर अयबाक आग्रह संग-संग परिषदक अर्थक अभावक जनतब हिनका देल। आश्चर्य ई भेल जे ई अपन स्वीकृति तुरत देलनि आ कहलनिµ ”हम जरूर आएब। हमरा निमित्त कोनो लाम-काप$ आकि लाग-लपेटक आवश्यता नहि।“ ओ आयोजन खूब सफल भेल छल आ हिनक अएबाक निःस्वार्थ स्वीकृति बहुत दिन धरि घुरियबैत रहल आ मनमे हिनका प्रति आदरभावकें उपजबैत रहल। तकर कारण प्रायः ई छल जे एहि अर्थयुगमे ई निःस्वार्थ रूपें एहि आयोजनक महत्व देलनि। एहि क्रममे हम अपन एकटा व्यक्तिगत अनुभव सेहो कहब। खुटौनामे श्री महेंद्र नारायण राम ‘कथा-विदेहक’ आयोजन कएलनि। सबगोटे जनिते होएब जे कथा-गोष्ठी भरि रातिक होइत छैक। हमहूँ बहुत उ$हापोहक संग गोष्ठीमे पहुँचलहुँ। बहुत साहित्यकार सब आयल छलाह। कथा-गोष्ठी खूब नीक भेल। से आयोजनक स्तरसँ सेहो आ वस्तु-गाम्भीर्यक स्तरपर सेहो। जखन 12 बजे रातिमे कथा-गोष्ठी समाप्त भेल तँ हमर दिमाग एहि ओरिआओनमे लागि गेल जे हम कोना जायब। बहुत गोटे अपन गंतव्य दिस अपन-अपन सवारीसँ विदा सेहो भऽ गेलाह। कएक गोटे पूछताछ सेहो कएलनि जे हम कोना जाएब। हमरो होइत छल जे आबि तँ गेलहुँ मुदा आब एती रातिकऽ कोना जायब! आदि-आदि। ई सब दिमाग मे चलैत रहय आ गोष्ठी-स्थलकें पतराइत देखि मन सेहो विचलित जकाँ होइत रहए। लेकिन साहित्यिक संबंधक कारणें भरोस छल जे कोनो जोगाड़ लगबे करतैक। तखनहि श्री प्रदीप बिहारी आ मेनका मल्लिकजी लग आबि पुछलनिµ ”कोना जायब निक्की?“ हम अपन यथार्थ स्थिति हुनका कहि देलियनि। आश्यर्च भेल जे हुनका दुनू गोटेकें रूपम झा आ मनोज कुमार झा संगे अपन गाड़ीसँ बेगूसराय जएबाक योजना बनल छलनि। मुदा श्री प्रदीप बिहारी मेनका मैडमकें एतेक सहजताक संग कहलनि जे किएक नहि सबगोटे एहि हाॅलमे बैसि गपशप करब आ भोरमे विदा होयब। महेंद्र नारायण राम सेहो अपन सहमति देलनि। हमरा चलते हुनकर योजनामे परिवर्तन करब हमरा अचंभित कएलक। मानवताक साक्षात प्रतिमूर्ति सन लगलाह हमरा ओ दुनू प्राणी। ई साहित्यिक संबंधक गरिमा छलैक। ओहि समयक ओ हमर अनुभव हमरा सदैव अविस्मरणीय रहत आ साहित्यकारक संगहि व्यक्तिक रूपमे, से सरल आ सहज व्यक्तिक रूपमे श्री प्रदीप बिहारी सदैव आदरणीय रहताह। Ú कुमार गगननीक लागल ‘कोखि’
समसामयिक टाॅपिक पर एतेक नीक उपन्यास लिखैक हेतु प्रदीप बिहारी भाइजी कें बधाइ। पूरा उपन्यास पढ़लहुँ। हम तँ पहिनहुँ सँ हिनक व्यक्तित्व ओ लेखनीक प्रशंसक रहल छी। हिनक टटका उपन्यास ‘कोखि’ केर कथामे रंगकर्म ओ साहित्य कला सँ जुड़ल तीन जोड़ीक तीन अलग कथा मुदा एहि तीनूक बीच अद्भुत आत्मीय सम्बन्ध अछि। एकटा त्रिकोण बनल आपस मे जुड़ल अछि ई संबंध। रक्त संबंध सँ बेसी आत्मीय संबंधक रोचक कथ्य शिल्प उपन्यासक रोचकता कें बढ़बैत अछि, संगहि आधुनिक सेहो बनबैछ। प्रतीक आ पल्लवी दू प्रेमी रंगकर्मी जखन पारिवारिक बंधन सँ जुड़ि जाइछ तँ पल्लवी पारिवारिक दायित्वक निर्वहन हेतु अपन रंगकर्म कें छोड़ि दैछ मुदा अपन प्रेमी प्रतीक जे आब रंग समीक्षक ओ प्रसिद्व लेखक बनि गेल अछि, केर सदैव सहयोगीक भूमिका मे रहैछ। दोसर जोड़ी अछि श्वेता आ अनुपम केर। अनुपम अपन पत्नीक कैरियरक प्रगति लेल मनोयोग सँ लागल अछि। श्वेता जे ईश्वरीय अभिशाप कही वा आंतरिक शारीरिक अक्षमताक कारणें अपन कोखि सँ स्वस्थ बच्चा कें जन्म नहि दऽ पबैछ तें पारिवारिक ओ सामाजिक उलहनक कारणें एक आंतरिक दबाब सँ गुजरि रहल अछि, मुदा ओकर एहि संकट मे सहयोग ओ संबल दैछ ओकर प्रेमी पति अनुपम। तेसर जोड़ी अछि पारुल आ भौमिक के। दुनू रंजगतक प्रसिद्ध नाम। पारुल महत्वाकांक्षी अछि, तें ओ अपन कोखि मे पलि रहल अपन प्रेमक बीया कें अवरोधक मानैत अछि आ ओकरा नष्ट करैछ। कला जगतक बड़का सेलिब्रिटी बनि चुकल अछि। ओतहि ओकर प्रेमी रंगकर्मी भौमिक मानवीय संवेदना, करुणा सँ भरल बहुत अत्यंत भावुक व्यक्ति अछि। जे आम धारणा सँ अलग लेखक नव कथ्य उपस्थित करैत छथि। भौमिक एक महान मानवीय कार्य हेतु अपन प्रिय विधा रंगकर्म सँ विरक्त भए अपनहि शहर मे गुमनाम अछि। एहि तीनू जोड़ीक कथा सूत्रा कें लेखक बहुत कुशलता सँ एक सूत्रा मे बान्हि एकटा नव कथ्य शिल्प सँ उपन्यासक कथा कें पाठकक लेल उत्सुकता ओ रोचकता बनौने रहैत छथि। चूंकि उपन्यासक कथ्य आधुनिक तथा भाषा सरल ओ बोधगम्य अछि तें पाठकक संख्या मे विस्तार होयबाक नीक संभावना अछि। मिथिला आब गामे धरि नहि रहि गेल अछि, बल्कि पटना, कोलकाता, दिल्ली, मुम्बई, हैदराबाद, बेंगलुरु, पुणे आदि अनेको शहर मे कतेको मिथिला बनि चुकल अछि, ओहि ठामक रहनिहार शिक्षित आधुनिक मैथिल लोकक दैनिक जीवन ओ जीवनदर्शन बहुत बदलि चुकल अछि। वर्तमान वैश्विक सामाजिक समस्या सँ ई समाज सेहो प्रभावित भऽ रहल अछि। आजुक समस्या लिव इन रिलेशन, सेरोगेसी, भ्रूण हत्या, चाइल्ड अडाॅप्शन आदि सँ आधुनिक शिक्षित लोकक परिवार मे ई घटना सभ होमय लागल अछि। 