आब कतेक चुप रहू : दीप नारायण Leave a comment

आब कतेक चुप रहू : दीप नारायण

दीप नारायण

मधुबनी जिलाक भटचौड़ा गामक श्री रामपुकार मंडलक सुपुत्र प्राथमिक लेखन दीप नारायण विद्यार्थीक नामसँ कएनिहार दीप नारायण (15 फरवरी 1984), गजल विधापर साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार पओनिहार मैथिलीक पहिल कवि/लेखक छथि। ई गजलक संगहि कविता, गीत, लघुकथा, आलेख, यात्रा-संस्मरण आदिमे सेहो निरन्तर कलम चलबैत आएल छथि।

लोक आ समाजसँ गहीँर सम्बन्ध रखनिहार युवा कवि दीप नारायण मैथिली कविताक प्रमुख युवा कवि छथि। हिनक विषय-विविधता आ दृष्टि-परिधिक सिमान बहुत अइल-फइल छैन्हि। दीप नारायणजीक कविता संवाद करैत, बतियाइत अछि अपन पाठकसँ। एहि विशिष्टताक कारणेँ हिनक रचना बेसी आत्मीय होइत छैन्हि। हिन्दी एवं मैथिली साहित्यमे स्नातकोत्तर दीप नारायणजीकेँ साहित्यक संग-संग चित्रकलामे सेहो विशेष अभिरुचि छैन्हि। हिनक माय श्रीमती धनेश्वरी देवी मिथिला चित्रकला आ सिक्की-मौनीक सिद्धहस्त कलाकार छथि। एहि तरहेँ कहि सकैत छी जे सृजनशीलता हिनक सोनितमे समाहित छैन्हि। वर्ष 2014मे हिनक पहिल पोथी जे कहि नञि सकलहुँ (मैथिली गजल संग्रह) प्रकाशित भेलनि आ बेस चर्चित सेहो भेलनि। 2015मे एहि पोथी पर चेतना समिति पटनासँ डॉ. माहेश्वरी सिंह ‘महेश’ ग्रंथ पुरस्कार आ साहित्य अकादेमी युवा पुरस्कार (2016) प्राप्त भेलन्हि। हिनक एहि पुरस्कारसँ मैथिली गजलक ख्याति आओरो बढ़लैक अछि। ई अनुप्रास नामक सहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाक संस्थापक एवं समकालीन मैथिली साहित्यक रचनात्मक पत्रिका अनुप्रासक सम्पादक छथि। देशक कतेकहु जगहपर भारतीय भाषा-साहित्यक संगोष्ठीमे मैथिलीक प्रतिनिधित्व क’ चुकल दीप नारायण बिहार सरकारक शिक्षा विभागमे प्रभारी प्रधानाध्यापक रूपेँ कार्यरत छथि। मधुबनीकेँ साधना-स्थल बनाए क्रियाशील रहल दीप नारायण कवितामे डूबल रहैत छथि आ कविता हिनकामे। रचनाशीलतासँ ओतप्रोत दीप नारायणक कलमसँ अनुखन साहित्य फुटैत रहैत अछि जेना कोनो बीआ धरती फाड़िक’ बहराइत अछि।

 
आब कतेक चुप रहू दीपनारायण

कविता एकटा यात्रा थिक

आ यात्रा थिक जीवन
कविताक जीवन-यात्रामे
हम ई नहि कहि सकैत छी
जे हमर कविता समाज आ
देश-दुनियाँमे कोन तरहक
असरि आनि सकैत अछि,
 
मुदा,
ई अवश्य कहब जे
हमर हृदय आ चेतनाक विस्तारमे
एकर प्रभाव स्थायी रहलैक अछि 
 
दुनियाँकेँ देखबाक,
दुनियाँकेँ पढ़बाक,
जीवन जीबाक एकटा
दृष्टिकोण देलक अछि कविता
हमर मनोभावकेँ उच्छ्वासित क’
हमर जीवनमे कतेको गुणा जीवन भरनिहार
ऊर्जाक अजस्र स्रोत देलक अछि कविता
कविता हमर जीवनक एकपेड़ियाकेँ 
स्वाभिमान आ आत्मसम्मानक राजमार्गमे
रूपान्तरित कएलक अछि।

— दीप नारायण

 

विचारक आँच पर कविता

दीप नारायण मैथिलीक एक युवा, तेजस्वी कवि अपन कवितालेखनक अतिरिक्त आरो बहुत रास एहन रचनात्मक काज सब करैत रहला अछि जे मैथिली समाजक ध्यान हुनका दिस आकृष्ट होइत रहलनि अछि। कविता-लेखनक अपन प्रधान काज बनौने छथि आ ताहि लेल सम्मानितो कयल गेला अछि। ‘आब कतेक चुप रहू’ हुनक दोसर संग्रह छनि जकरा एक नजरि देखबाक हमरा सुयोग लागल। अपन एहि संग्रहमे निश्चिते ओ अपन पछिला गंतव्यसँ पर्याप्त आगू बढ़ला अछि आ से एहि कविक प्रति आशा आ आश्वस्ति जगबै बला बात थिक।

