रचल प्रदीप हमहुँ से जानल

रचल प्रदीप हमहुँ से जानल

(षष्ठिपूर्ति पर विशेष)

सम्पादक

ऋषि बशिष्ठ

दीप नारायण

प्रस्तुति

चतुरंग प्रकाशन

बेगूसराय

प्रकाशकीय

प्रस्तुत पोथीक प्रकाशनक पहिलुक एकटा छोटछीन खिस्सा कहऽ चाहैत छी। बेगूसरायक किछु रंगकर्मीसँ गपसपमे अनचोके ई बात बहरयलैक जे 05 मार्च 2023 कऽ प्रदीप बिहारी जी अपन जीवनक साठिम वर्ष पूरा कऽ रहलाह अछि। भेलैक जे एहि अवसरकें अविस्मरणीय बनाओल जाय। बेगूसरायमे प्रदीप जी पर केन्द्रित एकटा कार्यक्रम राखल जाय, संगहि एकटा पुस्तिकाक प्रकाशन सेहो कयल जाय। जखन एहि प्रस्ताव पर गप भऽ रहल छल, तखन समयक सीमा देखैत लागल जे मोश्किलसँ एकटा पुस्तिका टा बहार भऽ सकैत अछि। एतेक जल्दी कोन रचनाकार प्रदीपक बारेमे किछु लिखि कऽ देताह? तथापि तय भेल जे लेखकलोकनिकें आग्रह कयल जाय। समयकें देखैत ई बादमे तय भेल जे एकर सम्पादन के करताह, पहिने भेल जे लेखकलोकनिकें तुरंत आग्रह करब शुरू कऽ देल जाय। कम-सँ-कम एको सप्ताहक समय देल जानि। मुदा, हमरा सभ लग ततबो समय नहि छल। रचना प्राप्त करबा लेल मात्रा पाँच-छओ दिन शेष छल। लेखकलोकनिकें कहबामे कोनादन सेहो लागय, मुदा जें कि निर्णय लेने रही जे ई काज करबाक छैक, तँ तैयारीमे लागि गेलहुँ।

दू-तीन गोटेसँ गप कयलाक बाद हुनक सकारात्मक बात सूनि हौसला बढ़ल। बेसी गोटें कहलनि जे आर समय दितहुँ तँ प्रदीपक बारेमे वा हुनका साहित्यक बारेमे फैलसँ लिखितहुँ। हमरा प्रसन्नता भेल जे जिनका सभकें हम कहलियनि, सभ गोटें यथासमय रचना देबाक भरोस देलनि। तखन बुझायल जे प्रदीप बिहारीकें ओ सभ कतेक स्नेह दैत छथि। ई प्रदीपक लोकप्रियता आ सभक संग व्यवहारकुशलताक परिणाम छल जे सभ गोटें अपन वचनक अनुसार यथासमय रचना पठा देलनि। एखनो लगैत अछि जे प्रदीप बिहारी अपन सहजता आ सरलताक कारणें सबहक प्रिय छथि। अपन अग्रज साहित्यकार सभकें सदैव आदर दैत रहलाह आ अनुज साहित्यकारकें स्नेह, तें हुनका लेल आयोजित एहि सारस्वत काजमे सभ गोटें मदति कयलनि।

रचना सभ देखलाक बाद लागल जे पुस्तिकामे अँटऽ बला नहि छैक। जेना-जेना रचना अबैत गेल, तेना-तेना आत्मबल बढ़ैत गेल। प्रस्तावित पुस्तिका पुस्तकक आकार लेबऽ लागल। तखन तय भेल जे पोथीक रूप देल जाय। तखन हम सभ अपन निर्णयक अनुसार मैथिलीक युवा रचनाकार ऋषि बशिष्ठ आ दीप नारायण सँ एहि पोथीक सम्पादन करबाक आग्रह कयलियनि। हमरा प्रसन्नता भेल जे ओ दुनू गोटें हमर आग्रहकें स्वीकारि हमर काज बहुत हल्लुक कऽ देलनि।

समयक दबावक कारणें बहुत रचनाकारसँ हम सम्पर्क नहि कऽ सकलहुँ, तकर खेद अछि हमरा। प्रसन्नता एहि बातक अछि जे ई पोथी अपने सभक हाथमे दऽ रहल छी।

मेनका मल्लिक/वास्ते चतुरंग प्रकाशन, बेगूसराय

सम्पादकीय

प्रदीप बिहारी एकटा श्रेष्ठ कथाकार, एकटा श्रेष्ठ उपन्यासकार, एकटा श्रेष्ठ अनुवादक, एकटा श्रेष्ठ सम्पादक, एतेकमेसँ जएह कहि सकी सएह समुचित। प्रदीप बिहारीक नाम सभ विधामे अग्रगण्य छनि। आ से, मैथिली साहित्य मात्रामे नहि, हिनक कथा-उपन्यास अनेको अन्य भारतीय भाषामे अनूदित आ प्रकाशित छनि। ओना लिखलनि कविता सेहो। नेपालीक प्रसिद्ध कविता सभक अनुवाद सेहो कयलनि, से प्रकाशितो छनि, मुदा गद्य विधामे जे हिनक विराट परिचिति बनलनि से सूर्यक समान भास्वर भेल। प्रदीप बिहारीक मैथिली साहित्यमे आगमन अनायास नहि भेलनि। मैथिली साहित्यक विराट नक्षत्रा जीवकान्त सन सिद्ध साहित्यिक गुरुक मार्गदर्शनसँ ओ निखरैत गेलाह। ओ मधुबनी जिलाक कन्हौली मल्लिक टोल(खजौली)सँ चाहे जतय गेलाह, हुनक रचनामे गाम, गामक संस्कृति मुखरित होइत रहल। ‘सरोकार’ कथा-संग्रहक लेल हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कार भेटलनि। ई सभ बात तँ भेल साहित्यक सन्दर्भमे, रंगमंचक लेल सेहो प्रदीप बिहारी ओतबे अनिवार्य नाम छथि। पछिला सदीक नवम दशकमे प्रदीप बिहारी बिहारक एकटा ख्यातिप्राप्त रंगकर्मी रहलाह अछि। रंगकर्मक लेल हिनका बिहारमे सर्वश्रेष्ठ अभिनेताक पुरस्कार सेहो प्राप्त छनि। जखन प्रदीप बिहारी नोकरी कयलनि तँ बैंकमे एकटा अधिकारी बनि गेलाह। अर्थात् प्रदीप बिहारी हरेक क्षेत्रामे श्रेष्ठ। से प्रदीप बिहारी (हमर सभक प्रदीप भैया) आइ जीवनक साठि टा बसन्तक आनन्द आ ऊर्जा प्राप्त कऽ लेलनि अछि। नोकरीक जवाबदेहीसँ आब ओ मुक्त भऽ रहल छथि। ई अवसर अवश्ये उत्सव आ उत्साहक अछि। मिथिलामे कोनो छोटो काज सम्पन्न भेलापर घरमे सत्यनारायण भगवानक पूजाक आयोजन होइत रहल अछि। ई मिथिलाक परम्परा आ संस्कृति रहल अछि अदौकालसँ। आ, ई सेवानिवृत्तिक अवसर तँ उचिते अछि। एही क्रममे प्रदीप बिहारीक षष्ठिपूर्तिक अवसरपर हुनक व्यक्तित्व आ कृतित्वपर केन्द्रित एकटा पोथी निकालबाक नियार अनेक लेखकलोकनिक मोनमे छलनि। यद्यपि एहि संकल्पकें कार्यरूप देबयमे कनेक बिलम्ब भेलैक अवश्य, मुदा मैथिलीक अनेको प्रतिष्ठित श्रेष्ठ लेखकलोकनिक रचना तत्काल प्राप्त भेल आ ई सारस्वत-संकल्पना सार्थक भऽ सकल।

प्रदीप बिहारी जतय रहलाह अछि ओही जगहकें उर्वर बनबैत रहलाह अछि। जीवनक प्रारम्भिक कालमे नेपालमे रहलाह तँ ओतहु बेस चर्चित-अर्चित रहलाह। ओतहुसँ मैथिलीक त्रौमासिक पत्रिका ‘हिलकोर’ बहार कयलनि। जखन बेगूसराय अयलाह तँ एकरा साहित्य आ संस्कृतिक केन्द्र बनयबाक सार्थक प्रयास कयलनि। ई जीवनमे अनेक नव-नव प्रयोग करैत रहलाह अछि। से चाहे क्षेत्रा कोनहु होअए- साहित्य, संस्कृति आ कि सामाजिक। इएह विशेषता मैथिली साहित्यमे हिनका बेछप बनबैत छनि। प्रदीप बिहारी सभक प्रिय छथि, से ओ वरिष्ठ होथि वा कनिष्ठ, साहित्यकर्मी होथि वा रंगकर्मी, साहित्य-प्रेमी होथि वा साहित्य-सृजक। एहन महत्वपूर्ण व्यक्तित्वपर केन्द्रित ई पोथी मैथिली साहित्य-जगतमे एकटा नव परम्पराक बढ़ैत डेग थिक। मैथिलीमे अनेको साहित्यकारक अभिनन्दन-ग्रंथ प्रकाशित भेल छनि, मुदा षष्ठिपूर्तिक अवसरपर निकलयवला एहि पोथीक महत्व ऐतिहासिक अछि। एहि पोथीक प्रकाशनमे कथाकार-कवयित्राी मेनका मल्लिकक योगदान सर्वोपरि छनि। हिनक ई संकल्पना मैथिली साहित्यमे एकटा नव परम्पराक निर्माण करत से विश्वास अछि। एहि अनुपम पोथीक सम्पादनक भार अनुज दीप नारायण जीक संग भेटब हमर साहित्यिक जीवनमे एकटा अलभ्य-लाभ थिक। एहि तरहक अवसर प्रदान करबाक हेतु मेनका मल्लिक जीकें हार्दिक आभार। पोथीमे संकलित सभ रचनाक प्रतिष्ठित लेखकलोकनिक प्रति सेहो सादर आभार व्यक्त करैत छी।

आ अन्तमे, प्रदीप बिहारी (प्रदीप भैया)क सुस्वास्थ्य आ सुदीर्घ रचनाशील जीवनक कामना करैत छी। जीवनक नव पारीक शुरुआतक शुभकामना। अनन्त काल धरि हिनक मार्गदर्शन आ आशीष हमरालोकनिकें भेटैत रहय।

ऋषि बशिष्ठ

जीवकान्त

अपन पीढ़ीक संग आ ओहिसँ एक डेग आगाँ

प्रदीप बिहारी मैथिलीक एक महत्वपूर्ण कथाकार छथि। कथा कहबाक जे ढंग छैक, तकरा ओ प्रभावशाली बनओलनि अछि। कथाकारक सही परीक्षा थिकैक ओ कथामे कतबा विश्वसनीय लगैत अछि। एहि परीक्षामे ओ सफल भेल छथि।

बेसी काल हुनक कथामे उत्सुकता जगयबाक आ ओकरा अंत धरि जगा कए राखबाक गुण भेटैत अछि। कथाकार एहि गुणक कारणें कथा-गोष्ठी सभमे आदरपूर्वक सुनल गेलाह अछि।

नारी विषयक कथा मैथिलीमे कम लिखल गेल अछि। राजकमल चैधरी अपन कथा सभमे एहि विषयकें उठओलनि। एहि भाषाक पाठककें अवचंक भेलैक जे ई कोन लेखक एतबा साहस प्रदर्शित कए रहल अछि। एहि साहसक लेल पाठकक एक वर्ग हुनक बहुत निन्दा कयलक, दोसर वर्ग हुनका महत्वपूर्ण आसन प्रदान कयलक। प्रदीप बिहारी जखन नारी विषयक कथा उठबैत छथि, तँ हिनको साहसकें रेखांकित करबाक स्थिति बनैत अछि।

मैथिली समाज स्त्राी कें अपन समकक्षी नहि बुझैत अछि। पार्लियामेंट मे एक तिहाइ आसन महिलालोकनिकें देल जाइनि। एक दिस ई बात अछि, जे क्षीण अछि। दोसर दिस एहि बातक विरोध अछि, जे शक्तिशाली अछि। स्त्राी विवाह लेल पालित होइत छथि। विवाह हुनक सार्थकता थिक। विवाह बिना ओ निरर्थक छथि। एतबा तिलक-दहेज, एतबा बरियाती, एतबा शामियाना आ जेनरेटरक इजोत स्त्राीकें तुच्छ आ अपदार्थ बनबैत अछि। विवाहक बाद नववधूकें डाहि-जारि कए तिलक-दहेजकें ओकरासँ महत्वपूर्ण बूझल जाइत अछि। एहि विषयमे समाज अविकसित आ निन्दनीय अछि।

नारीकें मनुक्ख बुझबाक, ओकरा पुरुषक समकक्षी बुझबाक साहस प्रदीप बिहारीक कथा सभमे अछि। तें ई लेखक महत्वपूर्ण छथि। ई भविष्यक लेल आशा जगबैत अछि।

प्रदीप बिहारी बहुत संघर्षपूर्ण जीवन जीलाह अछि। भारत आ नेपालक दुनू कातक मैथिली भाषी समुदायक जीवनकें ओ देखलनि अछि। पायाक ओहि पारक मिथिलाक जखन ओ बात करैत छथि, तँ आर मर्मस्पर्शी भए जाइत छथि। नाटक, फिल्म आदिक सृजनात्मक अनुभव हिनक लेखकीय भाषाकें संयम प्रदान करैत अछि। ओ अपना पीढ़ीक संग छथि आ ओहिसँ एक डेग आगाँ छथि।

(प्रदीप बिहारीक पोथी मकड़ीक फ्लैपसँ साभार। वर्ष 2000

कोनो लेखक ‘नपना’ लऽ कऽ नहि लिखैत छथि। नपना लऽ कऽ लिखब प्रायः सम्भवो नहि छैक। लिखलाक बाद चाहे जेहेन नपना लगाउ से संभव छैक।

साहित्य सम्पूर्ण जीवनकें पकड़बाक प्रयास थिकैक। प्रदीप बिहारी सम्पूर्ण जीवनकें पकड़बाक प्रयासमे विसूवियस मे आ आनो ठाम तथा कथित जनवाद सँ निकट रहबाक प्रयास करैत छथि, से हमरा नीक लगैत अछि। जीवन ततेक विलक्षण आ विराट अछि जे प्रत्येक युग मे ओकर व्याख्या करैत जाउ, जीवन जेना अनेक अर्थ मे व्याख्या आ विश्लेषण सँ बाहरे रहि जाइत अछि। तैं प्रत्येक युगमे साहित्य लिखल जायत आ पढ़ल जायत।

‘विसूवियस’ मे पहाड़ी आ मधेसीक बीच अन्तरक बात अछि। प्रदीप बहुत ठीक टिप्पणी कऽ सकलाह अछि। एहि उपन्यासमे मधेसी सभक कछमछी कें ओतुक्का प्रशासन प्रतिक्रियावाद कहैत अछि, सेहो एक ठोस यथार्थ थिक। पहाड़ी जनीजाति पर जे धारणा मैदानी भागमे बसनिहार मैथिल लोकनिक मोनमे बनैत छनि, तकरो प्रदीप एहि उपन्यासमे लिखैत छथि। सभ सँ पैघ तारीफक बात ई अछि जे प्रदीप बिहारी एक एहेन पहाड़ी परिवारक चित्राण कयलनि अछि जे बहुत उत्थर लगैत अछि, मुदा ओकर कारणक विश्लेषण कऽ ओ ओकरा सभकें मानवीय गरिमा प्रदान कयलनि अछि। ततेक सहानुभूति आ करुणाक संग ओ एहि परिवारक दुःखक कथा कहलनि अछि जे ई परिवार आ एहि परिवारक प्रत्येक कन्या पाठकक सहानुभूति प्राप्त कऽ लैत अछि।

जीवकान्त/‘विसूवियस’क भूमिकासँ

उदयचन्द्र झा ‘विनोद’

‘हे रौ’ पढ़लाक बाद

अंग्रेजीक शौर्ट स्टोरी के अपना ठाम कथा कहल गेलै। तखन अयलै लघु कथा। आब तँ बीहनि कथा सेहो चललैए। एखन हमरा सोझाँ एक गोट सद्यः प्रकाशित लघु कथा संग्रह अछि- हे रौ। एही शीर्षकक लघु कथाक नाम पर पोथीक नाम राखल गेल अछि। कथाकार छथि बहुआयामी व्यक्तित्वक स्वामी कन्हौली मल्लिक टोल, खजौलीक निवासी प्रदीप बिहारी। नेपाल सँ कहियो हिलकोर नामक त्रौमासिक पत्रिका बहार करैत रहथि। नेपाली सँ मैथिली आ हिन्दी मे अनुवाद करैत रहैत छथि। खजौली स्कूल मे जीवकान्त जीक प्रिय छात्रा रहल छथि। अपना नाम जीवकान्त जीक तमाम पत्राक एक पुस्तक प्रकाशित कयने छथि, नाम छैक- स्वस्ति श्री प्रदीप बिहारी। साहित्य संस्कृति आ भाषा प्रसंग जीवकान्त जीक विचार के बुझबाक लेल बेश सहायक अछि ई किताब। एखन सरि भऽ साठि वर्षक नहि भेलाह अछि तथापि मैथिली, नेपाली आ हिन्दीक आँगन मे जतबा काज हिनका सँ संभव भेल अछि, से ठीके स्पृहनीय। उचिते बहुत पूर्वे हिनका साहित्य अकादेमी पुरस्कार सँ सम्मानित कैल जा चुकल अछि। भारतीय स्टेट बैंकक व्यस्त नौकरी करैत जतबा ई लेखन आ सम्पादन संभव कयलनि से ककरो लेल अनुकरणीय। विसूवियस प्रभृति छओ गोट उपन्यास प्रकाशित छनि, औतीह कमला जयतीह कमला कथा संग्रह छनि। खण्ड खण्ड जिनगी नामक लघुकथा संग्रहक बाद ई विचारणीय किताब आयल अछि। स्वागत।

लघु कथा की थिकैक? कम शब्द मे अधिक कहबाक सौकर्य थिकैक। आजुक व्यस्त लोकक लेल अनुकूल। व्यंजना प्रधान ई अणुगल्प औपन्यासिक कथ्य लेने भेटत। देखन मे छोटो लगे, घाव करे गंभीर। सम्मान समारोह मे सम्मानक पाछाँक राजनीति देखल जा सकैत अछि। ‘सत्संगी’ केहन बढियाँ छूआछूत पर चोट करैत अछि। ‘थापड़’क बेदराक स्वाभिमान कोना प्रत्यक्ष भऽ जाइछ जखन ओ कहैत छै जे हमे हथ उठाइ नहि लै छिकियै साहेब। बूड़ि कथा केहन व्यंग्य करैछ ई कहि जे जनकल्याणक काज करब बूड़ित्व थिक। बेटीक प्रति समाजक सोच के देखार करैत ‘संतान’ आ नौरिन के ‘मीना अंटी’ कहि कुसंस्कारी होयबाक विचार केहन दिव्य।

नीक लागल किताब। ठीक लागल विचार। कीत्र्ति नारायण मिश्रक बेगूसराय के प्रदीप मे एक सुयोग्य आ सक्रिय उत्तराधिकारी भेटलैक अछि। अपन लेखन तँ करिते छथि संगहि मैथिली के अनुवाद द्वारा जे व्यापकता प्रदान करैत छथि, ताहि हेतु प्रशंसाक पात्रा छथि। हमरा सदा हिनक लेखक प्रिय रहल अछि, हिनक काज जँचल अछि। भीड़ मे रहैत अपना के बचा राखब नान्हि टा बात नहि। पोथीक हार्दिक स्वागत। एखन अंतरंगक उन्नैसम अंक पढि रहल छी। अभिनन्दनीय छी अहाँ। एहन चैचक समांगक आर आवश्यकता बुझाइछ। जय मैथिली।

कहबाक प्रयोजन नहि जे स्वातंत्रयोत्तर साहित्यक यथार्थ वास्तव मे प्रगतिवादी यथार्थ थिक। यैह यथार्थ आइयो साहित्य के प्रासंगिक बनबैछ, समय सापेक्ष रहनहि समाजक व्यथित रग पर हाथ देबाक प्रयोजन। आदर्श आ यथार्थक द्वन्द्व आजुक लेखन मे विलीन होइत भेटत। अपन विभिन्न साहित्यिक विधाक ई नवीनीकरण हमरा सदैव प्रमुदित करैत रहैत अछि। जखन कखनो हम अशोक, तारानन्द वियोगी, विभूति आनन्द आ कि शिवशंकर श्रीनिवास के पढैत छी, ई सत्य झलकि कऽ हमरा अपना दिस आकृष्ट कऽ लैत अछि। भाषा परिवेश पर बाद मे ध्यान जाइत अछि।

प्रदीप बिहारी मैथिली लेखनक एक महत्वपूर्ण नाम थिक। बहुत रास अनुवाद कयने छथि। हिन्दी मे सेहो गति छनि, गोटे पत्रिको बहार करैत छथि। हिनक विसूवियस उपन्यास एक परतार खूब चर्चा मे रहल छल। एखन पढ़ल अछि हिनक सद्यः प्रकाशित उपन्यास कोखि। विलक्षण। कोखिक महत्व के जेना ई वृहत्तर समाजक हित मे तिरोहित कयलनि अछि, से नव थिक। पल्लवी, श्वेता, शुभा, प्रतीक, अनुपम तमाम पात्रा विश्वसनीय। होटल हो वा घर, सभ ठाम लेखक सावधान छथि। भौमिकक चरित्रा अलगे बंगालक शरत चन्द्रीय आभा के मोन पाड़ि दैत छैक, मुदा लगले ताहि आभामंडल सँ कुशलता पूर्वक बहरा जाइछ।

बहुत दिन पर मैथिली मे फेर एकटा नीक उपन्यास पढबाक अवसर भेटल जाहि मे सरोकारक संग समुचित सहकारो छै, भावना संग औचित्यक विचारो छै, मात्सर्य संग मलारो छै। हम अपन अनुज रचनाकारक अभिनन्दन करैत गौरवान्वित छी, चाहैत छी जे एहिना अविरल गंगा जकाँ बहैत रहथि। सरोगेसी नहि, कोखि। पठनीय कृतिक हार्दिक स्वागत।             —उदय चन्द्र झा ‘विनोद’

विभूति आनन्द

प्रदीपक मादे किछु-किछु…

आब ठीक सँं स्मरणो नहि अछि. कत्ता वर्ष भऽ गेलै। ओना तकर प्रयोजन सेहो नहि रहल। कारण, मेनका एक दिन फोन कयलनि- ‘प्रदीप साठिक भऽ रहल छथि! सोचै छिऐ जे एहि अवसर कें स्मरणीय बनयबाक लेल हुनकापर केंद्रित एक पुस्तिका प्रकाशित करी…’

आ से तें विश्वास नहियों करैत विश्वास करय पड़ल। कारण हुनक फोटो आ रचनात्मकता सँं ई कखनो बूढ़ नहि लगलाह। छथिहो नहि। जँं रहितथि तँं कथमपि नहि कहने रहितथि, ‘भाइ! हमर पुत्रा अपन सहकर्मिणी संग विवाह करताह! आबी तँं नीक लागत!’

ओना एकबेर कहने रहथि,दृ‘भाइ! एखन एसगरे छी। मेनका अपन पौत्राक परिचर्या लेल पुत्रा-पुत्राबधूक संग रहि रहलि छथि!’

एही क्रम मे ईहो कहलनि,दृ‘भाइ, भाबहु एहि बेर सँं छठिक हाथ उठौतीह! ताही मे जा रहल छी। हम मुदा घुरि आयब, पत्नी पुत्रा लोकनिक संग ओतहि चल जयतीह।’

तैयो मोन नहि मानैत अछि! कारण हमरा आँखि मे प्रदीपक एकटा एहन फोटो सुरक्षित अछि, जे हमरा अपन एक कथाक संग ओ पठौने रहथि। तहिया हम ‘लालधूआँ’ नामक पत्रिकाक संपादन करैत रही। ओ फोटो एकदम सँ काॅंच, मुदा ‘कैचिंग’ छल! आ से एखनो ओ ‘कैचिंग फेस’ हमर आँखि मे अनामति अछि! बाल-सुलभ भाव छलकैत रहैत छनि, चेहरा पर सेहो, बात-व्यवहार मे तँं सहजहिं।

से हमरा लगैत अछि, लगैत की अछि, मानैत छी जे प्रेमिल हृदय अधिक रचनाशील, कल्पनाशील होइत अछि। आ ओ व्यक्ति जँं सही मे प्रेम करैत अछि, अथवा कहियो कएने रहैत अछि, आ तकरा अपन हृदय मे जोगने जावंतो स्वप्निल भेल रहैत अछि, ओ व्यक्ति कथमपि बूढ़ नहि भऽ सकैत अछि! ओना भनहि नोकरी लेल ओ अनफिट कऽ देल जाइत हो, आ ओकर नाम संग ‘रिटायर’क तमगा लगा देल जाइत होइ, सही अर्थ मे चिर-युवा रहैत अछि। प्रदीप, माने प्रदीप बिहारी, एकर सद्यः बानगी छथि!

हम एमहर ‘रिटायरमेंट’क बाद (ई शब्द मजबूरी मे लिखऽ पड़ि रहल अछि। विश्वविद्यालय हमरो संग प्रदीपे सनक दुव्र्यवहार कऽ चुकल अछि) कही तँं काफी मात्रा मे ‘टीनएजर्स कथा’ लिखलहुँ! एना कही जे मैथिली समाज लेल मोटा-मोटी अपैत आ अपवित्रा प्रसंग सभ पर कथा लिखब मैथिली मे वर्जिते जकाँं रहैत अयलैक अछि, किछु अपवाद कें छोड़िकऽ। चर्चाक क्रम मे घुमा-फिरा कऽ वएह ललितक ‘मुक्ति’, आकि कल्पना शरण (लिली रे)क ‘रंगीन परदा’ वा राजकमल चैधरीक गोटेक, अथवा धूमकेतुक आकि प्रभास कुमार चैधरीक कथा…

एखन ओ सभ वर्जना टुटलै अछि। एमहर देखादेखी हम सेहो किछु रिस्क उठौलहुँ अछि! आ से कही तँ किछु बेसिये उठबैत अयलहुँ अछि। भरिसक सएह सभ पढ़लाक बाद प्रदीप एक दिन फोन पर कहलनि,दृ‘भाइ, हमरो पर केंद्रित एकाध कथा लिखियौक ने!’

हम पहिने चैंकलहुँ। फेर त्वरित प्रतिक्रिया आयल,दृ‘जुलूम भऽ जेतै!’

‘तऽ की हेतै, लिखियौक ने!’

से एतऽ हम ई साफ करऽ चाहैत रही जे एहन करेज लऽ कऽ जीनिहार कतहु रिटायर होअय! तें हम व्यक्तिगत रूप सँ एहन रूढ़ मान्यता कें सोझे, सिराउरे पर सँ खारिज करैत छी!

फेर एहि ठाम अबैत-अबैत हम प्रदीपक विरुद्ध एक ललकार देबाक लेल बाध्य होइत छी जे ओ अपन कथा अपने किएक नहि लिखैत छथि! आ से ताही मूड मे एक दिन कहलियनि,दृ‘अहाँ अपने किएक नहि लिखैत छी?’

ओ पहिने बालसुलभ स्वभाव संग बिहुँसलाह। फेर अस्पष्ट सन स्पष्ट होइत बजलाह,दृ‘लिखबै भाइ, लिखबै…’

‘आकि डर होइए?’ हम प्रत्यक्ष रूप सँ ललकारि देलियनि।

तखन ओ मजबूत स्वर मे कहलनि,दृ‘नै नै, डर कथी लेल हेतै भाइ! समय आबऽ दियौ, सभ टा चिट्ठी सुरक्षित अछि! आ से गाम सँ लऽ कऽ…’

आ हम आस्वस्त भेल रही। तें आइ पुनः सोचैत छी जे आत्मसंस्मरण ओ स्वयं लिखथि तँ से काफी समीचीन होइतय! कारण हिनक रचना सभक चित्रात्मकता ईष्र्ये होइत छनि। हमरा तें कखनो-काल हिनका सँ एहि गुण लऽ कऽ ईष्र्या सेहो होइत रहैत अछि! प्रायः एहने सनक कोनो मानसिकता रहल होयत जे हिनक पहिल कथा ‘लालधूआँ’ मे छपने होयब!

एतऽ एखन हम आत्मसंस्मरणक चर्च कयलहुँ छल। हम मानैत छी जे आत्मसंस्मरण आकि आत्मकथा वस्तुतः एक तरहक आत्मसाक्षात्कार करब सनक होइत अछि! जँ कोनो लेखक एना कऽ कऽ सोचैत छथि, आ जे अन्दर सँ तथाकथित कोनो टा वर्जित क्षेत्रा कें नहि मानैत अछि तँ ओहन रचना सभदिना पठनीय रहैत अछि। प्रदीप बहुत रास घाटक पानि पीने छथि! जँ साहस करथि तँ मैथिली कें सेहो रसीदी टिकट, आकि कमला दासक डायरी सनक कृति भेटि सकैत अछि। कदाचित राजकमल चैधरीक एकाधिकार सेहो टुटि सकैत अछि!

ओना हम अनुभव करैत छी जे प्रदीप जी एहि प्रसंग पारम्परिक मैथिल-भाव मे आबि जयताह! तें हमरा कलम सँ लिखाबऽ चाहलनि! हम लीखि सकैत रही, आ जे किछु बूझल अछि, किछु पूछि कऽ सेहो कोनो बेजाय नहि लिखि सकितहुँ। मुदा हमरा संग संकट ई अछि जे ओ हमरा अपन जेठ भाय मानैत छथि! चलू ई सेहो कोनो तेहन संकट नहि छल। मूल संकट ई अछि जे हमर दिवंगता पत्नी ज्योत्स्ना चंद्रम हिनक धर्मपत्नी मेनका कें अपन छोट दियादिनी सम मानैत रहलथिन! आ एहि मामला मे ओ काफी पारंपरिक रहथि…

तखन एहि स्थल पर आबि हमर सोझा एक त्रिकोण सन बनैत अछिदृप्रदीप, वियोगी आ नवीन! ई तीनू अपन अपन अवस्थाक अंतरंग रहल छथि! तें हम सोचैत छी जे ई तीनू मित्रा यदि पत्रात्मक शैलीक आधार लऽ कऽ अपन-अपन जीवनानुभव लिखथि, तँ ‘तीन पंथ, एक काज’ भऽ जैतय! ओना हमरा एना कऽ सोचबाक संदर्भ मात्रा प्रदीप छथि। होयत की, कहब मुश्किल अछि…

खैर जे-से, हम कतय-सँ-कतय चलि गेलिऐ! एहनो कतहु सोचब भेलैए! अनुज मित्रा प्रदीप बिहारी आइ अपन साहित्य-यात्राक अनेक-अनेक पड़ाव कें पार कऽ चुकल छथि। तथापि यात्राशील छथि। भूख एखनो यथावत छनि। तें ई रिटायरमेंट हिनका मे अलग बोध कराबय, ई ‘री टायर’ होथि, से के नहि चाहत! हम तँ चाहिते छी। नेनपने सँ एक टा लोकोक्ति सुनैत आबि रहल छी साठा तब पाठा!

प्रदीप बिहारी ट्यूशनियाँ मास्टर रहलाह, रंगमंचक कलाकार भेलाह, देश-विदेशक विभिन्न पत्रा-पत्रिका केर माध्यम सँ साहित्यकारिता कयलनि, बैंकिंग सेवा मे तँ छथिहे, शाही-गैर शाही पुरस्कार/सम्मान भेटिते रहलनि। आ से एहि छोट सन जीवन मे आर की चाही!

ओना तँ भूखक कोनो इयत्ता नहि छै, तथापि हमर कामना अछि जे हमर अनुज सखा आर-आर नब क्षितिज कें पयबाक चेष्ठा करथि, आ बेर-बेर हमरा गौरब-बोध भेल करय जे हम आ प्रदीप बिहारी दूनू एक्कहि समकाल मे रचनाशील रहि आगू-पाछू चलैत रहलहुँ…

भऽ सकैछ, प्रदीप कें हमर उक्त पंक्ति पर आपत्ति होनि! मुदा हम दूनू समकालीन तँ छीहे! आ कतहु-कतहु तें मन प्रसन्न भऽ गेल करैत अछि जे बेसीठाम हमरा सँ ओ बीस पड़ि जाइत छथि! आ से एना कऽ कऽ सोचब हमरा अपना अंदर सँ आर पुष्ट करैत अछि!

एकदिन प्रदीप स्मरण दियौलनि जे एकबेर हम अहाँ संग ट्रेनक यात्रा मे रही। ओहि क्रम मे अहाँ हमरा भरि बाट समकाल, समकालीनता आ सोचक अद्यतन ‘ट्रेण्ड’ सभ सँ सोझा-सोझी करबैत, आधुनिक साहित्य-लेखनक प्रसंग बहुत रास ‘टिप्स’ देने छलहुँ!

ठीक छै, कहलनि तँ मानि लेलियनि। मुदा ईहो भाव आब आजुक पीढ़ी कहाँ स्मरण रखैत अछि! वस्तुतः एहि अतीत कें मोन रखैत ओ ई कहबाक चेष्टा कयलनि छलाह जे भाइ, हमर रचनाकार बइमान नहि अछि! से सही कही तँ रचनाकार बइमान होइतो नहि छथि!