202 पेजक एहि उपन्यासक अंतिम ओ वाक्य, ‘कोखि सम्माननीय शब्द होइत छैक, मैडम।’ एहि लेल प्रदीप बिहारी भाइक लेखनी कें प्रणाम। हम तँ बहुत साधारण पाठक छी। रंगकर्म सँ जुड़ल रहबाक कारणें ई उपन्यास आर नीक लागल । ú ज्ञानवर्द्धन कंठरंगकर्म आ रचनाकर्मक स्रष्टा आ द्रष्टा
हमर दृष्टिमे प्रदीप बिहारी एकटा प्रदीप्त द्रष्टा आ स्रष्टा छथि। एहि प्रदीप्तिक धाह हुनक रंगकर्मसँ लऽ कऽ रचनाकर्म धरि अनुभूत होइछ। हिनक पारिवारिक पृष्ठभूमिमे सांगीतिक आ साहित्यिक चास लहलहाइत रहलनि अछि, तकर सुवास हिनक व्यक्तित्वकें गमकौने छनि। हिनक लेखनकें चमकौने छनि। झमकौने छनि। स्पष्टवादिता आ प्रखरताक संग हिनकामे औखन गुरु जीवकान्त जीबि रहल छथिन। ई समर्थ गुरुक समर्पित शिष्य छथि। ‘जेना कोनो गाम होइत अछि’ शीर्षक सँ जीवकान्तक पाँचो उपन्यासक संकलन हिनक अप्रतिम गुरुभक्ति आ मैथिली भाषा-साहित्यक धरोहरिकें जोगा कऽ राखबक दृढ़ संकल्पक द्योतक अछि। हिनक लेखनमे संवादक स्वाभाविकता आ सजीवता रंगकर्मक प्रत्यक्ष अनुभवसँ आयल छनि। तें ई कथानक बुनैमे सिद्धहस्त छथि तऽ दृश्य छानैमे प्रशस्त। हिनक उपन्यास ‘मृत्युलीला’ पढ़ैत काल कोरोनाकालक विभीषिकाक विभ्ज्ञिन्न प्रसंग अन्तर्मोनकें दोमि कऽ राखि दैत छैक। कंठ अवरुद्ध भऽ जाइत छैक। देह भुलकि जाइत छैक। रोइयाँ ठाढ़ भऽ जाइत छैक। हिनक शैली आ प्रवाहक गबाह के नहि अछि? ‘खण्ड-खण्ड जिनगी’ आ ‘हे रौ’ शीर्षक लघुकथाक पोथीमे कम्मे मे बेसी कहि देबाक हिनक कला चमत्कृत कऽ दैत छैक। ई खाँँटी मैथिली लिखबामे जतबे प्रवीण छथि ततबे आँचलिक बोलीक संवाद सधबामे। कथा-उपन्यास दुहूमे एकर प्रमाण भेटत। ‘दक्षिण मिथिला’ पत्राक संपादकक रूपें ई मैथिलीक वितानकें तनने रहलाह अछि। नेपालसँ हिनक सायुज्य एहि वितानकें आओर विस्तृति प्रदान करैछ। हिनकर व्यक्तित्वकें अंतरराष्ट्रीय छवि प्रदान करैछ। मिथिलाक दुनू भागक ई सेतु छथि। ई नेपाली पोथीक कुशल अनुवादक छथि। ‘अंतरंग’ अनुवाद पत्रिकाक संपादकक रूपमे हिनकर बहुभाषी रंग आ तरंग उद्भाषित भऽ रहल अछि। भारतीय भाषा-मंचकें सजेबामे हिनक स्नेह-श्रम-समर्पण अनुकरणीय छनि। विभिन्न साहित्यिक आयोजनमे हिनक स्वाभाविक सक्रियता बनल रहैत छनि। हिनक मैथिली कथा-लघुकथाक अनुवाद हिन्दी, नेपाली, ओड़िया, असमिया, मलयालम, डोगरी, तेलुग, पंजाबी, उर्दू, अंग्रेजी आदि भाषामे भेल छनि आ भइये रहल छनि। एहि प्रकारें मैथिलीकें अखिल भारतीय भाषा मंचपर प्रतिष्ठापित रखबामे हिनक प्रमुख भूमिका छनि। ई टेलीफिल्मक स्क्रिप्टक लेखक आ अभिनेता सेहो रहल छथि। एकटा व्यक्ति एक्कहि संगे अभिनेता, नाटककार, लघुकथाकार, कथाकार, उपन्यासकार, पत्राकार, संपादक, अनुवादक, इत्यादि कोना भऽ सकैए, से देखबाक-बुझबाक-गुनबाक लेल प्रदीप बिहारीकें निहारी। साहित्य अकादेमी सहित नाना पुरस्कारके सम्मानित करैबला ई हमरा लोकनिक गौरव-पुरुष छथि। षष्ठिपूर्तिक अवसरपर अकास भरि शुभकामना आ बधाइ संप्रेषित करैत एतबी कहबनि जे प्रदीप बिहारीक प्रदीप्तिसँ साहित्य-समाज जगमग बनल रहय, रचना-भंडार भरैत रहय आ हिनक भावी जीवन सुन्दर, स्वस्थ, सुखपूर्ण आ सृर्जनशील आयामसँ परिपूर्ण बनल रहनि। Ú कल्पना झाप्राकृतिक नहि राजनीतिक छल मृत्युलीला