मैथिली कविताक प्रेमी पाठक जे थोड़ बहुत छथि, पछिला कैक बर्खसँ एहि उपरागसँ भरल देखल जाइत छथि जे समकालीन समयक जटिलताकेँ पकड़बामे मैथिली कविता लगातार हूसि रहल अछि। कहब आवश्यक नहि जे एकर कारण समाजक राजनीतिकरण तँ छैहे, कवि-समाजक ‘नीक दिन सिंड्रोम’ सेहो छैक, जे स्वयं कवितेक कविताक मूल धर्मसँ तिरस्कृत क’ देलकैक अछि। कविताक मूल धर्म रहल अछि ओहि व्यक्ति वा समूहक पक्षमे ठाढ़ होयब जकरा उत्पीड़ित कयल गेलैए, कतिया देल गेलैए। आइ किछुए कवि छथि, जे शाश्वत विषय वा प्रकृतिमे भागि क’ शरण लेबाक बदला मुस्तैदीसँ अपन समयक जटिलताकेँ पकड़बाक प्रयत्न साहसपूर्वक क’ रहल छथि। मैथिलीक दुनियामे एहन लोकक होयब रेगिस्तानमे नखलिस्तानकेँ होयबाक समान थिक। हमरा खुशी अछि जे दीप नारायण अपन हाल सालक कवितामे एहि दायित्वक प्रति सचेष्ट भेल देखाइत छथि। एहि संग्रहमे हुनकर अनेक कविता एकर दृष्टान्त थिक।

जगजानित तथ्य अछि जे भद्र मैथिल लोकनि अपन शुभ्र साभ्र जीवनमे जते नैतिकताविहीन होइत अछि, तकर ठीक-ठीक प्रतिबिंबन मैथिली प्रतिष्ठानक मान्यता, सम्मान, पुरस्कार आदिमे देखल जा सकैत अछि। दीप नारायण कविता पर कविता लिखैत एहि सब गुपचुपके रहस्य-भेदन करैत छथि। प्रायोजित कवि लोकनिक खबरि लैत एक ठाम ओ कहैत छथि—
जिनका कवितामे
जतेक अछि कविता
ओ समयक ततेक पैघ कवि।

(पैघ कवि)

मतलब, सुंदर छपाइ, नीक गेट अप, चुट्टासँ बीछि-बीछि क’ प्रयोग कयल गेल गमकौआ शब्द सब, बड्ड जोगारसँ अर्जित कयल गेल पुरस्कार सब—ई सब निर्णायक नहि थिक। मैथिलीक कवि होयब आ समयक कवि होयब, दूटा भिन्न भिन्न स्थिति थिक। कवितामे कविता होयबकेँ ओ आरो कैक ठाम परिभाषित करैत छथि। एक ठाम ओ कहै छथि—
जेना कवितामे रहैत अछि कविता
रौदमे गर्माहटि

इजोरियामे इजोत                —

घामक बुन्नीमे मिज्झर रहैछ जेना नोन

हरियर पातमे क्लोरोफिल
जेना गम्हड़ाएल गहूममे दूध।

कोनो बेदराक तोतराइत बोलीमे
जेना रहैत अछि माय। 

(प्रेममे…)


मने, तहिना क’ करैत ओ एक ठाम कहै छथि—
अन्यायक विरुद्ध आबकिछु नहि क’ सकैत छी…
इतिहासक सभसँ गहीँर मृत्यु
मरय चाहैत छी हमरा लोकनि।

(अपंग समाज)
‘हमरा लोकनि’ एतय नीक दिनक मस्तीमे झूमैत मठोमाठ मैथिल समाज थिक आ कहब जरूरी नहि जे मैथिली कवि सब हिनके लोकनिक प्रवक्ता थिका। दोसर दिस, सौंसे समाज कोना कंफ्यूज अछि, दीप नारायणक कवितामे तकरो जिक्र आएल अछि। हालमे जे दंगा भेल अछि, ताहि पर लिखल कवितामे ओ कहै छथि—
एहि बेरुका दंगा
काज केलकैक किछु
जमकल छैक किछु लेहू
एमरीदा छापल जेतैक एहिसँ
चुनाव केर पर्चा।