आ इएह कारण अछि जे प्रदीप अपन साहित्ययात्रा मे अविवादित रहि एकनिष्ठ भाव सँ लेखन-मनन-चिंतन मे निरत रहलाह अछि। सदा प्रसन्न, आ कोनो टा कटुसत्यो कें हँसैत-मुस्कैत, मुदा अपन निज विचार कें व्यक्त करबा मे तोतराइत नहि छथि! एकर कारण हमरा इएह लगैत अछि जे, जेंकि सकारात्मकता हिनक स्थायी भाव रहल छनि, ई साहित्यिक गुटबंदी मे कतहु नहि देखाइत छथि. मतलब ई जे साहित्यिक गुटबंदी सँ दूरी राखब, सफलता आ सही लेखनक हथियार अछि!

अशोक

प्रदीप बिहारी अखण्ड मिथिलाक कथाकार छथि

प्रदीप बिहारीक कथामे मिथिलाक आम लोकक सुख-दुख, इच्छा-आकांक्षा आ मनोरथक अभिव्यक्ति भेल अछि। एहि तथ्य कें हिनक कथा ‘मोटबाह’, ‘नौरी’, ‘सरोकार’, ‘गमला मे धान’ आदि कतोक कथा सभ मे देखल जा सकैत अछि। एहि ‘आम’ आदमी मे मिथिलाक स्त्राी सेहो छथि। प्रदीपक सरोकार स्त्राीक शक्ति-संपन्नता सँ सेहो संपृक्त रहल अछि।

अंग्रेज मिथिला कें दू भाग मे बाँटि देलक। नेपाली मिथिला आ भारतीय मिथिला। मुदा, ई बंटवारा राजनीतिक आ प्रशासनिक स्तर पर भलें होअए, सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर कहियो नहि भऽ सकल। मैथिलीक एहि विभाजन के दुनू देशक साहित्यकार मन सँ कहियो ने स्वीकारलनि। किछु  साहित्यकारक लेखन मे दुनू कातक मिथिलाक जनजीवन आयल अछि। मैथिली कथा मे डाॅ. धीरेन्द्रक बाद प्रदीप बिहारीक कथा सभ मे मिथिलाक जनजीवन आयल अछि, जतऽ नेपाल आ भारतक भेद नहि अछि। अतः प्रदीप अखण्ड मिथिलाक कथाकार छथि। हिनक कथा मे पाया (सीमा) वा ‘देबाल’ नहि अछि। ई बात प्रदीप बिहारी के कथाकारक रूप मे कोनो समकालीन कथाकार सँ फराक करैत अछि।

प्रदीप बिहारी साहित्यकर्मीक संग-संग रंगकर्मी सेहो छथि। रंगकर्म मे हिनक संलग्नता, अनुभव आ सोच हिनक कथा सभ मे अपन प्रभाव छोड़ैत अछि। एहि प्रभावक प्रसार कथ्य सँ कतोक कथाक शिल्प धरि मे देखल जा सकैत अछि।

कथाक संग मैथिली उपन्यासमे सेहो प्रदीपक विशिष्ट अवदान अछि। हिनक पहिल उपन्यास मिथिला मिहिरमे 1983 ई. मे प्रकाशित भेल ‘गुमकी आ बिहाड़ि’। ई पोथी वर्ष 2022 मे पुस्ताकाकार छपल अछि। उपन्यास मे एक पीड़ित प्रताड़ित नवयुवतीक आत्मविश्वास आ प्रतिरोध उजागर भेल अछि। एही संग प्रदीप एहि उपन्यास मे धर्ममे पैसल शोषण तंत्राक वास्तविकता आ शोषकक अनैतिक आचरण के सेहो देखार केलनि अछि।

‘विसूवियस’ (1986) उपन्यास नेपालक जनजीवन पर आधारित अछि। उपन्यास मे मधेशी क्षेत्राक समाज, पहाड़ी आ मधेशीक बीच भेदभावक चित्राण अछि तँ बेरोजगारी आ मिल मालिकक द्वारा जन-मजदूरक शोषणक विरुद्ध प्रतिरोधक स्वर सेहो अछि। ‘शेष’ (2012) उपन्यास मिथिला मे आयल सामाजिक-सांस्कृतिक आरोह आ अवरोह के देखबैत अछि। ई उपन्यास रंगमंच आ रंगकर्म पर एक सार्थक विमर्श प्रस्तुत करैत अछि जे मैथिली उपन्यास सभमे एकरा एक फराके परिचिति प्रदान करैत अछि। ‘जड़ि’ (2013) उपन्यासमे तीन पीढ़ीक सोच-विचारमे आयल परिवर्तन के रेखांकित कयल गेल अछि। एहिमे सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन के सामूहिकताक भावना मे लोप होइत जेबा पर सेहो चिन्ता प्रकट कयल गेल अछि। ‘कोखि’ (2020) उपन्यास मे एक व्यापक मानवीय विमर्श अछि। कोखि के एक फराक आ सम्माननीय नजरिसँ देखल गेल अछि। प्रेम, दाम्पत्य, संस्कृतिकर्म, महत्वाकांक्षा आदिक बीच एक उदात्त मानवीय संवेदना एहि उपन्यास मे उभरि कऽ आयल अछि। ‘मृत्युलीला’ (2021) कोरोना त्रासदी पर आधरित एक अनुभूति सम्पन्न उपन्यास थिक। एहिमे भोगल दुख, कष्ट, भय, आशा-निराशा, मानसिक तनाओ आदिक मनोवैज्ञानिक चित्राण अछि। एहि उपन्यासक महत्ता एहिमे आयल यथार्थक कारणें कालांतरमे आर जीवंत आ सार्थक रूपमे सिद्ध होयत। प्रदीपक सभ उपन्यास अपन समयक संवेदनासँ एकाकार होइत एक सामाजिक-सांस्कृतिक मनुक्ख होयबाक लेल प्रेरित करैत अछि। कथा हो वा उपन्यास प्रदीप बिहारी सभ दिन ओहि समयक ज्वलंत प्रश्न सभसँ टकराइत मनुखताक पक्षमे ठाढ़ भेटैत छथि।

बिना कोनो तामझाम, शिल्पक दुरुहता के प्रदीप अपन रचनामे सहजतासँ बात करबाक लेल जानल जाइत छथि। अपन जीवन आ रंगकर्म मे सक्रियतासँ उपजल जीवन-दृष्टि हिनक रचना-दृष्टि बनल अछि। एक संस्कृति कर्मी के रूपमे ई जे अनुभव करैत छथि, भोगैत छथि, ओकरा एक व्यापक मानवीय संदर्भमे प्रस्तुत करैत छथि। यैह ओ तत्व थिक जे कोनो सीमा, धर्म आ क्षेत्रासँ ऊपर उठा सामान्य मनुक्खक पक्ष मे ठाढ़ करैत अछि। ओ अखण्ड मिथिलाक मानवीय संवेदनाक कथाकार छथि।

शिवशंकर श्रीनिवास

अपन बाटक बटोही

प्रदीप बिहारी आब अपन नोकरीसँ अवकाश ग्रहण करता, किंतु एखनो ओ युवा छथि। युवा छथि अपन वैचारिकतासँ, अपन लेखनसँ, जाहिमे हिनक विचार प्रकट होइत अछि। पहिरन-ओढ़न सेहो युवा सन रहैत छनि। अपन मातृभाषाक प्रति अद्भुत लगाव छनि। गाम छनि कन्हौली (मधुबनी) रहैत छथि बेगूसरायमे, किन्तु गामक प्रति जुड़ाव हिनक उपन्यास ‘शेष’ मे देखि सकैत छी। गामक विकासक सुन्दर कथा एहि उपन्यासमे आयल अछि। अपन ढंगक अद्भुत उपन्यास अछि ओ।

ओना प्रदीप बिहारी कथाकार, उपन्यासकार आ रंगमंचसँ जुड़ल कलाकार सेहो छथि। ‘अंतरंग’ नामक हिंदीक अनुवाद पत्रिकाक सम्पादक सेहो छथि। जाहि माध्यमे भारतक विभिन्न भाषाक अनुवाद, जाहिमे अपन भाषा मैथिलीक अनुवाद सेहो प्रकाशित होइत अछि।

उक्त पत्रिका माध्यमे ई भारतीय भाषा सभके आपसमे जोड़ैत छथि, जे अद्भुत कार्य अछि। अनुवादक रूपमे सेहो हिनक पोथी सभ आयल अछि।

हिनक कथा हो या उपन्यास, ओहि सभकें पढ़लासँ स्पष्ट हैत जे हिनक लेखन ओहि विषय सभ पर होइत अछि, जाहि पर एखनि तक नहि लिखल गेल छल। हिनक ढंग ओ कथ्यक टटकापन निश्चित रूपसँ मोहि लेत। ई मैथिलीक प्रसिद्ध लेखक जीवकान्तक मेट्रिकक छात्रा रहलाह। जीवकान्त पर हिनक कार्य सेहो प्रशंसनीय अछि, किंतु प्रदीप अपन लेखनक बाट बनयबामे अपन गुरुक प्रभावमे नहि अयलाह। ई अपन बाट स्वयं बनौलनि आ हिनका सैह हिनक अपन पहचान ओ विशिष्टता प्रदान कयलक। कहबाक तात्पर्य अपन साहित्यिक यात्रामे अपन बाटक बटोही छथि जे भीड़सँ फराक करैत अछि। हिनक पहचान कायम करैत अछि, विशिष्ट बनबैत अछि।

हिनक कथाक अध्ययनसँ स्पष्ट हैत जे ई अपन कालक सांस्कृतिक चेतनाक कथाकार छथि।

हिनक पहिल कथा 1976 ई. मे आयल। ओकर बाद ई निरन्तर कथा लिखि रहलाहे। एखनि तक हिनक पाँच गोट कथा-संग्रह प्रकाशित अछि-

औतीह कमला जयतीह कमला (1993), 2. मकड़ी (2000), 3. सरोकार (2005), 4. पोखरिमे दहाइत काठ (2017) आ 5. सपन एक देखल (2022)

समयक उपजल धाहमे बदलैत जीवन दशाक आवश्यक बिन्दु संग समक्ष अनैत सांस्कृतिक चेतनाकें जगबैत हिनक कथा आगू आयल अछि, से हिनक बादक कथामे स्पष्ट रूपसँ दृष्टि हैत।

हिनक प्रसिद्ध कथा अछि ‘मकड़ी’। एहि नामसँ हिनक संग्रह सेहो अछि। एहि कथामे मातृत्व पर वासनाक विजय देखाओल गेल अछि। ओना मातृत्व पाल्यपरक अछि किन्तु अछि। वासना जीवन संग अछि, ओकर परिणाम जीवन सेहो थिक किन्तु मातृत्व पर वासनाक विजय देखयबाक कोन औचित्यसँ ओ वैचारिक विमर्शकें आगू बढ़बैत स्त्राीक जीवनकें समक्ष अनैत छथि। डाॅक्टर देवशंकर नवीन ‘उजास’ (प्रदीप बिहारीक मैथिली कथाक हिंदी अनुवाद) मे कहैत छथि- ‘एक स्त्राी जब प्राचीनता से मोह तोड़ती है और नवीनता की ओर उन्मुक्त होती है, तब भी ममता और मानवीयता व्यक्ति को लगातार मकड़ी के जाल में उलझाती रहती है और स्त्राी उलझकर उसी में लटक जाती है।’ हमरा जनैत कथाकारके स्थितिक अंधकारक बाट पर प्रकाश देब कार्य सेहो छैक। खास कऽ कऽ ओहेन कालमे जकरा प्रदीप बिहारी अपन कथामे आगू कऽ सकलाह अछि।

हिनक कथा ‘नकसक फकफक’ एक भ्रष्टाचार विरोधक कथा थिक, तँ ‘औतीह कमला जयतीह कमला’ बाढ़िक कथा थिक, किन्तु ई बाढ़ियेक कथा नहि थिक। ई थिक परम्परासँ चल अबैत कला-कौशलके बिसरैत जयबाक चिन्ताक कथा। कथामे प्रसंग आयलए जँ एहिना लोक अपन परिवारक, अपन भूमिक अदौक विधा बिसरैत जायत तँ लोक क्रमशः एहि भूमिके सेहो छोड़ि देत। कमला एहिना अबैत रहतीह जाइत रहतीह। एहि संग उक्त कथा विरोधक कथा सेहो थिक।

हिनक एकटा कथा अछि- ‘गमलामे धान’। एहि कथामे सेहो देखाओल गेल अछि जे कोना लोक अपन स्थानीय रूप-रंग, वेष-भूषाके छोड़ि रहलैए। जे टोपी कहियो नेपालीक माथ पर गर्वक प्रतीक होइत छल वैह टोपी आब ओतऽ दुर्लभ भऽ गेल। सभ आधुनिकताक रंगमे रंगैत अपन संस्कृति ओ सभ्यताके बिसरि रहलैए।

प्रदीप बिहारीक कथा ‘सरोकार’ गंगाक प्रदूषण रोकबाक एक दृष्टिक कथा थिक किन्तु जे सुनरा डोम एहि लेल आगू भेल अछि आ डँटल अछि, ओकरा लोक बिजली पर जरौलासँ ओकरा लाभक बुझैत अछि। परम्परासँ चल अबैत चिता पर जरयबाक बात बेसी ठीक लगै छै किन्तु कथा सुनराक समर्थनमे नव लोक एक नमहर वैचारिक दृष्टि दऽ रहल अछि से विशेष महत्वक बात अछि।

हिनक कथाक प्रसंग डाॅ. देवकान्त झा कहैत छथि- ‘‘अपन कथाक घटनावलीक प्रति अतिशय उत्साहित प्रदीप बिहारी निसंदेह प्रभूत ओज-ऊर्जाक संग कथा-प्रसंगके आगू बढ़बैत छथि…‘अजग्गि’ दहेज-दानवक खतराक प्रति एक मर्मद्रावक कथा थिक। लेखकक अधिकांश कथा माक्र्सवादी विचारधाराक अनुरूप वर्गसंघर्ष पर आधारित अछि। ओ सभ उद्घाटित करैछ जे पितृसत्तात्मक समाजमे जोर जुल्मक संग स्त्राीके कोना निर्दयतापूर्वक उत्पीड़ित कयल जाइछ।’’ किन्तु ओ वर्गसंघर्ष वा माक्र्सवादी कोना थिक? एहि पर डाॅ. देवकान्त झा कोनो प्रकाश नहि देलनि अछि। हमरा जनैत जीवनसंघर्ष माक्र्सवादी चिंतनक आधार पर भऽ सकैत अछि किन्तु प्रत्येक जीवनसंघर्षमे माक्र्सवादी चिंतन पर किनसाइत अछि आ ने रूप लऽ सकैत अछि तें आवश्यक अछि कोनो विश्लेषणके उदाहरण संग पुष्टि कयल जेबाक चाही।

प्रदीप जीक एकटा कथा अछि- ‘फाँक’। एहि कथामे भूषण पत्नी अछैत सारिसँ प्रेम करैत अछि। पत्नीसँ ओकरा द्वारा संतान छैक। पत्नीसँ ओ बियाह एहि कारणें केने छल जे ओहो (एकर पत्नी) एकरे प्रेममे कुमारिएमे गर्भवती भऽ गेल छलैक। पुनः एकर हृदय प्रेमसँ रिक्त भेले छलैक जे एकटा फाँक बनौने छलैक आ ओहि फाँकके भरबाक लेल ओ पुनः सारिसँ प्रेम करैत अछि। अपन वासनाक पूर्ति करैत अछि। आ, पुनः सारि (छाया)क गर्भपात करबैत अछि। हमरा जनैत ई एकटा घटना भऽ सकैए, किन्तु प्रश्न उठैत अछि उक्त घटनाके कथा रूपमे प्रस्तुत कऽ की कहऽ चाहैत छथि कथाकार? उक्त कथा कथ्य कहबासँ पाछू हटैत अछि। एहन हिनक कैकटा कथा अछि। किन्तु बादमे ई कथाकार अपन कथ्यके कथामे विकसित कयलनि अछि।

प्रदीप बिहारीक कथाक विशेषता थिक रोचक घटनाक निर्माण आ पात्रा चरित्राक रूप उपस्थित करब जाहिमे ई महारत हासिल कयने छथि।

हिनक कथा अछि- ‘चानके तकैत’। एहि कथाक विशेषता अछि जे ई रोचक घटनाक संग, स्पष्ट चरित्रा निर्माण आ ओहि संग एहिमे स्पष्ट कथ्य अछि। उक्त कथा कहैत अछि जे मनुष्यके सपना (अपन सुन्दर संसारक कल्पना) देखक चाही। आ ई बात ओ बहुत कुशलतासँ एकटा आन्हर भिखमंगासँ बहुत सहज ढंगे कहबबैत छथि जे अपूर्व अछि।

एहिना कथा अछि- ‘पोखरिमे दहाइत काठ’। उक्त कथामे कविता (काजवाली) एक नोकरिहाराक भोरुका भानस करैत अछि। कथा कहैत अछि प्रत्येक व्यक्तिकें अपन मोनक बात कहबाक लेल एक व्यक्ति चाही आ से जाही ढंगे कथा कहैत अछि ओ कथाकारक संग मैथिली कथाकें विस्तार दैत अछि।

प्रारंभमे कहलहुँ जे प्रदीप बिहारी आगू अपन कथाके सांस्कृतिक चेतना संग जोड़ैत अपन कथाके आगू अनैत छथि आ अपन कथाके नव मोड़ दैत छथि। एहि रूपें हिनक कथा अछि- ‘बसात दिस बसातक विपरीत’। एहि कथामे सरला देवीक पुत्रा अमरीकामे पढ़ैत, ओतहि विवाह कऽ लैत अछि, हिनक पुत्रा गौरव बालपन जे कि हिनका संग अपन देशमे जुड़ल छलैक तें ओकरामे अपन सांस्कृतिक लेश छलैक किन्तु पुतौहु अमरीकेक जन्मजात छलि। बेटा-पुतौहु संग पोता अयलनि किन्तु सरला देवी पितामही रूपमे किछु नहि कऽ छटपटाइत रहलीह। ई छटपटयबाक कारण हुनक जीवन संस्कृतिसँ उपजल बोध छल। बेटा-पुतौहु मानैत छलनि किन्तु पुत्रा बुझितो आ पुतौहु अपन सहज संस्कारक कारणें हिनका संतुष्टि नहि दऽ सकलि। सरला देवीक छटपटाइत मोन अपन अतृप्ति भावकें झा जीक बेटा सभकें देखि भरऽ चाहैत छथि। जीवन कोना परिवारसँ समाज दिश जा रहलए तकर बात करैत कथा बहुत मार्मिक ढंगे समाप्त होइत अछि।

तहिना हिनक कथा अछि ‘लसेढ़’ (जखन तखन पत्रिका मइ 2019) जाहि कथामे कथाकार कहैत छथि जे कोना मोबाइल-इंटरनेट मनुक्खके असगर रहब सिखा रहल अछि।

एहि रूपें प्रदीप बिहारीक कथाक आगू चरण अपन विभिन्न विशिष्टतासँ कथाके विशिष्ट बनौलक अछि।

Ú

नवीन चैधरी

कोखि: कथ्य आ शिल्प

अंग्रेजी शब्द ॅवउंद कें एहि रूपमे देखी ॅवउ;इद्धउंद तँ बूझि पड़त जे नारी जातिक परिचय लेल कोखि ;ूवउइद्ध कें आधार मानल गेल। जतेक जीव-जन्तु अछि, सभ अपन-अपन मायक कोखिसँ बहरायल।

श्री प्रदीप बिहारी अपन पाँचम उपन्यासक केन्द्रमे स्थापित कयलनि कोखि। एके शब्दक अनेक सम्पृक्तार्थ (बवददवजंजपवद) होइत छै। एहि उपन्यासमे श्वेता लेल ‘कोखि’ केर महत्त्व आ पारुल लेल जे महत्त्व अछि, तकरे रेखांकित करैत अछि। पूर्ण तार्किक विन्याससँ दुनूकें बेराबेरी शिशु कल्याण आश्रम आनल जाइत अछि। दत्तक संतान लेल श्वेता आवेदन पंजीयन फार्म जमा कऽ देलक आ दोसरे दिन फिर्ता लेलक। दत्तक संतानक पालन करबामे कचोट रहतै जे अपन कोखिक नहि अछि। एहिसँ नीक जे बेसी सँ बेसी अनाथ बच्चा सभकें अपन संतान बुझि दुलार करत।

पंजीयन फार्म श्वेता फिर्ता लेनहि छल, तखनहिं जुमैत अछि पारुल, जे कहियो ‘कोखि’कें नकारात्मक धरातल पर राखि कए उपेक्षा कएने छल। आब बुझलक कोखिक महत्त्व। मोहन बाबू (भौमिक)कें कहैत अछि- ‘हमर कोखि एखनो अहींक प्रतीक्षा मे अछि।’ मोहन बाबू (भौमिक) कहैत छथि- ‘कोखि सम्माननीय शब्द होइत छैक, मैडम।’

‘मैडम’ शब्द मे सानल कटूक्ति पारुलक कोंढ़-करेज मे लागल हेतै। ओ समय पर कोखिक महत्त्व नहि बुझलक।

एहि उपन्यासमे तीन-चारिटा परिवार अछि। ओहि परिवार सभक सुख-दुख आ हर्ष विषाद एकटा कलात्मक सूत्रा मे बान्हल गेल अछि। आब की हेतै? से बुझबाक जिज्ञासा अंतिम वाक्य धरि सानल अछि। ई जिज्ञासा अनुत्तरित रहल जे पारुल आब की करत?

महानगर मे नोकरिहारा वृत्त एहि रूपमे देखल गेल- ‘…आॅफिसक महिला कर्मी मे किछु विवाहिता छथि। साँझ मे बऽर आ बच्चाक सुरता लागल रहैत छनि, से आवश्यको छैक। किछु गोटे दुनू प्राणी नोकरी करैत छथि। दुनू मे पहिने जे पहुँचय, दोसराक प्रतीक्षा करैत रहैत अछि। किछु गोटेक मित्रा प्रतीक्षारत रहैत छैक। एहन मे बेसी कुमारि रहैत अछि। (पृष्ठ 99)

कलाप्रेमी लोकक नियति

‘हम सभ ककरा लेल रंगकर्म करैत छी मित्रा? तों ककरा लेल लेख लिखैत छें? ककरा लेल नाटक लिखैत छें? तोहर मातृभाषामे ई आर नमहर प्रश्न छौक। तोहर लेखक अनुवाद भेलौक, किछु दोसर भाषामे लिखलें, तें चर्चित भेलें। मुदा किछु दिन छोड़ि दही तँ देखही जे के तकैत छौक तोरा? तोरे सन किछु इमानदार लोक होयतैक, जे कतहु लेख वा थीसिसमे चर्च कऽ देतौक (पृष्ठ – 189)

प्रवासीक व्यथा, वेदना, विवशता

आपति-बिपतिमे गान मोन पड़ैए। सभ दिन बाहरे-बाहर रहलहुँ। कहियो गामक बारेमे सोचलियै? घराड़ी भत्थन भऽ गेल। दूटा पजेबो जोड़ि देने रहितियै तँ आबऽ-जाय के सूत्रा बनल रहैत। बड़ कमयलनि फल्लाँ बाबू! नोकरी छोड़ि कऽ बिजनेस कयलनि। अनठीया ठाम मे कोठा ठाढ़ कयलनि आ गामकें अबडेरने रहलाह…आइ एकटा घर रहैत तँ अपना घर मे पयर दितहुँ ने। (पृष्ठ 74)

ई तीनू प्रसंग घटनामे गति देबा लेल आवश्यक नहि अछि, किन्तु उपन्यासक व्यापकता बढ़बैत अछि। ठाम-ठाम शब्द चयन आ वाक्य रचना मुग्ध करैत अछि। जेना-

अनुपम कनेकाल एकटक सासुकें तकैत रहल आ तकर बाद जबदाह मोने बहरायल। (पृष्ठ 83)

समधिन छोलनी धिपा कऽ दागि देलखिन…समधिनक शब्द सभ फनिगा बनि हुनक कानमे पैसि गेलनि अछि आ फरफरा रहल छनि। (पृष्ठ 88)

तामस एँड़ी सँ जुट्टी धरि पसरि गेलनि। (पृष्ठ 89)

आफिस सं अयलाक बाद थाकल सन लगैत रहैत छें। मोन पर किछु उघने सन। (पृष्ठ 90)

मोन नपना नहि होइत छैक, बटखरा नहि होइत छैक। मोन स्वाभाविक रूपें जे कहय, तकर संग रही। (पृष्ठ 103)

शुभा कें हलदिली पैसि गेलनि। (पृष्ठ 107)

हम अपना माथ पर कतेक दिन ढांठि कऽ राखी? (पृष्ष्ठ 124)

भोर सन फरहरि नहि लगैत छें। (पृष्ठ 129)

मम्मी-पापा कें अपन-अपन पेटक पानि नहि पचि रहल छनि। (पृष्ठ 130)

एहि सम्बन्ध कें उघि किएक रहल छें? (पृष्ठ 136)

पारुल कतऽ मंगा कऽ पाथि देलकैए ओकरा। (पृष्ठ 156)

ई तेसर पहर हमरा दुनूक नाम केबाला भऽ गेल। (पृष्ठ 163)

….सासु ओकरा तरुआ बूझि बरकल तेल मे राखि तरि रहल होथि। (पृष्ठ 182)

डेली खोंघी लेने जाल समेटि लेलें। (पृष्ठ 189)

लागय जे देह खुने खुनामय भऽ गेल। आ हम लुद्द दऽ बैसि जाइ। (पृष्ठ 191)

प्रायः तीन किलोमीटर धरि ओ भोरहरबा मे चलि गेल। (पृष्ठ 191)

झाड़-झंखार, दोग-दोसानि मे कतऽ सऽ भेटैत छौक? (पृष्ठ 193)

सभ एक दोसराक भले-जी-भले कयलक। (पृष्ठ 194)

ओहिना राखल अछि। बिनु उराहल। (पृष्ठ 195)

एहि सभ मे भाषाक अभिव्यक्ति क्षमता आ लेखक केर रुचि झलकैत छै। उपन्यास मे मनोरम तिलिया-फुलिया लागि जाइत छै। अबडेरल वाग्धारा सोझाँ आबि जाइत अछि।

Ú

रमेश

नव प्रौद्योगिकीक अथवा ‘फील गुड’क?

प्रदीप बिहारी बीसम शताब्दीक नवम दशकक ख्यातिलब्ध मैथिलीक लेखक छथि। ओ तीन पत्रिका आ दू पोथीक संपादक, छः पोथीक अनुवादक, एक पोथीक नाट्य-रुपांतरकार, एक पत्रा-साहित्य-संकलनकत्र्ता, पाँच उपन्यासक लेखक, दू लघुकथा- पोथीक लेखक आ अंततः पाँच कथासंग्रहक कथाकार छथि।

ओ मैथिली साहित्यक पैघ लेखक छथि। हुनकर जीवन, मैथिली साहित्य, मैथिली भाषा आ नाट्य-क्रियाकलाप लेल समर्पित अछि। ओ साहित्य अकादेमी पुरस्कार (2007) समेत, पाँच टा ‘सम्मान’ सँ विभूषित छथि।

मुदा, अपन सब तरहक साहित्यिक क्रियाकलाप आ समस्त लेखनक संग, ओ मूलतः कथाकार छथि, जाहि लेल ‘सरोकार’ नामक कथासंग्रह पर ओ साहित्य अकादेमी पुरस्कार सँ अलंकृत छथि।

प्रदीप बिहारी के ई साहित्यिक ‘लसेढ़’(संक्रमण) जे लगलनि, से पूरा जीवन नहि छुटलनि। ई ‘लसेढ़’ होइतहिं अछि सैह आ तेहने, जकर एक बेर सकारात्मक संक्रमण भऽ गेला पर, ओ लेखक समाजक निधि बनि जाइत छथि। आ जिनकर ‘लसेढ़’ नकली रहैत अछि, से जीवनक भौतिकवादिता मे हेरा आ डूबि जाइत छथि।

मुदा मैथिलीक तेहेन महत्वपूर्ण कथाकार प्रदीप बिहारीक जीवनायुक षष्ठिपूत्र्तिक अवसर पर आइ, हुनकर ताहि साहित्यिक ‘लसेढ़’क, आ ‘लसेढ़’ नामक कथा पर सेहो, विमर्श करबाक सौविध्य प्राप्त भेल अछि।

ई कथा जहिया नव संस्करणक दिवारात्रि कथागोष्ठी मे पढ़ल गेल छल, खूब नीक बहस आमंत्रित केने छल।

प्रदीप बिहारी मैथिलीक एहेन कथाकार-संवर्ग सँ अबैत छथि, जिनकर सामाजिक कछमछी, हुनकर कथालेखनक कथा प्लौट के, ज्वलंत विषय सबहक अद्यतन दिशा मे, निदेशित करैत रहल अछि। टटका विषय-वस्तु हुनकर उपन्यास आ कथा-लेखन मे, बरमहल हुलकी मारैत रहल अछि।

प्रदीप बिहारीक नाट्यशास्त्रीय ज्ञान, नाटकीयता, मंचधर्मिताक आ आन-आन नाट्य क्रियाकलापक ‘लसेढ़’, जहिना सफलतापूर्वक बेगूसराय-क्षेत्राक ‘तथाकथित दक्षिण मिथिला’मे नाट्य-संस्कृति के संस्थापित केलक अछि, तहिना भाषाक स्तर पर, ओइ क्षेत्राक मैथिलीकरण आ साहित्यक स्तर पर, ओइ क्षेत्राक साहित्यिकीकरण सेहो केलक अछि।

तहिना ‘अंतरंग’ पत्रिकाक माध्यमें, मैथिली के हिन्दी संसारक संग जोड़ब आ मैथिली साहित्य भाषाक क्रियाकलाप के हिन्दी-संसार मे पहुँचायब, मात्रा प्रदीप जी सँ संभव भऽ सकल अछि। ‘तथाकथित दक्षिण मिथिला’ के, पत्राक माध्यमें बहुत दिन धरि जन-आवाज देब सेहो, हिनकर लेखकक उपलब्धि रहल अछि।

हिनकर सामाजिक क्रियाकलापक सकारात्मक ‘लसेढ़’, कोनो टा साहित्यिक क्रियाकलापक सकारात्मक ‘लसेढ़’ सँ, एकदम्मे फराक नहि अछि। तकरे परिणाम थिक, जे बेगूसरायक साहित्यिक परिवेशक स्तरीय विकास मे, महाकवि दिनकर, आ कीत्र्ति नारायण मिश्र आ प्रदीप बिहारीक बदौलत, निशाकर, मनोज कुमार झा, रुपम झा आदि साहित्यकारक निर्माण आ विकास भेल अछि/भऽ रहल अछि।

एतावता ई प्रमाणित भऽ रहल अछि, जे ‘लसेढ़’ मात्रा नकारात्मके नहि होइत अछि, अपितु ओकरा सामाजिक, सांस्कृतिक आ साहित्यिक स्वरुप प्रदान केला पर, ओकर संक्रमण लोक-कल्याणकारीयो भऽ सकैत अछि। जेना खान सँ खनिज पदार्थक ‘शोषण’, औचित्यसम्पन्न आ जनकल्याणकारी होइत अछि, तहिना! साहित्यकारक यैह विशेषता ओकरा बुद्धिजीवीक आन संवर्गो धरि सँ फुटका दैत अछि, जे ओ मूल्यांकनपरक नकारात्मकता आ आलोचना के लिखितो, वस्तुतः सकारात्मकताक लक्ष्यपूत्र्तिए के स्थापित करैत रहैत अछि, जे अंततः समाजक हिते मे होइत अछि।

आ ताहि सकारात्मक ‘लसेढ़’/साहित्यिक संक्रमण के जँ निरंतरता आ गतिशीलता दऽ कऽ कोनो लेखक कोनो विशेष क्षेत्राक साहित्यकारिता के ओइ क्षेत्राक स्थायी-भाव बना दिअय, तँ प्रदीप बिहारी सन तेहेन लेखकक योगदान, बेगूसराय-क्षेत्राक प्रसंग मे स्वयंसिद्ध भऽ जाइत अछि।

मुदा एतऽ विवेच्य ई अछि जे, की ‘लसेढ़’ नामक अइ कथाक ‘लसेढ़’, मात्रा मोबाइलक/स्मार्ट फोनक भौतिकवादी लिलसाक क्षिप्र-संक्रमण वा ‘लसेढ़’ लगबाक ‘प्रक्रिया’ धरि सीमित अछि?