प्रदीप बिहारीक टटका उपन्यास ‘मृत्युलीला’ मे कोरोनाकालक भयावहता, लाॅकडाउन सँ उत्पन्न भयंकर आर्थिक समस्याक संग लोक जे शारीरिक, मानसिक कष्ट झेलबालेल बाध्य भेल, तकर तेहेन जीवन्त चित्राण कएल गेल अछि, जे पढ़ैत काल कतहु-कतहु विचलित सन भऽ जाएत भावुक लोक। हृदयविदारक घटना सभ एना चित्रित करब सहज नहि छल हेतनि लेखक लेल। अपनहुँ करेज पाथर कऽ लिखए पड़ल हेतनि लेखक कें। जाहि त्रासदीक कुप्रभाव देखब-सुनब एतेक कष्टकर छलए तकरा शब्दमे उतारि पोथीक रूप देब, बड़ सहासक काज रहल होयत। कतेको एहेन दृश्यक चित्राण अछि, जे भावविह्वल कऽ देत पाठक कें। बेटाक अस्पताल मे भर्ती होएबाक जनतब रहितहुँ बेटा-पुतहु सँ दूर रहबाक भवेश आ हुनक पत्नीक विवशता आ हुनकर सभक प्राण सदिखन बेटा पर टाँगल रहब। एक टा नवविवाहित जोड़ा आरती आ सुरेसबाक बिछुड़ब सेहो हृदयविदारक। बैंककर्मी अविनाशक अस्पताल मे भर्ती होएबाक दृश्य सँ सुरुह भेल उपन्यासक कथानक मूलरूप सँ हुनकर कार्यस्थल पर संक्रमित होएबाक संभावना सँ प्रारम्भ होइत अछि। जखन कोरोना टेस्टक उपरान्त आशंकाक पुष्टि भऽ जाइत छनि, तदुपरान्त अस्पताल मे एक टा सीटक व्यवस्था लेल फिरिसान हुनकर परिजन पुरजन। आवश्यक सावधानी राखैत, सकारात्मकता ओ धैर्यक संग कोना बेमारी कें हरओलनि उपन्यासक नायक अविनाश, तकर चित्राण करैत पाठक कें सेहो संदेश देल गेल अछि जे सकारात्मकता ओ धैर्यक बलें लोक जीवनक कठिन सँ कठिन परिस्थिति सँ उबरि सकैत अछि। कोरोना सँ लड़बामे इएह सकारात्मकता, धैर्य आ अविनाशक जिजीविषा अस्पतालक अन्य रोगीक लेल सेहो सहायक सिद्ध भेलनि। जहिना एक टा डरपोक लोक सभ कें डेरा दैत छै, तहिना एक टा अविनाश सन लोकक उपस्थिति अस्पतालक ओहि पूरा हाॅलक लोकक भीतर एक टा विश्वास भरि देलकैक जे ओ सभ निश्चित ठीक भऽ कऽ घर घुरताह/घुरतीह। विशेष रूप सँ प्रिया नामक अविनाशक समवयस्क महिला रोगी तँ अत्यधिक प्रभावित छलीह अविनाशक बात व्यवहार सँ। अविनाशक आइसोलेट रहबाक क्रममे सामाजिक संकट सँ कोना त्रास्त रहलाह नायक ओ हुनकर परिवार, से सभटा बिन्दु कें फड़िछा कऽ सोझाँ राखैत कोरोना त्रासदीक चित्राण तेना कएल अछि जे, आबए बला पीढ़ीक लोक जँ पढ़त तँ एहि मृत्युलीलाक तांडव कें अपना सोझाँ होइत देखि रहल छी, तेहेन सन लगतैक। अगिला पीढ़ी लेल ई उपन्यास मैथिली साहित्यक एक टा बहुमूल्य धरोहर अछि। कोरोनाकालक एक टा इतिहासक रूप मे देखल जाएत एहि पोथी कें। अगिला पीढ़ी सेहो निश्चित रूप सँ एहि पोथी कें पढ़ब पसिन करत, जेना विश्व युद्धक समयक खिस्सा किंवा स्वतंत्राता संग्रामक खिस्सा हमसभ एखन पढ़ैत छी। कोरोनाक प्रभाव सँ लोकक जीवन कोना बदलि गेलैक तकर विस्तृत विवरण दैत अछि ई उपन्यास। जे शब्द सभ कहियो सुनल नहि छलैक से कोरोनाकाल मे बोलचाल मे नित्य प्रयोग होमए लागल, जेना – कोरेन्टाइन, वर्क फ्राॅम होम, ओइसोलेट होएब, सेनेटाइज करब, इत्यादि। जे कहियो वर्क फ्राॅम होम नहि केने छलथि सेहो सभ एहि कोरोनाकाल मे सिखलनि। एहि तरहक छोट-छोट बिन्दु पर प्रकाश दैत कथा आगाँ बढ़ैत अछि जे उपन्यास कें वास्तविकता सँ जोड़ैत अछि। पाठक रिलेट कऽ पाबैत छथि, घटनाक्रम सँ। सभ टा परिस्थिति सभक देखल-सुनल आ भोगल सन बुझना जाइत छै। लोकक सामाजिक जीवन समाप्तप्राय भऽ गेलैक, आगंतुक केर स्वागत लोक सेनेटाइजर सँ करए लागल। लिफ्ट केर बटन दबाबए लेल सलाइक काठी लऽ कऽ घर सँ बहराए लागल, एहि तरहक छोट-छोट बातक उल्लेख अछि उपन्यास मे, जाहि सँ कोरोना वायरसक कारणें लोक कोन तरहें भयाक्रांत छल से बुझबा मे भाङठ नहि रहतनि पाठक कें। कोरोना सँ संबंधित कोनहुँ समस्या एहेन नहि जे लेखक केर नजरि सँ वा कही जे लेखकक कलम सँ छूटल होनि, सामाजिक समस्या हुअए वा आर्थिक, राजनैतिक। एहि कोरोना त्रासदी मे लोक जे कष्ट भोगलक, सभक चर्चा अछि चाहे ओ शारीरिक कष्ट हुअए वा मानसिक। लाॅकडाउनक विकट समयक चर्चा करैत मजदूर वर्गक व्यथाक चित्राण एना केलनि अछि जेना अपन भोगल होइन। बहुत मार्मिक चित्राण। एक टा प्रसंग मोन पड़ैत अछि। बड्ड मार्मिक प्रसंग अछि, जखन सगुन अपन मौसी सँ फोन पर गप्प करैत कहैत अछि- ‘‘राति दू साँझ होइ गेल रहै। दिल्ली आबए घड़ी छोटका नुनू बोलल रहै जे अबियहो तऽ बहुते चाकलेट आ चनाचूर लेने अबियहो। मौसी! एखनी तक तऽ ओकरा लेल संग मे रखने छिकियै, एत्ती ने भूख लागल छै जे ऊ चाकलेट आ चनाचूर हमर परीच्छा लए रहल हन।’’ तखन मौसी कहैत छथिन ‘‘संगमे छिकऽ तऽ उहे खा लैह नुनू। परान बचा लैह नुनू। परान बचतऽ तऽ सब कथु होइ जेतऽ।’’ समाजक सभ वर्ग, सभ बएसक लोक कोरोना सँ कोना आ कतेक प्रभावित भेल तकर सजीव चित्राण करबा मे लेखक पूर्णरूपेण सफल भेलाह अछि। परिवारक एक टा सदस्य कें संक्रमित होएब पूरा परिवार कें कोन तरहें अस्त-व्यस्त कऽ दैत छै, से ओएह बुझि सकैत अछि, जकर घरक सदस्य पॅजिटिव भेल छलाह आ अस्पतालक फेरा मे पड़ल छलाह। लक्ष्मी, गृहपति आ हुनकर सभक बूढ़ माए सेहो उपन्यासक मुख्य पात्रा मे सँ छथि। दुनू बेटाक बीच संपत्ति केर बँटवारा करैत काल बूढ़ीक व्यथा एना बहरएलनि, ‘‘एहि सँ दुखद की भऽ सकैछ जे पतिक अरजल धन पत्नी कें खण्ड खण्ड करऽ पड़ैक।’’ उपन्यासक कथानक कें दू भाग मे विभक्त करैत लिखल गेल अछि। प्रथम भाग मे कोरोनाक पहिल लहरि केर समस्या सभक चित्राण कएल गेल अछि। द्वंद ओ भ्रम कें स्थिति जे छलए तकर सूक्ष्म विश्लेषण देखबा लेल भेटत। उपन्यासक दोसर भाग मे दोसर लहरि केर भयावहता, ‘मौत का नंगा नाच’ बला भयंकर स्थिति जे छलैक तकरा हू-ब-हू कागत पर उतारि देल गेल अछि। आॅक्सीजन सिलिण्डरक कालाबाजारी, दवाइ लेल अफरा-तफरीक वातावरण, नेता सभक आरोप-प्रत्यारोप, डाॅक्टर सभक बनियागिरी सँ लऽ कऽ वैक्सीन पर राजनीति, सभ बातक चर्चा कएल गेल अछि उपन्यासक दोसर भाग मे। कोरोनाकाल मे विभिन्न सामाजिक संगठन सभ कोना आगाँ बढ़ि मानवताक रक्षार्थ, संगठित भय काज केलनि तकर चित्राण सेहो कएल गेल अछि। कहबाक माने जे समाज मे सभ तरहक लोक अछि, किछु पतित लोक एहि त्रासदीक लाभ उठएबाक कोनहुँ अवसर नहि छोड़लाह तऽ किछु मानवताक रक्षा करैत निःस्वार्थ भावें अपन सहयोग देलनि, तकरा अनदेखी नहि केलनि अछि लेखक। ई तऽ भेल कथानक केर गप्प। उपन्यासक शिल्प कें गप्प करी तऽ उपन्यासक भाषा अत्यन्त सरल, बोधगम्य अछि। विलुप्त शब्दक प्रयोगक एक टा नब तरीका अपनाओल गेल अछि लेखक द्वारा। जेना दू टा शब्दक हम उदाहरण देमए चाहब। पहिल ‘कोलिया कोठरी’ आ दोसर ‘पीनी’। एहि शब्द सभक प्रयोग कऽ पुनः ओकर विवरण एक पूरा पाराग्राफ मे कएल गेल अछि जाहि सँ हमरा सन लोक जे एहि तरहक शब्द सँ पूर्णतः अनभिज्ञ होएत सेहो नीक जकाँ बुझि जाएत आ ततेक नीक जकाँ बुझि जाएत जे आजीवन स्मरण रहतैक। शिल्प सँ संबंधित एक टा त्राुटि हमरा देखबा मे आएल जे उपन्यासक पूर्वार्द्ध मे अविनाशक पिताक उपस्थिति ‘पिता’ शब्द सँ छनि, ‘पिता सोचलनि, पिता बजलाह’ आ उत्तर्रार्द्ध मे ‘भवेश’ नाम देल गेल छनि। अविनाशक माए लेल आद्योपान्त ‘माए’ सम्बोधनक प्रयोग अछि जे पढ़ैत काल कंफर्टेबल लागल हमरा। मुदा ‘पिता’ सँ ‘भवेश’ कऽ देब एकरत्ती उटपटाङ सन लागल हमरा। आब गप्प कथोपकथन केर। कथोपकथन एहि उपन्यासक मजगूत पक्ष अछि। भिन्न-भिन्न पात्राक बोली निश्चित रूप सँ भिन्न हेतैक। दिल्ली मे रहनिहार द्वारा हिन्दीक दिल्ली बला अपभ्रंश भाषाक प्रयोग हुअए वा बेगूसराय कें निवासी मजदूर वर्गक बेगूसराय बला भाषा हुअए, लेखक जेना पात्राक भीतर प्रवेश कऽ पात्राक बोली लिखलनि अछि, जे प्रशंसनीय। कोरोना त्रासदी पर आधारित एहि उपन्यास कें कथानक, भाषा आ संवाद, शिल्प आ स्पष्ट उद्देश्य, सभ दृष्टिकोण सँ उत्कृष्ट कहल जा सकैछ। आदरणीय प्रदीप बिहारी यथार्थ कें चित्राण करैत एहेन सशक्त ओ रोचक उपन्यासक सृजन केलनि ताहि लेल हुनका साधुवाद! Ú रूपम झाप्रदीप बिहारीक रचनाक भौगोलिक विस्तार
प्रदीप बिहारी मैथिलीक लोकप्रिय साहित्यकार छथि। करीब चालीस बर्खक हिनक साहित्य सृजनमे एखनि धरि चैबीस टा पोथीक सृजन-प्रकाशन भऽ चुकल छनि आ एखनो सक्रिय रूपें सृजनशील छथि। हिनक एखनि धरिक सृजनमे कथा, लघुकथा, उपन्यास, अनुवाद, नाटक, संपादन आदि उल्लेखनीय अछि। ई मूलतः कथाकार आ उपन्यासकार छथि। मुदा, हिनक अनुवाद, नाटक, लेख आदि देखला पर ई कहल जा सकैछ जे ई मैथिलीक प्रमुख गद्यकार छथि। कथा संग्रह ‘सरोकार’ लेल प्रतिष्ठित साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त लेखक प्रदीप बिहारी मैथिलीक ओहन लेखक छथि, जिनका ई पुरस्कार मात्रा चैवालिस बरखक बयसमे भेटलनि। हिनकासँ कम बयसमे एहि पुरस्कारकें प्राप्त कयनिहार मार्कण्डेय प्रवासी छथि, जिनक महाकाव्य ‘अगस्त्यायनी’ हेतु ई पुरस्कार प्राप्त भेल छलनि। बीस बरखक बयसमे हिनक कतोक प्रामाणिक कथा आ पहिल उपन्यास ‘गुमकी आ बिहाड़ि’ (वर्ष 1983 ई.) मे मिथिला मिहिरमे धारावाहिक रूपें प्रकाशित भेलनि आ चर्चित भेलनि। ताहि समय मिथिला मिहिरमे रचना छपिए जायब लेखकक प्रमाणिकता आ स्थापनाक बात होइत छल। से, हिनका अपन प्रतिभा आ साधनाक कारण भेटलनि। प्रदीप बिहारीक साहित्य (कथा, उपन्यास, नाटक आदि) मिथिलाक माटिपानिकें धयने देश-विदेशक कथा-व्यथा कहैत अछि। हिनक रचनाक विस्तार चतुर्दिक पसरल अछि। देशक ज्वलंत सामाजिक, सांस्कृतिक आ राजनीतिक समस्याकें ई अपन रचनाक विषय बनौलनि अछि, जे हिनक समकालीन रचनाकार सभमे कम पाओल जाइत अछि। मैथिलीक कालजयी रचनाकार जीवकान्त हिनका मादे कहैत छथि- ‘प्रदीप बिहारी मैथिलीक एक महत्वपूर्ण कथाकार छथि। कथा कहबाक जे ढंग छैक, तकरा ओ प्रभावशाली बनौलनि अछि। कथाकारक सही परीक्षा थिकैक ओ कथामे कतबा विश्वसनीय लगैत अछि। एहि परीक्षामे ओ सफल भेल छथि। बेसीकाल हुनक कथामे उत्सुकता जगयबाक आ ओकरा कथाक आगाँ धरि जगा कऽ राखबाक गुण भेटैत अछि। कथाकार एहि गुणक कारणें कथा-गोष्ठीमे आदरपूर्वक सुनल गेलाह अछि। प्रदीप बिहारी जखन नारी विषयक कथा उठबैत छथि, तँ हिनक साहसकें रेखांकित करबाक स्थिति बनैत अछि। नारीकें मनुक्ख बुझबाक, ओकरा पुरुषक समकक्षी बुझबाक साहस प्रदीप बिहारीक कथा सभमे अछि। तें, ई लेखक महत्वपूर्ण छथि। ई भविष्य लेल आशा जगबैत अछि। प्रदीप बिहारी बहुत संघर्षपूर्ण जीवन जीलाह अछि। भारत आ नेपालक दुनू कातक मैथिली भाषी समुदायक जीवनकें ओ देखलनि अछि। पायाक ओहि पारक मिथिलाक जखन ओ बात करैत छथि, तँ आर मर्मस्पर्शी भए जाइत छथि। नाटक, फिल्म इत्यादिक सृजनात्मक अनुभव हिनक लेखकीय भाषाकें संयम प्रदान करैत अछि। ई अपन पीढ़ीक संग छथि आ ओहिसँ एक डेग आगाँ छथि।’ संदर्भ: कथा संग्रह ‘मकड़ी’ (प्रकाशन वर्ष 2000)क फ्लैप। जीवकान्त जतऽ भारत आ नेपालक मैथिली भाषी समुदायक गप करैत छथि, ओतऽ एकटा बात देखबा योग्य जे नेपालक मूल नेपाली समाजक कथा-व्यथा हिनक कथा-उपन्यास सभमे जतेक महत्वपूर्ण ढंगे आयल अछि, ततेक नेपालक मैथिली लेखकक रचनामे सेहो कम भेटैत अछि। ओहि पारक लेखकलोकनि मैथिल समाजक व्यथा, राग-अनुरागकें अपन रचनाक विषय बनौलनि अछि, गैर-मैथिलक विषय कें बहुते कम अपन रचनामे स्थान दऽ पौलनि अछि। हँ, बानगी स्वरूप डा. धीरेन्द्रक रचना ‘हिंचुकैत बहैत सेती’, डा. राजेन्द्र विमलक कथा ‘रामेछापक राम लक्ष्मण’ प्रभृति किछु रचनाकें रेखांकित कयल जा सकैत अछि। ओतहि प्रदीप बिहारीक कतेको कथा अछि, जाहिमे मूल नेपाली समाजक दुख-सुख, पीड़ा, लोकोपचार, जीवन-दर्शन, राग-विराग आदिकें देखल जा सकैछ। यथा- प्रेषित, चनकल सीसा, शरणागत, गमलामे धान आदि कतोक कथा। ई बात हुनक रचनाकें भौगोलिक विस्तार दैत अछि आ मैथिलीकें ओहि समाजमे प्रतिष्ठित बनबैत अछि। हिनक उपन्यास ‘विसूवियस’ सन् 1986ई. मे छपल छल आ खूबे चर्चित-प्रशंसित भेल छल। एकर दू टा कारण देखल गेल। पहिल ई जे ई पोथी श्रमिक समस्या पर प्रायः पहिल उपन्यास मैथिलीमे छल। नहि, एहिसँ पहिने ललितक ‘पृथ्वीपुत्रा’ अछि। मुदा ओकर श्रमिकक प्रकार फराक अछि। ओ खेत, बजार वा रिक्शा-तांगा आदिसँ सम्बद्ध मजूरक समस्या पर केन्द्रित अछि। मुदा, विसूवियसमे उद्योग माने चाउर-तेल मिलमे काज कयनिहार मजूरक समस्या आ समाधानकें प्रमुखतासँ राखल गेल अछि, से उद्योग आ औद्योगिक समस्या पर लिखल प्रायः पहिल पोथी अछि। एहिमे उद्योगसँ सम्बद्ध सभ प्रकारक मजूरक समस्याकें उठाओल गेल अछि। दोसर बात ई जे ‘विसूवियस’मे पहाड़ी आ मधेसीक बीचक कटुता आ असमानता, जे ताहि समयक नेपालक राजतंत्राीय व्यवस्थाक गंभीर राजनीतिक समस्याक रूपमे उभरल छल, केर सौहार्द्र बनयबाक बातकें कौशलपूर्वक उकेरल गेल अछि। एहि उपन्यासकें नेपालक मैथिल आ गैर-मैथिल दुनू समाजमे समादृत कयल गेल अछि। नेपालक भद्रपुरक आंचलिकता पर लिखल ई उपन्यास मैथिली साहित्यक वितानकें आर विस्तृत कयलक। हिनक ई उपन्यास अंचल विशेषक व्यथा-कथा कहितहुँ पूरा दुनियाक मजूर आ ओकर क्षेत्राक गाथा बनैत अछि। ओकर पीड़ा आ समस्याकें समाज धरि पहुँचबैत अछि। प्रदीप बिहारीक सरोकार कोनो एक इलाकाक नहि, वैश्विक अछि। ओहिना, जेना ई कहल जा सकैछ जे महाभारतक कथा एक परिवार आ बहुत पहिलेक अछि, मुदा ओ पूरे भारतक कथा बनैत अछि आ एखनो प्रासंगिक अछि। ‘विसूवियस’कें मैथिलीक पाठक खूबे पसिन