                                                (दिल्ली दंगाक बाद…)
‘स्पष्ट छैक जे दंगा सेहो प्रायोजित छैक जकर अभिप्राय राजनीतिक अछि। पृथ्वीकेँ बचेबाक अभियानमे शामिल होयब, सभ्य देश हेबाक लेल एक जरूरी कर्मकांड थिक। पानि बचेबाक अभियान एकरे एक अंश थिक जाहि पर दीप नारायण कविता लिखलनि अछि। कहै छथि—
ई बहुत खतरनाक समयमे बीत रहल छी हमरा लोकनि
जखन लोक नहि जानि रहल अछि पानिक मोल
नीलामीक लेल सुखल धारकेँ सेहो लागि रहल अछि बोली
पानि पर राजनीति करैत लोक पर हँसि रहल अछि पानि।

                                                     (पानिक समर्थनमे)
एही सब हाल सूरतिकेँ देखैत एक आर ठाम ओ कहै छथि—
बेकार,
ई कवितामे नव-नव
बिम्बक प्रयोग
जखन कि शहर
लहास भेल अछि आ
मना रहल अछि
गिद्ध सभ महाभोज।

                                                 (नबका साल)
आजुक एहि ‘खतरनाक’ समयमे आम लोक जे पराभव भोगि रहल अछि, दीप नारायणक कविता सबमे तकरो साफ-साफ चित्र सब आएल अछि। ‘साफ’ एहि दुआरे कहै छी एहि कविता सबमे देश आ कालकेँ स्पष्ट चिन्हास सब देखल जा सकैत अछि, ओहि तमाम चालाक कविता सभक विपरीत जकर कवि अपन क्रान्तिकारी कथ्यक अछैतो देश-कालक चिन्हासकेँ नुकौने रहैत छथि। पोस्ट ट्रुथ अर्थक अनर्थ पर हुनकर स्पष्ट विरोध अछि—
कानसँ ठोकराइत अश्लील ध्वनि हमरा
निन्नसँ जगा दैत अछि बेर-बेर

शब्द ककरो बपौती नहि अछि मी लॉर्ड!
जे, जकरा जेना मोन हेतैक
तेना खेलेतैक शब्दक जीवनसँ…

                                                                     (अर्जीनामा)
‘शब्दक जीवन एहि ठाम मात्र शब्देक नहि, आम नागरिकक जीवन सेहो थिक।
अपना समयक यथाशक्य आकलन केलाक पछाति दोसर जे विषय दीप नारायण उठबैत छथि से मिथिलाक आम नागरिकक पराभव थिक। समय एहि तरह लोकसँ लोककेँ तोड़ि देलकैक अछि परिचयक सबटा चेन्ह, दोस्तीक सबटा आपकता तरहत्थी परक बालु जकाँ बहि खसल अछि—
जहिया कहियो
भेटैत छी आब हम
नहि होइए कोनो गपसप
शब्द स्तब्ध भेल
रहि जाइए ठाढ़ एसगर
हमरा-अहाँक बीच

जखन कि साँच ई छैक जे
‘हमर मोन कहियो
बेजाय नहि सोचलक
अहाँ लेल…
                                                         (ठमकल समय)
अनेक ठाम ओ कहने छथि जे एकर कारण की थिक? कारण थिक जाति, धर्म, विचारसँ भिन्न होयब। ई भिन्नता नितान्त स्वाभाविक छै आ एहि देशक सौन्दर्य एही विविधता सभक बीच एकतामे निहित छै। ई समझ समाप्त भेल अछि तँ तकर अर्थ थिक जे लोकतांत्रिक संस्कारक हनन भेल अछि। जाहि समुदाय दिस कविक जुड़ाव छनि तकरा लेल हुनक कहब छनि—
हम दुखकेँ बचाएकेँ रखलहुँ
आ दुख हमरा।

                                                              (एखन आर बेसी जीबाक अछि)
समुच्चा जीवन ओतय एक अखंड संघर्ष थिक। उत्पीड़नकेँ जे कठिनतर बनबैत छैक से सब थिक—
आदमीसँ आदमीक छुआछूत
भेदभाव, ऊँच-नीच, दुराचार

                                                                   (अथबल ईश्वर)
एहनामे उत्पीड़क वर्गकेँ जखन ईश्वरकेँ सेहो अपने पार्टीक बताओल जाइत छैक आ तमाम उत्पीड़नक लेल धर्मकेँ हथियार जकाँ इस्तेमाल कयल जाइछ, कवि ईश्वर पर सेहो नराज होइ छथि। ‘अथबल ईश्वर’ पढ़बा जोग कविता अछि जतय ईश्वरकेँ आँखिसँ आँखि मिला क’ प्रश्न कयल गेलैए—
साँच-साँच कहू
किएक ने ठाढ़ भेलियैक
अत्यचारक खेलाप
अथबल ईश्वर।
(अथबल ईश्वर)
कविताक वितान एहि तरहेँ  तैयार कयल गेलैए जे एकटा शब्द अथबल कहने मानू तमाम निर्घिन गारिक शक्ति एहि शब्दमे आबि गेलैक अछि। मुदा, ई सब जे उत्पीड़ित समुदायक लोक थिका, जाति-धर्मविचारकेँ ओतय कोनो फरक नै छै, बस उत्थर धार्मिक राजनीतिक जे शिकार भेल अछि, रौदी-दाही सेहो ओकरे लेल छैक, विस्थापनक पीड़ा सेहो ओकरे हिस्सामे अबैत छैक। मृत्यु पर एकाधिक कविता एहि संग्रहमे आएल अछि। एकटा कवितामे  मृत्युपरान्त कर्मकांड सभक वर्णन छैक जकर निरर्थकता बतबैत कवि कहै छथि—
लोक ओना मरि त’ तखने जाइए
घर छोड़ि जखन
जाइए परदेस।

                                                                    (परदेस)
कविताक शीर्षक सेहो ‘परदेस’ छैक । एक आन कवितामे ओ एहि समय आ समाजक गतिहत्या पर बात करैत कहै छथि—
धर्म, जाति आ भाषाक जुन्नामे गछारल देस
मोहनजोदड़ोक देबाल पर पीठ अरकौने
पाँच सालक बेटीक देह पर देखि हवसकेँ चेन्ह
डेराएत लहासक शिनाख्तसँ…
                                                                   (एकतीस दिसम्बरक राति)
भयावहता एहिसँ अधिक गाढ़ आर की हेतैक? अपन समाजक मानसिक अपंगता देखैत हुनकर आकलन छनि—
ई समय धकिया रहल अछि हमरा सभकेँ
आ धकियबैत-धकियबैत
द’ आओत पाछू, बहुत पाछू
हमरा लोकनि चलि जाएब
आगुसँ पछिला शताब्दी दिस…
साँपक केंचुआ जकाँ।

                                                            (कविताक वितानमे)
अकारण नहि थिक जे हुनकर एक आन कविताक शीर्षकेँ ‘अपंग समाज’ थिक। एहि संग्रहमे कविक वैयक्तिक अनुभूति सभक सेहो अनेक कविता छैक जतय विगतकेँ संताप आ भविष्यक संकल्प स्पष्ट देखल जा सकैए। कविक हवाइयात्रा, पहाड़क भ्रमण आदिक अतिरिक्त प्रेमकविता सब सेहो छैक। एकटा एहन समय जखन घृणाकेँ प्रधान जीवनमूल्य बताओल जा रहलैए, प्रेमकेँ पक्षमे बात करब, आ सेहो एहि व्यापकताक संग जे—
‘हम अहाँसँ प्रेम करैत छी’
एकर सोझ-सोझ मतलब छैक
अहाँ हमरासँ
बेसी महत्पूर्ण छी।

                                                               (प्रेममे…)
—एक दृष्टिवान युवा कविक अभियानमे उतरब थिक। कविता अपन सामाजिक उद्देश्य जँ नहि रखैत हो तँ ओकर लिखल जेबाक कोनो मूल्य नहि अछि। आ, एहि ‘खतरनाक समय’मे, खतरा सबकेँ परिभाषित आ विश्लेषित करब संभवत: कोनो जिम्मेदार कविक लेल सबसँ करणीय काज थिक। अपना बीचक एक युवककेँ एहि दिस साकांक्ष देखब आँखिक जुड़ायब थिक ।
— तारानन्द वियोगी
(पटना, 3 दिसम्बर, 2020)

हुनक चुपी पर हमर बकार

‘आब कतेक चुप रहू’ कविता संचयनमे अन्तर्वाह्य सत्यक प्रति सजग आत्मनिष्ठाक मृदुल आ कलात्मक अभिव्यक्ति हेतु जाहि प्रकारेँ ललित-कलित, ग्रामगन्धी शब्दक प्रयोग करैत छथि युवा कवि दीप नारायण, से लगैछ जेना प्रेयसीक लोमहर्षक, तन्द्रिल स्पर्श हो। जीवनक पल-प्रतिपलक सत्य-गर्भसँ प्रसवित ई कविता भावबोध आ सौन्दर्य बोधक जे विलक्षण प्रतिमान ठाढ़ करैत अछि से विमुग्धकारी तँ अछिए, उद्बोधक सेहो अछि। अस्तित्व-चेतनाक महासागरमे डुबकी लगा सत्यक मोती बिछनिहार कवि दीप नारायणक कविता यथार्थक स्वीकृति-अस्वीकृति संग जीबैत अछि, हिनका भीतर कविताक एकटा ज्योति निरन्तर उद्भासित भ’ रहल छनि, तेँ पंकिल पलक तलसँ उठल शिवत्व-सम्पन्न सुन्दर सत्यक कमल जखन शब्द-शब्दमे खिलैत अछि तँ मोन महमहा उठैत अछि आ समय थम्हि जाइत अछि। आडम्बरपूर्ण शब्द-विधान आ भाव-वितानसँ अलगट्टे फराक रहनिहार कविक कविता विकलांग यथार्थक  विरूप चित्रखण्ड नहि अछि, पूर्ण यथार्थक सर्वांगीण चित्र अछि, जाहिमे अनुभूत पलक विद्रूपता आ सुरुपता दुनू समाहित छैक—