नहि, निश्चित ई नवल बाबूक भौतिकवादी सुखक लिलसा नहि थिक। ओ तऽ एकटा सामान्य जीवनक पक्षपाती पेंशनभोगी, ग्रामीण जीवनप्रेमी आ मोबाइल-विरोधी विधुर छलाह, जे वृद्धावस्थाजन्य शारीरिक स्वास्थ्य खसबाक कारणें, बेटा-पुतोहु द्वारा नागर जीवन मे बलजोरी लऽ जायल गेल छलाह।

ओ बेटा-पुतोहु-पोता, तीनूक मोबाइल-क्रयबला प्रस्ताव के काटियो देने छलाह। अपन रुटीनबला पार्कीय-जीवनशैली सँ ओ, महानगरो मे सहयोजन बैसा लेने छलाह।

ओ तँ संयोगवशात् विद्यालयी जीवनक मीत जीबछ सँ अनायासक भेंट भऽ जायब, महानगरो मे भाया मोबाइल फोन, हुनकर जीवन बदलि देलक। जीबछ हुनकर पूर्व-सहपाठिनीक प्रेम-स्मृति नवल बाबू मे जगा कऽ, फेसबुक आइडी बना कऽ, मोबाइल-दुनियां दिस प्रेरित कऽ दैत छथि।

बस्स, बेटा-पुतोहु-पोताक पर्यटन-कार्यक्रम बनिते, मोबाइल किनबाक बहन्ना नवल बाबू के भेटि जाइत छनि, जाहि सऽ ओ अपने कहियो मना केने रहथिन।

आ मोबाइलक क्रय होइते, नवल बाबू के मोबाइल फोनक ‘लसेढ़’ लागियो जाइत छनि।

ई भेल मोबाइल-क्रय केर ‘लसेढ़’ लगबाक ‘प्रक्रिया’! मुदा अइ ‘लसेढ़’ लगबाक बहन्ना, छात्रा-जीवनक सहपाठिनीक ‘मधुर आकर्षणक स्मृति’ बनैत अछि।

तखन ई ‘लसेढ़’ मोबाइल-संक्रमणक नकारात्मकता कोना भेल? आ ‘स्नेह-संक्रमणक सकारात्मकता’ कोना नहि भेल? दुनू बात कथाक अन्तर्गुंफन सँ एक संग अभरैत अछि।

कथा मे जीबछ जी आ नवल बाबू, दुनू दू वर्ग सँ अबैत मीता-पात्रा छथि। मुदा मैत्राीक स्नेह-रसायन एहेन बनल छनि दुनू गोटे मे, जे ओ हिनका एकाध बेर ‘नवला’ कहैत छथिन आ ई हुनका हरदम ‘जीबछा’ कहैत छथिन। दुनू गोटेक संवादक उतरा-चैरी, छात्रा- जीवनक मैत्राीक मधुर उठापटक, परीक्षा-रिजल्टक उठापटक, आदिक मोहक स्मृति सऽ कथा बोरल अछि।

मुदा जीबछ जी एकाध बेर नवला कहैत छथिन आ नवल जी बेर-बेर, हरदम हुनका ‘जीबछा’ कहैत छथिन, से किए? की ई मिथिला समाजक ‘जातिवादी संस्कारक विकृत यथार्थ’ थिक, कथाकारक चूक थिक अथवा सायास प्रयोग थिक?

मुदा की ई कथा मोबाइल-प्रौद्योगिकीक प्रसार सन सतही कथा-प्लौट पर लिखल थिक? तखन तऽ नव बात होइतो, कोनो तेहेन पैघ बात नहि भेल ई?

प्रौद्योगिकीक पक्ष आ विपक्ष मे तँ अनेक कथा, एक-सँ-एक कथा, मैथिली मे लिखायल अछि आ लिखल जाइत रहल अछि। आइ ‘मोबाइल मोबाइल’ खेलायब, कोनो तेहेन पैघ बात नहि, सतही बात थिक। ओ तँ विकृत युग-परंपरा जकाँ बनि गेल अछि। जेना कहियो श्वेत-श्याम टी.वी.छल, भीसीआर आ भीसीपी छल, सीडी आ डीभीडी छल, फ्लौपी छल, चोंगाबला बेसिक फोन छल!

अनेक प्रौद्योगिकी बिहाड़ि जकाँ आयल आ अपने रस्ते, कालक गाल मे समा गेल! तहिना बहुत कथा अबैत अछि आ कालक गाल मे समा जाइत अछि। अनेक पुरस्कृत कथासंग्रह धरि कालक भक्ष्य बनि जाइत अछि आ स्मृति बनिकऽ रहि जाइत अछि अथवा सेहो धरि बनल नहि रहि पबैत अछि।

वस्तुतः कोनो कथा युग-विजयी कथा तखने बनि पबैत अछि, जखन ओकर कथ्य जीवनक गहींर आ मेंही रहस्यक तानी पर, युगसत्यबला समकालीनताक भरनी सऽ, ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ जकाँ, बूनल रहैत अछि।

से कोनो कथाकारक ‘गहींर आ अद्यतन’ जीवन-दृष्टिक बिना संभवे नहि अछि। कोनो ज्वलंत विषय के कथालेखनक लेल चूनब तँ, कथालेखनक ‘ए बी सी डी’ थिक, चरम-कलाक ‘एक्स वाइ जेड’ नहि थिक।

सगर दुनियाँ जकाँ, मिथिलो के आ मैथिलो के, मोबाइल फोन-क्रयक ‘लसेढ़’ लागब, आमबात थिक। तकर ‘प्रक्रिया’, अइ कथा मे वर्णित प्रक्रिया सेहो भऽ सकैत अछि आ तकरा सँ भिन्न प्रक्रिया सेहो, भऽ सकैत अछि।

ईहो बहुत पैघ बात नहि थिक। कथाकार-कथाकारक कथा-ट्रीटमेंट-कला मे अन्तर हैब, सामान्य स्वाभाविकता आ अपन-अपन सक्षमता, दुनू भऽ सकैत अछि आ से होइतो अछि।

तखन पैघ बात की थिक, एहेन नव प्रौद्योगिकी-आधारित कथा मे?

पैघ बात थिक, नव प्रौद्योगिकी सँ अन्तर्सम्बन्धित आ प्रभावित जीवनक सही दिशा मे चित्राणक सघनता! जीवनक सुविधापूर्ण संचालन मे, नव प्रौद्योगिकीक सकारात्मक स्वीकार्यता!

से ‘लसेढ़’ नामक अइ कथा मे भेल अछि। मोबाइल प्रौद्योगिकीक नवल बाबू द्वारा स्वीकार्यता, हुनकर एकाकी जीवनक निश्चिते एकटा अनमना बनैत अछि। मुदा से बनैत अछि, पोताक चेतावनीक संग, जे ‘आप भी इसी मे नहीं डूब जाइएगा!’

एकदम्मे नव पौधबला पीढ़ी, जे अपने मोबाइलक निसां सँ चिन्ताजनक रुपें पीड़ित भऽ गेल अछि, स्मार्ट-फोनक पक्ष मे अनेक तर्क दैतो, अपन बाबा के चेतौनी दैत अछि, जकरा कोनो आधुनिक कथाक ‘अविश्वसनीय यथार्थ’ मानलो जा सकैत अछि, आ नहिंयों मानल जा सकैत अछि।

कथा के अनेक उप-कथा आ संस्मरण सँ धनीक बनाओल गेल अछि। कथा मे औसत प्रवासी मैथिल परिवार मे लगैत ‘हिन्दीक द्वैभाषिक ‘लसेढ़’क विकृति’ सेहो, सार्थक रुपें हुलकी मारलक अछि। नवागन्तुक बाल-पीढ़ी मे आयल अइ विसंगतिक दोषी ओ बाल-पीढ़ी नहिं, बच्चाक माता-पिता अछि, जे बच्चा के मातृभाषाक अधिकार सऽ, अपने बच्चा के वंचित कऽ रहल अछि।

सेहो ‘लसेढ़’, मोबाइल फोनक ‘लसेढ़’क संग-संग, समानान्तर रुपें चलैत अछि अथवा कथाक संस्थापना मे भाँज पुरैत अछि।

मुदा एतऽ अइ दुनू ‘लसेढ़’क स्वरुप नकारात्मक रहबाक कारणें, आलोच्य अछि, जखनकि, नवल बाबूक पूर्व-सहपाठिनीक संग स्नेह-सौजन्यक संस्थापनाक ‘टूल’ बनबाक कारणें, एकहि कथा मे, सैह मोबाइल फोन, सकारात्मक ‘लसेढ़’क स्वरुप ग्रहण कऽ, वरीय नागरिकक एकाकी जीवन मे ‘फील गुड’ कराबैत अछि।

तँ की ई दू स्वरुपक परस्पर-विरोधी ‘लसेढ़’क, एकहि कथा मे सह-अस्तित्व हैब, विरोधाभास उत्पन्न करब थिक, अथवा विरोधाभासी परिस्थितिक संश्लिष्ट बुनावटिक कथोपयोग थिक, जखनकि मैथिली नहिं सिखा पेबाक पौत्राक उलहन आ मोबाइल फोनक दुरुपयोग सँ बांचबाक पोताक चेतौनी, दुनू एकहि संग कथा मे अबैत अछि…?

ई कथा संक्रमण/‘लसेढ़’क, विविध आयामक उद्घाटने नहिं, तकर अनेक स्वरुपक यथोचित विश्लेषणो, अनेक दिशा मे करैत अछि।

कथा, समाजक आँखि सेहो फोलैत अछि आ ‘भविष्यक चेतौनी-संकेत’ सेहो दैत अछि। सैह कथाक सार्थकतो होइत अछि।

सैह अहू कथाक सार्थकता थिक! जेना उदय प्रकाशक ‘पालगोमराक स्कूटर’ कहियो आँखि फोलने छल।

मुदा अइ कथा मे विज्ञानक विध्वंसात्मक चरित्रा(जेना, ‘दिनकर बाबू के भ्रम भेल छलनि?’मे) आ विज्ञानक सकारात्मक उपयोगबला स्वरुप, दुनूक एक संग, कथा-उपस्थापन होयब, अइ कथाक विशेषता थिक।

आ विशेषताक तँ, नकारात्मक आ सकारात्मक दुनू दिशा आ दुनू स्वरुप, सब दिन सँ होइत रहल अछि। ‘लसेढ़’ तेहने एकटा संक्रमण-‘विशेषता’ आ ‘कथा’, दुनू एक संग थिक!

Ú

तारानन्द वियोगी

लोक-आस्थाक समांग: प्रदीप बिहारी

प्रदीप बिहारी जीवनक बहुरंगी संभावनाक गहींर पारखी कलाकार छथि। अपन लेखनक आरंभिके काल सँ कथासाहित्य कें ओ अपन सृजनक दिशा बनेलनि। कथासाहित्यक जतेक जे कोनो विधा छैक– कथा, उपन्यास, लघुकथा, कथेतर गद्य– सब विधा मे प्रदीप लेखन केलनि अछि आ ओहि-ओहि विधा मे सफलता हासिल कयलनि अछि। ई सब विधा शुरुहे सँ हुनक अभिरुचिक केन्द्र मे रहल। दोसर दिस, हुनकर अवलोकनक क्षेत्रा सेहो बेस व्यापक रहल अछि। निःस्व भिखमंगा सँ लऽ कऽ सर्वसाधनसंपन्न उच्चवर्गीय लोकक जीवन-प्रसंग धरि समान रूप सँ हुनकर साहित्यक विषय बनल अछि। हुनकर लेखनक प्रधान जीवनमूल्य रहलनि करुणा, जे एक दिस तँ हुनकर अवलोकन मे गहराइ अनलक तँ दोसर दिस जीवनक विडंबना सब सेहो अपूर्व व्यंजनाक संग हुनकर कथासाहित्य मे उतरल अछि। जीवनक एक-एक खण्ड हुनक कथा मे आबि कऽ तेना पुनर्सृजित होइत चलैत छैक, जे बहुधा यैह लगैत अछि जे प्रदीप अपने कथा नहि लिखैत छथि, अपितु हुनकर कथा स्वयं अपना कें लिखैत अछि।

प्रदीप सहज कथा-रचनाक आग्रही छथि। हुनका कतहु छुच्छ प्रयोग लेल प्रयोग करैत नहि देखबनि। ओ कोनो प्रसंग कें अपन पात्रा सभक संग सीधा साफ ढंग सँ उठबैत छथि आ आगू बढ़ल चलि जाइत छथि। जीवनक अपन जटिलता छैक सेहो हुनकर कथा मे पूरे विस्तारपूर्वक अबैत अछि। मुदा एकरा प्रदीपक कला-कौशल कहल जाय जे समस्त जटिलता हुनकर रचना मे आबि कऽ सुसंवेद्य सरलता मे ग्रथित भेटैत अछि। एकर शक्ति हुनका भेटैत छनि अपन कहन-शैली सँ जे नितान्त यथार्थवादी गद्यक एक सहज वितान बनबैत अछि। अपन ई शैली ओ निश्चिते अपन एकाग्र कथा-साधना सँ प्राप्त केलनि अछि। ओ मैथिलीक आधुनिक कथा-परंपरा मे ललितक धाराक विकास केलनि अछि। हुनक कथा सभ अत्यधिक सोझ आ तें आत्यन्तिक रूपें संवेद्य होइत छनि। सहृदयता आ सहजता- जे प्रदीपक व्यक्तित्वक पोर-पोर मे विद्यमान छैक, एही तरहें हुनक कथो सभ मे अनुस्यूत देखाइत छैक।

प्रदीप लोक-आस्थाक समांग छथि। लोक अपन सम्पूर्ण गतिमयता आ विविधताक संग हुनक कथा सभ मे चाह मे दूध जकाँ तेना मिझराओल छैक, जे हुनक कथा सभ सँ गुजरैत कत्तहु अहाँ कें निस्संगता आ एकान्त होयबाक बोध नहि होयत। हुनकर कथा-संसार बहुत व्यापक अछि। एक साधारण मजूर सँ लऽ कऽ सत्ता-संचालनक शक्तिशाली समूह धरि, गरीब महादलित सँ लऽ कऽ कुलाभिमानी धनीक धरि, बिनु कोनो भेदभाव के सब धर्म, सब जाति, सब लिंग के मनुक्ख कें हुनकर साहित्य मे समान रूप सँ नागरिकता प्राप्त छैक। मुदा, हुनकर हमेशा इष्ट रहलनि अछि– जे काज आ आचरण मनुष्यताक लेल उपकारक अछि तकर समर्थन, आ जे मनुष्यता-द्रोही अछि तकर विरोध। अपन कथा-साहित्य मे ओ अपन पात्राक भीतर बहुत गंहीर धरि उतरैत छथि आ बहुत दूर धरि ओकर पीछा करै छथि। फल होइत अछि जे जकरा समाज मे भव्य-भाव्य मानल जाइछ से अधिकतर छोटहा साबित होइत अछि। आ तहिना, जाहि लोक कें आम तौर पर छोट मानल जाइछ तकरा भीतर जे मनुष्यताक चेतना रहैत छैक से बहुत पैघ होइत अछि। उच्चवर्गक चित्राण करैत प्रदीप कें अहाँ अधिकतर गंहीर व्यंग्य-भाव सँ भरल देखबनि जखन कि हुनकर कथा अपन अपेक्षित गतिये मे निर्णायक विन्दु दिस गमन करैत देखायत। सोचल जाय तँ एते सरल शिल्प मे एहन जटिल सामाजिक सत्यक उद्घाटन करबा मे प्रदीप बिहारी मैथिलीक एक विरल कथाकार छथि।

प्रदीप बिहारी हौसलाक लेखक छथि, आ तें ओ भविष्यक लेखक सेहो छथि। लाख दुख आ संघर्षक अछैत लक्ष्यविन्दुक संधान मे बढ़ैत जायब- प्रदीपक केन्द्रीय स्वर थिकनि। हुनकर पात्रा सब कें अधिकतर अहाँ जुझारू बनल देखबनि। मामूली धंधा करय बला श्रमिक सँ लऽ कऽ स्वावलंबी स्त्राी धरि समान रूप सँ हुनकर कथाक पहुँच छनि। दोसर जे हुनकर कथा-साहित्य एखन धरि कहियो कालबाधित नहि भेल अछि। जेना-जेना समय, देश आ समाज बदलल, प्रदीपक कथा-साहित्य मे एहि समस्त बदलाव के दृश्य आ गूंज कें ओकर सम्पूर्ण असार-पसारक संग सगरे पसरल देखब। ने हारब स्वयं हुनका पसंद छनि ने हुनकर कोनो पात्रा कें। जीवन जेहन अछि ताहि सँ ओकरा बेहतर हेबाक चाही, प्रदीपक केन्द्रीय लेखन-आयोजना एही बातक संकल्प थिक।

Ú

देवशंकर नवीन

विसंगतिक बीचमे सहज सन्धान

बीसम शताब्दीक आठम दशकमे लेखन प्रारम्भ कए जे युवा लोकनि अपन हस्तक्षेप मैथिली कथामे केलनि, ताहिमे प्रदीप बिहारीक महत्त्वपूर्ण स्थान छनि। लगभग डेढ़ सय कथा, एक सय लघुकथा, दर्जन भरि एकांकी, छ गोट उपन्यास, पाँच गोट कथा संग्रह, सात गोट अनूदित पोथीक संग मैथिली साहित्यक वर्तमान लेल प्रदीप बिहारी एकटा अनुपम रचनाकार छथि, जे भविष्णु रचनाकार लेल एक प्रेरणा-पुंज सेहो छथि। हिनकर कतोक रास रचनाक अनुवाद अन्य भारतीय भाषा सभमे पर्याप्त सम्मानक संग पढ़ल जा रहल अछि।

देश, काल, वातावरण कथोपकथनक सचेष्ट समावेश हुनकर अपन रचनाक विशेष आकर्षक बात होइत रहल अछि। हुनकर अइ वैशिष्ट्यक संकेत चरित्रा-चित्राणमे सेहो देखाइत रहैत अछि। सामाजिक, भौगोलिक आ भौतिक परिवेशक वैविध्य, रीति-रिवाज, वेश-भूषा, आचार-विचार आदिकें ओ अत्यन्त कलात्मकतासँ रेखांकित करैत रहलाह अछि। मध्य आ निम्न मध्य वर्गीय जनजीवनक जीवन-संघर्ष आ विसंगतिसँ सम्बद्ध संवेदना हुनका ओतए भावककें मोहि कऽ रखने रहैत अछि। अही कारणें भावक लोकनि हुनकर रचनामे डूबि जाइ छथि, नायकक जीवन-संघर्षक सहयात्राी बनि जाइ छथि। प्रारम्भिक जीवनक नेपाल-प्रवासक सुच्चा अनुभव हुनकर कथा-भूमिमे भकरार भेल रहैत अछि।

निर्णय करब कठिन अछि जे पेशासँ बैंककर्मी, रुचिसँ रंगकर्मी, कर्मसँ कथाकर्मी आ स्वभावसँ आयोजनधर्मी प्रदीप बिहारीक बहुआयामी क्रियाशीलतामे हुनकर समय आ ऊर्जाक छियानति भेल, कि सृजनात्मक उपयोग। अइसँ हुनकर रचनाशीलता आहत भेल कि उन्नत। मुदा एतबा तय अछि जे ई सब प्रकारक गतिशीलता हुनकर जीवन-दृष्टिकें निरन्तर पुष्ट आ ऊर्जस्वित करैत रहलनि अछि। अइ समस्त व्यस्तता आ अस्तव्यस्ततामे हुनकर कथा-लेखन समृद्ध होइत रहल अछि। निस्सन्देह प्रदीप बिहारी तुमुल कोलाहल आ जटिल व्यवधानक पहाड़कें चीड़ैत आगू बढ़ैत रहलाह अछि।

असलमे प्रदीप बिहारीक पीढ़ी अपन ऊर्जस्वित रचनात्मकताक संग एकटा दारुण आ दमघोंटू वातावरणमे ठाढ़ भेल छल, जकरा सोझाँ मुट्ठी भरि सुविधा आ क्षितिज भर दायित्व मुँह बौने ठाढ़ छल। दहोदिशक आगि समकालीन जनसमुदायक अस्तित्वकें अहरा पर चढ़ौने छल। प्रदीप बिहारी अही विकल समाजक सहभोक्ता छथि, आ इएह परिवेश हिनकर कथा-संसारक जन्मभूमि थिक। हुनकर कथा सबमे एकर ममत्वपूर्ण चित्राण अपन समस्त छविक संग भेटैत अछि। घटनाबहुल समाज-व्यवस्थाक अनेक नवीनतम परिस्थिति कालान्तरमे हुनकर कथावस्तुकें छोट आ विषयक संग लेखकीय बेवहारकें चुनौतीपूर्ण बनबैत गेल। प्रदीप अइ चुनौतीकें दायित्वपूर्वक निमाहलनि। मकड़ी आ उग्रास कथामे कथाकारक अइ तनावकें देखल जा सकैत अछि। मकड़ीक नायिका सुनीता आ बौका एहने घटनाक भोक्ता अछि। सुनीताकें अपन जीवनी आ जैविक परिस्थितिक अवबोध छलनि अथवा नइँ, अनुमान कठिन अछि।

अवगाहन कालमे पाठककें बहुस्तरीय कथा-यात्रा कराएब प्रदीप बिहारीक कथा-कौशलक खास वैशिष्ट्य होइ छनि। सुनीताकें जखन प्रधान पंच बजौलखिन, तखन पाठक अनेक आशंकासँ भरि गेल। व्यतीत जीवनमे आएल पुरुख समाजक आचरणक भुक्तभोगी सुनीता सेहो बेशुमार आशंकासँ ग्रस्त रहथि, मुदा परिणाम किछु आओरे निकलल। कोनो कथामे वस्तुतः कथाकार द्वारा लिखल कथाक हरेक घटनाक समानान्तर कथा, पाठकक मोनमे चलैत रहैत अछि, ओकर विकासमान अँखुआ विकसित होइत रहैत अछि। मानोवैज्ञानिक स्तर पर अहिना कथा-चरित्राक मोनमे सेहो नब-नब कथाक सृजन होइत रहैत अछि, जेना सुनीताक मोनमे प्रधान पंचसँ गप करबा काल होइत रहल हएत। कथाकारक जीवन-दृष्टि अइ कथामे अहू रूपें देखल जा सकैत अछि जे पहिल बेर सुनीता हेमबहादुर सन सम्पूर्ण मर्दसँ विवाह कऽ अपन जीवन सुखी करबाक चेष्टा केलनि, मुदा ओ धोखेबाज निकलल। ओइ कुकर्मी पुरुखकें सुधारबाक ओकर चेष्टा बेकार गेलै। दीपक सुब्बा सन व्यसनी आ  2कामान्ध पुरुषक पहचान सेहो भेलै…मुदा तें कथाकार कोनहुँ परिस्थितिमे अपन नायिका सुनीताकें टूटए नइँ देलनि। पुरना जमीन आ पुरना व्यवसायसँ मुक्त करा कए ओकरा नब जमीन आ नब व्यवसाय दिश उन्मुख केलनि। एकटा नब समाज संग ओकर नब सम्बन्ध जोड़ि कए ओकरा जीवन-रस देलनि। एतए अलगसँ कहबाक प्रयोजन अछि जे अइ पीढ़ीक समस्त कथाकारक इएह मूल वृत्ति अछि। टूटब आ कि हारब ओ नइँ जनै छथि। समस्त सृजित पात्राक संग अखण्ड संघर्ष आ पुरजोर साहससँ लड़ै छथि, डटल रहै छथि। अइ क्रममे इहो बात रोचक अछि जे नब जीवनमे सुनीता, जै दिलकुमारीक मकानमे किराया पर रहब शुरुह केलनि, ओहो अपन जीवन असगरे बिता रहल छल, आ समाजक आन-आन स्त्राी ओकरा दुन्नूकें चरित्राहीन घोषित करबा पर बित्र्त छल। अइ चित्रांकनमे कथाकार समाजक सोझाँ चरित्राक एकटा नव व्याख्या देलनि अछि, जे  वस्तुतः चरित्राहीन के अछि, चरित्रा की थिक? जीवन आ जोखिम दुन्नूक प्रति मनुष्यक जाहि अजेय शक्तिक छवि कथाकार अइ कथामे अंकित केलनि अछि, से अइ सम्पूर्ण पीढ़ीक कथाकारक संघर्षशील चेतनाक परिचायक थिक।

दोसर दिश उग्रास कथाक लक्ष्य मैथिल जनपदक पाखण्ड, छद्म, भीरुता, अपसंस्कृतिक जीवन्त नमूना थिक। रोचक अछि जे जतए बुजुर्ग-पीढ़ी दकियानूसी आ बाल-पीढ़ीकें अज्ञानी कहल जाइत अछि, कथाकार प्रदीप अइ दुन्नूमे प्रगतिशीलता आ नैतिकताक उज्ज्वल जीवन-दर्शन देखि रहल छथि। जै युवा पीढ़ीकें अत्यन्त प्रगतिशील घोषित कएल जाइत अछि, तकर दू टा वर्ग एक दिश  धर्मभीरुतामे लिप्त अछि, दोसर दिश धर्मक ओटमे अनाचारमे डूबल जा रहल अछि। एतए कथाकारक व्यंग्य वक्रोक्तिक कलात्मक भंगिमा सेहो देखल जा सकैत अछि, आ समकालीन युवा लेल धिक्कार देखल जा सकैत अछि।…जे समाज अपना गामक कनियाँ-मनियाँक आँचरविहीन वक्ष देखबा लेल छठि-घाट पर लुब्ध अछि, ओही समाजक एक टा बच्चा, रामभूषण बाबूक पोता, अइ चिन्तामे फटाकाक कवर नइँ हटबैत अछि जे ओइ पर छपल स्त्राीक फोटो नांगट भऽ जेतै। धर्म, पूजा-पाठ, कबुला-पाती…आदि प्रसंग पर भनहि कोनो आयोजनपूर्वक वक्तव्य नइँ हो, मुदा पूरे प्रसंगमे समाजक धार्मिक पाखण्ड, निरर्थक और नाटकीय आस्था एवं आस्तिकताक फजहति अइ कथामे अत्यन्त चतुराइसँ भेल अछि। बलिहारी ओइ समाजकें, जे एहेन आचरणक संग स्वयंकें धार्मिक आ आस्तिक मानैत अछि!

वस्तुतः प्रदीप बिहारीक कथाधाराक मूल-वृत्ति घटनाक्रमक सहजता आ समय-सम्बद्धता अछि। अपन पूरे रचनाक्रममे ओ कोनो आकाश कुसुम तोड़ि अनबाक जिद नइँ करै छथि। हुनकर घटनाक्रम सहज जीवन पद्धतिक अनुसारहि चलैत अछि। हुनकर कथा-समाजक भूगोल अपन पीढ़ीक अन्य कथाकारक तुलनामे कनेक विस्तीर्ण छनि। मिथिलासँ नेपाल धरिक जीवन-पद्धतिक टटका अनुभव हुनकर कथाक मूल विषय बनल। मोटबाह, गमलामे धान, एक टा आओर सान्ताक्लाॅज, मकड़ी, शरणागत आदि कथा भावककें सहजहि बान्हि रखैत अछि। बिम्बकें जीवन्त करैत कथाकार भावककें एक दिश चमत्कृत करैत अछि, तँ दोसर दिश ओइ जीवन्तताक बलें अन्तस्तलकें आन्दोलित करै छथि। एक टा विचित्रा उद्वेगसँ पाठक विचलित भऽ उठै छथि। शरणागतक प्रोफेसर अपन बेटाक लहास लऽ कए माइ नदी दिश चलै छथि, अथवा एक टा आओर सान्ताक्लाॅजक ड्राइवर चाहक दोकान पर बैसि कए कनैत अछि, अथवा गमलामे धानक कथाभूमिमे नेपाली लोकगीतक मूल्यबोध सांस्कृतिक धरोहर जकाँ नइँ देखि कए बाजार-मूल्य जकाँ देखल जाइत अछि। आ ओकर उपयोग बाजारीकरण लेल कएल जाइत अछि। मोटबाहक कथानायक रामबहादुर अपन माटि-पानिक मोहमे अपन गाम दिश रुखि करैत अछि…ई सबो टा प्रसंग अपन परिणति एवं प्रभावमे कथाकारक परम्परा-पूजनक स्थिति नइँ देखबैत अछि, बल्कि परम्पराक सम्बन्धमे दुर्गन्धित नकार-भावकें नकारैत, सुव्यवस्थित समाजक परिकल्पनाक संकेत दैत अछि। पुरुष प्रधान आधुनिक समाजमे आधुनिकता भनहि परवान चढ़ि गेल हो, मुदा आइ सन्तानवती नइँ भेला पर स्त्राीए दोषी बूझल जाइ छथि, जखन कि स्त्राी अपन पतिक पुंसत्वहीनताकें पर्दा देबाक दंश भोगैत रहै छथि। पूर्णियाँवाली सन कथामे स्त्राी-जीवनक अइ त्रासदीकें देखल जा सकैत अछि।

कथा कोनहुँ भावधाराक हो, प्रदीपक ओतए स्त्राी अपन मुखर स्वरूप संग उपस्थित होइ छथि। रोचक अछि जे ई स्त्राी समुदाय अपन जीवनक त्रासदी लेल कतहु कानैत-खीजैत नजरि नइँ अबै छथि। हुनका जीवनमे लाख त्रासदी आबि जाए, ओ आजुक समयक सुशिक्षित युवती होथि, अल्पशिक्षित गृहिणी, प्रौढ़ उमेरक अभिभाविका, विधवा, नौरी, नेपाल-भारत सीमा पर तस्करी करैत निम्नवर्गीय स्त्राी…केओ होथि, प्रदीप बिहारीक सब वर्गक नायिका जीवन-संग्राममे अपन तीक्ष्ण ऊर्जा संग लड़ैत नजरि अबै छथि, अपन विवेक आ जीवन-दृष्टिसँ निर्धारित लक्ष्य धरि पहुँचिए कऽ दम लै छथि। प्रेम न हाट बिकाय, लुत्ती, नौरी आदि कथाकें अइ नजरिएँ देखल जा सकैत अछि। जाति, शक्ति रूपेण संस्थिता आदि कथामे दृढ़ आत्मविश्वासक स्त्राीक प्रगतिशील डेगक सबसँ पैघ बाधक परिवार आ परिवेशक स्त्राीकें निके ना राखल गेल अछि।

समकालीन जनजीवनक कोनहुँ टा अंश प्रदीप बिहारीक कथामे अछूत नइँ मानल गेल अछि। जन्मोत्सवसँ लऽ कए मरणोत्सव धरि, छठिहारसँ दाह-संस्कार धरि, प्रेमसँ विलगाव धरि, दाम्पत्यसँ परकीय सम्बन्ध धरि, राजनीतिसँ तस्करी धरि, अभिनयसँ गायन-लेखन धरि…सब विषय हुनकर कथाक कोरमे आबिकए जीवन्त भेल अछि आ समस्त घटना नब जीवन आ नब व्याख्या संग प्रस्तुत भेल अछि। ú

नारायणजी

विसंगतिसँ लड़ैत मानवीय साहसक रचनाकार

रचनाकार प्रदीप बिहारीक रचना हमरा सभ दिनसँ प्रिय रहल अछि। हुनकर रचना सभकें हम अत्यन्त मनोयोगपूर्वक पढ़ैत छी, आ उत्सवित होइत रहैत छी। से, हुनकर अनुवाद कार्य होअय, पत्रिकाक सम्पादकीय, उपन्यास अथवा हुनकर लिखित कथा सभ, तकर पृष्ठभूमिमे हुनकर रचना सभक भाषा थिक, से एतेक पारदर्शी रहैत अछि, जे ओ अपन अनुभवसँ अर्जित सत्यकें उद्घाटित करय चाहैत छथि, से एनकेएन हृदयमे उतरि जाइत अछि। से कहबाक ढंग सेहो हुनकर एतेक अप्रतिम आ विशिष्ट छनि, से नहि मात्रा अपन गुणक बल पर अपन समकालीनसँ पृथक करैत छनि, अपितु रचनाक निहित भाव-बोधक समुचित अभिव्यक्ति लेल दिशाक संधान सेहो करैत अछि। आ से थिक, अपन लेखन लेल हुनकर उत्खनित दृश्य-श्रव्य शैलीक प्रयोग। अपन रचनामे एहि प्रयोग द्वारा बुझाइत रहैत अछि जे आँखिक आगू सभ घटना चलचित्रा सदृश उपस्थित भए गेल अछि। आ से आकर्षणमे बान्हि आगू पढ़बाक लेल उत्सुकता निरंतर प्रवाह बनौने रहैत अछि। लेखन लेल तकर पाछू हुनकर विषयक चुनाव सेहो थिक। विशेष रूपें कथा पर गप करी। हुनकर कथाक ओ विषय रहैत अछि जे परिवर्तनशील परिवारक आजुक जीवन-चर्या थिक। जे परिवार कहियो गाममे रहैत छल, आ आब किछु विवशताक कारणें अथवा तीव्र गतिसँ बदलैत समयमे समयक संग पयर मिला कऽ चलबाक लेल शहरमे आबि बैसि गेल अछि, मुदा ओहि व्यक्ति अथवा परिवारक नाभि-नाल एखनहुँ गाममे गाड़ल अछि, तकर जीवन व्यथा आ साहसकें अत्यन्त सजीवतासँ अपन कथा सभमे कथाकार प्रकट करैत छथि। से एहन विषय रहैत अछि, जाहिमे पाठककें बहुसंख्यक जनसमुदायक घटित घटना जीवन-गति भेटैत छनि आ ओ सभ तन्मय भए पढ़ैत छथि। जे कथाकार प्रदीप जीक कथाकें पठनीय बनबैत छनि।