कयलक। एहिसँ हिनक लेखनक प्रतिष्ठा बढ़ैत गेलनि। बहुत गोटें एहि उपन्यासक रचनाक बारेमे कहलनि जे प्रदीप बिहारी मैथिली कें पंचकोसी-दसकोसीक सीमासँ बाहर लऽ गेलाह अछि। हिनक अन्य उपन्यास यथा- शेष, जड़ि, कोखि आ मृत्युलीला सेहो चर्चित छनि। ‘शेष’मे जतऽ गाममे होइत सांस्कृतिक स्खलन आ नव धनाढ्यक लीलाक कथा कहैत छथि, ओतहि ‘जड़ि’ वैश्वीकरणक कारणें व्यस्त आ छोट होइत जीवनक कथा कहैत छथि। बाजारक दबावक कारणें चिर्रीचोंथ होइत जीवनक कथा कहैत छथि, जकर सरोकार मिथिलाक संग-संग पूरे देशसँ देखाइत अछि। ‘कोखि’ हिनक नव उपन्यास छनि, जकर विषय-वस्तु मैथिलीमे नवीनतम छैक। ई उपन्यास प्रवासी मैथिलक व्यथा, मनोभाव, जीवन दर्शन आदिकें उकेरैत अछि। एहि उपन्यासक कथा स्थल सिलीगुड़ी (बंगाल) अछि। एहिमे भ्रूण हत्या, दत्तक संतान ग्रहण, लिव-इन-रिलेशन आ सेरोगेसी सन विषयकें प्रमुखता आ गंभीरतापूर्वक उकेरल गेल अछि। एहि उपन्यासक भूगोल बंगालक अछि, मुदा अपन माटि-पानिसँ सेहो गसिया कऽ जुड़ल अछि। एहि उपन्यासमे वर्णित विषय सभ पर मैथिलीमे छिटफुट रूपें किछु कथा तँ आयल अछि, मुदा समग्रतामे एहि विषय पर लिखल पहिल उपन्यास अछि कोखि। ‘मृत्युलीला’ हिनक नवीनतम उपन्यास अछि, जे वैश्विक महामारी कोरोनाक त्रासदीक व्यथा-कथाक बात करैत अछि। कोरोना सन महामारी के उपन्यासक विषय बना कऽ एकटा सफल उपन्यासक रूप देब बड़ साहसक बात छैक। कोरोनासँ त्रास्त लोकक यथार्थ आ एहि महामारीकें अवसर बुझि अपन स्वार्थ सिद्ध करैत लोकक यथार्थक चित्राण जीवन्तताक संग एहि उपन्यासमे भेल अछि। प्रदीप बिहारी अपन रचना सभमे विषयक विविधताकें गंभीरतापूर्वक स्थापित करैत छथि। ओ विषयकें दोहरबैत-तेहरबैत नहि छथि, अपितु नव-नव विषयक संधान कऽ अपन रचनामे अनैत छथि, प्रायः तें अपन समकालीन आ परवर्ती रचनाकारसँ बेरायल छथि। कथा आ लघुकथा मिला कऽ प्रायऽ दू सयसँ बेसिए रचना कयलनि अछि। शेष विधाक रचना एकर अतिरिक्त। जेना कि ऊपर लिखलहुँ अछि जे ई अपन रचनामे विषयगत दोहराइत नहि छथि। कथा आ लघुकथामे सेहो एहि गपक निर्वाह कयलनि अछि आ एखनो कऽ रहल छथि। भूमंडलीकरण आ सूचना क्रान्तिक फलस्वरूप दुनिया आँगुर तर गेल अछि। छोट सन इलेक्ट्राॅनिक चिप्समे समटल दुनियामे भेल आ भऽ रहल परिवर्तनकें सूक्ष्मतापूर्वक अपन कथामे गाँथलनि अछि। ओकर लाभ-हानिकें बड़ कुशलतासँ अपन कथा सभमे सहेजलनि अछि। हिनक बहुत रास कथाक विषय मिथिला-लोकक होइतहुँ पूरा देशक बनि गेल अछि आ ताहि स्तर पर प्रशंसित आ लोकप्रिय भेल अछि। कथा- गमलामे धान, शरणागत, प्रेम न हाट बिकाय, लसेढ़ आदि बहुत रास कथा छनि, जे मिथिला आ मैथिलीकें राष्ट्रीय कैनवास पर प्रतिष्ठित करैत अछि। प्रत्येक कथा फराक-फराक विचार आ चिन्तनक मांग करैत अछि। मैथिलीसँ आन-आन भारतीय भाषामे बेसीसँ बेसी अनुदित होमऽ बला रचनाकारमे प्रदीप बिहारी सेहो महत्वपूर्ण छथि। अपन समकालीन रचनाकारमे तँ प्रायः सभसँ बेसी अनुदित भेनिहार लेखक छथि। साहित्य अकादेमीसँ पुरस्कृत हिनक कथा संग्रहक अनुवाद हिन्दी, नेपाली, मलयालम, राजस्थानी, डोगरी भाषामे भऽ चुकल छनि। एकर अतिरिक्त हिनक कतोक कथा-लघुकथा सभक अनुवाद हिन्दी, नेपाली, अंग्रेजी, मलयालम, राजस्थानी, डोगरी, गुजराती, ऊर्दू, ओड़िया, असमिया, तेलुगु आदि भाषामे भऽ चुकल छनि आ होइत रहैत छनि आ सम्बन्धित भाषाक स्तरीय पत्रिका सभमे प्रकाशित होइत रहैत छनि। प्रदीप बिहारी ‘अंतरंग’ नामक अनुवाद पत्रिका सेहो संपादित करैत छथि। ई भारतीय भाषाक हिन्दी पत्रिका थिक। एहिमे विभिन्न भाषा सभक रचना हिन्दीमे प्रकाशित होइत छैक, जाहिमे मैथिली रचना सभक बाहुल्य रहैत अछि। एहि पत्रिकाक संपादन-प्रकाशन मादे ओ कहैत छथि जे मैथिलीमे जे नीक साहित्य लिखल जा रहल अछि, तकर सूचना देशक आन-आन भाषा-भाषीकें होयब जरूरी छैक। अंतरंगक माध्यमे मैथिलीक रचना सभ दोसर भाषा क्षेत्रामे खूबे प्रशंसित भेल अछि। हिनक सम्पादकीय योगदान सेहो मैथिली भाषा-साहित्यक भौगोलिक विस्तारमे रेखांकित करबा योग्य छनि। हिनक रचना सभ मनुक्खकें सामाजिक आ समाजकें मानवीय बनयबाक संदेश दैत अछि। संगहि वैश्वीकरणक कारण ह्रास होइत मानवीय संवेदनाकें बचयबाक लेल हिनक रचना संघर्षशील अछि। देशमे भऽ रहल