कनैल बिहुँसैत अछि जतए आँगनमे
ओतए, जतए अकासमे उड़ैत अछि चिड़ै

 शुरु होइछ अंतरिक्ष ओतहिसँ…
ओतहिसँ जीवन आ कविता सेहो।

 (आँगनमे बिहुँसैत कनैल)

कोनो इन्द्रधनुषक रंग काछि कए कविता प्रियाक श्रृंगार नहि करैत छथि कवि, अपितु अपन उभड़खाभर यथार्थ परिवेशकेँ भरि पोख जीबैत, अनुभूतिजन्य सत्यकेँ रसात्मक बिम्ब-प्रतिबिम्ब तथा सटीक प्रतीकक रसायनक संग मिला कए पाठक सङ्ग आँजुर भरि-भरि भरिछाक पीबि आ पिया कए एकात्म भए जाइ छथि कवि। तेँ ओ जीवनवादी कवि थिकाह। मिथिलाक आम्रकुंज, वन-उपवन, च’र-चाँचर, खेत-खरिहानेटा नहि, एकर गरदा-माटि, राहड़ि खेतसँ लए विज्ञानक प्रयोगशाला धरि चलैत रोमान्टिक छू-छाप, राजनीतिक विडम्बना, सामाजिक पीड़ा, प्रहर्ष, उमंग, उत्तेजना, घृणा आ हिंसा-सभ किछु हिनक तिलस्मी लेखनीक स्पर्श पबितहिँ कवितामे जीबि उठैत अछि—

जेना जनमैछ
हरियर दुपतिया गहूँमक बीच

अनगिनित नान्हि-नान्हिटा

सेनुरिया बथुआ

 

तहिना चाही प्रेम
कि तहिना चाही घृणा

 जेना गन्हकी फतिंगा
सेबने रहैत अछि गन्ह।

 (घृणा आ प्रेम)

खाँटी ग्राम्य जीवनसँ बीछल हिनक बिम्ब आ प्रतीक बेजोड़ अछि। किछु अंश देखल जाए—

जेना बिला गेल अछि चिठ्ठी आ तार
तहिना बिला रहल अछि पिरथी परसँ पानि

 पिरथी परसँ पानि नहि
जीवन बिला रहल अछि
 
हमरा सभ आब किछुए दिन बाद…
गूगल पर सर्च क’ क’ देखब पानि
 
पोखरि, धार आ इनारक पेंटिंग बना क’
टाँगब देबाल पर…

 (पानिक समर्थनमे)

एकटा बरफ खाइत बेदरा

 अबैछ घर जखन
बाँचल रहैछ
 

ओकरा लकटीमे
बरफ जतेक

 बस!
 
ओतबे जग्गह चाही
हृदयमे प्रेमक लेल।

(प्रेममे…)

माटिक बहन्ने स्त्रीक सहनशीलताक जे बात कहल गेल अछि अपरिभाषित, अव्यक्त आ अद्वितीय अछि—

माटि बजैत नहि छैक तेँ की!
सहैत छैक बहुत

 आ स्त्री सेहो।
(माटि आ स्त्री)

कवि अपन कल्पनाक प्रयोगसँ बिम्बक सृष्टि करैत छथि, एतय विज्ञानसँ लेल गेल एकटा बिम्ब देखियौ—
विज्ञानक क्वाण्टम एनटेंगलमेण्ट जकाँ

खींचि रहल छल अहाँ दिस बरोबरि
आ हम अहाँक सिनेह-पाशमे गछारल

 बिहुँस’ लागल रही जेना फूल
(देहक परिधिकेँ नाँघि)

बाढ़िक चित्रक माध्यमे समकालीन राजनीति पर कएल व्यंग्य देखियौ—

अथाह पानिमे
डूबल अछि मिथिला

 अकासमे…
मर्रा रहल अछि हेलीकॉप्टर
 

हाथ हिला रहल छथि
मंत्री जी,

 काल्हि,
 
अखबारमे छपत…
‘संकट की घड़ी में हम आपके साथ हैं’