हेबनिमे हम हुनकर एकटा कथा पढ़ल अछि, ‘दिव्यांग’। कथा परिवारिक समस्याक संकुचित परिधिसँ सर्वथा फुट रेलवे प्लेटफाॅर्म पर भेटल, ओहि एकटा दिव्यांगक कथा थिक, जे दिव्यांग लोकनिकें नागरिकताक आधार पर प्राप्त सुविधाक मांग लेल प्रदर्शनमे भाग लेबाक लेल संकल्पित अछि, एहि साहस आ विश्वास संग (जाहिमे जयी होयबाक भावना अछि) जे दिव्यांग लोकनिक मांग जँ सत्ता नहि सुनत तँ ओ लोकनि (दिव्यांग लोकनि) ‘ताण्डव’ धरि पर उतरि अओताह। कदाचित, ओहि दिव्यांगक कहबाक आशय अछि, जे ओ लोकनि हिंसा धरि पर उतरि अओताह। कथा  अंगसँ हीन व्यक्तििक पराक्रमी भावनाकें सहजतासँ भखैत कथाकारक रचनाक कौशलकें परम विश्वसनीयतासँ उजागर करैत अछि।

प्रिय कथाकार प्रदीप बिहारीक हमरा सभ कथा प्रिय अछि, एतऽ हम हुनकर एकटा मूल्यधर्मा कथा ‘मकड़ी’ चर्चा करैत छी।

‘मकड़ी’ एकटा सम्पूर्ण स्त्राीक जीवनक दारुण कथा थिक, ओहि स्त्राीक जकर माय नेनहिमे मरि गेल रहैत छैक। सुनीता नामक ओ बचियाक तरुणपन बीति नहि पाओल छल, आ कि पिताकें भार बुझाय लगैत छल, संगहि गाँजा-शराब पीबामे बेटीक उपस्थिति बुझाइत छनि बाधा। तें पिता अपन स्वच्छंद जीवन जीबाक लेल, बेटीसँ मुक्त भऽ जीवनमे अपना ढंगक आनन्द उठयबाक लेल बेटीकें बियाहि दैत छथि। मुदा, ककरो-ककरो संग होइत अछि, आ कखनो काल होइत अछि, जेना सुनीता विधवा भऽ जाइत अछि। मुदा, जे सुुनीता गायक सेवामे निमग्न रहैत भावावेशमे आबि कोनो पुरुषक जालमे नहि फँसबाक लेल संकल्पित हेमबहादुर सन शराबी पुरुषक जालमे फँसि जाइत अछि, आ एकटा स्त्राीक सम्पूर्ण आत्मोत्सर्ग देखबैत पुनः विधवा भऽ जाइत अछि।

जे कि कथाकार प्रदीप बिहारी गामसँ रोजगार लेल विस्थापित मनुष्य, जे शहरमे आबि अपन श्रम आ लगनशीलतासँ स्थान बनौनिहार व्यक्तिक कथाकार छथि, एहि कथामे सेहो सुनीता गामसँ शहर आबि अनेक गलंजरकें निर्भीकतासँ सहैत, कुचर्यामे जीबैत स्त्राीक ओहिठाम डेरा राखि, बाजारमे मशीनसँ सिलाइक काज कए अपन जीवन-यापन करैत अछि, से एहन चरित वास्तवमे कोनो विसंगति-बोधसँ दूर प्रगतिशीलताक आदर्श उपस्थित करैत अछि।

मुदा, जेना कि हम पूर्वमे कहने छी जे निस्सन कथाकार प्रदीप बिहारीक ई कथा आधुनिक परिवेशमे एकटा सम्पूर्ण स्त्राीक कथा थिक, अहाँकें भेटत, जे सुनीता जे जीवन-यापन लेल बाजारमे गामसँ आबि सिलाइ करैत छैक, ओकर हृदयमे कतेक दया अछि, आ हृदय कतेक विशाल छैक, तकरा बुझल जा सकैत अछि जे नगरपालिकाक मेहतरक बेटीकें बियाहमे बिनु मजदूरीक ओ ओकरा बेटीक लेल कपड़ा सीबाक लेल तैयार भए जाइत अछि, एहि लेल स्नेहक भूखलि सुनीताकेें केओ ‘बहिन’ जे कहलकैक।

सुनीता सम्पूर्ण स्त्राी रहय, ओकरामे माया, मोह, स्नेह, भूख, पियासक पूर्ण संवेदना रहैक, ओकरामे प्रचुर मात्सर्य रहैक, तें नगरपालिकाक प्रधान पंच द्वारा प्रदत्त बौक आ मतिशून्य बालककें अपन नीरस एकान्त दूर करबाक लेल ओकरा पालन-पोषण करए लागलि। मुदा, दया-मायासँ मुक्त एकटा समर्थि स्त्राी लग मन संग देह सेहो तऽ होइत अछि, आ पुत्रा जकाँ पोषण करैत ओहि बौकाक संग बहकबामे अपनाकें रोकि नहि सकलि, आ गर्भवती भए गेलि। बौका पुरुष भए गेल रहैत अछि, आ कतहु अलोपित भए जाइत अछि। यद्यपि, स्त्राीक देह धारण कयने सुनीता ओकर बाट तकैत अछि, बौका नहि फिरैत अछि। आ, तिल-तिल मरैत उदास सुनीता फेर सिलाइक काज करए लगैत अछि।

सम्पूर्ण कथामे ‘मकड़ी’ शब्द नहि आयल अछि, मुदा, एहि कथाक शीर्षक मकड़ी थिक। से, ई शिल्प थिक रचनाक जे रचनाक भावभूमिक आधार पर एहन शीर्षकसँ तादात्य स्थापित कए रचनाक कथ्यकें उद्घाटित करब। आ से व्यापक फलकक ई बिम्बधर्मी कथा ‘मकड़ी’ स्त्राीक मकड़ी सन ओहि नैसर्गिक भावनाकें प्रकट करैत अछि जे मकड़ी जाल बुनैत अछि, अपन रूप-गंध अथवा ममतासँ दोसर पुरुषकें फँसबैत अछि, आ अपनहि बुनल जालमे मरैत अछि। से, ई कथा स्त्राीक जीवनक दारुण यथार्थकें एकटा सुन्दर रोचक कथानक द्वारा दर्शबैत अछि।

Ú

लक्ष्मण झा ‘सागर’

प्रदीप बिहारी: हमरा नजरि मे

प्रदीप बिहारी सँ हमर परिचय 42 साल सँ अछि, से मिथिला मिहिर के माध्यम सँ। नेना भुटकाक चैपाड़ि’ मे हमर हास्य व्यंग छोट-छोट रचना छपैत छल। प्रदीप जी कथा लिखैत रहथि से छोट-छोट मुदा, गंभीर। हमर रचना अपने हमरा झुझुआन लगैत रहय। मुदा, प्रदीप जीक कथा हमरा बड़ पसिन्न पड़ैत रहय। से छोट-छोट कथा लिखैत-लिखैत प्रदीप जीक कथा संग्रह प्रकाशित होइत रहल आ कथा संग्रह ‘सरोकार’ लेल हिनका साहित्य अकादेमीक मूल पुरस्कार प्राप्त भेलनि। से पुरस्कार मैथिली साहित्य जगत मे धमाका  मचा देलक। कारण प्रदीप जी दोसर एहेन मैथिलीक साहित्यकार भेलाह जिनका एतेक कम वयस मे साहित्य अकादेमीक मूल पुरस्कार भेटलनि। हिनका सँ कम बयस मे मार्कण्डेय प्रवासी कें भेटल छलनि। ई एकटा एहेन पुरस्कार छल जाहि पर कोनो चू चपर नहि भेल मैथिली साहित्य जगत मे। कारण ईहो रहै जे एहि सँ पहिने अपन ‘औतीह कमला जयतीह कमला’ आ ‘मकड़ी’ प्रकाशित कय ओ अपन कथाकार वाला छवि रूप मे मैथिली साहित्य मे अपना के स्थापित कय लेने छलाह।

हमरा मोन मे, आत्मा मे, प्रदीप जीक स्थान एहि लेल खूब ऐल फैल सँ जगह बना लेलक जे ओ अपन रचना लेल अपन मातृभाषा मैथिली के चुनलनि। चाहितथि तँ नेपाली आ हिन्दीक पैघ रचनाकार बनि सकैत छलाह। कियैक तँ नेपाली सँ मैथिली आ नेपाली सँ हिन्दी मे कय टा पोथी के अनुवाद प्रकाशित छनि। मुदा, मैथिलीक प्रति समर्पित भाव आ मोह माया प्रदीप बिहारी के मैथिलीक बेस चर्चित आ लोकप्रिय कथाकार, उपन्यासकार, नाटककार (मण्पिद्म जीक उपन्यास ‘फुटपाथ’क नाट्य रूपांतर), अनुवादक, सम्पादक, रंगकर्मी बनाय देलकनि जे अपना आप मे बड़ पैघ सफलता आ जीवनक अनुपम उपलब्धि छनि।

साहित्य अकादेमीक मूल पुरस्कार सँ पहिने हिनका बिहार सरकार सँ सर्वोत्तम अभिनेता पुरस्कार(1993), माहेश्वरी सिंह महेश ग्रंथ पुरस्कार (2001) आ आरो कय टा महत्वपूर्ण पुरस्कार आ सम्मान भेट चुकल रहनि। खास बात ई जे कोनो पुरस्कार आ सम्मान लेल हिनका पर ई आरोप कहियो नै लागल जे ओ पैरबी पैगाम सँ लऽ लेलनि अछि। महत्वपूर्ण बात ईहो जे प्रदीप बिहारी जी के यदि अहाँ देखबनि कि वा हुनका सँ अहाँ कोनो विषय पर गप करब तँ ओ अपन वानी आ व्यवहार सँ ई नहि पता लागय देताह जे ओ एकटा बड़ पैघ मैथिली साहित्यक हस्ती छथि। साधारण बगय बानि। सरल सहज मुस्कुराइत भेटताह। अग्रजक प्रति आदर आ सम्मान भाव आ अनुजक प्रति स्नेह आ आवेश देखबनि। एक पाइक घमंड नहि देखबनि। ने कोनो विवाद मे पड़ैत छथि आ ने कोनो तेहेन बात बजैत सुनबनि जाहि सँ विवाद उत्पन्न हो। कोनो आन बिषय पर बात करैत हुनका नहि देखबनि सिवाय साहित्य, पत्रा-पत्रिका, नाटक, भाषा, संस्कृति के। मुदा, हुनक कथा-वस्तु वा उपन्यास के प्लाॅट मे अहाँ के मिथिला किंवा देशक ताजा घटना के जिक्र भेटत। सामाजिक आ पारिवारिक छोट सँ छोट बात आ समस्या, गरीब गुरबाक जिनगीक नान्हियो टा बात के तेना ने मेंही सँ कहि देताह जकर अहाँ कल्पनो ने करैत हैब। प्रदीप जी कोनो अपन रचना सरदर नै लिखैत छथि। लिखबा सँ पहिने कथा आ उपन्यासक सम्पूर्ण खाका मोन मे खीचि लैत छथि। फेर अपने कय बेर समीक्षा करैत छथि। जहन मोन गबाही दय दैत छनि तखने लिखैत छथि। ओ पहिने पेन सँ कागज पर लिखैत छलाह आ आब लैपटाॅप आ मोबाइल पर लिखैत छथि।

प्रदीप बिहारी जी जीवकांत जीक शिष्य रहल छथि। से शिष्य एहेन जे हुनका एहि युगक एकलव्य कहबा मे कोनो अतिशयोक्ति नहि होयत। जीवकांतो जी हिनका बड़ मानैत छलथिन। अपन आरम्भिक जीवन मे प्रदीप जी नेपाल मे रहैत छलाह। हम तहिया असाम मे रही। जीवकांत जी पत्रा लिखैत छलाह जे प्रदीप बिहारीक कथा मे हम, हमर नै रहैत अछि। प्रदीप कय टा अपन उपन्यासक प्लाॅट के कथा मे समेटि लैत अछि। कागज मे कंजूसी करैत अछि। जीवकांत जी लिखथि जे प्रदीप नेपाल मे रहैत अछि। अहाँ असाम मे रहैत छी। कहलियै प्रदीप के जे ओ नेपालक जन जीवन पर कथा लिखय। ओ से लिखैत अछि। अहाँ के कहने रही जे असामक जन जीवन पर लिखू। अहाँ कान बात नै देलहुँ। प्रदीप जीक उपन्यास विसूवियस यदि पढ़बैक तँ लागत जे तहिया जीवन कतेक कठिन छल। हाले मे हिनकर ‘कोखि’ उपन्यास बहुत चर्चित भेल अछि। हिनक विशेषता छनि जे ई रिपीट नहि करैत छथि। एखने हिनकर एकटा लघुकथा संग्रह ‘हे रौ’ पाठक लोकनिक प्रशंसा लूटि रहल अछि। हिनक एकटा आर लघुकथा ‘खण्ड खण्ड जिनगी’ के अतिरिक्त कथा संग्रह ‘पोखरि मे दहाइत काठ’, ‘सपन एक देखल’ आ उपन्यास ‘गुमकी आ बिहाड़ि’, ‘विसूवियस’ए ‘जड़ि’, ‘शेष’ आ ‘कोखि’ हम पढ़ने छी। हिनक किछु कथा बेगूसराय अंचल के बोली मे लिखल अछि जे अहाँ के मुग्ध आ चकित कय देत। हम बंगाल मे रहैत जे नहि कयल से प्रदीप जी खगरिया, भागलपुर, पटना आ बेगूसराय मे रहैत केलनि। ओ सिंगुर आ नंदीग्राम पर लिखलनि तँ सिलीगुड़ी आ कोलकाता पर सेहो लिखलनि। हम जीवकांत जीक पड़ोसी रहैत जे नहि कयल से प्रदीप जी हुनकर छात्रा रहैत कयलनि। ओ जीवकांत जीक ‘गाछ झुल झुल’ छपेलनि। हुनक पाँचो उपन्यास के एक जिल्द मे ‘जेना कोनो गाम होइत अछि’ छपेलनि। हुनक सभटा आयल पत्रा के ‘स्वस्ति श्री प्रदीप बिहारी’ नामक पोथी रूप मे प्रकाशित करेलनि। एकलव्य कोना ने कहबनि?

प्रदीप बिहारी अपन प्रकाशन चतुरंग नाम सँ रखने छथि। अंतरंग नामक पत्रिकाक सम्पादन करैत छथि, जाहि मे भारतीय भाषाक अनुवाद साहित्य रहैत अछि। एहि सँ हिनक सम्पर्क देशक विभिन्न भाषाक साहित्यकार संग बढ़ैत गेलनि। फायदा ई भेलनि जे हिनको मैथिली पोथीक अनुवाद देशक विभिन्न भाषाक साहित्यकार लोकनि अपन-अपन भाषा मे करैत रहैत छथिन। तें प्रदीप बिहारी जी कें भारतीय साहित्यकार मे लेखा होइत छनि। बेगूसराय सँ ‘मिथिला सौरभ’, ‘दक्षिण मिथिला’ आ नेपाल सँ ‘हिलकोर’ नामक पत्रिकाक सम्पादन करैत मैथिली टेलीफिल्म के पटकथा लिखलनि आ हिन्दी टेलीफिल्म मे अभिनय सेहो केने छथि हमरा लोकनिक प्रदीप बिहारी।

सब सँ सुखद आश्चर्य ई अछि हिनक जिनगीक जे अबोध नेना प्रदीप के वाल्यकाल बहुत कष्ट आ संघर्ष सँ भरल रहल। पिताक असमय देहांत भऽ जायब। विधवा माय द्वारा अभाव मे लालन-पालन हैब। एहेन स्थिति मे बालक प्रदीप खजौली हाइ स्कूल सँ मेट्रिक पास केलनि। पैतृक गाम कन्हौली मल्लिक टोल छनि। चलि एलाह बेगूसराय। नेने सँ मैथिली मे छपैत छलाह। अग्रज साहित्यकार सब नाम सँ परिचित रहनि। नाट्यशास्त्रा सँ एम ए केलाह। अपन पसन्द सँ नेपाली युवती मेनका सँ बियाह कय लेलनि। मेनका नामे गुण जेहने सुन्दर तेहने सुशिक्षित आ सुशील। घर सम्हारि लेलखिन। उलाव, बेगूसराय मे अपन स्थायी घर ‘मेनकायन’ बनौलनि। अपन छोट भाय के लिखाय पढ़ाय के इंडियन आयल मे नोकरी लगौलनि। दू टा बालक छथिन। दुनू बैंक मे वरीय अधिकारी छथिन। मेनका जीक बहुत सहयोग छनि प्रदीप जीकें प्रदीप बिहारी बनाबय मे। मेनका मल्लिक अपने मैथिली साहित्यक एक यशस्वी आ स्थापित कवियित्राी, कथाकार छथि। माने प्रदीप मेनकाक सफल जोड़ी मैथिली साहित्य के बहुत किछु देलक अछि आ दऽ रहल अछि।

प्रदीप जीक जीवनक एकटा सबल पक्ष ईहो छनि जे ओ बहुतो गोटे के साहित्यकार बनौलनि। स्व श्याम दरिहरे सँ मैथिली साहित्य कें परिचय करौलनि। बेगूसराय अंचल मे हुनकर अनुकरण करैत श्यामानन्द निशाकर, प्रेमचन्द्र मिश्र,श्री मती रूपम झा आ श्री मनोज कुमार झा लोकनि साहित्य मे नीक काज कय रहल छथि। सिमरिया मे दिनकर साहित्य के संरक्षण हो वा कीर्ति नारायण मिश्रक शोकहरा मे अपेक्षित सम्मान हो प्रदीप जीक सक्रियता प्रशंसनीय रहल अछि। प्रदीप जी सेमिनार मे आलेख पाठ सेहो करैत छथि।  प्रदीप जी कविता नहि लिखैत छथि आ से हुनका बुतें पार सेहो नहि लगैत छनि। मुदा, ताहि सँ हुनकर साहित्यिक ऊँचाइ कम नहि होइत छनि। ओ अपन पहिल उपन्यास ‘गुमकी आ बिहाड़ि’ उनैस बरखक बयस मे लिखलनि आ सेहो मात्रा तेरह दिन मे। तहिना चालीस दिन मे आॅफिस सँ बिनु छुट्टी लेने ‘कोखि’ सन दू सय चारि पृष्ठक उपन्यास पूरा कयलनि। कोरोना पर केन्द्रित उपन्यास ‘मृत्युलीला’ सेहो एके मास मे लिखलनि। एहेन जुनूनी लेखक छथि प्रदीप बिहारी।

बैंक सन जबाबदेही वाला नोकरी करैत प्रदीप जी मैथिली साहित्य के उम्मीद आ अपना प्रयाास सँ बहुत बेसी अनुपम आ विशिष्ट साहित्यक विपुल योगदान देलनि। कारण अछि हुनक टाइम मैनेजमेंट। एक्को मिनट समय बर्वाद नहि करैत छथि। एकहक क्षणक सही उपयोग करैत छथि। बदली भऽ कऽ पटना एलाह। एतुक्का साहित्यकार समाज सँ सम्पर्क कय उपमान साहित्यिक गोष्ठी मे अपन सक्रिय योगदान दऽ रहल छथि। उपमान नाम सँ मैथिलिक विशुद्ध साहित्यिक त्रौमासिक पत्रिकाक प्रकाशन लेल सहयोग कय रहल छथि।

हमरा लोकनिक सम्पर्क के माध्यम फोन आ पत्राचार रहल अछि। भेंट घाँट सेहो कय बेर भेल अछि। ई जहन स्टेट बैंकक बरौनी रिफाइनरी कैम्पस शाखा मे पदस्थापित छलाह तँ हम अपन कंपनी के काज सँ बरौनी रिफाइनरी जाइत-अबैत रही। बेगूसरायक ममता होटल मे रुकल करी। फोन करियनि त साँझ के भेंट करय आबि जाथि। दुनू गोटे रेस्टोरेन्ट मे चाय नाश्ता करी। घंटो गप सरक्का करी। गपक बिषय मैथिली साहित्य, मैथिलीक समकालीन साहित्यकार आ विद्यापति रहैत छलाह। एक दिन गपक क्रम मे कहलनि जे हम एहि ठामक लोक के कहैत रहैत छियनि जे बेगूसराय मिथिला मे अछि आ एहिठामक भाषा मैथिली अछि। उदाहरण दैत छथि जे विद्यापतिक नचारी छनि तोंहे शिव धरओ नट वेश, हमें डमरू बजाएब हे…। बेगूसरायक लोक तोंहे बजैत छथि। आदि, आदि…। अहिना हास्य विनोद चलैत रहैत छल। एक दिन होटल के मालिक हिनका देखि के लग आयल। बेयरा सब के कहि के गेल जे नीक सँ खातिरदारी करै ले। हमरा अचंभित देखि कहलनि जे हमरे बैंक सँ लोन लेने अछि होटल लेल। हम चाहितियैक तँ डेली आबि के मुफ्त मे एतय खाय पी सकैत रही। मुदा, तहन ई खातिरदारी नै होइत। से ठीके जहन प्रदीप जी घर चलि गेलाह तँ होटल मालिक हमरा कहलनि जे सर बहुत नेक इंसान छथि। ड्राइ ओनेष्ट। हमरा से सुनि के नीक लागल छल।

एक बेर हम दुनू परानी अपन छोटकी बेटी के ओकर दोस्तनीक घर पर रखबाक लेल उलाव गेल रही। रिफाइनरी मे मास दिनक ट्रेनिंग रहै। बेटीक बहिनाक बाप कोनो यादव जी रहथि। हुनका प्रदीप जीक बारे मे पुछलियनि। ओ तुरत प्रदीप जीक घर देखाय देलनि। सटले दक्षिण। मोन चपचपाय गेल। लगले फोन केलियनि। कहलनि प्रदीप जी जे एखने पटना सँ अयलहुँ अछि। दिनका भोजन अही ठाम बनि रहल अछि। आ लगले आबि गेलाह बजबय ले। हुनका घर जहन गेलहुँ हम सब, तहन कहलनि जे हुनक अपन कोनो दियादी भाय के दिल्ली मे रोड एक्सीडेंट भऽ गेलनि आ ओ मरि गेलनि। एहेन सन स्थिति मे दोसर कियो किए पुछितय? मुदा, ताहि शोक आ गम के बिसरि मेनका जी आ प्रदीप जी जे हमरा सभक जे स्वागत-सत्कार केने रहथि से लोक के अपन सहोदरो नहि करै छै।

एक बेर सहरसा आ पटना मे सेहो हमरा दूनुक भेंट मुलाकात भेल अछि। मुदा, से कनिये कालक लेल। हम जहन 1980-81 बला प्रदीप बिहारी सँ अपना के आइ मिलान करै छी तँ पबैत छी जे संगे संगे गाय चरेलहुँ कृष्णा भेल भगवान! हम अपन ताहि भगवान सदृश्य अनुज के हुनक साठि बरख पुरि जेबाक पावन अवसर पर बहुत-बहुत स्वागत करैत छियनि! हार्दिक बधाइ दैत छियनि!! आत्मिक शुभकामना करैत छियनि!!!

Ú

कमल मोहन चुन्नू

साहित्यिक विविधताक संतुलित समीकरण

नाटकक दर्शक दीर्घा सँ उठि कऽ मंच धरि अयबा मे बेसी दिन नहि लागल छल। दुइए-तीन वर्ष मे हम दर्शक सँ प्रस्तोता भऽ गेल रही। मंच पर हमर प्रवेश अभिनय सँ अवश्य भेल मुदा एकरहि समानान्तर हम एकर नेपथ्य-कर्म दिस सेहो अपन सक्रियता बढ़ा लेने छलहुँ। एकर पाछाँ उद्देश्य ई छल नाट्यकर्म कें ओकर सम्पूर्णता मे गहब। तहियाक नाट्यकर्म मे जे किछु वरेण्य नाम सभ अभरथि तिनक व्यक्तित्व आ ख्याति-व्याप्ति सँ मुग्ध भेल करी। हिनकालोकनि मे एकटा विशिष्ट पक्ष ई अभरय जे ओ लाकनि मात्रा रंगमंचे धरि सीमित नहि छलाह अपितु नाट्य जगत सँ बाहरोक साहित्यिक प्रभाग मे हिनका लोकनिक हस्तक्षेप छल। नाटक सँ बाहरोक साहित्य के ई लोकनि पढ़ल करथि। तें हिनका लोकनिक व्यक्तित्व मे एकटा संतुलित रचनाकार परिलक्षित होइत रहैत छल। हिनका लोकनिक ई संतुलित व्यक्तित्व हमरा लेल सदति स्पृहणीय होइत छल। एतहि ई भावना दृढ़ भेल जे मैथिली रंगमंच मे दृढ़ताक संग दीर्घकाल धरि टिकल रहबाक लेल अपन सािहत्य कें पढ़ब अत्यन्त आवश्यक अछि। तदुपरांत हम अपन साहित्य अध्ययनक सीमा-विस्तार कयल। विविध भाषाक नाट्य-साहित्यक संगहि अपना भाषाक साहित्य, विशेष कऽ कथा, कविता, आलोचनादिक अध्ययन प्रारम्भ कयल। ताहि क्रम मे मारितेक रास कथाकार, कवि, नाटककार, समीक्षक लोकनिक नाम आ काज सभ अभरैत गेल। ताही क्रम मे जे किछु कथाकार विशेष रूप सँ ध्यान घिचैत छलाह ताहि ते श्री प्रदीप बिहारी जी सेहो छलाह। हिनका सँ सदेह देखा-सुनी तँ बहुत बाद मे भेल मुदा हिनक साहित्य सँ पहिले सँ परिचित रही। हिनक कथा पढ़ि हिनका सँ एकटा अदृश्य आपकता बुझाइत छल। ताही क्रम मे ई बुझय जोग भेल जे ई बेगूसराय मे रहैत छथि ओ ओतहि रहि अपन आजीविका सँ समय निकालि एकहि संग ओतहुक साहित्य आ रंगमंच दुनूक गतिविधि मे समान रूप सँ सक्रिय रहैत छथि। एकहि संग रंगमंच आ साहित्य मे ठठब तहियो आजी-गुजी बात नहि छलैक, आइयो नहि छैक।

हिनकर ‘सरोकार’ कथा-संग्रह हमर पाठक मन पर निश्चये एकटा छाप छोड़ने छल। ओहि कथा सभ मे लागय जे एकदम टटका आ सुच्चा कथा वर्णित भेल अछि। एहि संग्रह सँ हिनक कथाकार रूप साकार आ सुदृढ़ भेल छल। हिनक कथा मे व्यंग्य सँ बेसी चिन्ता देखल करी। से चिन्ता अपन सर-समाजक बढ़ैत अदिनता पर बेसी देखल करी। व्यंग्य करब आसान होइत छैक। ओहि क्रम मे घटना सँ, परिस्थिति सँ किछु बेसीए संलिप्तता अपेक्षित रहैत छैक। ई संलिप्ति-क्रिया स्वयमेव एकटा विशेष प्रकारक प्रतिबद्धताक मांग करैत छैक। एकटा जिम्मेदार कथाकार-रचनाकार लेल ई प्रतिबद्धता बेस महत्वपूर्ण होइत छैक। से जिम्मेदारी आ कि से प्रतिबद्धता हमरा हिनको कथा दिस बेसी घिचैत छल। एतय हमर सोचबाक अभिप्राय ई कदापि नहि अछि जे व्यंग्यकार लोकनि मे जिम्मेदारी आकि प्रतिबद्धताक अभाव होइत छनि। हमर अभिप्राय ई छल जे जँ व्यंग्य-लेखन करैत काल एहि तत्व सभक खगता कमो-सम हो तँ कथा लिखैत काल ई तत्व सभ बेस निर्णायक भूमिकाक संग कथाकार मे सम्मिलित रहैत अछि। दोसर बात इहो रहैत अछि जे कोनहु दुःस्थिति पर चिन्ता करैत काल अथवा ओहि स्थितिक परिवर्तन लेल समर्थ उद्यम करैत काल कने बेसीए गंभीर होबय पड़ैत छैक। ‘सरोकार’ कथा-संग्रहक कथा सभ हमरा एहिए स्तर सँ प्रभावित कयने छल।

हिनक लगले-लागल ‘शेष’ आ ‘जड़ि’ उपन्यास सेहो आयल। मिथिलाक समाज मे सामाजिक स्खलन आ सांस्कृतिक विद्रूपण-विलोपन पर हिनक चिन्ता ओहि उपन्यास सभ कें महत्वपूर्ण बनौने छल। ताधरि हिनका संग हमर व्यक्तिगतो हेम-छेम बढ़ि गेल छल। दू-चारि ठाम, साहित्यिक कार्यक्रम मे हिनका संग भेंटो-घाँट भऽ चुकल छल। ताहि भेंट-घाँट सँ ई धारणा स्पष्ट भऽ गेल छल जे प्रदीप बिहारी नामक ई रचनाकार एकटा मितभाषी, मृदुभाषी, अमानी आ दोसरोक मान-सम्मानक चाँकि रखनाहर एकटा कलाविज्ञ-कलामर्मज्ञ व्यक्ति छथि। इहो स्पष्ट भऽ चुकल छल जे ई जाति-वर्ण-क्षेत्रादि दुर्भावना सँ ऊपर उठल रचनाकार छथि। हिनका लेल सदति एकटा समग्र मिथिला भावना प्रधान रहैत छल। जिला-परगन्ना मे बँटल मिथिलाक लेल आकि एहि प्रकारक खंडित मिथिलावादीक लेल हिनका लग कोनहु जग्गह नहि छलनि। हिनक कथा सभ मे सेहो ई प्रमाण सभ अभरैत छल जे ई सदति एकटा विराट मिथिला आ अखण्ड मिथिलाक पक्षधर छथि। मिथिलाक भौगोलिक सीमा हिनक मिथिला के भावनात्मक सीमा तहियो नहि बनि सकल छल। ई यथार्थ हिनक विराटकाय विचार आ व्यक्तित्वक यथार्थ छल।

अपन चाँकि आ चिन्ता कें एकटा सार्थक कथावस्तु बनाकऽ अपन रचना मे परसबाक ढंग अद्भुत लागय। तें हिनक विचारक धरातल पर नितान्त हिनक कथावस्तु कथा-उपन्यास मे आबि कऽ सगर समाजक कथा बनि जाइत छल। हिनक चिन्ता मे अतीतजीविता आकि यथास्थितिवादिताक तत्व कहियो प्रभावित करैत नहि अभरय, कहियो बाट छैकैत नहि अभरय। ‘सरोकार’क प्रभाव उतरलो नहि छल कि ‘शेष’ आ ‘जड़ि’ अपन प्रभाव देखाबय लागल। लागय लागल जे ई आब उपन्यासे लिखताह। कारण उद्यमक स्तर सँ ई दुनू उपन्यास बेस सुदृढ़ रचना लागि रहल छल। निर्णय करब आसान नहि छल जे ई कथाकार नीक आकि उपन्यासकार नीक। आब स्थिति ई छल जे हिनक उपन्यास पढ़ैत काल कथा सँ मोहभंग नहि भऽ पाबय आ कथा सुनैत काल उपन्यास सँ छुटकारा नहि भेटय। तथापि हमरा लागय जे आब ई उपन्यासे लिखताह तँ बेसी छजतनि। मुदा जखन ‘पोखरि मे दहाइत काठ’ (कथा-संग्रह) आयल तँ अपन धारणा कें परिमार्जित कयल जे ‘सरोकार’क कथाकार भनहि उपन्यासे लिखि रहल छथि, मुदा ओ कथा-लेखन दायित्व आ चमत्कार सँ अभ्यास-विरत नहि भेल छथि। हिनक कथा सभ मे पुनः दुर्लभ क्षेत्रा आ नितान्त अप्रचलित-अपरिचित पात्रा, सर्वहारा-गृहहारा पात्रा सभक वेदना-संवेदना अत्यंत मार्मिक रूपें चित्रित-अंकित भेल।

कोरोना विभीषिका मे लगले-लागल पुनः दूटा उपन्यास ‘कोखि’ आ ‘मृत्युलीला’ आयल। ‘कोखि’ उपन्यास अपन मानवतावादी दृष्टिकोणक संग एकटा यथार्थक भूमि पर नारी-विमर्शक आह्वान करैत छल। एहि मे एकटा विशेष प्रकार सूक्ष्मताक संग आ एकटा दूरदर्शी विवेकक संग स्त्राीक स्त्राीत्व कें आ ओकर मातृत्व कें नव तरहें विमर्शक धरातल पर आनल गेल। कहबा मे हर्ज नहि जे उपन्यासकारक ‘काखि’क विमर्श-स्वर एक प्रकारें तलवारक धार पर चलब छल। मुदा उपन्यासकार ताहू पर चलय सँ परहेज नहि कयल। ‘सेरोगेसी’ पर जाहि दृढ़ताक संग वैचारिक विमर्श कें आमंत्रित कयल से हिनक सबल आत्मविश्वासक प्रतिफलन थिक। यद्यपि प्रचलित युगक आधुनिक चालि-चलन के आधार बना कऽ हिनक स्थापना सँ असहमतो भेल जा सकैत छल। मुदा हिनक ‘कोखि’-विचार कें सहजे ने तँ अनठाओल जा सकैत छल आ ने निरस्त कयल जा सकैत छल। ‘मृत्युलीला’ तँ कोरोना संकटक एकटा औपन्यासिक दस्तावेज सन आयल। एहि उपन्यास मे मानवक तुच्छता, परिस्थितिक उग्रता, भयानक-भयग्रस्त परिवेश, पैशचिकता भरल मृत्यु-क्षुधा, असहाय बनल सम्बन्ध-बन्ध, पर्वताकार मृत्यु-भय आदिक तँ सटीक चित्राण भेले छल, मुदा सम्पूर्ण उपन्यास मे जे मानवक सीमित प्रभाव सँ उपकल चैबगली भय तेना ने सृजित भेल छल जे लगैत छल जे भय स्वयमेव एकटा अदृश्य पात्रा हो। मुदा तकर संगहि, जे मानवक जिजीविषा आ मानवीय संघर्षक गरिमा प्रस्तुत भेल से सर्वथा प्रशंसनीय छल। तकर संगहि पुनः एकटा संग्रह ‘हे रौ’ (लघुकथा-संग्रह) आयल। इहो संग्रह अपन अपेक्षित तीक्ष्णताक संग आयल। एकर लघुकथा सभ मात्रा काया मे लघुकथा छल, प्रभाव मे ई बेस मजगुत बनैत छल। विशेषतः जखन ई लघुकथा सभ अपन क्षिप्रताक संग पाठकक मोन मे अपन अर्थ-अभिप्राय खोलैत छल तँ लगैत छल जे एहि लघुकथा सभक एक-एक शब्द सभ कते आवश्यक आ कतेक महत्वपूर्ण अछि। ई लघुकथा सभ अपन विषयक स्तर पर जतेक व्यापक छल, प्रभावक स्तर पर ताहू सँ बेसी ठोस देखाइत रहैत छल।