सामाजिक- सांस्कृतिक परिवर्तनक ध्वनि मिथिलाक गाममे सुनैत छथि आ ओकर प्रभावसँ गाममे होइत परिवर्तनकें अपन रचना सभमे उकेरैत छथि। देश, काल आ परिस्थितिक अनुसार लेखकक दायित्व सेहो बदलैत छैक। प्रदीप बिहारी जाहि समय लेखन शुरू कयलनि, ओ स्वतंत्राताक बाद लोकक मोनमे भेल मोहभंगक बहुत बादक समय छल। मुदा, सामाजिक असमानता, बेरोजगारी, मानवीयताक क्षरण सनक समस्या मुँह बौनहि ठाढ़ छल। ओ समय देशमे आर्थिक उदारीकरणसँ कनिये पहिलुक समय छल। आर्थिक उदारीकरण आ वैश्वीकरणक कारणें उपजल बाजारवाद आ आन-आन समस्या सभ हिनक रचनाकालक महत्वपूर्ण विषय आ चिन्ता रहल अछि। आ यैह चिन्ता आ चिन्तन, जेना कि हम ऊपर कहल अछि, हिनक रचनामे मनुक्खकें सामाजिक आ समाजकें मानवीय बनयबाक संदेश दैत अछि। Ú सोनी नीलू झा‘अपराजिता’ टीमक उमेद नहि तोड़लनि
मैथिली आ नेपाली समाजक एकटा स्थापित नाम छथि प्रदीप बिहारी। प्रदीप बिहारी जीक परिचय हमरा प्राप्त होइत अछि एकटा रंगमंच सँ। एतय हम हुनक कथा पढ़ि रहल छी, ‘पूर्णियावाली’ जकर मंचन होएबाक छलैक दिल्लीक नेशनल स्कूल आॅफ ड्रामाक सम्मुख सभागार मे। ओहि दिन ओहो ओतऽ पहुँचल रहथि। मैथिली नाटकक दर्शकसँ सभागार भरल छल, एहन मे हुनकासँ भेंट मोसकिले छल। ‘पूर्णियावाली’ कथा जखन हम पढ़ने रही तँ मोन मे प्रश्न उठल छल किछु से इच्छा भेल पुछिअनि, मुदा से मोने मे रहल तहिआ। किएक तँ भीड़ बड़ छल, हुनकासँ भेंट केनिहारक। ओहि भीड़मे एकटा हेरायल लोक हमहुँ रही, मोनमे एक-आधटा प्रश्न लेने ठाढ़। खैर! लगभग दू हजार अठारहक गप अछि। दिल्ली मे फेर एकटा साहित्यिक कार्यक्रममे ओ आएल छलाह। मुदा ओहु दिन ओ मुख्य अतिथि बनि आएल रहथि से हुनक चारूकात भीड़ ओहू दिन खूब छल। एक तँ ओ साहित्यकार छलथि आ दोसर रंगमंचक लोक। हुनक लोकप्रियता विशेष छनि आ से स्वाभाविके छैक। हुनक मिलनसार स्वभाव आ व्यवहार सहज छनि, से व्यक्तिकें आसपासक लोकक भाव भंगिमासँ बुझबामे आबि जाइत छैक। ऊपरसँ साहित्यक लोक। जहिया हम रंगमंचसँ जुड़ल रही तँ रंग-जगतमे बहुत रास नाम मे एकटा नाम प्रदीप बिहारी जीक सेहो ज्ञात भेल छल। हुनकासँ हमरा वर्ष 2022 ई. धरि व्यक्तिगत रुपें भेंट नहि छल। हम एकल नाटक लऽ कऽ पटना गेल रही तँ ओ नाटक देखय आएल रहथि विद्यापति भवनमे। ओहू दिन खूब भीड़ छल नाटकक दर्शक लोकनिक, ओहि भीड़मे हमरा हुनकासँ भेंट भेल। प्रणाम केलियनि, एकटा नीक लोकक जे काज छैक से ओ तहिना हमरा आशीर्वादक संग प्रोत्साहित कएलनि। हमरा एकटा आश्वासन भेटल जे हम एकल नाटक लऽ आगू बढ़ि सकैत छी। जाहि दिन हुनकासँ गप भेल तँ रंगमंच विषय पर बहुत रास गप भेल। जतय ओ अपन रंगमंचक यात्राक बात सभ कहलनि, ओ खिस्सा बुझब रंगमंचसँ जुड़ल नव पीढ़ीक लेल एकटा सार्थक होएत। जखन सुनलहुँ तँ हमरोमे ओज भरल, आ एतेक चुनौती भरल उतार चढ़ावसँ ओतप्रोत मैथिली रंगमंच टिकल रहबाक लेल प्रेरित करैत अछि। जखन ओ कहलनि जे नाटक करऽ लेल ओ सभ रिहर्सलक बाद दोकाने-दोकान जा कऽ चंदा ओसुलैत रहथि। आ तखन फेर नोकरी चाकरी कतेक संघर्ष तहियो छलैक। ई चुनौती एखनो बनले अछि रंगमंचमे आ बनले रहत, जाधरि लोकक नेत मे बेइमानी रहत। कखनो लाचारी, कखनो बेरोजगारी आ ककरो तँ मात्रा संग चाही सेहो हलाहलि भेटैछ कहाँ? हमरा मोन मे एकटा योजना चलैत छल कोरोना समयकाल सँ, जाहिमे हमरा एहन व्यक्तित्व सभक सहायता चाही छल। हम हुनका ओहने भीड़मे पुछलिअनि, ‘‘अहाँ दिल्ली कहिया आएब?’’ उत्तर भेटल, ‘‘एखन तँ नहि। हँ, जँ कोनो साहित्यिक काज भेलैक तँ निश्चिते आएब।’’ हम आश्वस्त भेलहुँ जे जँ हिनका बजाएल जाए तँ ई अवश्य अओताह। हमरा हुनकर फोन नम्बर प्राप्त भेल। हम दिल्ली अएलहुँ तँ जखन ‘रंगनायिका’ कार्यक्रम करबाक योजना बनल तँ बहुत गोटेकें आमंत्रित केलियनि- जाहिमे बहुत गोटे हँ, नहि, हँ नहि, दोमरजा मे रहथि। प्रदीप जीकें फोन करबाक लेल सोची, मुदा फेर राखि दी। दोसर काजमे लागि जाइ, किएक तँ समयक लोक व्यवहार देखि होइत छल जे इहो तँ नहिए एताह, तँ करियौन काॅल की नहि करियौन। मुदा मोन मे एकटा उमेद छल जे ओ पटनामे कहने रहथि जे कोनो साहित्यिक कार्यक्रम होइत अछि आ हमरा सूचना भेटैत अछि तँ हम अवश्य अबैत छी, जँ हमरा लग समय रहैत अछि। हम काॅल कएलियनि, कहलनि बाद मे