(बाढ़ि: किछु छवि)

समकालीन प्रश्नक संवेदनासम्पन्न उत्तर खोजैत कवि दीप नारायणक कविता परम्परा आ वर्तमानक गर्भसँ मूल्यक संधान कए प्रतिपल गतिशील यथार्थक अनुभूत सत्यकेँ कालजयी स्वर देबामे पूर्ण समर्थ भेल छथि। कविता हिनका लेल समय बिताएब नहि समय बदलैक हेतु थिक। तेँ हिनक कविता कालजयी सृष्टि थिक, ताहिमे कोनो संदेह नहि।

— डॉ. राजेन्द्र विमल 
(विराटनगर, नेपाल, 1 अक्टूबर 2020)
अनुक्रम 
 
विचारक आँच पर कविता
हुनक चुपी पर हमर बकार
आँगनमे बिहुँसैत कनैल
दार्जिलिंग यात्रासँ…
प्रतिक्रिया
प्रेममे…
स्वेटर आ प्रेम
हम के छी अहाँक
एखन आर बेसी जीबाक अछि
जीवनमे घुरए चाहैत छलहुँ हम
देहक परिधिकेँ नाँघि
ठमकल समय
बाढ़ि: किछु छवि
मायक लेल
गाँती
चोरनी
माटि आ स्त्री
निघेस
भूख
भूखक रेघा
दरमाहा
हवाइ यात्राक बाद- 01
हवाइ यात्राक बाद-02
पूर भेल रहए सेहन्ता
घर
फेरसँ लिखबाक अछि पहिल कविता
देशक भविष्य
घृणा आ प्रेम
कविताक वितानमे
समयक घाओ पर पट्टी बन्हैत
पैघ कवि
निठल्ला
साँच बाजएसँ पहिने
पेपरवेट
दिल्ली दंगाक बाद…
एकतीस दिसम्बरक राति
नबका साल
अपंग समाज
पानिक समर्थनमे
अथबल ईश्वर
कविता हमर प्रेमिका अछि
पुरान कविताकेँ पढ़ैत
माथमे घुरियाइए कविता
विचारक आँच पर कविता
अहाँ बाँचल रहब
गामक इतिहास
परदेस
कि होबाक चाही आजुक हमर शब्द
अर्जीनामा
हमरा भीतर पहाड़ अछि

कविता

 

आँगनमे बिहुँसैत कनैल

आइ भोरे

जखन सुरुज अकास पर

धरैत छथि पहिल डेग…

आ पातक सोपान पर

नान्हि-नान्हि

निर्मल, गोल ओसक बुन्नी धरि

नहुँ-नहुँ उतरैत छैक

सिनुरिया किरिन

आँगनक पुबरिआ कोनमे

देबाल पर बाँहि अरकौने

गाछक सभ डारि पर

सोनाक घाँटी जकाँ

लटकल बिहुँसैत देखलियैक

पीअर-पीअर कनैल

कि एकाएक

बाजि उठैत अछि

हमरा मोनमे सहस्त्रहुँ घाँटी

आ घोरि दैत अछि अंतरमनमे संगीत

बसातक स्नेहास्पर्श सिहकीसँ

डोलति हर्षातिरेकमे कनैलक डारि

घरमे…मनमे…अंतरिक्षमे

सौंदर्य घोरैत अछि

आम गाछक फुनगी पर बैसल फुद्दीसँ

बतियाइत अछि कनैल…

स्वभिमानसँ ठाढ़ अभयदान परसैत

खहरि गेल अछि हृदयक अंतसमे

बिहुँसैत कनैल…

कनैल बिहुँसैत अछि जतए आँगनमे

ओतए, जतए अकासमे उड़ैत अछि चिड़ै

शुरु होइछ अंतरिक्ष ओतहिसँ…

ओतहिसँ जीवन आ कविता सेहो।

 

दार्जिलिंग यात्रासँ…

मुह परसँ हेठ क’ कारी ऊनी चद्दरि

गुलाबी कलस थम्हने सुरुजकेँ

कञ्चनजंघाक कान्ह परसँ

हुलकी दैसँ पहिने

जागि जाइत अछि पर्वतक रानी

नव सूर्योदयक छिटकति उजासक बीच

बदलैत बर्फक रंगकेँ काछि

टाइगर हिलसँ खहरि

हैप्पी वेली टी गार्डनमे नित्तह उनटा-पुनटा क’

सुखबैत रहैत अछि अपन घाओ

गत्र पर कए गोट चेन्ह छैक घाओ केर

कनेक गहीँर धरि जा क’ देखबै

एकटा वेदना जमल भेटत

हृदयक भीत पर

जे कि अपने लोकसँ भेटल छैक ओसा क’