एतावता हमर ई धारणा पुष्ट भऽ गेल छल जे श्री प्रदीप बिहारी जी कथाक छोट-पैघ तीनू ‘फाॅर्म’ (कथा, उपन्यास, लघुकथा) मे सिद्धहस्त छथि। हिनक ई तीनू ‘फाॅर्म’ आ तीनू स्तरक रचना अपन विधागत आकि विषयगत-शिल्पगत स्तर पर ककरो-केओ अतिक्रमण नहि कऽ रहल छल। ई रचनाकार जतेक साकांक्ष विषयक चयन मे लागथि ताहि सँ कतोक गुणा बेसी ओकरा लेल शिल्पक चयन मे लागथि। एहि क्रम मे हिनक संयम आ धैर्य प्रशंसनीय लागय। जेना-तेना आ जे-से लिखि देबाक चर्या कें कहियो प्रश्रय दैत नहि लगलाह। हिनक यैह साहित्यिक आ विधागत सुविचार हमरा प्रभावित करैत छल। हिनक सभ कृति मे ई योजना-तत्व एकटा गंभीर दृष्टिक संग कार्यरत भेटैत छल। ई रचनाकार ने तँ लघुकथाक योजना बना कऽ कथा लिखैत छलाह आ ने कथाक योजना बना कऽ उपन्यासे लिखैत छलाह। ई लघुकथा लेल लघुकथा लिखैत छलाह, कथाक लेल कथा लिखैत छलाह आ उपन्यासक लेल उपन्यास। तें हिनक लघुकथा, कथा आकि उपन्यास अपन-अपन आकार, प्रकार आ विचार कें सदति सुरक्षित रखने लगैत छल। अपन रचनाक कथ्य आ तदनुरूप काया लेल एहेन सचेत-सजग रचनाकार मैथिली-साहित्यक लेल गर्वक विषय छल। एहने सन किछु सजग-सचेत रचनाकार लोकनि सँ आधुनिक मैथिली साहित्य सुदृढ होइत रहल छल।

हिनक कथा सभक मारिते रास पात्रा सभ सँ हमरा वैयक्तिक अपनैती लागय। हमरा सदरि काल एहेन अनुभव होअय जे एहि पात्रा के हम कतहु देखने छी, एहि पात्रा सँ कतहु हमरो भेंट-घाँट भेल अछि। ई पात्रा कहियो हमरो टकरायल अछि। अपन समाजक प्रति एकटा सजग रचनाकारक ई एकटा महत्वपूर्ण प्रमाण लागय। लागय जे ई कथाकार अपन विषय आकि पात्रा चयनक लेल कतेक जाग्रत छथि, कते उद्यमी छथि। हिनक कोनहु रचना मे ई नहि लागय जे रचनाकार कखनो औंघा गेल छथि।  कथा-उपन्यास बुनबाक क्रम मे जे ‘माइन्यूट डिटेल्स’ अबैत छल से एकटा जाग्रत लेखकक प्रबल पक्ष छल। कोनहु कथा मे, कोनहु बात कें ई ‘मोटामोटी स्तर पर’ कहबा सँ सायास परहेज कयने रहथि। जे बात कहथि से अपन पूरा ‘होमवर्क’क संग कहथि। ओ बात हिनक कथाक केन्द्रीय कथ्य होइत छल। ‘एकटा आओर सान्ताक्लाॅज’ कथा मे हिनका अन्तर्राष्ट्रीय आतंकबाद पर गप करबाक छलनि मुदा पात्रा छल एकटा बस ड्राइवर। ई बस ड्राइवर वस्तुतः एकटा वास्तविक पात्रा छल जे पटना-जटही चलैत ओम ट्रेवेल्स बसक ड्राइवर छल। ई ड्राइवर पोखरौनी मे ओहि बस मे चढ़ैत छल आ जटही धरि लऽ जाइत छल आ वापस सेहो होइत छल। ओहि ड्राइवर कें हमहूँ कएक बेर देखने रही, कएक बेर ओकरा ड्राइवरी मे गाम आयल रही। ओकरा सभ सरदारजी कहैक। ओ सरदारजी बच्चा सभक प्रिय ड्राइवर छल। पोखरौनी सँ लऽ कऽ जटही धरि, सभ गामक बच्चा ओकरा सँ एतेक स्नेह करैक जे ओकरा अभिवादन करय लेल दुबगली ठाढ़ रहैत छल। ‘एकटा आओर सान्ताक्लाॅज’ मे यैह सरदारजी ड्राइवर मुख्य पात्रा देखल जे एकटा प्रिय बच्चाक माय छैक, जकर घरवला जे कमाय लेल परदेश गेलैक से आइ कएक वर्ष सँ घुरि कऽ गाम नहि अयलैक। सरदारजी कें बूझल छैक जे ओकर घरबला अतिवादी-आतंकवादीक गोलीक शिकार बनि गेल छैक, मुदा ई दुखक बात ओ अपन ओहि मुँहबोली बहिन कें कोना कहतैक? कथाकार एहि ड्राइवरक चिन्ता कें, क्रमेण बढ़ैत आतंकवाद कें अपन विलक्षण तानी-भरनीक संग एकटा ठोस कथा रूप मे कहने छथि। ओहि ड्राइवरक मानवतावाद सहजे ओकरा एकटा विराट चिन्तक रूपमे ठाढ़ कऽ दैत छैक जकर श्रेय एहि कथाकार कें जाइत छनि। एकटा सामान्य जन कें अपन कथा मे उतारि ओकर भावना-संवेदना कें एतेक विस्तार देब, ओकर मानवीय सरोकार कें एतेक पैघ क्षितिज पर स्थापित-व्याख्यायित करब हमरा लेल सहज आकर्षणक केन्द्र भऽ गेल छल। एहेन-एहेन कथा पढ़ि कऽ हम तहियो अचम्भित भेल छलहुँ। हमरा तहियो लागय आ से आइयो लगैत अछि जे हमरा भाषा-साहित्य मे एहेन-एहेन रचनाकार सभ छथि जे मैथिली कें ओकर कूपमण्डूकता मे नहि ओकर वैश्विकताक संग अंगेजने छथि। हिनक प्रायः सभ कथाक ‘कैनवास’ एही वैश्विकता-भावना सँ प्रेरित लगैत छल। मारिते रास कथा मे तँ इहो लागय जे हिनक कथापात्रा सभ बहुत जिम्मेदार आ बहुत उदार छनि। अपन गौण पात्रा सभ कें सेहो ई ‘वंचित-वर्ग’क आकि ‘वंचित कोटि’क पात्रा नहि बुझलनि। एहि पात्रा सभ कें सेहो ई अपेक्षित विस्तार दैत रहलाह। एहि पात्रा सभ कें ओ ‘अपटी खेत’ मे छोड़ि देबाक पक्षधर नहि लागथि। ई प्रवृत्ति हिनक ‘पात्रोचित न्याय’ भावनाक पर्याय बनल।

कथात्मक गद्य लिखैत काल बहुत दायित्व रहैत छैक। ई तँ क्रिकेटक ‘बैटिंग’ करब सन होइत अछि जाहि मे बैट्समैन कें रन सेहो बनेबाक छैक, क्रीज पर सेहो टिकल रहबाक छैक, अपन सहकर्मी बैट्समैन कें मदति सेहो करबाक छैक, चारूकात फिल्डर कें सेहो ध्यान मे रखबाक छैक आ अपन टीम कें सेहो जितेबाक छैक। एकटा कथाकार कें कथात्मक गद्य लिखैत काल एहने भरिगर-भरिगर दायित्व सभ निभहय पड़ैत छैक। हिनक कथात्मक गद्य सेहो ताहि दाियत्व कें निमाहैत सन लागय। से कएक स्तर लागय। जखन ई पात्रा सभक गपशप लिखैत छलाह, जखन ई कथाक्रम कें आगू बढ़बैत छलाह, जखन ई कथाक परिवेश कें लिखैत छलाह आ कि जखन ई अपन वैचारिक भाव लिखैत छलाह, सभ स्तर पर अपन चमत्कारिक गद्यक संग ई भेटैत छलाह। कोनहु ठाम कोनहु गद्य झूस नहि, कोनहु गद्य अकछाह नहि। मैथिली मे किछु कथाकरक कथात्मक गद्य आकर्षित करय ताहि मे श्री प्रदीप बिहारी सेहो छलाह। हिनक कथात्मक गद्य कहियो आलोचनात्मक गद्य नहि बनय। हिनक ई सायास उद्यम आ चिन्तन-मनन हमरा बेर-बेर आकर्षित करय।

आइ जखन हिनक लगभग सभटा कृति पढ़ि लेने छी तखन कहबा मे प्रसन्नता तँ होइत अछि जे श्री प्रदीप बिहारी आजुक मैथिली साहित्यक ओहि किछु मजगुत रचनाकार मे सँ छथि जिनक साहित्य-रचना सँ हमरा लाकनि आइयो गर्व करबाक स्थिति मे छी। श्री प्रदीप बिहारी ओहि रचनाकार सभ मे छथि जे मैथिलीक कथा-साहित्य आ उपन्यास-साहित्य कें एकटा प्रशंसनीय स्तर पर सुस्थापित कयने छथि। हिनक एहि षष्ठिपूर्तिक अवसर पर हम अपन एहि अग्रज रचनाकारक साहित्यिक स्वास्थ्यक संगहि हिनक भौतिक, आध्यात्मिक प्रभृति सभ स्वास्थ्यक प्रति अपन शुभकामना व्यक्त करैत छी। ई शतायु होथि आ हमरा लोकनि सदति हिनक साहित्य सँ आ हिनक साहचर्य सँ लाभान्वित-ऊर्जस्वित होइत रही।

Ú

दिलीप कुमार झा

‘कोखि’ पढ़लाक बाद

एखने-एखने पढ़ि कऽ समाप्त कयलहुँ अछि मैथिलीक सुप्रसिद्ध कथाकार, उपन्यासकार श्री प्रदीप बिहारी जीक लिखल चतुरंग प्रकाशनसँ प्रकाशित उपन्यास ‘कोखि’। प्रदीप बिहारी अपना कथा ओ उपन्यासमे नव विषय उठबैत रहलाह अछि, से एहु उपन्यासक माध्यमसँ पाठककें देश-दुनियाँमे भऽ रहल सामाजिक परिवर्तन दिश धियान दियेबाक प्रयास केलनिहें। कथा फेसबुकपर एकटा महिलाक मित्रातासँ आरंभ होइत अछि। ओ महिला जिनक नाम श्वेता छनि, ओएह एहि उपन्यासक नायिका छथि। श्वेताकें बेर-बेर गर्भमे  पालित बच्चाक नोकसान भऽ जाइत छनि, जाहिसँ श्वेता आ हुनक पति अनुपमक परिवारक लोक बच्चाक लेल बहुत चिंतित होइत छथि। अनुपमक परिवारक लोकसभ आ श्वेताक माय बच्चाक लेल कनि बेसिये चिंतित होइत छथि। एहिक्रममे श्वेताक लेल सेरोगेसीक माध्यमसँ बच्चा प्राप्त करबाक सेहो योजना बनैत अछि। अनुपमक परिवार तँ ओकर दोसर बिआह करेबाक नियार सेहो करैत अछि मुदा श्वेता आ अनुपम दुनू गोटा अपना दाम्पत्य जीवन ओ आपसी  सिनेहसँ एना ने शिक्त छथि जे हुनका सभकें बच्चा प्राप्त करबाक सभ जोगार, एतय धरि जे पोषपुत बला बात सेहो अस्वीकार छनि। उपन्यासमे शुरू सँ अन्त धरि नाटक ओ रंगमंच कथाक विषय-वस्तु बनल अछि। से उपन्यासक कथावस्तुमे सेहो नाटकीयता परिलक्षित होइछ, जे एकटा अभिनव प्रयोग कहल जा सकैए। एकटा रंग निर्देशक भौमिक ओ नृत्यांगना पारुलक प्रेमकथा सेहो समानान्तर चलैत अछि। पारुल आ भौमिकक प्रेमसँ उपजल कोखिकें पारुल नष्ट करबा लैत अछि। पारुलक एहि बेवहारसँ भौमिककें आघात लगैत छैक। ओ भूमिगत भऽ जाइत अछि, जकरा कथाक सूत्राधार प्रतीक, जे स्वयं रंगकर्मी ओ रंग समीक्षक छथि, अथक प्रयाससँ हुनका ताकि लैत छथि। कथामे आधुनिक मेट्रो संस्कृतिमे भऽ रहल परिवर्तनक सेहो लेखक बहुत सुक्ष्मतासँ ‘लिव इन’ के बात उठौलनि अछि।

कहबाक अर्थ ई जे उपन्यास मनलग्गू अछि। अनेक सामाजिक समस्या दिश पाठककें घिचबामे सफल भेल अछि। हम एहि सुन्नर उपन्यासक लेल श्रीमान प्रदीप बिहारी जीकें बधाइ ओ शुभकामना दैत छियनि। अपनेलोकनि पढ़ब तँ अवश्य नीक लागत। धन्यवाद। ú

दीप नारायण

उपेक्षित पात्रक सुधि लैत कथाकार

विश्व कवि रवीन्द्रनाथ ठाकुरक अमर निबंध ‘काव्येर उपेक्षिता’ आ महावीर प्रसाद द्विवेदी जीक निबंध ‘कवियों ने उर्मिला के साथ न्याय नहीं किया’ कें चुनौती रूपमे किछु कविलोकनिक ओहि चिर उपेक्षिता पर ध्यान गेलनि।

अदौ कालसँ सामाजक उपेक्षित पात्रा सभकें अपन लेखनीमे स्थान दऽ लेखकलोकनि ओहि पात्राकें जीवंत कएलनि। मैथिली शरण गुप्त अपन कालजयी कृति ‘साकेत’मे चिर उपेक्षिता विरहिणी उर्मिलाक ओहि रातिक नोर सभक हिसाब कएलनि जे भातृ प्रेममे लक्ष्मणक चैदह वर्षक बनवासकालमे अयोध्याक राजमहलमे बहल छल। उर्मिलाक संग मांडवी, श्रुतिकीत्र्ति, कैकेयी आदि पात्रा सभक चारित्रिक उत्कर्ष केर दिग्दर्शन ‘साकेत’मे भेल तँ यशोधराक अमर खंड ‘सखि वे मुझसे कहकर जाते’ मे अपूर्व रूपसँ यशोधराक चरित्रा चित्राण भेल अछि। एहिना केदारनाथ मिश्र ‘प्रभात’ कैकेयीकें राष्ट्रमाताक रूपमे वर्णन करैत लिखैत छथि जे जँ रामक वनगमन नहि होइतैक तखन रावण वध संभव नहि छल। मैथिली साहित्यमे सेहो महाकवि पंडित लालदास अपन ग्रन्थ ‘जानकी रामायण’मे राम काव्य परम्परामे अपन चालिसँ उपेक्षित कैकेयीकें कृष्ण कालमे देवकी रूपमे परिष्कृत करैत छथि। ओ बालिक बहिन रत्नाकें पुतना रूपमे मोक्ष दिएबैत छथि तँ सीताक सखी सभकें गोपी रूपमे महारासमे सहभागी बना राम कालक मनोरथ पूर्ण करैत छथि। ई तँ भेल उपेक्षित पात्रा सभक परिष्कार। मुदा सत्य इहो अछि जे समाजमे किछु त्याज्य पात्रा सभ सेहो अछि जकर मनोभावक अभिव्यक्ति मैथिली साहित्यमे नहि सन भेल अछि। सभ्यताक आडम्बर तऽर दबाएल लेखकलोकनि वेश्यालय वा देह व्यापारमे फँसल पात्रा कें अपनक कथाक पात्रा बना परिष्कार करएसँ बिदकैत रहलाह अछि।

अपन रचनामे नव-नव कथावस्तु आ भाव-भूमि तकैत रहब जिनक लेखनक स्वभाव छनि। नव-नव आ अद्यतन विषय सभकें प्रमुखतासँ अपन रचनामे समाहित कएनिहार मैथिलीक विरल बहुआयामी साहित्यकार प्रदीप बिहारी अपन कथा ‘मौगियाह’मे एहि सभ भावक एक संग पूर्ति कऽ मैथिली कथा साहित्यकें जे अपन अवदानसँ विस्तृत फलक देलनि अछि, से अपूर्व अछि।

प्रदीप बिहारीक चर्चित कथा-संग्रह ‘औतीह कमला जएतीह कमला’मे संग्रहित ‘मौगियाह’ कथाक आरम्भ एकटा तरकारीक दोकानसँ होइत अछि, जतए लेखककें भेंट कथाक मुख्य पात्रा मिरदंगियासँ होइत अछि। मिरदंगिया मौगियाह अछि। ओकर आंगिक, वाचिक आ क्रियाकलाप स्त्रौण्य अछि। एकगोट वेश्यालय जकरा पेट्रोल पम्प लग होएबाक कारणें ओहि क्षेत्राक लोक इंडियन आॅयल वा पेट्रोल पम्पक नामसँ जनैत अछि, ताहिमे ओ भरुआक काज करैत अछि। स्त्रौण्य चालिढालिक कारणें ओ लेखककें एहि विषयक नाटक लेल उपयुक्त लगैत अछि। वेश्यालय केर भावभूमिपर बुनल गेल ई विलक्षण कथा अछि जे पाठककें झकझोरि दैत अछि। समाजमे प्रचलित उक्ति ‘माउग ने मरद बलिगोबना’ कहि एहन पात्राकें बलिगोबना मानि मजाक उड़ाओल जाइत अछि। मुदा एहि पात्राकें कथाकार अत्यन्त संवेदनशील प्रस्तुतिसँ एहि कथामे अमर कएने छथि।

हिंदी आ अंग्रेजी साहित्यमे थोड़-बहुत एहि विषय पर लिखल गेल अछि, मुदा मैथिली साहित्यमे हमरा जनैत मणिपद्मक एक कथा ‘बालगोबिंद’मे एहि तरहक पात्राक चर्च भेटैत अछि, मुदा आधुनिक मैथिली साहित्यमे एहि विषय पर कलम चलओनिहार प्रदीप बिहारी संभवतः एक मात्रा लेखक छथि। सुप्रसिद्ध लेखक राजकमल चैधरीक कथा वेश्यालय वा अनुचित प्रेम संबंध सभक यात्रा अवश्य करैत अछि मुदा एहन बलिगोबना चरित्रा चित्राण केर जानकारी हमरा नहि अछि।

कथामे कथाकार एकगोट नाटकक पात्रा लेल मौगियाहक चरित्रा देखाबए लेल मिरदंगियाकें बहुत मेहनतसँ राजी करैत छथि। जखन मिरदंगिया रिहर्सल लेल आबए लगैत अछि आ कथाकारसँ हेमक्षेम होइत छनि, तखन कए गोट कथा एकहि संगे सोझाँ अबैत अछि। सभकें एक तागमे गाँथि लेखक एहि कथाकें विलक्षण बना देने छथि। एतए लेखकक लेखन-कलाक जे उच्चता अछि से अन्यत्रा कथा साहित्यमे कमे अभरल अछि।

मिरदंगियाक बजबाक शिल्प कथाकें आओर मनलग्गु बना देने अछि। जखन मिरदंगिया लेखकसँ किताब माँगए अबैत अछि तँ कहैत अछि जे-

‘‘ऊ कतेक दिनसँ बोलल करै छलै किताब दऽ।’’

‘‘के ऊ?’’

‘‘आर के? हमरा जऽरे जे रहै हइ- मालती।’’

‘‘के मालती?’’

‘‘हमे जहाँ रहै छिकियै, ओतै एगो छौड़ी हइ। सभ सँ सुन्नरि हइ। ड्राइभर-खलासी आउर के अपना भीरू बैठैयो ने दै हइ। ओकरा पढ़ै के बड्ड सख है। कहियो काल बाजार सऽ हमे किताब आनि दै छियैक। एहि बेर अहीं सऽ कहलकै माँगि कए लेने आबै लेल।’’

मिरदंगिया मालतीक बड़ाइ करैत अघाइत नहि अछि।…लेखककें जखन ई बुझबामे कोनो भाँगठ नहि रहैत अछि जे मिरदंगियाकें मालतीसँ प्रेम छैक तँ पुछि दैत छथि-

‘‘तोरा बड़ मानै छौ मालती?’’

‘‘बुझाइ हइ तहिना। मुदा, हमे ई गलती फेरो नै करए चाहै छिकियै।’’ गम्भीर होइत मिरदंगिया कहैत अछि, ‘‘आब एगो बात मुदा होइ हइ…।’’

प्रेमक जे अभिव्यक्ति प्रदीप बिहारी कयने छथि ओ साँचे अपूर्व लगैत अछि। एहि संवादसँ ई स्पष्ट होएत- ‘‘…पहिने मालती गहिंकी भीरू केबाड़ बन्न करै छलै तऽ हमरा कुच्छो ने होइत रहै आ आब जे ऊ गंहिकी के लए कऽ कोठरी मे जाइ हइ आ केबाड़ी बन्द करै हइ, तखने हमरा मोनमे किछ कचकि जाइ हय।’’

ई मौगियाहक हृदयमे प्रेमक प्रस्फुटनक सुन्दर वर्णन अछि। ओहि पात्राकें जकरा समाज मानैत अछि जे प्रेमसँ एकरा दूर दूर धरि कोनो सम्बन्ध नहि छैक, ओहि मिरदंगियाकें प्रेम एक बेर घटनाक रूप लैत अछि जखन कि रिहर्सल करैत नायिकाक माय अपन बेटीकें प्रेम करै सँ मना करैत छथि। आ एहि दृश्यक रिहर्सल देखैत मिरदंगिया रिहर्सलेमे माएक भूमिका करैत ओहि स्त्राीक गरदनि दाबि कऽ अधमरू सन कऽ दैत अछि। वस्तुतः ई घटना ओकर मुंगेरमे रहैत काल ओहि कष्ट केर प्रतिशोध छैक, जकरा कारणें ओकर प्रेयसी इन्दु एड्ससँ मरि गेल आ ओ तखन किछु कऽ नहि सकल छल। ओकर मोनक ओ कुंठा रिहर्सलमे बहरा गेलै आ भावातिरेकमे ओ ओहि पात्राकें अपन इन्दुक मृत्युक जिम्मेवार मानि लेलक। एहि कथामे कए गोट घटनाक जोड़ि कथाकार एहि कथाकें रोमांचक बना देने छथि। एहि कथामे समानान्तर रूपसँ अनेक कथा चलैत अछि जेना तरकारीवलाक कथा, नाटक होयबाक कथा, इन्दु मृदंगियाक कथा, मालती मृदंगियाक कथा, पैघ हाकिमक स्त्राीक मृत्युक बाद बरोबरि मालती लग अएबाक, ओकरा किताब पढ़बाक सऽख, मुजराक लाइसेंस, स्त्राीजन्य रोग एड्स, सरस्वती साधना लग मात्रा साधना छोड़ि कोनो काज संभव नहि आदि। लेखकीय कौशल एहि कथामे एना अभरल अछि जे सभटा कथा एक दोसराकें सहारा दैत अछि। एक प्रसंग दोसर प्रसंगक गतिमे बाधक नहि बनैत अछि। सभ एक दोसराक संग एहि बेहतरीन कौशलसँ बुनल गेल अछि जे कथाक प्रवाह अंत धरि प्राणवन्त बनल रहैछ। नाटक देखबा लेल मालती सेहो एतैक आ लेखकसँ भेंट करतैक। तखन की हेतै से जिज्ञासा बनल रहैछ। अंत धरि एहि कथामे पाठक केर उत्सुकता बनल रहैछ जे लेखकक कथा कहबाक कौशलक सफलता थिक। नाटकसँ तीन दिन पहिने पता चलैत अछि जे मृदंगिया एहि वेश्यालयक मलिकाइनक हत्या कऽ देलक। नृत्य आ मुजरा सिखबाक निर्णय एकरा सभके अरघै नहि छैक।

एहि कथाक ई एकटा विशेष खूबी अछि जे मिरदंगिया आ मालती ई चाहैत अछि जे हमसभ एहि नरकसँ बाहर भऽ जाइ। कहुना छुटकारा पाबि जाइ मुदा से संभव नहि देखि ओ निर्णय लैत अछि। मुंगेरमे रहैत कालमे इन्दुकें नहि बचा सकबाक दुख आ विवशता मोन पड़ैत छै। प्रेममे कतेक शक्ति छैक जे सदिखन बलिगोबना बनल रहएबला मिरदंगिया अपन दोसर प्रेम मालतीक रक्षा लेल मलिकाइनक हत्या करैत अछि आ पुलिसक समक्ष सहजतासँ ई स्वीकार करैत अछि। पाठकक उत्सुकता रहिए जाइत अछि जे फेर नाटक भेल वा नहि? मालतीक की भेल? आदि…। पाठकक मोनक उत्सुकताक चरमपर रहैत अछि आ कथा समाप्त भऽ जाइत अछि।

कथाकार एहि कथासँ कथा कहबाक एक विलक्षण शैली विकसित कएलनि अछि जे पाठककें विह्वल करैत अछि। हमरा ई कथा कोनो सत्य घटनाक बहुत लगीच लगैत अछि। यैह कथाकारक सभसँ पैघ सफलताक पैमाना अछि। पात्रा सभक चरित्रा विकास सेहो प्रशंसनीय ढंगसँ बढ़ैत अछि। मिरदंगियाक चारित्रिक ग्राफ सीधा ऊपर जाइत अछि। मालतीक ग्राफ सेहो ऊपर उठैत अछि। अस्वस्थ रहितो ओकरा लग बेसीसँ बेसी गहिंकी पठबैत अछि मलिकाइन। ओ सभटा सहि जाइत अछि। यथार्थमे कथाकार अत्यन्त चातुर्यसँ ओकरा किताब पढ़बाक सऽख दऽ ओकरा गहिंकी सभक संसारसँ अलग एक एहन वृत्त  देलनि जे मात्रा ओकर छैक। एहि वृत्तमे ओ अछि, पोथी छैक आ छैक मात्रा मिरदंगियाक स्नेह। पोथी पढ़बाक हिस्सकक सर्जनासँ कथाकार जे मालतीक मनोवैज्ञानिक ग्राफ बनओने छथि ओ साँचे अपूर्व भेल अछि। ई एक मनोवैज्ञानिक तथ्य अछि जे एहन स्त्रौण्य चरित्रा वा विषयपर रचित रचनामे लेखक आ पात्राक स्वाभाविक रुझान समलैंगिकता दिश बढ़ि जाइत अछि। प्रसिद्ध लेखक ई एम फाॅस्टर सन पैघ लेखक अपन। त्ववउ ूपजी ं टपमू आ भ्वूंतके म्दकमे एहि प्रवृत्तिसँ बाँचि नहि सकलाह। ई प्रदीप बिहारीक वैचारिक उच्चताक परिचायक अछि जे ओ एहि प्रवृत्तिसँ बाँचि सकलाह। ओ अपन कथाक मुख्य पात्रा मिरदंगियाकें मौगियाह होयबाक बादो ओकर पुरुषार्थकें बचा कए रखलनि। ओकर सहज आकर्षण विपरीत लिंगक मालतीसँ होइत छैक आ कथाक चरमोत्कर्षपर ओकर नुकायल पुरुषार्थ प्रेमक रक्षा लेल जगैत छैक आ ओ मलिकाइन केर हत्या कऽ अपराध स्वीकार करैत अछि। कथाक कथानक एवं पात्रा सभक चरित्रा चित्राण सटीक भेल अछि आ एकर शिल्प अद्भुत अछि। कथोपकथनक शैली असरदार अछि। मुदा एहि कथाक भाषा-शैली सभसँ बेसी आकर्षित करैत अछि। बृहत्तर मिथिला क्षेत्राक भाषाक बेसी उपयोग भेल अछि। एहि लेल शब्द चयनक कथाकारक काबिलियत प्रशंसनीय अछि। हिबै, भिरु, बड़गाही, लचकैत डाँड़, कचकि जाइ हय, कुभेला आदि शब्द सभक उपयोग कथाक गति, वातावरण आ वास्तविकताकें निखारि देने अछि। कुल मिला कऽ कहि सकैत छी जे प्रदीप बिहारीक कथा ‘मौगियाह’ एक विलक्षण सफल कथा अछि जे कथाकारक कथा कहबाक कौशलक जीवन्त दस्तावेज अछि।

Ú

डाॅ निक्की प्रियदर्शिनी

एकटा जिम्मेदार उपन्यासकार

“We expect a fiction writer to know his craft and to help us discover something about the would we did not know before or know in the same way, something to be true and that has relevance to our attitudes and conduct.”