कहब अपन आॅफिसक समय सैड्यूल देखि कऽ। हमरा बुझा गेल आब इहो नहिए अएताह। किएक तँ धियापुता पर भरोस करब, ओकरा सभकें प्रोत्साहित कयनिहारक अभाव छैक एहि समाज मे। एकदमे नहि छैक से नहि, मुदा तँ ई पतियाए पड़त जे बहुत कम्मे लोक छथि। ओहन मे एकटा प्रदीप बिहारी जी ‘अपराजिता’ टीमक उमेद नहि तोड़ि एकटा आर प्रतिमान गढ़लनि। आ एहिमे निधोख कहि सकैत छी हम जे हमरा मदति कएलन्हि ऋषि बशिष्ठ जी। ओ मधुबनीमे रहैत छथि। हुनका हम बाल साहित्यक लेखक आ ‘सियाक सकल देखि’ नाटकक लेखकसँ जनैत रहियनि। प्रदीप बिहारी जी रंगनायिका 2022 ई. मे आबि हमरे टा नहि अपराजिताक सम्पूर्ण टीमक अथवा ‘रंगनायिका’ मे भाग लेनहार सभ क्षेत्रासँ आएल टीमक प्रोत्साहन प्रदान कएलन्हि। ओ क्षण सुखद छल हमरा सभक लेल। ओ दू दिन रहल रहथि आ दुनू दिनक नाटकक साक्ष्य बनलाह। ई हमरा सन नव आ अदना सनक लोकक लेल एकटा उपलब्धिए तँ अछि। हम आभार व्यक्त करय चाहबनि ऋषि बशिष्ठ भैयाक जे ओ सूचना देलनि, एहि पोथीमे अपन संस्मरण देबाक लेल। हमरा एहि तरहें अपन गप कहबाक अवसर भेटल। ई हम किन्नहुं नहि गमा सकैत रही। एहि सँ नीक आ सुखद तरीका आर की भऽ सकैत छैक अपन मोनक गप कहबाक लेल। Úफेसबुक पर आयल किछु प्रतिक्रिया
प्रदीप बिहारीक कथामे जनसंकट आ जन-आक्रोश एतेक सहजतासँ अभिव्यक्ति पबैत अछि जे बुझाइत अछि जे पाठकक अनुभवमे एकटा आर अनुभव जुड़ि रहल अछि। एकटा निस्सहाय व्यक्तिक गरीबी आ विवशता बेचब सन पत्राकारक व्यवसाय पर दिव्यांगक टिप्पणी अत्यन्त महत्वपूर्ण थिक। प्रदीपजीक कथाक विषय आ पात्राक चयन सेहो नव स्वाद दैत अछि। –नारायणजी, कथा ‘दिव्यांग’ पर टिप्पणी/फे बु/ 16.06.2020 मैथिली कथा मे जे किछु कथाकार सब छथि ताहि मे प्रदीप बिहारी विश्वस्त नाम छथि। प्रदीप बिहारी छथि तँ भरोस अछि जे कथा साहित्य मकमकायत नहि। –गुंजन श्री/अपन ब्लाॅग ‘तिर्यक’ पर/ 15.06.2020 आइ भोरे-भोर मैथिलीक श्रेष्ठ ओ साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त साहित्यकार आदरणीय प्रदीप बिहारी जी द्वारा उपहार स्वरूप पठायल गेल पोथी सब प्राप्त भेल। लगभग 8-10 दिन पहिले हिनकर एकटा पोस्ट पर पोथी पढबाक इच्छा एवं प्राप्ति हेतु पूछने रहियनि। हिनकर साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत पोथी के भारतक विभिन्न भाषा में अनुवाद भेल अछि एवं जारी अछि। किछ कथा तँ एखने पढ़ि गेलौं। ‘पोखरिमे दहाइत काठ’ नामक पोथीक 2 टा कथा पढलाक बाद हमरा यैह लागल जे ई साहित्यक संग-संग मैथिली भाषाक प्रति बहुत साकांक्ष छैथ, समय, काल ओ कथानक के संग-संग पात्राक माध्यमसँ एकहि कथा मे बेगूसराय, मधुबनी, दरभंगा ओ मिथिलाक अन्य स्थान पर बाजऽ जाइ बला बोली/उपभाषा(कपंसमबज) के प्रयोग केने छैथ जे मैथिली भाषा के दीर्घ काल मे बहुत मदति करतै खास कऽ भाषा के नाम पर बंटै के राजनीति खतम हेतै ओ मैथिलीमे समावेशी प्राकृतिक विकास हेतै। एकटा कथा ‘चश्मा’ के किछु पाँति सब देखियौ- अवधेश पुछलक, ‘‘की?’’ ‘‘बोललिअऽ जे थोड़े रूपा दए सकै छहो?’’ ‘‘यै किएक?’’ ‘‘एल्ड्रिन कीन के अपनो खइबै आ बेटो के खुआ देबै।’’ बाजलि तापसी। ़़ शैलेन्द्र मिश्र/ फे बु/ 23.01.2021सऽर-समांगक उद्गार
मेनका मल्लिकअनुखन माधव-माधव रटइत
एहि मासक अंतिम तिथि माने 31 मार्च 2023 कऽ बैंकक नोकरीसँ रिटायर होयताह प्रदीप बिहारी। मुदा, एकटा साहित्यकार आ रंगकर्मी रिटायर नहि होयताह, एकटा नव ऊर्जाक संग नव दायित्वक लेल तैयार भऽ जयताह। हिनक षष्ठिपूर्ति पर हिनका विषयमे लिखैत हमरा भीतर एकटा उहापोहक स्थिति बनि रहल अछि। जहियासँ हम हिनक जीवनसंगिनी छी, तहियासँ हम हिनक साहित्यक प्रति प्रेम आ समर्पणक साक्षी छी। बियाहक बाद जखन हम हिनका ओहिठाम अएलहुँ, तखन साहित्यक प्रति रुचि देखि अवाक् रहि गेलहुँ। बियाहसँ पहिने ई बुझल छल जे ई लिखऽ-पढ़ऽमे रुचि रखैत छथि। मुदा साहित्यमे एहि तरहें मातल छथि, तकर कल्पना नहि छल। बियाह कऽ जखन बेगूसराय अएलहुँ तखन हमर गृहस्थी दू कोठरीक मकानमे छल। चारि गोटेक परिवार। हम दुनू गोटे, हमर सासु आ दिओर। यैह चारि गोटेक हमर दुनिया छल। ससुरकें हम मात्रा फोटोमे देखलहुँ। प्रदीपक इंटरक परीक्षासँ पन्द्रह दिन पहिने स्वर्गीय भऽ गेल छलाह।