नहि जानल गेल अछि दार्जिलिंग

पाङल गेल अछि दार्जिलिंग

नोचल गेल अछि

खोँटल गेल अछि

काटल गेल अछि छेनी-हथौड़ीसँ

ढाहल गेल अछि दार्जिलिंग

नीचा चायक बगानसँ अबैत

कपासक गेठरी उघने बेबस मेघक हेँज

अकास केर सुनाबए चाहैत अछि

माटिक खबरि

की अकास स्थलमे फेर मेघक घर ढाहि दैत अछि

दक्षिणसँ अबैत बसात

बसात एखने भनभनाइत गेल अछि हमरा पाँजर दने

अपन अस्तित्वक यात्रामे

ठेहुन सिकुड़ने सिनकोनाक छाह तर सुस्ताइत

पर्वतक रानी देखि रहली अछि

समयकेँ टाँगल बाँसक छीप पर आ

पहाड़ पर मैदानमे

जत्र-तत्र छिड़ियायल अदखिज्जु सम्बन्ध

अट्टालिकाक छत पर अटकल एक अखरा चुप्पी

सिमसीमाएल सिहकीक संग

पर्यटकक लेल मीठ आह्लाद परसैत आ

नव कपल्स केर दैत खोँछि भरि आशीष

आँखिक भीतर टघरैत

एक गोट दुनियाँ अँगेजने

चौरस्तासँ बाहर भ’

ऑब्जवेर्टरी हिल होइत

जाइत अछि महाकालक मोख धरि

जे कि आब शिवसँ शिला भेल छथि

भारतक सभसँ ऊँच आ विश्वक धरोहरि

घुम स्टेशनसँ ट्वाय ट्रेनमे घूमती काल

बेर-बेर ऐड़ी उचका क’ देखए चाहैत अछि

बतासिया लूपसँ हिमालयक दरद

मिसियो भरि नहि पघिल रहल अछि

विश्वक शान्तिक लेल बनल

उज्जर दप-दप संगमरमरसँ

विश्व शान्ति स्तूप

आब कहाँ भेट रहल अछि शान्ति

बुद्धक शरणमे गेलासँ सेहो

जापानी मंदिर

लाल कोठी

आभा आर्ट गैलरी आ

धीरधाममे हेरैत अछि अपन इतिहास

दार्जिलिंग

कखनो झीसीआइत बर्खामे तीतल

बेधशाला पहाड़ी पर चढ़ि

नेपाल

भूटान

तिब्बत आ

कखनो सिक्किम दिस ताकैत अछि

दार्जिलिंग

कखनो चाय बगान

पहाड़, नद-नदी, झड़ना कखनो

मठ-मंदिर, शहर-बाजार, मॉल त’ कखनो

रॉक गार्डन,

रोपवे, तेनजिंग रॉक, रॉय विला

कखनो चिड़ै-चुनमुन्नी

अकादारुन गाछ-बिरिछ आ ठाढ़ि-पातसँ

कहैत अपन आत्मकथा

कखनो चढ़ैत, कखनो खहरति

एकटा उभर-खाभर अकुलाहटिक संग

औहरि मारैत

कतए-कतए नहि

तकैत अछि दार्जिलिंग

कतेक दिनसँ दार्जिलिंगकेँ।

 

प्रतिक्रिया

जानि ने किए

खौंझा गेलियैक

किएक भ’ गेलियैक बेकाबू

कहैत गेलियैक

छूटल-छूटल बात

दैत गेलियैक उपराग

ने कोनो भाषा छोड़लियैक

ने कोनो दशा

ओहो कहि सकैत छली बात

मानि सकैत छली रोख

द’ सकैत छली उपराग

मुदा,

आँखिमे नोर नुकबैत

प्रतिक्रिया स्वरूप

हमर बातक उतारामे

भाड़ी स्वरे

एतबे बजली—

‘रातिसँ उपासल छी अहाँ

खाएक बेओँत केलहुँ अछि

भोजन क’ लीय’

निर्वाक, निसबद, ठाकुआएल

हम सोंचैत रहलहुँ अनन्तमे

आ कलेमचे खाइत रहलहुँ

तीमन-सोहारी आ हरियर मेरचाइ ।

 

प्रेममे…

एक

एकटा बरफ खाइत बेदरा

अबैछ घर जखन

बाँचल रहैछ

ओकरा लकटीमे

बरफ जतेक

बस!