-William Van O’Conner

प्रसिद्ध अमेरिकी विद्वान विलियम वैन ओ’काॅनर उपन्यासकारक दायित्वक संन्दर्भमे कहैत छथिµ ”हम उम्मीद करैत छी जे एकटा उपन्यास लेखक अपन शिल्पके ँ बुझथि आ हमरा ओहि वस्तुक विषयमे किछु तकबामे मदति करथि जकरा हम पहिनेसँ जनैत छलहुँ अथवा ओहि तरहे ँ नहि जनैत छलहुँ जकरा हम सत्य मानि ली आ ओ हमर दृष्टिकोण आ आचरणक लेल प्रासंगिक भऽ जाए।“

मैथिली उपन्यास प्रारम्भहि काल (1913-14)सँ अपन विषयमे समकालीनताकें विद्यमान रखने अछि। जाहि कालमे जे विषय प्रमुखताक संग समाजमे छल तकरा केंद्रमे राखि उपन्यासकार लोकनि अपन बात उपन्यासक माध्यमे समाजक समक्ष अनलनि। केहनो मरखाहसँ मरखाह विषय किएक नहि हो तकरा निधोख भऽ अपन उपन्यासक विषय बनौलनि आ सफल सेहो भेलाह।

उपर्युक्त दायित्वक निर्वहन करैत मैथिली साहित्यक हमर प्रिय उपन्यासकारमेसँ एक श्री प्रदीप बिहारी छथि। साहित्यक प्रमुख विधा सभमे हिनक योगदान बहुमूल्य अछि जाहिमे अनेको कथा-संग्रहµ ओतीह कमला जयतीह कमला, मकड़ी, सरोकार, उजास, लघुकथाµ खण्ड खण्ड जिनगी, हे रौ, नाटकµ फुटपाथ, उपन्यासµ गुमकी आ बिहाड़ि, विसूवियस, शेष, जड़ि, कोखि, मृत्युलीला आदि प्रकाशित अछि। एकर अतिरिक्त हिनक कतेको अनूदित आ सम्पादित पोथी मैथिलीक आँचरमे अर्पित अछि। सम्मान-पुरस्कारक गप करी तँ अनेको पुरस्कारक संग साहित्यिक क्षेत्राक प्रमुख पुरस्कार साहित्य अकादमी पुरस्कार 2007 ई.मे प्राप्त छनि।

उपन्यासकार श्री प्रदीप बिहारी मात्रा बीस वर्षक आयुमे अपन पहिल उपन्यास ‘गुमकी आ बिहाड़ि’ लिखलनि। ओना हिनक पहिल रचना ‘कथा संकोच’ छल जे 1976 ई.मे ‘लालधुआँ’ नामक पत्रिका, जकर सम्पादक विभूति आनंद छलाह, ताहिमे छपल छलनि। अपन मास्साहेब जीवकान्त जकाँ ईहो पाँच-पाँचटा उपन्यास लिखि हुनक आशीर्वादके ँ फलीभूत कएने छथि। आगू आओरो उपन्यास आओत से विश्वास हमरा सन पाठकके ँ आह्लादित करैत अछि। एहि पाँचो उपन्यासमेसँ टटका उपन्यास ‘कोखि’ पर हम किछु गप करब। ई उपन्यास 2020 ई.मे प्रकाशित भेल। उपन्यासकार श्री प्रदीप बिहारी द्वारा हमरा ई उपन्यास 14 सितम्बर 2020 कऽ उपहृत कयल गेल। उपन्यासकार कतेको बेर भेंट भेलाह। सभबेर व्यवहार-कुशल लगलाह। साहित्यिक समाज मे ई अपन लेखन सँ यश प्राप्त कयने छथि। हमहूँ हिनक पोथी पाबि आंनदित भेलहुँ। मुदा पोथीक शीर्षक देखि कनेक अचंभित भेलहुँ। ‘कोखि’ तँ स्त्राीपक्षक विषय लगैत अछि। पहिल बेर जखन ई उपन्यास पढ़लहुँ तखन ई मात्रा हमरा ‘सेरोगेसी’, जे एकटा डाॅक्टरी बिध अछि आ ओ एखन निःसंतानता लेल भारतो मे खूब प्रचलित भेल अछि, तकर विरोध करैत सन लागल। उपन्यासकारसँ हम अपन सहमति नहि रखलहुँ। मुदा एहिपर विमर्श करबाक मन बेर-बेर होइत छल। मोन ईहो कहए जे ई मैथिली साहित्यक बहुत सशक्त रचनाकार छथि, तँ ई एहि उपन्यासक नाम ओहिना नहि रखने हेताह।

लगभग एक साल बाद फेर एहि उपन्यासके ँ पढ़बाक मोन बनेलहुँ। पढ़लाक बाद ‘सेरोगेसी’क विरोधक संग-संग तीनटा आओरो विषय भेटल। ओ छल, लिव-इन-रिलेशनक परिणाम, भ्रूणहत्याक पुरजोर विरोध आ अनाथालयक आवश्यकता। कही तँ उपन्यासमे देखाओल गेल चारू विषय समाजक ज्वलंत समस्याके ँ देखार करैत अछि। उपन्यासकार अपन सभ पात्राक उपयोगिताके ँ सार्थक सेहो करैत छथि। ‘कोखि’ उपन्यासक महिला पात्रा श्वेताक माय, श्वेता, शुभा, पल्लवी, ललिता, पारुल आदि सभ के ँ बेस भावनात्मकताक संग प्रस्तुत कएल गेल अछि। सम्पूर्ण उपन्यास बच्चा आ कोखिक प्रयोजन लेल घुमैत भेटैत अछि। उपन्यासक पुरुष पात्रा प्रतीक, आशुतोष, भौमिक, अनुराग आदि छथि। एहि उपन्यासक स्त्राीपात्रासँ बेसी बुझनुक पुरुषे पात्रा छथि। मुदा उपन्यासक स्त्राी सभ ‘डिसीजन मेकिंग पावर’क संग ठाढ़ भेटैत छथि। ई स्त्राीक सबलताक परिचय दैत अछि।

उपन्यासकारक रूचि रंगमंचसँ रहल छनि। से एहि उपन्यासकें पढ़लासँ सेहो स्पष्ट होइत अछि। बेर-बेर नाटकक महत्वक चर्चा उपन्यासमे भेटैत रहैत अछि। उपन्यासकार श्री प्रदीप बिहारी एहि उपन्यासक केंद्रमे कोखिक अनिवार्यता रखने छथि। कएकटा कारणसँ अथवा परिस्थितिवश एकैसम शताब्दीमे कोखि दूषित भऽ गेल छैक। बाजारवादक प्रभावसँ कोखिक व्यापार खूब भऽ रहल अछि। एक तरहें निःसन्तानक लेल ई सुखदायी होइत अछि। मुदा ‘कोखि’क लेखक एकरा अपन पात्राक माध्यमे असहमतिक संग प्रस्तुत कएने छथि। उपन्यासकार सेरोगेसीक पक्षधर नहि रहितहुँ एकर एक-एकटा भ्रांतिकें तोड़ि पाठकक समक्ष रखने छथि। तें उपन्यासकारक जे जिम्मेदारी होइत छैक तकरा खूब नीकसँ निर्वाह कएने छथि। सेरोगेसीक संग-संग उपन्यासकार लिव-इन-रिलेशनोकें नीक नहि मानैत छथि। किछु गप जे एहि उपन्यासक खूब नीक लागल से अछि मित्राता। कहल जाइत अछि जे मित्रा सदैव उचित निर्णय दैत अछि जे अहाँ लेल सर्वथा उचित होयत। दू मित्रा शुभा आ रितिकाक बीच लिव-इन-रिलेशनपर जखन गप होइत अछि तखन रितिका, शुभाकें चेतबैत कहैत छथिµ ”कखनो तोड़ल जा सकैत छैक। प्रायः कोनो समय तोड़ि देबाक लेल ई सम्बन्ध बनल छैक। मुदा ठीके कहलें तों, जे अनुबंध नहि होइत छैक।“

एहिना सेरोगेसीक भ्रांति दूर करैत उपन्यासकारक पात्रा ललिता आ श्वेताक माए कहैत छथि जेµ ”ई काज सभ तँ डाक्टर करतैक। वैह बाबूक शुक्राणु बहार करतैक आ तोरा गर्भमे धऽ देतैक। तोरा दुनूकें तँ कहियो भेंटो ने होयतौक।“

एहि उपन्यासमे हमरा जनैत सबसँ बेसी विरोध उपन्यासकार भ्रूणहत्याक कएलनि। उपन्यासक प्रमुख पात्रा प्रतीक आ भौमिकक माध्यमे पाठककें देखौलनि। भ्रूणहत्याकें रोकब अनिवार्य अछि। देश मे बहुत कानून बनाओल गेल अछि। भ्रूणहत्या कम सेहो भेल अछि मुदा बन्द नहि भेल अछि। एहिसँ विचलित भऽ आ रोकबाक लेल भौमिक एकटा अनाथालय खोलैत अछि। भ्रूणहत्याक परिणामक चर्च करैत भौमिक कहैत छथिµ ”एकदिन दू-तीनटा कुकुरकें बीच धारमे पानिसँ कने पहिने बालू कोड़ैत देखलियैक।…लग गेने देखैत छी जे एकटा अपरिपक्व नेनाक लहासकें कुकुर नोचि रहल छैक।“

एहि उपन्यास मे जे दाम्पत्य जीवनक सहजता देखाओल गेल अछि से भरोस दैत अछि। किएक तँ एखन एकटा कुरीति खूब प्रचलित भऽ गेल अछि ओ अछि दाम्पत्य जीवनक कोनो कारणसँ टूटब। मुदा एहि उपन्यासक जोड़ी सभ बहुत ‘अंडरस्टैंडिंग’ छथि। जेना श्वेता-अनुपम, प्रतीक-पल्लवी, शुभा-आशुतोष आदि। श्वेता आ अनुपम जे एक-दोसराकें बुझबाक स्तर छैक तकर आवश्यकता एखनो समाजमे छैक। उपन्यासकार अपन एहि पात्राक माध्यमे समाजकें कहए चाहैत छथि जे एहि सामंजस्यक आवश्यकता दाम्पत्य जीवनमे सभकें रहबाक चाही।

रोमांचसँ भरल अछि ई उपन्यास जिज्ञासासँ सेहो भरल अछि। ई उपन्यास निराश होइत जीवनमे आस जगेबाक एकटा विराट कथा अछि। एहि उपन्यासक चारू विषय, जाहिपर चर्चा कएल गेल अछि, तकर केंद्रमे कोखि आ बच्चा रहल अछि। स्त्राीक सीमा आ परिधि कतबो व्यापक किएक ने भऽ गेल हो मुदा स्त्राी होयबामे जे मूल तत्व अछि ओ थिक ओकर ‘कोखि’ जाहि लेल ओ समाजमे सदैव पूजनीया रहतीह। उपन्यासक माध्यमे उपन्यासकार एहि यथार्थकें प्रस्तुत कएने छथि।

लेखकक स्थापना दैत उपन्यासकारक पात्रा भौमिक कहैत छथिµ ”भने तों पोथी लिखैत छें, लिख। सबकिछु समाप्त भऽ जयतैक, तखनो आखर बचले रहतैक।“

उपन्यासकारक रूपमे श्री प्रदीप बिहारी हमरा बहुत समय-सापेक्ष लगैत छथि। व्यक्तिक रूपमे कही तँ ई हमरा कहियो अहंसँ भरल नहि लगलाह। अपन रचने जकाँ ई बहुत सरल आ सहज व्यक्ति लागथि। जतेक बेर भेंट भेलाह से कोनो ने कोनो साहित्यिक आयोजने सभमे, से बहुत आत्मीयता भरल अग्रज-अभिभावकक रूपमे। एक-दूटा आयोजन तँ हमरा लेल अविस्मरणीय छल। भागलपुर मे जखन पढ़ैत रही तखन ओहिठाम प्रत्येक साल एकटा सेमिनारक आयोजन कएल करी। एकटा मुख्य अतिथिकें बजाओल जाए। 2015 मे हिनका बजाओल जएबाक योजना बनल। ओहि सेमिनारक आयोजन मात्रा चंदे सँ होइत छलैक। तें अर्थाभाव होएब कोनो अचरज नहि। श्री प्रदीप बिहारीकें अयबाक आमंत्राण आ स्वीकृतिक लेल फोन कएल। फोनपर अयबाक आग्रह संग-संग परिषदक अर्थक अभावक जनतब हिनका देल। आश्चर्य ई भेल जे ई अपन स्वीकृति तुरत देलनि आ कहलनिµ ”हम जरूर आएब। हमरा निमित्त कोनो लाम-काप$ आकि लाग-लपेटक आवश्यता नहि।“ ओ आयोजन खूब सफल भेल छल आ हिनक अएबाक निःस्वार्थ स्वीकृति बहुत दिन धरि घुरियबैत रहल आ मनमे हिनका प्रति आदरभावकें उपजबैत रहल। तकर कारण प्रायः ई छल जे एहि अर्थयुगमे ई निःस्वार्थ रूपें एहि आयोजनक महत्व देलनि।

एहि क्रममे हम अपन एकटा व्यक्तिगत अनुभव सेहो कहब। खुटौनामे श्री महेंद्र नारायण राम ‘कथा-विदेहक’ आयोजन कएलनि। सबगोटे जनिते होएब जे कथा-गोष्ठी भरि रातिक होइत छैक। हमहूँ बहुत उ$हापोहक संग गोष्ठीमे पहुँचलहुँ। बहुत साहित्यकार सब आयल छलाह। कथा-गोष्ठी खूब नीक भेल। से आयोजनक स्तरसँ सेहो आ वस्तु-गाम्भीर्यक स्तरपर सेहो। जखन 12 बजे रातिमे कथा-गोष्ठी समाप्त भेल तँ हमर दिमाग एहि ओरिआओनमे लागि गेल जे हम कोना जायब। बहुत गोटे अपन गंतव्य दिस अपन-अपन सवारीसँ विदा सेहो भऽ गेलाह। कएक गोटे पूछताछ सेहो कएलनि जे हम कोना जाएब। हमरो होइत छल जे आबि तँ गेलहुँ मुदा आब एती रातिकऽ कोना जायब! आदि-आदि। ई सब दिमाग मे चलैत रहय आ गोष्ठी-स्थलकें पतराइत देखि मन सेहो विचलित जकाँ होइत रहए। लेकिन साहित्यिक संबंधक कारणें भरोस छल जे कोनो जोगाड़ लगबे करतैक। तखनहि श्री प्रदीप बिहारी आ मेनका मल्लिकजी लग आबि पुछलनिµ ”कोना जायब निक्की?“ हम अपन यथार्थ स्थिति हुनका कहि देलियनि। आश्यर्च भेल जे हुनका दुनू गोटेकें रूपम झा आ मनोज कुमार झा संगे अपन गाड़ीसँ बेगूसराय जएबाक योजना बनल छलनि। मुदा श्री प्रदीप बिहारी मेनका मैडमकें एतेक सहजताक संग कहलनि जे किएक नहि सबगोटे एहि हाॅलमे बैसि गपशप करब आ भोरमे विदा होयब। महेंद्र नारायण राम सेहो अपन सहमति देलनि। हमरा चलते हुनकर योजनामे परिवर्तन करब हमरा अचंभित कएलक। मानवताक साक्षात प्रतिमूर्ति सन लगलाह हमरा ओ दुनू प्राणी। ई साहित्यिक संबंधक गरिमा छलैक। ओहि समयक ओ हमर अनुभव हमरा सदैव अविस्मरणीय रहत आ साहित्यकारक संगहि व्यक्तिक रूपमे, से सरल आ सहज व्यक्तिक रूपमे श्री प्रदीप बिहारी सदैव आदरणीय रहताह।

Ú

कुमार गगन

नीक लागल ‘कोखि’

समसामयिक टाॅपिक पर एतेक नीक उपन्यास लिखैक हेतु प्रदीप बिहारी भाइजी कें बधाइ। पूरा उपन्यास पढ़लहुँ। हम तँ पहिनहुँ सँ हिनक व्यक्तित्व ओ लेखनीक प्रशंसक रहल छी।

हिनक टटका उपन्यास ‘कोखि’ केर कथामे रंगकर्म ओ साहित्य कला सँ जुड़ल तीन जोड़ीक तीन अलग कथा मुदा एहि तीनूक बीच अद्भुत आत्मीय सम्बन्ध अछि। एकटा त्रिकोण बनल आपस मे जुड़ल अछि ई संबंध। रक्त संबंध सँ बेसी आत्मीय संबंधक रोचक कथ्य शिल्प उपन्यासक रोचकता कें बढ़बैत अछि, संगहि आधुनिक सेहो बनबैछ।

प्रतीक आ पल्लवी दू प्रेमी रंगकर्मी जखन पारिवारिक बंधन सँ जुड़ि जाइछ तँ पल्लवी  पारिवारिक दायित्वक निर्वहन हेतु अपन रंगकर्म कें छोड़ि दैछ मुदा अपन प्रेमी प्रतीक जे आब रंग समीक्षक ओ प्रसिद्व लेखक बनि गेल अछि, केर सदैव सहयोगीक भूमिका मे रहैछ। दोसर जोड़ी अछि श्वेता आ अनुपम केर। अनुपम अपन पत्नीक कैरियरक प्रगति लेल मनोयोग सँ लागल अछि। श्वेता जे ईश्वरीय अभिशाप कही वा आंतरिक शारीरिक अक्षमताक कारणें अपन कोखि सँ स्वस्थ बच्चा कें जन्म नहि दऽ पबैछ तें पारिवारिक ओ सामाजिक उलहनक कारणें एक आंतरिक दबाब सँ गुजरि रहल अछि, मुदा ओकर एहि संकट मे सहयोग ओ संबल दैछ ओकर प्रेमी पति अनुपम। तेसर जोड़ी अछि पारुल आ भौमिक के। दुनू रंजगतक प्रसिद्ध नाम। पारुल महत्वाकांक्षी अछि, तें ओ अपन कोखि मे पलि रहल अपन प्रेमक बीया कें अवरोधक मानैत अछि आ ओकरा नष्ट करैछ। कला जगतक बड़का सेलिब्रिटी बनि चुकल अछि। ओतहि ओकर प्रेमी रंगकर्मी भौमिक मानवीय संवेदना, करुणा सँ भरल बहुत अत्यंत भावुक व्यक्ति अछि। जे आम धारणा सँ अलग लेखक नव कथ्य उपस्थित करैत छथि। भौमिक एक महान मानवीय कार्य हेतु अपन प्रिय विधा रंगकर्म सँ विरक्त भए अपनहि शहर मे गुमनाम अछि।

एहि तीनू जोड़ीक कथा सूत्रा कें लेखक बहुत कुशलता सँ एक सूत्रा मे बान्हि एकटा नव कथ्य शिल्प सँ उपन्यासक कथा कें पाठकक लेल उत्सुकता ओ रोचकता बनौने रहैत छथि। चूंकि उपन्यासक कथ्य आधुनिक तथा भाषा सरल ओ बोधगम्य अछि तें पाठकक संख्या मे विस्तार होयबाक नीक संभावना अछि।

मिथिला आब गामे धरि नहि रहि गेल अछि, बल्कि पटना, कोलकाता, दिल्ली, मुम्बई, हैदराबाद, बेंगलुरु, पुणे आदि अनेको शहर मे कतेको मिथिला बनि चुकल अछि, ओहि ठामक रहनिहार शिक्षित आधुनिक मैथिल लोकक दैनिक जीवन ओ जीवनदर्शन बहुत बदलि चुकल अछि। वर्तमान वैश्विक सामाजिक समस्या सँ ई समाज सेहो प्रभावित भऽ रहल अछि। आजुक समस्या लिव इन रिलेशन, सेरोगेसी, भ्रूण हत्या, चाइल्ड अडाॅप्शन आदि सँ आधुनिक शिक्षित लोकक परिवार मे ई घटना सभ होमय लागल अछि।

202 पेजक एहि उपन्यासक अंतिम ओ वाक्य, ‘कोखि सम्माननीय शब्द होइत छैक, मैडम।’ एहि लेल प्रदीप बिहारी भाइक लेखनी कें प्रणाम।

हम तँ बहुत साधारण पाठक छी। रंगकर्म सँ जुड़ल रहबाक कारणें ई उपन्यास आर नीक लागल ।

ú

ज्ञानवर्द्धन कंठ

रंगकर्म आ रचनाकर्मक स्रष्टा आ द्रष्टा

हमर दृष्टिमे प्रदीप बिहारी एकटा प्रदीप्त द्रष्टा आ स्रष्टा छथि। एहि प्रदीप्तिक धाह हुनक रंगकर्मसँ लऽ कऽ रचनाकर्म धरि अनुभूत होइछ। हिनक पारिवारिक पृष्ठभूमिमे सांगीतिक आ साहित्यिक चास लहलहाइत रहलनि अछि, तकर सुवास हिनक व्यक्तित्वकें गमकौने छनि। हिनक लेखनकें चमकौने छनि। झमकौने छनि। स्पष्टवादिता आ प्रखरताक संग हिनकामे औखन गुरु जीवकान्त जीबि रहल छथिन। ई समर्थ गुरुक समर्पित शिष्य छथि। ‘जेना कोनो गाम होइत अछि’ शीर्षक सँ जीवकान्तक पाँचो उपन्यासक संकलन हिनक अप्रतिम गुरुभक्ति आ मैथिली भाषा-साहित्यक धरोहरिकें जोगा कऽ राखबक दृढ़ संकल्पक द्योतक अछि। हिनक लेखनमे संवादक स्वाभाविकता आ सजीवता रंगकर्मक प्रत्यक्ष अनुभवसँ आयल छनि। तें ई कथानक बुनैमे सिद्धहस्त छथि तऽ दृश्य छानैमे प्रशस्त। हिनक उपन्यास ‘मृत्युलीला’ पढ़ैत काल कोरोनाकालक विभीषिकाक विभ्ज्ञिन्न प्रसंग अन्तर्मोनकें दोमि कऽ राखि दैत छैक। कंठ अवरुद्ध भऽ जाइत छैक। देह भुलकि जाइत छैक। रोइयाँ ठाढ़ भऽ जाइत छैक। हिनक शैली आ प्रवाहक गबाह के नहि अछि? ‘खण्ड-खण्ड जिनगी’ आ ‘हे रौ’ शीर्षक लघुकथाक पोथीमे कम्मे मे बेसी कहि देबाक हिनक कला चमत्कृत कऽ दैत छैक। ई खाँँटी मैथिली लिखबामे जतबे प्रवीण छथि ततबे आँचलिक बोलीक संवाद सधबामे। कथा-उपन्यास दुहूमे एकर प्रमाण भेटत। ‘दक्षिण मिथिला’ पत्राक संपादकक रूपें ई मैथिलीक वितानकें तनने रहलाह अछि। नेपालसँ हिनक सायुज्य एहि वितानकें आओर विस्तृति प्रदान करैछ। हिनकर व्यक्तित्वकें अंतरराष्ट्रीय छवि प्रदान करैछ। मिथिलाक दुनू भागक ई सेतु छथि। ई नेपाली पोथीक कुशल अनुवादक छथि। ‘अंतरंग’ अनुवाद पत्रिकाक संपादकक रूपमे हिनकर बहुभाषी रंग आ तरंग उद्भाषित भऽ रहल अछि। भारतीय भाषा-मंचकें सजेबामे हिनक स्नेह-श्रम-समर्पण अनुकरणीय छनि। विभिन्न साहित्यिक आयोजनमे हिनक स्वाभाविक सक्रियता बनल रहैत छनि। हिनक मैथिली कथा-लघुकथाक अनुवाद हिन्दी, नेपाली, ओड़िया, असमिया, मलयालम, डोगरी, तेलुग, पंजाबी, उर्दू, अंग्रेजी आदि भाषामे भेल छनि आ भइये रहल छनि। एहि प्रकारें मैथिलीकें अखिल भारतीय भाषा मंचपर प्रतिष्ठापित रखबामे हिनक प्रमुख भूमिका छनि। ई टेलीफिल्मक स्क्रिप्टक लेखक आ अभिनेता सेहो रहल छथि। एकटा व्यक्ति एक्कहि संगे अभिनेता, नाटककार, लघुकथाकार, कथाकार, उपन्यासकार, पत्राकार, संपादक, अनुवादक, इत्यादि कोना भऽ सकैए, से देखबाक-बुझबाक-गुनबाक लेल प्रदीप बिहारीकें निहारी। साहित्य अकादेमी सहित नाना पुरस्कारके सम्मानित करैबला ई हमरा लोकनिक गौरव-पुरुष छथि।

षष्ठिपूर्तिक अवसरपर अकास भरि शुभकामना आ बधाइ संप्रेषित करैत एतबी कहबनि जे प्रदीप बिहारीक प्रदीप्तिसँ साहित्य-समाज जगमग बनल रहय, रचना-भंडार भरैत रहय आ हिनक भावी जीवन सुन्दर, स्वस्थ, सुखपूर्ण आ सृर्जनशील आयामसँ परिपूर्ण बनल रहनि।

Ú

कल्पना झा

प्राकृतिक नहि राजनीतिक छल मृत्युलीला

प्रदीप बिहारीक टटका उपन्यास ‘मृत्युलीला’ मे कोरोनाकालक भयावहता, लाॅकडाउन सँ उत्पन्न भयंकर आर्थिक समस्याक संग लोक जे शारीरिक, मानसिक कष्ट झेलबालेल बाध्य भेल, तकर तेहेन जीवन्त चित्राण  कएल गेल अछि, जे पढ़ैत काल कतहु-कतहु विचलित सन भऽ जाएत भावुक लोक। हृदयविदारक घटना सभ एना चित्रित करब सहज नहि छल हेतनि लेखक लेल। अपनहुँ करेज पाथर कऽ लिखए पड़ल हेतनि लेखक कें। जाहि त्रासदीक कुप्रभाव देखब-सुनब एतेक कष्टकर छलए तकरा शब्दमे उतारि पोथीक रूप देब, बड़ सहासक काज रहल होयत। कतेको एहेन दृश्यक चित्राण अछि, जे भावविह्वल कऽ देत पाठक कें।

बेटाक अस्पताल मे भर्ती होएबाक जनतब रहितहुँ बेटा-पुतहु सँ दूर रहबाक भवेश आ हुनक पत्नीक विवशता आ हुनकर सभक प्राण सदिखन बेटा पर टाँगल रहब। एक टा नवविवाहित जोड़ा आरती आ सुरेसबाक बिछुड़ब सेहो हृदयविदारक।

बैंककर्मी अविनाशक अस्पताल मे भर्ती होएबाक दृश्य सँ सुरुह भेल उपन्यासक कथानक मूलरूप सँ  हुनकर कार्यस्थल पर संक्रमित होएबाक संभावना सँ प्रारम्भ होइत अछि। जखन कोरोना टेस्टक उपरान्त आशंकाक पुष्टि भऽ जाइत छनि, तदुपरान्त अस्पताल मे एक टा सीटक व्यवस्था लेल फिरिसान हुनकर परिजन पुरजन। आवश्यक सावधानी राखैत, सकारात्मकता ओ धैर्यक संग कोना बेमारी कें हरओलनि उपन्यासक नायक अविनाश, तकर चित्राण करैत पाठक कें सेहो संदेश देल गेल अछि जे सकारात्मकता ओ धैर्यक बलें लोक जीवनक कठिन सँ कठिन परिस्थिति सँ उबरि सकैत अछि। कोरोना सँ लड़बामे इएह सकारात्मकता, धैर्य आ अविनाशक जिजीविषा अस्पतालक अन्य रोगीक लेल सेहो सहायक सिद्ध भेलनि। जहिना एक टा डरपोक लोक सभ कें डेरा दैत छै, तहिना एक टा अविनाश सन लोकक उपस्थिति अस्पतालक ओहि पूरा हाॅलक लोकक भीतर एक टा विश्वास भरि देलकैक जे ओ सभ निश्चित  ठीक भऽ कऽ घर घुरताह/घुरतीह। विशेष रूप सँ प्रिया नामक अविनाशक समवयस्क महिला रोगी तँ अत्यधिक प्रभावित छलीह अविनाशक बात व्यवहार सँ।

अविनाशक आइसोलेट रहबाक क्रममे सामाजिक संकट सँ कोना त्रास्त रहलाह नायक ओ हुनकर परिवार, से सभटा बिन्दु कें फड़िछा कऽ सोझाँ राखैत कोरोना त्रासदीक चित्राण तेना कएल अछि जे, आबए बला पीढ़ीक लोक जँ पढ़त तँ एहि मृत्युलीलाक तांडव कें अपना सोझाँ होइत देखि रहल छी, तेहेन सन लगतैक। अगिला पीढ़ी लेल ई उपन्यास मैथिली साहित्यक एक टा बहुमूल्य धरोहर अछि। कोरोनाकालक एक टा इतिहासक रूप मे देखल जाएत एहि पोथी कें। अगिला पीढ़ी सेहो निश्चित रूप सँ एहि पोथी कें पढ़ब पसिन करत, जेना विश्व युद्धक समयक खिस्सा किंवा स्वतंत्राता संग्रामक खिस्सा हमसभ एखन पढ़ैत छी।

कोरोनाक प्रभाव सँ लोकक जीवन कोना बदलि गेलैक तकर विस्तृत विवरण दैत अछि ई उपन्यास। जे शब्द सभ कहियो सुनल नहि छलैक से कोरोनाकाल मे बोलचाल मे नित्य प्रयोग होमए लागल, जेना – कोरेन्टाइन, वर्क फ्राॅम होम, ओइसोलेट होएब, सेनेटाइज करब, इत्यादि। जे कहियो वर्क फ्राॅम होम नहि केने छलथि सेहो सभ एहि कोरोनाकाल मे सिखलनि। एहि तरहक छोट-छोट बिन्दु पर प्रकाश दैत कथा आगाँ बढ़ैत अछि जे उपन्यास कें वास्तविकता सँ जोड़ैत अछि। पाठक रिलेट कऽ पाबैत छथि, घटनाक्रम सँ। सभ टा परिस्थिति सभक देखल-सुनल आ भोगल सन बुझना जाइत छै। लोकक सामाजिक जीवन समाप्तप्राय भऽ गेलैक, आगंतुक केर स्वागत लोक सेनेटाइजर सँ करए लागल। लिफ्ट केर बटन दबाबए लेल सलाइक काठी लऽ कऽ घर सँ बहराए लागल, एहि तरहक छोट-छोट बातक उल्लेख अछि उपन्यास मे, जाहि सँ कोरोना वायरसक कारणें लोक कोन तरहें भयाक्रांत छल से बुझबा मे भाङठ नहि रहतनि पाठक कें। कोरोना सँ संबंधित कोनहुँ समस्या एहेन नहि जे लेखक केर नजरि सँ वा कही जे लेखकक कलम सँ छूटल होनि, सामाजिक समस्या हुअए वा आर्थिक, राजनैतिक। एहि कोरोना त्रासदी मे लोक जे कष्ट भोगलक, सभक चर्चा अछि चाहे ओ शारीरिक कष्ट हुअए वा मानसिक।

लाॅकडाउनक विकट समयक चर्चा करैत मजदूर वर्गक व्यथाक चित्राण एना केलनि अछि जेना अपन भोगल होइन। बहुत मार्मिक चित्राण। एक टा प्रसंग मोन पड़ैत अछि। बड्ड मार्मिक प्रसंग अछि, जखन सगुन अपन मौसी सँ फोन पर गप्प करैत कहैत अछि- ‘‘राति दू साँझ होइ गेल रहै। दिल्ली आबए घड़ी छोटका नुनू बोलल रहै जे अबियहो तऽ बहुते चाकलेट आ चनाचूर लेने अबियहो। मौसी! एखनी तक तऽ ओकरा लेल संग मे रखने छिकियै, एत्ती ने भूख लागल छै जे ऊ चाकलेट आ चनाचूर हमर परीच्छा लए रहल हन।’’

तखन मौसी कहैत छथिन ‘‘संगमे छिकऽ तऽ उहे खा लैह नुनू। परान बचा लैह नुनू। परान बचतऽ तऽ सब कथु होइ जेतऽ।’’

समाजक सभ वर्ग, सभ बएसक लोक कोरोना सँ कोना आ कतेक प्रभावित भेल तकर सजीव चित्राण करबा मे लेखक पूर्णरूपेण सफल भेलाह अछि। परिवारक एक टा सदस्य कें संक्रमित होएब पूरा परिवार कें कोन तरहें अस्त-व्यस्त कऽ दैत छै, से ओएह बुझि सकैत अछि, जकर घरक सदस्य पॅजिटिव भेल छलाह आ अस्पतालक फेरा मे पड़ल छलाह।

लक्ष्मी, गृहपति आ हुनकर सभक बूढ़ माए सेहो उपन्यासक मुख्य पात्रा मे सँ छथि। दुनू बेटाक बीच संपत्ति केर बँटवारा करैत काल बूढ़ीक व्यथा एना बहरएलनि, ‘‘एहि सँ दुखद की भऽ सकैछ जे पतिक अरजल धन पत्नी कें खण्ड खण्ड करऽ पड़ैक।’’

उपन्यासक कथानक कें दू भाग मे विभक्त करैत लिखल गेल अछि।  प्रथम भाग मे कोरोनाक पहिल लहरि केर समस्या सभक चित्राण कएल गेल अछि। द्वंद ओ भ्रम कें स्थिति जे छलए तकर सूक्ष्म विश्लेषण देखबा लेल भेटत।

उपन्यासक दोसर भाग मे दोसर लहरि केर भयावहता, ‘मौत का नंगा नाच’ बला भयंकर स्थिति जे छलैक तकरा हू-ब-हू कागत पर उतारि देल गेल अछि। आॅक्सीजन सिलिण्डरक कालाबाजारी, दवाइ लेल अफरा-तफरीक वातावरण, नेता सभक आरोप-प्रत्यारोप, डाॅक्टर सभक बनियागिरी सँ लऽ कऽ वैक्सीन पर राजनीति, सभ बातक चर्चा कएल गेल अछि उपन्यासक दोसर भाग मे।

कोरोनाकाल मे विभिन्न सामाजिक संगठन सभ कोना आगाँ बढ़ि मानवताक रक्षार्थ, संगठित भय काज केलनि तकर चित्राण सेहो कएल गेल अछि। कहबाक माने जे समाज मे सभ तरहक लोक अछि, किछु पतित लोक एहि त्रासदीक लाभ उठएबाक कोनहुँ अवसर नहि छोड़लाह तऽ किछु मानवताक रक्षा करैत निःस्वार्थ भावें अपन सहयोग देलनि, तकरा अनदेखी नहि केलनि अछि लेखक।

ई तऽ भेल कथानक केर गप्प। उपन्यासक शिल्प कें गप्प करी तऽ उपन्यासक भाषा अत्यन्त सरल, बोधगम्य अछि। विलुप्त शब्दक प्रयोगक एक टा नब तरीका अपनाओल गेल अछि लेखक द्वारा। जेना दू टा शब्दक हम उदाहरण देमए चाहब। पहिल ‘कोलिया कोठरी’ आ दोसर ‘पीनी’। एहि शब्द सभक प्रयोग कऽ पुनः ओकर विवरण एक पूरा पाराग्राफ मे कएल गेल अछि जाहि सँ हमरा सन लोक जे एहि तरहक शब्द सँ पूर्णतः अनभिज्ञ होएत सेहो नीक जकाँ बुझि जाएत आ ततेक नीक जकाँ बुझि जाएत जे आजीवन स्मरण रहतैक। शिल्प सँ संबंधित एक टा त्राुटि हमरा देखबा मे आएल जे उपन्यासक पूर्वार्द्ध मे अविनाशक पिताक उपस्थिति ‘पिता’ शब्द सँ छनि, ‘पिता सोचलनि, पिता बजलाह’ आ उत्तर्रार्द्ध मे ‘भवेश’ नाम देल गेल छनि। अविनाशक माए लेल आद्योपान्त ‘माए’ सम्बोधनक प्रयोग अछि जे पढ़ैत काल कंफर्टेबल लागल हमरा। मुदा ‘पिता’ सँ ‘भवेश’ कऽ देब एकरत्ती उटपटाङ सन लागल हमरा।

आब गप्प कथोपकथन केर। कथोपकथन एहि उपन्यासक मजगूत पक्ष अछि। भिन्न-भिन्न पात्राक बोली निश्चित रूप सँ भिन्न हेतैक। दिल्ली मे रहनिहार द्वारा हिन्दीक दिल्ली बला अपभ्रंश भाषाक प्रयोग हुअए वा बेगूसराय कें निवासी मजदूर वर्गक बेगूसराय बला भाषा हुअए, लेखक जेना पात्राक भीतर प्रवेश कऽ पात्राक बोली लिखलनि अछि, जे प्रशंसनीय।

कोरोना त्रासदी पर आधारित एहि उपन्यास कें कथानक, भाषा आ संवाद, शिल्प आ स्पष्ट उद्देश्य, सभ दृष्टिकोण सँ उत्कृष्ट कहल जा सकैछ।

आदरणीय प्रदीप बिहारी यथार्थ कें चित्राण करैत एहेन सशक्त ओ रोचक उपन्यासक सृजन केलनि ताहि लेल हुनका साधुवाद!

Ú

रूपम झा

प्रदीप बिहारीक रचनाक भौगोलिक विस्तार

प्रदीप बिहारी मैथिलीक लोकप्रिय साहित्यकार छथि। करीब चालीस बर्खक हिनक साहित्य सृजनमे एखनि धरि चैबीस टा पोथीक सृजन-प्रकाशन भऽ चुकल छनि आ एखनो सक्रिय रूपें सृजनशील छथि। हिनक एखनि धरिक सृजनमे कथा, लघुकथा, उपन्यास, अनुवाद, नाटक, संपादन आदि उल्लेखनीय अछि। ई मूलतः कथाकार आ उपन्यासकार छथि। मुदा, हिनक अनुवाद, नाटक, लेख आदि देखला पर ई कहल जा सकैछ जे ई मैथिलीक प्रमुख गद्यकार छथि।

कथा संग्रह ‘सरोकार’ लेल प्रतिष्ठित साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त लेखक प्रदीप बिहारी मैथिलीक ओहन लेखक छथि, जिनका ई पुरस्कार मात्रा चैवालिस बरखक बयसमे भेटलनि। हिनकासँ कम बयसमे एहि पुरस्कारकें प्राप्त कयनिहार मार्कण्डेय प्रवासी छथि, जिनक महाकाव्य ‘अगस्त्यायनी’ हेतु ई पुरस्कार प्राप्त भेल छलनि।

बीस बरखक बयसमे हिनक कतोक प्रामाणिक कथा आ पहिल उपन्यास ‘गुमकी आ बिहाड़ि’ (वर्ष 1983 ई.) मे मिथिला मिहिरमे धारावाहिक रूपें प्रकाशित भेलनि आ चर्चित भेलनि। ताहि समय मिथिला मिहिरमे रचना छपिए जायब लेखकक प्रमाणिकता आ स्थापनाक बात होइत छल। से, हिनका अपन प्रतिभा आ साधनाक कारण भेटलनि।

प्रदीप बिहारीक साहित्य (कथा, उपन्यास, नाटक आदि) मिथिलाक माटिपानिकें धयने देश-विदेशक कथा-व्यथा कहैत अछि। हिनक रचनाक विस्तार चतुर्दिक पसरल अछि। देशक ज्वलंत सामाजिक, सांस्कृतिक आ राजनीतिक समस्याकें ई अपन रचनाक विषय बनौलनि अछि, जे हिनक समकालीन रचनाकार सभमे कम पाओल जाइत अछि।

मैथिलीक कालजयी रचनाकार जीवकान्त हिनका मादे कहैत छथि- ‘प्रदीप बिहारी मैथिलीक एक महत्वपूर्ण कथाकार छथि। कथा कहबाक जे ढंग छैक, तकरा ओ प्रभावशाली बनौलनि अछि। कथाकारक सही परीक्षा थिकैक ओ कथामे कतबा विश्वसनीय लगैत अछि। एहि परीक्षामे ओ सफल भेल छथि।

बेसीकाल हुनक कथामे उत्सुकता जगयबाक आ ओकरा कथाक आगाँ      धरि जगा कऽ राखबाक गुण भेटैत अछि। कथाकार एहि गुणक कारणें कथा-गोष्ठीमे आदरपूर्वक सुनल गेलाह अछि।

प्रदीप बिहारी जखन नारी विषयक कथा उठबैत छथि, तँ हिनक साहसकें रेखांकित करबाक स्थिति बनैत अछि। नारीकें मनुक्ख बुझबाक, ओकरा पुरुषक समकक्षी बुझबाक साहस प्रदीप बिहारीक कथा सभमे अछि। तें, ई लेखक महत्वपूर्ण छथि। ई भविष्य लेल आशा जगबैत अछि।

प्रदीप बिहारी बहुत संघर्षपूर्ण जीवन जीलाह अछि। भारत आ नेपालक दुनू कातक मैथिली भाषी समुदायक जीवनकें ओ देखलनि अछि। पायाक ओहि पारक मिथिलाक जखन ओ बात करैत छथि, तँ आर मर्मस्पर्शी भए जाइत छथि। नाटक, फिल्म इत्यादिक सृजनात्मक अनुभव हिनक लेखकीय भाषाकें संयम प्रदान करैत अछि। ई अपन पीढ़ीक संग छथि आ ओहिसँ एक डेग आगाँ छथि।’  संदर्भ: कथा संग्रह ‘मकड़ी’ (प्रकाशन वर्ष 2000)क फ्लैप।

जीवकान्त जतऽ भारत आ नेपालक मैथिली भाषी समुदायक गप करैत छथि, ओतऽ एकटा बात देखबा योग्य जे नेपालक मूल नेपाली समाजक कथा-व्यथा हिनक कथा-उपन्यास सभमे जतेक महत्वपूर्ण ढंगे आयल अछि, ततेक नेपालक मैथिली लेखकक रचनामे सेहो कम भेटैत अछि। ओहि पारक लेखकलोकनि मैथिल समाजक व्यथा, राग-अनुरागकें अपन रचनाक विषय बनौलनि अछि, गैर-मैथिलक विषय कें बहुते कम अपन रचनामे स्थान दऽ पौलनि अछि। हँ, बानगी स्वरूप डा. धीरेन्द्रक रचना ‘हिंचुकैत बहैत सेती’, डा. राजेन्द्र विमलक कथा ‘रामेछापक राम लक्ष्मण’ प्रभृति किछु रचनाकें रेखांकित कयल जा सकैत अछि। ओतहि प्रदीप बिहारीक कतेको कथा अछि, जाहिमे मूल नेपाली समाजक दुख-सुख, पीड़ा, लोकोपचार, जीवन-दर्शन, राग-विराग आदिकें देखल जा सकैछ। यथा- प्रेषित, चनकल सीसा, शरणागत, गमलामे धान आदि कतोक कथा। ई बात हुनक रचनाकें भौगोलिक विस्तार दैत अछि आ मैथिलीकें ओहि समाजमे प्रतिष्ठित बनबैत अछि।

हिनक उपन्यास ‘विसूवियस’ सन् 1986ई. मे छपल छल आ खूबे चर्चित-प्रशंसित भेल छल। एकर दू टा कारण देखल गेल। पहिल ई जे ई पोथी श्रमिक समस्या पर प्रायः पहिल उपन्यास मैथिलीमे छल। नहि, एहिसँ पहिने ललितक ‘पृथ्वीपुत्रा’ अछि। मुदा ओकर श्रमिकक प्रकार फराक अछि। ओ खेत, बजार वा रिक्शा-तांगा आदिसँ सम्बद्ध मजूरक समस्या पर केन्द्रित अछि। मुदा, विसूवियसमे उद्योग माने चाउर-तेल मिलमे काज कयनिहार मजूरक समस्या आ समाधानकें प्रमुखतासँ राखल गेल अछि, से उद्योग आ औद्योगिक समस्या पर लिखल प्रायः पहिल पोथी अछि। एहिमे उद्योगसँ सम्बद्ध सभ प्रकारक मजूरक समस्याकें उठाओल गेल अछि।

दोसर बात ई जे ‘विसूवियस’मे पहाड़ी आ मधेसीक बीचक कटुता आ असमानता, जे ताहि समयक नेपालक राजतंत्राीय व्यवस्थाक गंभीर राजनीतिक समस्याक रूपमे उभरल छल, केर सौहार्द्र बनयबाक बातकें कौशलपूर्वक उकेरल गेल अछि। एहि उपन्यासकें नेपालक मैथिल आ गैर-मैथिल दुनू समाजमे समादृत कयल गेल अछि। नेपालक भद्रपुरक आंचलिकता पर लिखल ई उपन्यास मैथिली साहित्यक वितानकें आर विस्तृत कयलक।

हिनक ई उपन्यास अंचल विशेषक व्यथा-कथा कहितहुँ पूरा दुनियाक मजूर आ ओकर क्षेत्राक गाथा बनैत अछि। ओकर पीड़ा आ समस्याकें समाज धरि पहुँचबैत अछि।

प्रदीप बिहारीक सरोकार कोनो एक इलाकाक नहि, वैश्विक अछि। ओहिना, जेना ई कहल जा सकैछ जे महाभारतक कथा एक परिवार आ बहुत पहिलेक अछि, मुदा ओ पूरे भारतक कथा बनैत अछि आ एखनो प्रासंगिक अछि।

‘विसूवियस’कें मैथिलीक पाठक खूबे पसिन कयलक। एहिसँ हिनक लेखनक प्रतिष्ठा बढ़ैत गेलनि। बहुत गोटें एहि उपन्यासक रचनाक बारेमे कहलनि जे प्रदीप बिहारी मैथिली कें पंचकोसी-दसकोसीक सीमासँ बाहर लऽ गेलाह अछि।

हिनक अन्य उपन्यास यथा- शेष, जड़ि, कोखि आ मृत्युलीला सेहो चर्चित छनि। ‘शेष’मे जतऽ गाममे होइत सांस्कृतिक स्खलन आ नव धनाढ्यक लीलाक कथा कहैत छथि, ओतहि ‘जड़ि’ वैश्वीकरणक कारणें व्यस्त आ छोट होइत जीवनक कथा कहैत छथि। बाजारक दबावक कारणें चिर्रीचोंथ होइत जीवनक कथा कहैत छथि, जकर सरोकार मिथिलाक संग-संग पूरे देशसँ देखाइत अछि।

‘कोखि’ हिनक नव उपन्यास छनि, जकर विषय-वस्तु मैथिलीमे नवीनतम छैक। ई उपन्यास प्रवासी मैथिलक व्यथा, मनोभाव, जीवन दर्शन आदिकें उकेरैत अछि। एहि उपन्यासक कथा स्थल सिलीगुड़ी (बंगाल) अछि। एहिमे भ्रूण हत्या, दत्तक संतान ग्रहण, लिव-इन-रिलेशन आ सेरोगेसी सन विषयकें प्रमुखता आ गंभीरतापूर्वक उकेरल गेल अछि। एहि उपन्यासक भूगोल बंगालक अछि, मुदा अपन माटि-पानिसँ सेहो गसिया कऽ जुड़ल अछि। एहि उपन्यासमे वर्णित विषय सभ पर मैथिलीमे छिटफुट रूपें किछु कथा तँ आयल अछि, मुदा समग्रतामे एहि विषय पर लिखल पहिल उपन्यास अछि कोखि।

‘मृत्युलीला’ हिनक नवीनतम उपन्यास अछि, जे वैश्विक महामारी कोरोनाक त्रासदीक व्यथा-कथाक बात करैत अछि। कोरोना सन महामारी के उपन्यासक विषय बना कऽ एकटा सफल उपन्यासक रूप देब बड़ साहसक बात छैक। कोरोनासँ त्रास्त लोकक यथार्थ आ एहि महामारीकें अवसर बुझि अपन स्वार्थ सिद्ध करैत लोकक यथार्थक चित्राण जीवन्तताक संग एहि उपन्यासमे भेल अछि।

प्रदीप बिहारी अपन रचना सभमे विषयक विविधताकें गंभीरतापूर्वक स्थापित करैत छथि। ओ विषयकें दोहरबैत-तेहरबैत नहि छथि, अपितु नव-नव विषयक संधान कऽ अपन रचनामे अनैत छथि, प्रायः तें अपन समकालीन आ परवर्ती रचनाकारसँ बेरायल छथि।

कथा आ लघुकथा मिला कऽ प्रायऽ दू सयसँ बेसिए रचना कयलनि अछि। शेष विधाक रचना एकर अतिरिक्त। जेना कि ऊपर लिखलहुँ अछि जे ई अपन रचनामे विषयगत दोहराइत नहि छथि। कथा आ लघुकथामे सेहो एहि गपक निर्वाह कयलनि अछि आ एखनो कऽ रहल छथि।

भूमंडलीकरण आ सूचना क्रान्तिक फलस्वरूप दुनिया आँगुर तर गेल अछि। छोट सन इलेक्ट्राॅनिक चिप्समे समटल दुनियामे भेल आ भऽ रहल परिवर्तनकें सूक्ष्मतापूर्वक अपन कथामे गाँथलनि अछि। ओकर लाभ-हानिकें बड़ कुशलतासँ अपन कथा सभमे सहेजलनि अछि। हिनक बहुत रास कथाक विषय मिथिला-लोकक होइतहुँ पूरा देशक बनि गेल अछि आ ताहि स्तर पर प्रशंसित आ लोकप्रिय भेल अछि। कथा- गमलामे धान, शरणागत, प्रेम न हाट बिकाय, लसेढ़ आदि बहुत रास कथा छनि, जे मिथिला आ मैथिलीकें राष्ट्रीय कैनवास पर प्रतिष्ठित करैत अछि। प्रत्येक कथा फराक-फराक विचार आ चिन्तनक मांग करैत अछि।

मैथिलीसँ आन-आन भारतीय भाषामे बेसीसँ बेसी अनुदित होमऽ बला रचनाकारमे प्रदीप बिहारी सेहो महत्वपूर्ण छथि। अपन समकालीन रचनाकारमे तँ प्रायः सभसँ बेसी अनुदित भेनिहार लेखक छथि। साहित्य अकादेमीसँ   पुरस्कृत हिनक कथा संग्रहक अनुवाद हिन्दी, नेपाली, मलयालम, राजस्थानी, डोगरी भाषामे भऽ चुकल छनि। एकर अतिरिक्त हिनक कतोक कथा-लघुकथा सभक अनुवाद हिन्दी, नेपाली, अंग्रेजी, मलयालम, राजस्थानी, डोगरी, गुजराती, ऊर्दू, ओड़िया, असमिया, तेलुगु आदि भाषामे भऽ चुकल छनि आ होइत रहैत छनि आ सम्बन्धित भाषाक स्तरीय पत्रिका सभमे प्रकाशित होइत रहैत छनि।

प्रदीप बिहारी ‘अंतरंग’ नामक अनुवाद पत्रिका सेहो संपादित करैत छथि। ई भारतीय भाषाक हिन्दी पत्रिका थिक। एहिमे विभिन्न भाषा सभक रचना हिन्दीमे प्रकाशित होइत छैक, जाहिमे मैथिली रचना सभक बाहुल्य रहैत अछि। एहि पत्रिकाक संपादन-प्रकाशन मादे ओ कहैत छथि जे मैथिलीमे जे नीक साहित्य लिखल जा रहल अछि, तकर सूचना देशक आन-आन भाषा-भाषीकें होयब जरूरी छैक। अंतरंगक माध्यमे मैथिलीक रचना सभ दोसर भाषा क्षेत्रामे खूबे प्रशंसित भेल अछि।

हिनक सम्पादकीय योगदान सेहो मैथिली भाषा-साहित्यक भौगोलिक विस्तारमे रेखांकित करबा योग्य छनि।

हिनक रचना सभ मनुक्खकें सामाजिक आ समाजकें मानवीय बनयबाक संदेश दैत अछि। संगहि वैश्वीकरणक कारण ह्रास होइत मानवीय संवेदनाकें बचयबाक लेल हिनक रचना संघर्षशील अछि। देशमे भऽ रहल सामाजिक-  सांस्कृतिक परिवर्तनक ध्वनि मिथिलाक गाममे सुनैत छथि आ ओकर प्रभावसँ गाममे होइत परिवर्तनकें अपन रचना सभमे उकेरैत छथि।

देश, काल आ परिस्थितिक अनुसार लेखकक दायित्व सेहो बदलैत छैक। प्रदीप बिहारी जाहि समय लेखन शुरू कयलनि, ओ स्वतंत्राताक बाद लोकक मोनमे भेल मोहभंगक बहुत बादक समय छल। मुदा, सामाजिक असमानता, बेरोजगारी, मानवीयताक क्षरण सनक समस्या मुँह बौनहि ठाढ़ छल। ओ समय देशमे आर्थिक उदारीकरणसँ कनिये पहिलुक समय छल। आर्थिक उदारीकरण आ वैश्वीकरणक कारणें उपजल बाजारवाद आ आन-आन समस्या सभ हिनक रचनाकालक महत्वपूर्ण विषय आ चिन्ता रहल अछि। आ यैह चिन्ता आ चिन्तन, जेना कि हम ऊपर कहल अछि, हिनक रचनामे मनुक्खकें सामाजिक आ समाजकें मानवीय बनयबाक संदेश दैत अछि।

Ú

सोनी नीलू झा

‘अपराजिता’ टीमक उमेद नहि तोड़लनि

मैथिली आ नेपाली समाजक एकटा स्थापित नाम छथि प्रदीप बिहारी। प्रदीप बिहारी जीक परिचय हमरा प्राप्त होइत अछि एकटा रंगमंच सँ। एतय हम हुनक कथा पढ़ि रहल छी, ‘पूर्णियावाली’ जकर मंचन होएबाक छलैक दिल्लीक नेशनल स्कूल आॅफ ड्रामाक सम्मुख सभागार मे।

ओहि दिन ओहो ओतऽ पहुँचल रहथि।

मैथिली नाटकक दर्शकसँ सभागार भरल छल, एहन मे हुनकासँ भेंट मोसकिले छल। ‘पूर्णियावाली’ कथा जखन हम पढ़ने रही तँ मोन मे प्रश्न उठल छल किछु से इच्छा भेल पुछिअनि, मुदा से मोने मे रहल तहिआ। किएक तँ भीड़ बड़ छल, हुनकासँ भेंट केनिहारक। ओहि भीड़मे एकटा हेरायल लोक हमहुँ रही, मोनमे एक-आधटा प्रश्न लेने ठाढ़। खैर!

लगभग दू हजार अठारहक गप अछि। दिल्ली मे फेर एकटा साहित्यिक कार्यक्रममे ओ आएल छलाह। मुदा ओहु दिन ओ मुख्य अतिथि बनि आएल रहथि से हुनक चारूकात भीड़ ओहू दिन खूब छल। एक तँ ओ साहित्यकार छलथि आ दोसर रंगमंचक लोक।

रंगकर्मसँ जुड़ल लोक लग थोड़ बहुत लोक ठाढ़ भइए जाइत छथि, जतय ओ ठाढ़ होइत अछि। आ हुनकर परिवारक तँ ओहुना रंगमंचमे बढ़िया उपस्थिति रहलनि अछि। सएह पैर छलन्हि हुनको संग।

हुनक लोकप्रियता विशेष छनि आ से स्वाभाविके छैक। हुनक मिलनसार स्वभाव आ व्यवहार सहज छनि, से व्यक्तिकें आसपासक लोकक भाव भंगिमासँ बुझबामे आबि जाइत छैक। ऊपरसँ साहित्यक लोक।

जहिया हम रंगमंचसँ जुड़ल रही तँ रंग-जगतमे बहुत रास नाम मे एकटा नाम प्रदीप बिहारी जीक सेहो ज्ञात भेल छल। हुनकासँ हमरा वर्ष 2022 ई. धरि व्यक्तिगत रुपें भेंट नहि छल।

हम एकल नाटक लऽ कऽ पटना गेल रही तँ ओ नाटक देखय आएल रहथि विद्यापति भवनमे। ओहू दिन खूब भीड़ छल नाटकक दर्शक लोकनिक, ओहि भीड़मे हमरा हुनकासँ भेंट भेल। प्रणाम केलियनि, एकटा नीक लोकक जे काज छैक से ओ तहिना हमरा आशीर्वादक संग प्रोत्साहित कएलनि। हमरा एकटा आश्वासन भेटल जे हम एकल नाटक लऽ आगू बढ़ि सकैत छी।

जाहि दिन हुनकासँ गप भेल तँ रंगमंच विषय पर बहुत रास गप भेल। जतय ओ अपन रंगमंचक यात्राक बात सभ कहलनि, ओ खिस्सा बुझब रंगमंचसँ जुड़ल नव पीढ़ीक लेल एकटा सार्थक होएत। जखन सुनलहुँ तँ हमरोमे ओज भरल, आ एतेक चुनौती भरल उतार चढ़ावसँ ओतप्रोत मैथिली रंगमंच टिकल रहबाक लेल प्रेरित करैत अछि। जखन ओ कहलनि जे नाटक करऽ लेल ओ सभ रिहर्सलक बाद  दोकाने-दोकान जा कऽ चंदा ओसुलैत रहथि। आ तखन फेर नोकरी चाकरी कतेक संघर्ष तहियो छलैक।

ई चुनौती एखनो बनले अछि रंगमंचमे आ बनले रहत, जाधरि लोकक नेत मे बेइमानी रहत। कखनो लाचारी, कखनो बेरोजगारी आ ककरो तँ मात्रा संग चाही सेहो हलाहलि भेटैछ कहाँ?

हमरा मोन मे एकटा योजना चलैत छल कोरोना समयकाल सँ, जाहिमे हमरा एहन व्यक्तित्व सभक सहायता चाही छल। हम हुनका ओहने भीड़मे पुछलिअनि, ‘‘अहाँ दिल्ली कहिया आएब?’’ उत्तर भेटल, ‘‘एखन तँ नहि। हँ, जँ कोनो साहित्यिक काज भेलैक तँ निश्चिते आएब।’’ हम आश्वस्त भेलहुँ जे जँ हिनका बजाएल जाए तँ ई अवश्य अओताह। हमरा हुनकर फोन नम्बर प्राप्त भेल।

हम दिल्ली अएलहुँ तँ जखन ‘रंगनायिका’ कार्यक्रम करबाक योजना बनल तँ बहुत गोटेकें आमंत्रित केलियनि- जाहिमे बहुत गोटे हँ, नहि, हँ नहि, दोमरजा मे रहथि। प्रदीप जीकें फोन करबाक लेल सोची, मुदा फेर राखि दी। दोसर काजमे लागि जाइ, किएक तँ समयक लोक व्यवहार देखि होइत छल जे इहो तँ नहिए एताह, तँ करियौन काॅल की नहि करियौन।

मुदा मोन मे एकटा उमेद छल जे ओ पटनामे कहने रहथि जे कोनो साहित्यिक कार्यक्रम होइत अछि आ हमरा सूचना भेटैत अछि तँ हम अवश्य अबैत छी, जँ हमरा लग समय रहैत अछि। हम काॅल कएलियनि, कहलनि बाद मे कहब अपन आॅफिसक समय सैड्यूल देखि कऽ। हमरा बुझा गेल आब इहो नहिए अएताह। किएक तँ धियापुता पर भरोस करब, ओकरा सभकें प्रोत्साहित कयनिहारक अभाव छैक एहि समाज मे। एकदमे नहि छैक से नहि, मुदा तँ ई पतियाए पड़त जे बहुत कम्मे लोक छथि। ओहन मे एकटा प्रदीप बिहारी जी ‘अपराजिता’ टीमक उमेद नहि तोड़ि एकटा आर प्रतिमान गढ़लनि।

आ एहिमे निधोख कहि सकैत छी हम जे हमरा मदति कएलन्हि ऋषि बशिष्ठ जी। ओ मधुबनीमे रहैत छथि। हुनका हम बाल साहित्यक लेखक आ ‘सियाक सकल देखि’ नाटकक लेखकसँ जनैत रहियनि।

प्रदीप बिहारी जी रंगनायिका 2022 ई. मे आबि हमरे टा नहि अपराजिताक सम्पूर्ण टीमक अथवा ‘रंगनायिका’ मे भाग लेनहार सभ क्षेत्रासँ आएल  टीमक प्रोत्साहन प्रदान कएलन्हि। ओ क्षण सुखद छल हमरा सभक लेल। ओ दू दिन रहल रहथि आ दुनू दिनक नाटकक साक्ष्य बनलाह। ई हमरा सन नव आ अदना सनक लोकक लेल एकटा उपलब्धिए तँ अछि।

हम आभार व्यक्त करय चाहबनि ऋषि बशिष्ठ भैयाक जे ओ सूचना देलनि, एहि पोथीमे अपन संस्मरण देबाक लेल। हमरा एहि तरहें अपन गप कहबाक अवसर भेटल। ई हम किन्नहुं नहि गमा सकैत रही। एहि सँ नीक आ सुखद तरीका आर की भऽ सकैत छैक अपन मोनक गप कहबाक लेल।

Ú

फेसबुक पर आयल किछु प्रतिक्रिया

प्रदीप बिहारीक कथामे जनसंकट आ जन-आक्रोश एतेक सहजतासँ अभिव्यक्ति पबैत अछि जे बुझाइत अछि जे पाठकक अनुभवमे एकटा आर अनुभव जुड़ि रहल अछि। एकटा निस्सहाय व्यक्तिक गरीबी आ विवशता बेचब सन पत्राकारक व्यवसाय पर दिव्यांगक टिप्पणी अत्यन्त महत्वपूर्ण थिक।

प्रदीपजीक कथाक विषय आ पात्राक चयन सेहो नव स्वाद दैत अछि।

–नारायणजी, कथा ‘दिव्यांग’ पर टिप्पणी/फे बु/ 16.06.2020

मैथिली कथा मे जे किछु कथाकार सब छथि ताहि मे प्रदीप बिहारी विश्वस्त नाम छथि। प्रदीप बिहारी छथि तँ भरोस अछि जे कथा साहित्य मकमकायत नहि।

–गुंजन श्री/अपन ब्लाॅग ‘तिर्यक’ पर/ 15.06.2020

आइ भोरे-भोर मैथिलीक श्रेष्ठ ओ साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त साहित्यकार आदरणीय प्रदीप बिहारी जी द्वारा उपहार स्वरूप पठायल गेल पोथी सब प्राप्त भेल। लगभग 8-10 दिन पहिले हिनकर एकटा पोस्ट पर पोथी पढबाक इच्छा एवं प्राप्ति हेतु पूछने रहियनि। हिनकर साहित्य अकादेमी द्वारा पुरस्कृत पोथी के भारतक विभिन्न भाषा में अनुवाद भेल अछि एवं जारी अछि। किछ कथा तँ एखने पढ़ि गेलौं। ‘पोखरिमे दहाइत काठ’ नामक पोथीक 2 टा कथा पढलाक बाद हमरा यैह लागल जे  ई साहित्यक संग-संग मैथिली भाषाक प्रति बहुत साकांक्ष छैथ, समय, काल ओ कथानक के संग-संग पात्राक माध्यमसँ एकहि कथा मे बेगूसराय, मधुबनी, दरभंगा ओ मिथिलाक अन्य स्थान पर बाजऽ जाइ बला बोली/उपभाषा(कपंसमबज) के प्रयोग केने छैथ जे मैथिली भाषा के दीर्घ काल मे बहुत मदति करतै खास कऽ भाषा के नाम पर बंटै के राजनीति खतम हेतै ओ मैथिलीमे समावेशी प्राकृतिक विकास हेतै। एकटा कथा ‘चश्मा’ के किछु पाँति सब देखियौ-

अवधेश पुछलक, ‘‘की?’’

‘‘बोललिअऽ जे थोड़े रूपा दए सकै छहो?’’

‘‘यै किएक?’’

‘‘एल्ड्रिन कीन के अपनो खइबै आ बेटो के खुआ देबै।’’ बाजलि तापसी।

़़ शैलेन्द्र मिश्र/ फे बु/ 23.01.2021

सऽर-समांगक उद्गार

मेनका मल्लिक

अनुखन माधव-माधव रटइत

एहि मासक अंतिम तिथि माने 31 मार्च 2023 कऽ बैंकक नोकरीसँ रिटायर होयताह प्रदीप बिहारी। मुदा, एकटा साहित्यकार आ रंगकर्मी रिटायर नहि होयताह, एकटा नव ऊर्जाक संग नव दायित्वक लेल तैयार भऽ जयताह। हिनक षष्ठिपूर्ति पर हिनका विषयमे लिखैत हमरा भीतर एकटा उहापोहक स्थिति बनि रहल अछि। जहियासँ हम हिनक जीवनसंगिनी छी, तहियासँ हम हिनक साहित्यक प्रति प्रेम आ समर्पणक साक्षी छी। बियाहक बाद जखन हम हिनका ओहिठाम अएलहुँ, तखन साहित्यक प्रति रुचि देखि अवाक् रहि गेलहुँ। बियाहसँ पहिने ई बुझल छल जे ई लिखऽ-पढ़ऽमे रुचि रखैत छथि। मुदा साहित्यमे एहि तरहें मातल छथि, तकर कल्पना नहि छल। बियाह कऽ जखन बेगूसराय अएलहुँ तखन हमर गृहस्थी दू कोठरीक मकानमे छल। चारि गोटेक परिवार। हम दुनू गोटे, हमर सासु आ दिओर। यैह चारि गोटेक हमर दुनिया छल। ससुरकें हम मात्रा फोटोमे देखलहुँ। प्रदीपक इंटरक परीक्षासँ पन्द्रह दिन पहिने स्वर्गीय भऽ गेल छलाह।

लेखनक अलावे प्रदीप यूको बैंकमे कार्यरत कवि बाबा वैद्यनाथ झाक संग मिलि ‘मिथिला सौरभ’ नामक त्रौमासिक पत्रिका बहार करब शुरू कयने रहथि। पत्रिका छपि कऽ आबय तँ हमरे छोटछीन डेरामे रहैत छल। ‘मिथिला सौरभ’ बंडल लऽ कऽ प्रदीप दुमंजिला परहक अपन डेरामे अयलाह। से देखि हमर सासुकें अरचज भेलनि। हमरो। से देखि हमर सासु कहने रहथिन, ‘‘वैदेही, देखू ने ! दू किलो तरकारीक झोरा जे नहि उठबैए, से आध मोनक बंडल कोना उठा कऽ सिरही पर चढ़ि गेल।’’

पत्रिकाक डिस्पैचक बाद किछु प्रति बाँचल छल जे चैकी तरमे राखल रहय। एकदिन घर साफ करबाक क्रममे रद्दी बला अखबारक संग पत्रिकाक बाँचल प्रति सेहो धोखासँ बिका गेलै। किछुए दिनक बाद पुछलनि जे मिथिला सौरभक किछु प्रति चैकी तरमे छल से नहि देखै छी। हम सभ सामान्य रही। ओ बेर-बेर पुछैत रहलाह। हमर सासु कहलनि जे भऽ सकै छै जे पुरना अखबारक संग बिका गेल हेतै। एतेक सुनितहि हुनक मुँह तामससँ लाल भऽ गेलनि। आॅफिससँ आयले रहथि। माय पर तामस व्यक्त नहि कऽ सकैत छलाह। हमरो किछु नहि कहलनि। चुपचाप कोठरीसँ बहरा गेलाह। घुरि कऽ अयलाह तँ चुप। ककरोसँ गपसप नहि। ई क्रम चारि दिन धरि चललनि। पढ़थि, आॅफिस जाथि, खाथि-पिबथि, मुदा घरमे गप ककरोसँ नहि करथि। हुनक चुप्पी हमरा सभकें सालैत रहल। सभसँ बेसी हमर सासुकें। हुनका लगलनि जे हुनका बुतें ई की भऽ गेलनि? ओ बूझि नहि सकल रहथि जे ई नहि हटयबाक छलैक। ई कोनो संस्मरणक रूपमे नहि, साहित्यक प्रति प्रदीपक अटूट प्रेमक गप कहैत छी।

नोकरीक आरंभमे दरमाहा कम छलनि। अर्थाभाव रहैत छलनि। तथापि पोथी किनबा मे हिनका अर्थाभाव नहि बुझानि। आन-आन खर्चके कम कयल जाय मुदा पोथी आ पत्रा-पत्रिका सभ अबस्से किनथि। आरंभक जीवन बड़ संघर्षपूर्ण छल। मुदा, संघर्षमे पैर रोपने रहलाह प्रदीप। विचलित नहि भेलाह।

रंगमंचसँ हिनक लगाव गामेसँ छलनि। रिफाइनरी टाउनशिपक संस्था ‘उगना विद्यापति परिषद्’सँ जुड़लाह। नाटक कयलनि। सांस्कृतिक कार्यक्रम करौलनि। बरौनी रिफाइनरीमे गणतंत्रा दिवस पर झाँकी बहराइत छल। टाउनशिपमे बहुत रास मैथिल छलाह, मुदा ओहि झाँकीमे मिथिलाक प्रतिनिधित्व नहि होइत छल। पहिल बेर प्रदीपक प्रयाससँ मिथिलाक झाँकी शुरुह भेल। झाँकी बड़ बढ़िया भेलै। मधुबनी पेंटिंगसँ ट्रक सजाओल गेल। पेंटिंग बनौनिहारि बेगूसरायक वनद्वार गामक महिला छलीह। पेंटिंग पर कोनमे अपन नाम लिखने रहथि, जे कि सर्जकक अधिकार होइत छैक। मुदा, रिफाइनरीक झाँकीक इंजार्च जे मैथिल छलाह, कलाकारक नाम पेंटिंग परसँ मेटबा देलनि। प्रदीप मना करैत रहलाह। मुदा, नहि मानलनि। कहलनि जे ई रिफाइनरीक चीज भेलै। प्रदीपकें ई बात बेजाय लगलनि। ओ संस्था छोड़ि देलनि। तकर बाद बेगूसरायक नाट्य संस्था ‘नवतरंग’सँ जुड़लाह। ओना, गणतंत्रा दिवस पर रिफाइनरीमे मिथिलाक झाँकी बादोमे देखओल गेल।

‘नवतरंग’क कर्ताधर्ता अनिल पतंग जी छलाह। प्रदीपक ई गप ओ मानलनि जे नवतरंग हिंदीक संग मैथिलीक नाटक सेहो करत।

जें कि नेपाली हमर मातृभाषा छल, मैथिली आ हिंदी नहिए सन आबय। ताहि समय हमर सासु हमरा मैथिली सिखौलनि। प्रदीप ‘नवतंरग’सँ जोड़लनि। तकर दूटा कारण छल। एक तँ हम नाटक करब तँ भाषा-बोली जल्दी सीखि जाएब। दोसर ई जे जँ संस्थाक अधिकारी अपना घरक महिलाकें रंगमंचसँ नहि जोड़ताह, तँ आन घरसँ महिला कोना औतीह। हम नाटक करब शरुह कयलहुँ, अनिल पतंग जीक बेटी सेहो नाटक करब शुरू कयलक। एकर प्रभाव एहन पड़लै जे अन्तर्राष्ट्रीय मैथिली नाट्य समारोहमे मणिपद्मक नाटक ‘तेसर कनियाँ’क मंचन करबा लेल जखन पटना गेलहुँ तँ आन संस्थाक लोक सभकें आश्चर्य लगलैक जे बेगूसरायसँ एतेक महिला पात्रा कोना भेटि गेलै? तेसर कनियाँ नाटकमे दस टा स्त्राी-पात्रा अछि, जकर भूमिका छओ टा महिला कलाकार कयने छल।

बैंकक दायित्वक निर्वहन, साहित्य आ रंगमंचमे प्रदीप पहिने सन मातल रहलाह। हम घर आ बाल-बच्चाक जिम्मेदारीक निर्वहनमे लागि गेलहुँ। एकटा एहनो समय आयल जे साहित्य आ रंगमंचक प्रति हिनक सघनता देखि कखनो कऽ मन क्षुब्ध भऽ जाय, तामस सेहो उठय। सासु जाधरि संग रहलीह, हमरा बेसी कष्ट नहि भेल। गाम (खजौली) जाइ तँ दबाव भेटय जे प्रदीपकें हम बुझबियनि जे ई सभ छोड़थि। गाममे लोक इहो कहनि जे ई दूरि गेल, नटकिया भऽ गेल। कवियाठी करैए। हमरा कहल जाय जे केहन पत्नी छी जे ब’र काबूमे नहि छथि। हम सभटा सुनी। साहित्य आ रंगमंचक हिनक लगाव देखि हमरा लागय जे हम हिनका ई सभ छोड़ऽ कहि नहि सकै छियनि। कहितियनि, तँ छोड़बो नहि करितथि। सासु कहथि– दू टा कान अछि, लोक जे कहैए से सुनू। करू मुदा अपने मोनक। से हमर सासु एहि दुआरे कहथि जे हिनक साहित्यिक मित्रा सभ आबथि आ हमर सासुकें जे सम्मान दैथि, ताहिसँ हमर सासु अभिभूत होइत गेलीह।

प्रदीप प्रिंटिंग प्रेस खोललनि। एहि दुआरे जे किताबो छापब आ अर्थ लाभ सेहो होयत। मुदा से नहि चललनि। उनटे कर्ज माथ पर आबि गेलनि, जकरा अपन दरमाहासँ सधौलनि।

बेगूसरायमे ‘पहल’ सन पत्रिका नहि आबय। मैथिलीक तँ नहिए। पत्रिका सभ पढ़बाक लेल भेटनि, तें पाँच गोटेसँ पत्रिका कीनबाक भरोस भेटलाक बाद एकटा रीडर्स क्लब शुरू कयलनि। हिंदी आ मैथिलीक पत्रिका मंगाबऽ लगलाह। एकटा अपने कीनथि आ शेष चारि टाक ग्राहक तँ छलनिहें। किछु दिन ई क्लब चलल। किछु आर पाठक बढ़ल। तकर बाद भरोस देल लोक सभ पत्रिका कीनऽमे उदासीन होमऽ लगलाह। इहो बन्द भऽ गेलनि। तखन तय केलनि जे पत्रिका सभक ग्राहके बनि जाइ छी।

एहि क्रममे मैथिलीमे एकटा टेलीफिल्म सेहो बनौलनि।

जीवनक अतिसंघर्षोक समयमे हिनक चेहरा पर हम तनाव नहि देखलियनि। हम कखनो कऽ विचलित भऽ जाइ, मुदा हिनक धैर्य हमरा बल दैत रहल। ई अपन प्रयासमे लागल रहलाह। साहित्य आ समाज लेल हिनका मोनमे जे अयलनि, करैत गेलाह। मुदा, एकटा बात छलनि। भाय आ दुनू बेटाक पढ़ाइक प्रति सचेष्ट रहैत छलाह। परिवारक प्रति सेहो।

हिनक रचना-प्रक्रियामे एकटा बात हम देखैत रहलहुँ अछि। किछु लिखबाक होइत छलनि तँ बाजब कम कऽ दैथि। चेहरा पर कछमछी देखाय लगैत छल। हम सभ बूझि जाइ जे हिनका टोकबाक नहि अछि। मुदा जखन लिखल भऽ जानि तँ अत्यन्त प्रसन्न देखाथि। ई हिस्सक एखनो छनि। रचना पूरा कयलाक बाद प्रसन्नतामे गीत गबैत छथि। ओना, हिनका गीत गाबऽ नहि अबैत छनि।

अपन रचनामे नव-नव कथ्य उठबैत छथि, दोहराइत नहि छथि। घर-आँगन-गाम हिनक रचनामे अबिते छनि, समयक परिवर्तनक संग देश-दुनियाँक अद्यतन बातकें सेहो अपन रचनाक विषय बनबैत छथि, चाहे ओ कतबो छोट बात हो वा पैघ।

प्रदीप एहि बातक प्रयास करैत रहलाह जे साहित्यमे अपन बादक पीढ़ी तैयार करी। ओ मानैत छथि जे कोनो लेखककें लेल इहो आवश्यक जे ओ अपन बादक पीढ़ीकें तैयार करय। तखने साहित्य चलैत रहतैक। आ, एहन काज प्रदीप कयलनि अछि।

कखनो कऽ एकबेरमे कतेको काज ठानि लैत छलाह। पत्रिका बहार करबाक मोन भेलनि तँ भारतीय भाषाक अनुवाद पत्रिका ‘अंतरंग’ बहार कयलनि। बेगूसरायसँ मैथिली पाक्षिक ‘दच्छिन मिथिला’ सेहो बहार कयलनि। साहित्यिक पत्राकारितामे एकटा सुखद बात ई जे ‘अंतरंग’ हिनका देशक आन कतोक भाषामे प्रतिष्ठा आ लोकप्रियता दियौलकनि अछि।

हिनक रचनामे स्त्राी पात्रा प्रमुखतासँ अबैत छनि। हिनक कोनो रचनाक स्त्राी पात्रा कोनो स्तर पर कमजोर नहि होइत छनि। हिनक रचनाक स्त्राी सभ अपना लेल नव बाट बनबैत देखाइत अछि। शायद एहू दुआरे जे ई स्त्राी कें मात्रा स्त्राी नहि, मनुक्ख बुझैत छथि।

ओना व्यक्तिगत जीवनमे सेहो स्त्राी हिनका लेल सम्माननीय रहलनि अछि।

स्त्राी हो वा पुरुष, सभक समुचित विकासक पक्षधर छथि जकर बानगी हिनकर रचना सभमे भेटैत अछि। हिनक रचना ढोंग, पाखण्ड आ अंधविश्वासकें तोड़ैत देखाइत अछि। परती तोड़ैत हलगर जमीन बनयबाक काज हिनकर रचना करैत छनि। संक्षेपमे ई कहल जा सकैत अछि जे हिनक रचना मानवताक पक्षमे ठाढ़ रहैत छनि। संवेदना हिनक रचनामे महत्त्वपूर्ण ढंगसँ उकेरल देखाइत अछि। हिनक रचना यथार्थक बड़ लऽगक होइत छनि। अपन पात्रा सभसँ कतेको प्रकारसँ साक्षात् होइत छथि, तखन ओकरा कागत पर उतारैत छथि।

प्रदीप सरल, सहज आ संवेदनशील लोक छथि। स्वभावसँ विनोदी सेहो छथि। सहज आ सहयोगी स्वभाव कतोक बेर हिनका लेल घातक सेहो भेलनि अछि। मुदा ओहि आघातकें जल्दीए बिसरि जाइत छथि आ पुनः सामान्य भऽ जाइत छथि। सहजता आ स्वभाव नहि बदलैत छनि।

जतबे ई सहज-सरल स्वभावक छथि, ततबे जिदियाह सेहो छथि। कोनो बात जँ मोनमे पैसि गेलनि तँ से कइये कऽ रहताह। चाहे भगवानो आबि कऽ मना करथिन तँ हिनका पर असरि नहि पड़तनि।

आत्म नियंत्राणक धनी छथि। कतोक वर्ष धरि पान खाइत रहलाह। दिनमे दस-बारह टा पान खाथि आ एकदिन मोनमे अयलनि जे पान नहि खयबाक चाही, तँ प्राते भेने छोड़ि देलनि। हम सशंकित रही जे एहन पनखौक एकाएक पान खायब कोना छोड़ि सकैत छथि, मुदा ओ छोड़ि देलनि।

तहिना गुलसँ मंजन करबाक हिस्सक रहनि। सूति कऽ उठलाक बादसँ रातिमे सुतबा धरि पाँच-छओ बेर गुलसँ दाँत माँजथि। एकदिन फेर मोनमे अयलनि जे बेसी भऽ रहल अछि, छोड़ि देबाक चाही आ छोड़ि देलनि। हमरा चिन्ता भेल जे कोना निमहतनि? मुदा निमहि गेलनि।

स्वास्थ्यक प्रति पहिने बहुत बदपरहेजी लोक रहथि। मुदा, पछिला किछु वर्षसँ बड़ सचेत रहऽ लगलाह अछि। भोजन आ दिनचर्याक प्रति सतर्क। समयक मिनट-मिनटक हिसाब राखि उपयोग करैत रहैत छथि।

साहित्यक लसेढ़ तँ हमरो लगा देने रहथि। मुदा जाधरि दुनू पुत्रा पढ़ि-लिखि नोकरी नहि कयलनि, हम अपन साहित्यिक प्रयास बहुत कम कयने रही। तकर बाद पढ़-लिखऽ लगलहुँ। सीखऽ लगलहुँ।

आब जखन ई नोकरीसँ निवृत होमऽ बला छथि, तँ प्रसन्नताक संग डर सेहो होइए। प्रसन्नता ई जे नोकरीमे रहैत एत्तेक लिखलनि, आब आर-बेसी पढ़ताह-लिखताह। डर एहि बातक जे स्वास्थ्यक प्रति लापरवाह नहि भऽ जाथि, कारण नोकरीमे एकटा बान्हल अनुशासन छलनि, से आब नहि रहतनि।

मुदा, हमरा भरोस अछि जे जेना समयक अनुशासन मानैत छथि, तहिना स्वास्थ्यक अनुशासन सेहो मानताह। शुभकामना। ú

सुनील मल्लिक

मल्लिक परिवार आ मैथिली साहित्यक प्रकाशपुंज

हमर कका प्रदीप बिहारी

मल्लिक टोल कन्हौली एकटा कस्बा सन गाम। जतऽ सँ खजौली स्टेशन महज एक कोस पड़ैत छल। कोनो काज बेगरते लोकके खजौली स्टेशन जाइत अबैत रहऽ पड़ैत छलैक। मल्लिक टोलमे एकटा मात्रा किराना दोकान छलैक लम्बो भैयाक जे कहबै तँ साँझो बेगरतामे सम्हारैत रहैत छल। ओना एहि दोकानमे थोड़ेक महग समान भेटैत छलैक तैयो लोकसब एहि दोकानपर रसोइक व्यवस्था लेल जुटले रहैत छल। की नगदी की उधारी, सबहक खाता-पतर रखैत छलाह लम्बो भैया। हमर आँगन आ प्रदीप ककाक आँगन सटले छल। पहिने सबगोटे एक्के आँगनमे रही मुदा बेसी लोक भऽ गेलाक कारणें हमर बाबा अपन आँगन फुटा लेने रहथिन। हमर मल्लिक टोलके पुरबारी दिशक बाधमे बेसी लोकके खेत छल। ओहि दिश अबरजात कने बेसीये रहैत छल।

हम की कहि रहल छी जे हमर परवरिश एहन ठाम भेल जतऽ के लोक गाममे रहैत छल। हमर प्रदीप कका सेहो गामक पात्रा छथि। कालखण्डमे लोक जखन गाम सँ रोजी रोटी आ नोकरीक बहन्ने बहराय लागल तखन लोक शहर धऽ लेलक। एहि पात्रा मे सऽ एक पात्रा छथि हमर प्रदीप कका। हमरा ओ समय एखनो याद अछि जे हम गामक स्कूलमे पढ़ैत रही। होरिला के दरबज्जा एखनो याद अछि। तासक चैखड़ी चलैत रहैक नित्यहुँ। तास खेलऽ नहि आबय मुदा देखऽमे बड्ड मोन लागय। सबहक जीवन अभावमे बीतैक। मल्लिक टोल सँ सटले मलहटोली रहैक। बेचना के चप आ कचरी के गमक बड़ प्रभावित करए हमरा। छनलाहा पापड़ तँ ओतबे बेजोड़। निमकी बिस्कुट आ चाहक संगम जे अद्भुत लगैत छल, से की कहू? स्वर्गो के आनन्दक अनुभूति होइत छल। हमर बालमन बड्ड जीबलाह रहए। हमर दाइ(पितामही) हमरा बड्ड मानए। हमरा जँ क्यो एकबेर टोंगि दैत हमर दाइ सातो पुरखा के उखलि दैत छलैक। एकदिनक घटना ई भेलैक जे हम एकगोटे के घर सँ नओ टा एकटकही चोरा लेलियैक। बेचना दोकानक चप आ कचरी, पापड़, निमकी, बिस्कुट चाहक अम्बार लागि गेल हमरा संगे। नओ टका तहिया बड्ड बेसी नहि तँ कमो नहि मानल जाइ। हमर खेबाक रफ्तार देखि सबके शंका लागि गेलै। ओइ शंका करऽवलामे सबसँ ऊपर रहथि हमर प्रदीप कका। हमरा याद अछि आ एखनो ओ चोट उद्वेलित कऽ दैए जहिया हमरा प्रदीप कका दू सटका मारने रहथि आ सब सत्त बाहर कऽ लेलथि ओहि रुपैयाक सन्दर्भमे। हमर दाइ तँ की ने कहलकनि हिनका मुदा हिनका लेल धन सन। बिगड़ि रहल अछि काकी अहाँक पोता…। ओ शब्द एखनो याद अछि। हमर बानि सुधरि गेल छल। नहि जानि ओ सटका हमरा सुधारलक कि चेतना जागल पता नहि, मुदा एहन भऽ गेल।

बडका दलान जे हमर हमर बाबा बनौने छलाह, ओतय पढ़ाइ-लिखाइ चलऽ लागल। कहियो काल हिसाब बना दैथि प्रदीप कका। प्रदीप ककाक सुन्दर हिरो जकाँ चेहरा एकटा आदर्श सम्मान आ भयमिश्रित अवस्थाक त्रिवेणी छल हमर बालमनक लेल। हमरा साकांक्ष रखबाक लेल कोनो आँखि हमरा देखि रहल अछि, से भान होइत छल हमर बाल्यकालमे। हमर गामसँ सटले कमलाक धार बहैक। जहिना बाढ़ि तहिना दाहर लोक के परेशान करैक, तहिना माछक अबारमे कपड़ाक टुकडामे अँगनेमे माछ छनबाक मजा अलगे छलैक। एतबे नहि बाढ़ि मे पानि मात्रा आँगन नहि हमरा सबहक घरमे सेहो पैसि जाइत छल। एहन परिस्थितिक लेल बाध्य छल ई गाम आ गामक लोक। एहनास्थितिमे लोक एहि ठाम सँ पलायन करऽ लागल। एहिक्रम मे हमसब जनकपुर आबि गेलौं आ प्रदीप कका नोकरीक खोजमे नेपालक झापा पहुँचि गेलाह। झापा आ मल्लिक टोलक जुड़ाव बड्ड पुरान अछि। सबसँ पहिले हमरे बाबा झापा गेल छलाह आ तकरबाद तँ बुझू जे मल्लिक टोलक बहुतेरास लोक पुरब के रस्ता पकड़ि लेलथि। झापा एकटा घर जकाँ लगैत छल मल्लिक टोलक लेल। प्रदीप कका झापाक आयाबारीक स्कूलमे विज्ञान शिक्षकक रूपमे बहाल भेलथि। ओत्तहि सँ हमर काकी मेनका के अनलथि। परिवारमे बहुत बबाल भेल छल मुदा एक गोट नीक संयोग भेल जे कका के नोकरी भारतीय स्टेट बैंक मे भऽ गेलनि आ ओ बेगूसराय मे अपन ठेकान स्थापित कऽ लेलथि आ एकटा जिम्मेवार बैंकर्सके रूपमे स्थापित भेलथि।

प्रदीप कका के बच्चे सँ कथा कहबाक, लोक सब के मनोरंजन करेबाक, गाममे नाटक खेलेबाक बहुत मोन रहैत छलनि। हमरा गाममे चित्रागुप्त पूजाक अवसर पर सब साल नाटक होइत छल। गाम मे स्त्राीक भूमिका तहिया पुरुषे करैत छल। हमर प्रदीप ककाक सुन्दरतेक कारण हिनका महिलाक भूमिका देल जाइत छलनि। हमरा सावित्राी सत्यवान नाटकक सावित्राीक भूमिकामे प्रदीप ककाक जीवन्त अभिनय एखनो याद अछि। ताहि समयमे मिथिलामिहिर पत्रिका पटना सँ निकलैक आ हिनक कथा ओइ मे पहिलबेर छपल। हिनक खुशीक ठेकान नहि रहनि। कका कतेक बेर अपन कथा पढ़लथि, से नहि जानि। हमर बाबूजी सेहो तहिना बेर-बेर हिनक कथा हमरा सब के पढ़ि-पढ़ि कऽ सुनबैत रहथि। प्रदीप कका जतऽ गेलथि अपना संगे साहित्य लेने गेलथि, अपन भाषा मैथिली लेने गेलथि।

विज्ञान शिक्षकक रूपमे झापामे रहलथि, किछु पैसा होइन तँ पत्रिका बहार करथि। हिनक भीतर के लेखक ततेक ने जोर मारलकनि जे भद्रपुर झापा सँ हिलकोर पत्रिका मैथिली त्रौमासिकक रूपमे निकालथि। भद्रपुर झापा प्रवासक दौरान हिनक कयल काज एखनो मीलक पाथर अछि। झापाक मेची नदी, ओत्तुका समाज, चायबगान, जनजीवन, सामाजिक चरित्रा आ ओहने सन स्थितिमे सुनीता सन संघर्षशील महिला पात्राक कथा ‘मकड़ी’ मे ओझरायल जीवन आ कटु यथार्थक चकरघिन्नीमे फँसल महिला चरित्रा, ओकर ममता शहर होइक वा गाम, नहि बदलैत छैक। महिला शोषित दमित उत्पीडित रहैत आयल अछि एहि पुरुषवादी मानसिकता सँ भरल समाजमे। हिनक कथाक पात्रा बेसी ठाम शोषित लाचार अबोध रहैत अछि जे पात्रा अपन संघर्षक कथा कहि मकड़जाल सँ किम्बा  बाहर निकलि जाइछ वा पाठक के बेचैन कऽ दैत अछि। एहि परिदृश्यमे विचार करी तँ हिनक कथा माक्र्सवादी चेतना आ फ्रायडक चेतनाक मिश्रित रूपसँ अभिभूत अछि। तें हिनक कथामे बाबा नागार्जुनक ओज सेहो आबि जाइछ तँ राजकमलक स्त्राी चरित्रा, देह भूख सभक भाव देखबामे अबैछ। कहल जाइछ जतऽ अहाँ जाइ ओतुका भाषा भेष समाजक चरित्रा नाम गाम भूगोल सब के समावेश कऽ जँ ओहिठामक कथा कहल जाइ त ओ बेस प्रभावकारी आ कालजयी होइछ। प्रदीप बिहारीक रचनाक पात्रा जाहि भूगोल सँ रहैछ ओहीठामक सच्चरित्रा वर्णन हिनक रचना सब मे भेटैछ।

पत्रिका बहार करब, सम्पादन करब ई कहियो नहि छोड़लथि। कहबै त एकगोट तपस्वी जकाँ ई साहित्य साधनामे लागल रहलाह। झापाक बाद हिनक वास बेगूसरायक रिफाइनरी कैम्पसमे भेलनि जतऽ भारतीय स्टेट बैंकक नोकरी सेहो केलथि आ संगे जे किछु जमा करथि ताहि सँ पत्रिका बहार करब, किताब छपायब, नाटक करब, फिल्म बनायब, हिनक मूल अभिरुचि भऽ गेलनि। तकरे परिणाम स्वरूप बेगूसराय सँ मिथिला सौरभ पत्रिका बहार भेल। अनिल पतंग संगे मिलि कऽ ‘जटजटिन’ लोकनाटकक सयौं मंचन कयल गेल। ‘अबकी जे बेरिया हो गोपीचन’ मैथिली टेलिफिल्म के कथा-पटकथा लेखन, अभिनय, निर्देशन केलथि। एहि फिल्म मे संयोग सँ हमहूँ संगीतकार आ गायकक भूमिका निर्वहन केलहुँ। हम मधुबनी मे पढ़ैत रही आ कका बेगूसरायमे रहथि। हम कहबे केलहुँ ई स्थिर सँ बैसयबला नहि छलाह। ओतऽ राजकमल जयंती मनेबाक श्रीगणेश केलनि आ एहि दौरान हमरा बेगूसराय गीत गयबाक लेल दू बेर बजौने रहथि। जहिया कहियो कका हमरा खोजथि, हम हिनक घर बेगूसरायमे जायल करी। किताब छपेबाक हिनका भीतरमे जुनून जकाँ हम देखैत छलहुँ। एहि लेल ई प्रकाशन समूह सेहो खोललथि- चतुरंग प्रकाशन। एहि प्रकाशनक मार्फत बहुतरास किताबक संगे भारतीय भाषाक संवाहकक रूपमे ‘अंतरंग’ पत्रिका हिन्दीमे निकाललथि, निकालि रहल छथि। अंतरंग एकटा प्रतिष्ठित पत्रिकाक रूपमे स्थापित भऽ चुकल अछि। केरलक एक प्रतिष्ठित संस्था ‘भाषा समन्वय वेदी’ वर्ष 2022क ‘भाषा समन्वय पुरस्कार’ अंतरंग के देबाक घोषणा कयलक अछि।

साहित्यक प्रायः सब गद्य विधा मे ई समान रूपसँ कलम चलबैत आबि रहल छथि। की कथा, की उपन्यास, की नाटक, सब विधामे ई निष्णात छथि। एकगोट साहित्यकारक संवेदना जखन कोनो कल्पनाशीलतामे पहुँचि जाइछ तँ हृदय जोर मारय लगैत छैक सृजन करबाक लेल। ई बहुत भावुक लोक छथि। हिनक पात्रा सब के, जँ विचार करी तँ हिनक पात्रा सब मे मुख्य महिला रहैत छनि, जकर विविध रूपक चर्च हिनक कथामे भेटैछ। हिनक पात्रा सब कोनो अबोध बालक, कौखन कुकुर, सुग्गा, बगेड़ी, भैंसी, बसक ड्राइभर। एतबे कही जे हरेक शोषण दमन उत्पीड़नक विरुद्धमे हिनक हथियार रूपी कलम बाजि उठैत छनि। हमरा तँ हिनक कथा पढ़ि-पढ़ि अपनो कथा लिखबाक बानि भऽ गेल। कथा, कविता, गीत सब लिखलौं जकर प्रेरणापुं्ज हमर कका प्रदीप बिहारी छथि। आइ मिथिलाक धरती, खास कऽ कऽ कन्हौली मल्लिक टोल एहन सुपुत्रा पाबि गौरवबोध कऽ रहल अछि।

साहित्यकार आ कलाकार सब एकभगाह होइत अछि। जिनका घरमे एकगोट साहित्यकार हुअए, अपन कल्पनाशीलता आ किछं कऽ जेबाक जिद ओकरा थोड़े अन्तरमुखी बना दैछ। हम किछु लेखकक घरक अवस्था देखने छी। कोना साहित्यकारक किताब किलोक भावे कबाड़क हाथे बेचि देल जाइछ। किताब नहि बिकयबाक आ खास कऽ मैथिलीक किताब बेचि कऽ गुजर-बसर करबाक सपना एखनो धरि समाज मे नहि आयल अछि। एहि मादे हमर कका थोड़े भाग्यमानी छथि जे हिनका मात्रा किताब बेचि कऽ गुजर-बसर नहि चलेबाक छनि, तें ई मैथिली संसार मे एखनो मजगूत खाम्हक रूप मे उपस्थित छथि। मुदा इहो सनक कम नहि, जे जे कमायब किताब छपा लेब। आमदनी की हएत, नहि हएत तकर कहियो कोनो फिकिर नहि करब नान्हिटा बात नहि छैक। जे हमर कका एहि मामलामे बिन्दास छथि। समाजके एकटा दिशा देनिहार व्यक्ति कें कष्ट जरूर होइत छैक। हिनक साहित्यमे तपस्या आ साधना कें देखैत भारत सरकार द्वारा साहित्य अकादमी सँ सम्मानित करब एकटा सपना के साकार करब जरूर छैक। ताहिपर सँ हमर काकी मेनका मल्लिक सेहो अँखिगर कथाकार छथि। एहि सन्ता परिवारक सब के लऽ कऽ चलब हमर काकी सेहो नीक उदाहरण छथि। ओना जीवन मे संघर्ष नहि तँ ओ जीवन बेकार छैक। मैथिली साहित्य संसारकें प्रदीप बिहारी सँ बहुत आश छैक आ प्रदीप बिहारी प्रतिक आश हमरा सम्पूर्ण मल्लिक परिवारक लेल आह्लादक विषय अछि। नव-नव कीर्तिमान गढ़ि-गढ़ि कऽ मैथिलीक कोठी मे एहिना भरैत रहथि, माँ मैथिलीक प्रति कर्तव्यबोध देखबैत रहथि, से शुभकामना।

Ú

अर्चना

भैया: हमर घरक गार्जियन

परम आदरणीय भैया के साइठम जन्मदिन पर बहुत-बहुत बधाई! हम जहिया सँ हुनका देखैत छियैन्ह, हुनकर साहित्य के प्रति समर्पण देखि कऽ स्तब्ध भऽ जाइत छी। बैंकक नौकरी के संग लेखनी, सर-संबंधी आ परिवार के एक साथ लऽ कऽ चलनाय आसान काज नहि छैक। हिनक पोथी ‘उजास’ हम कतेको बेर पढ़ने छी। ई कथा संग्रह जीवन के एतेक सहज रूप मे दर्शन करबैत अछि जेना लागत जे सभटा पात्रा हमरे घर-परिवार आ समाजक अछि।

बरख 2007 में जखन हिनक कथा संग्रह ‘सरोकार’ के साहित्य अकादमी पुरस्कार देबाक घोषणा भेलै, ओ क्षण हमरा सबहक जिन्दगीक अविस्मरणीय क्षण भऽ गेल। हम सभ ओहि सम्मान समारोह मे उपस्थित छलहुँ। ताहि क्षण जे गर्व महसूस भेल तकरा लेल निःशब्द छी।

आब जखन भैया नोकरी जवाबदेही सँ मुक्त भऽ रहल छथि, तखन साहित्य के माध्यम सँ समाजक लेल काज करबाक भरपूर समय भेटतनि। आ से भैया करबे करताह। भैया बैसल रहिए ने सकै छथि।

हमर घरक गार्जियन, भैया व दीदी, हिनकर सभ के उपस्थिति मात्रा सँ हमरा सभ के कोनो काज कठिन नहि बुझाइत अछि। खास कऽ हम अप्पन बात कहैत छी जे भैया व दीदी के प्रति हमरा मन मे जे श्रद्धा व सम्मान अछि से हम कागज पर नहि लिखि सकैत छी। ईश्वर सँ प्रार्थना करैत छी जे हमर भैया के स्वस्थ व दीर्घायु रखथिन्ह आ ओ मैथिली साहित्य के अपन सेवा प्रदान करैत रहथि। साहित्य मे एखन जतऽ छथि ताहि सँ बहुत आगाँ जाइथ। बहुत आगाँ। जन्मदिनक अशेष शुभकामना भैया। ú

(प्रदीप बिहारीक अनुजबधु)

आमोद रमण

अहाँक अभिरुचिक साक्षी छी हम

भैया! साहित्यक प्रति अहाँक अभिरुचिक हम साक्षी छी। बैंकक नौकरी मे अपन योगदान देलाक साथे कतेक रास पत्रिका, लघुकथा, कथा संग्रह आ उपन्यासक लेखन आ संपादन संगहि मैथिली सँ नेपाली आ नेपाली सँ मैथिली भाषा मे अनुवाद आ मैथिली फीचर फिल्मक निर्दशन अहाँक साहित्य जीवनक यात्रा मे शामिल अछि। अपन कथा के प्रकाशन लेल ‘देवराहा प्रिन्टिंग प्रेस’ केर स्थापित केनाय स्मरण सँ नहि जा सकैत अछि। बेगूसराय मे मैथिली भाषा मे नाटकक मंचन हमरा जनतबे अहीं शुरू केलौं। बेगूसरायक टाऊन हाॅल मे ‘तेसर कनियाँ’ नाटकक मंचन तऽ अविस्मरणीय अछि।

अस्सी आ नब्बे के दशक मे तऽ अपन घर साहित्यकारक केन्द्र बनल रहैत छल। नवीन भैया आ वियोगी भैया (देवशंकर नवीन आ तारानन्द वियोगी)क अलावे आर-आर साहित्यकार सभक अपना ओहिठाम आयब कतेक नीक लगैत छल, से एखनो सोचैत छी तऽ रोमांचित होइत रहैत छी। एहि क्रम मे ‘सगर राति दीप जरय’ के नहि बिसरि सकैत छी। राति भरि जागि कऽ अलग-अलग कथाकारक नवरचित रचना पर तात्क्षणिक प्रतिक्रिया देनाय सरल काज नहि होइत छैक। मैथिली साहित्य मे एहि तरहक आयोजन ऐतिहासिक अछि। प्राचीन भारत (ईशा पूर्व) मे एहि तरहक आयोजन संगम काल मे होयत रहय।

बरौनी रिफाईनरी टाऊनशिप मे 26 जनवरी कऽ अहाँक पहल पर पहिल बेर मैथिली आ मिथिला दर्शन पर निकालल ओ झांकी अखनो हमरा मन अछि।

अहाँक ‘पोस्टकार्ड’ सँ पत्राचार करबाक ओ आदति नहि बिसरि सकैत छी।

गुरुदेवक प्रति अहाँक समर्पण के सेहो एहि प्रसंग मे नहि छोड़ल जा सकैत अछि। शनि दिन कऽ देवराहा बाबाक सत्संग के आयोजन मोन पड़ैत अछि।

सौरभ आ साकेतक जन्मदिन पर साहित्यिक आयोजन, सामान्य सँ अलग तरहक साहित्य के प्रति लगावक द्योतक छल।

बात रहल हमर, तँ हम अखन जे छी, ओ सभ अहीं दुनू गोटे के कारणे छी। हमरा ई सौभाग्य मिलल अछि जे अहाँ सन भाय के दुलार मिलि रहलअछि। जन्मदिन के असंख्य शुभकामना! अहाँक अनुज रमनजी। ú

प्रणव बिहारी

पितासँ सिखलहुँ पिता हएब…

पितासँ सिखलहुँ हम पिता हएब…आरम्भिक दिनक सीमित दरमहामे आ असीमित दायित्वक जूआ घिचबाक जिदमे, सुचिन्तित डेग बढ़ौनिहार श्री प्रदीप बिहारी हमर पिता छथि। हमरा लोकनिक लालन-पालनमे अपन वृत्ति-उन्नतिक सुदीर्घ आहुति ओ जतेक सहजतासँ द’ देलनि, सर्वथा अविश्वसनीय, मुदा निद्र्वन्द्व सत्य थिक। घनघोर जिद्दी छथि, तें भरिसक हुनकामे परिस्थितिसँ लड़बाक अक्षय ऊर्जा छनि।

घर, दफ्तर आ संयुक्त परिवारक दायित्वक संवेदनशील सन्तुलनकें साधैत साहित्य-सृजनक अपन ‘इश्क’ आ ‘रोमानियत’कें जीवित रखलनि…आरम्भिक दौरक अनुशासनात्मक तारण आ उग्र डाँट-डपटक बाद आइ हुनकर मित्रावत व्यवहार सराबो%

Home
Search
0
Cart
Account
Category
×
×