ओतबे जग्गह चाही

हृदयमे प्रेमक लेल।

 

दू

जखने अहाँ ककरोसँ

कहैत छियैक—

‘हम अहाँसँ प्रेम करैत छी’

अहाँ अपन सम्पूर्ण आजादी

समाप्त क’ दैत छियै।

 

तीन

‘हम अहाँसँ प्रेम करैत छी’

एकर सोझ-सोझ मतलब छैक

अहाँ हमरासँ

बेसी महत्पूर्ण छी।

 

चारि

प्रेम एकटा जहर छैक

बहुत मीठ जहर…

प्रेममे जा धरि

स्वयंकेँ अहाँ

मटिआमेट नहि क’ दैत छियै

बूझिए नहि पेबैक अहाँ

प्रेमकेँ।

 

पाँच

एकटा अनाम

अदृश्य शक्ति

हमरा-अहाँकेँ

भेँट-घाँट करओलक

साइत,

पूर्व जन्मक प्रेम

शेष छल।

 

छह

हम सोचैत रही…

अहाँ बिहुँसि जाएब

बदाम जकाँ

हमर साँसक उष्मा आ

ठोरक नमी पाबि

मुदा,

ई कि हमर प्रेमक आगा

ओछ भ’ गेल आँचर अहाँक।

 

सात

अहाँक मान

अहाँक अपमान

अहाँक प्राण…

छूबि क’ देखियौक

हृदयसँ हृदयकेँ

प्रेम करब कोनो दोख नहि छैक ।

 

आठ

अत्माक बीचोबीच

बरलै, एक दिन

प्रेमक दूधिया इजोत

आ छिड़िया गेलैक

जीवन हमर

इंद्रधनुष जकाँ

सात रंगमे।

 

नौ

सुनै छियैक—

प्रेम कहियो खतम नहि होइत छैक

रूप बदलि-बदलि क’

अबैत छैक जीवनमे

घरक चार पर

पाँखि कोरियबैत फुद्दी

कहीँ हमर प्रेम त’ नहि।

 

दस

हम किछु बाजी

आ कि अहीँ

कोनो खगता नहि

अहाँ देखैत रही हमरा

आ हम अहाँक एकटक

बिनु शब्द आ भाषाकेँ

होबए दियौक प्रेम।

 

एगारह

अहाँक संग भेँट-घाँट

अहाँक संग गप-सप

अहाँ हाथक—

तीमन-सोहारी

हमरा लेल…

उत्सव।

 

बारह

रेलक पटरी

एक-दोसराक

दुखकेँ बुझैत त’ छैक

मुदा,

दुनू मिलैत नहि छैक कखनो

जेना,

एखन

हम आ अहाँ।

 

तेरह

नहि चाही हमरा

धन-संपत्ति

नाम

इज्जति

सोहरति

ईश्वर!

हमरा दिय

हमर प्रेमक सामर्थ्य।

 

चौदह

जेना कवितामे रहैत अछि कविता

रौदमे गर्माहटि

इजोरियामे इजोत

फूलमे सुगन्धि

मधुमे मीठ

घामक बुन्नीमे मिज्झर रहैछ जेना नोन

हरियर पातमे क्लोरोफिल

जेना गम्हड़ाएल गहूँममे दूध

गाममे जुगक-जुगसँ अबैत

लोक कथा रहैछ जेना

कोनो बेदराक तोतराइत बोलीमे

जेना रहैत अछि माय

तहिना हमरामे अहाँ

आ अहाँमे हम

शब्दमे अर्थ आ

भाषामे व्याकरण जकाँ।

 

स्वेटर आ प्रेम

अहाँक ओ स्वेटर

जे बुनला उत्तर

स्वयं पहिर क’ भजारने रही अहाँ

हल्लुक गुलाबी रंगक

से मोन अछि अहाँकेँ ?

हम एखन धरि रखने छी जुगुता क’

जहिया कहियो पहिरैत छी

होइत अछि जे

पँजियौने छी अहाँ भरि पाँज,

आ फेर जखन-तखन हँसोथैत रहैत छी अपन देह,

निघारैत रहै छी अएना,

बतियाइत रहैत छी किछुसँ किछु,

आँखि नहि बुझि पबैत अछि से

सहजे बुझि जाइत अछि हृदय !

एहि स्वेटरकेँ भेटल छैक अहाँक औँरीक सिनेह

अहाँक दीर्घ सान्निध्य,

अहाँक देहक गमकैत सुगन्धि

जाहिसँ महमह करैत रहैत छी हम

ओ सिनेह

जे आइयो हमरा मोन पाड़ैत अछि

अहाँक लगीच होबाक,

ओ सान्निध्य,

जाहिमे ऊब-डुब होइछ कोनो समय

जाहिसँ गमकैत अछि

आइयो हमर साँस

स्वेटर नहि

अहाँक प्रेम अँटल अछि

हमर कायामे।

 

हम के छी अहाँक

हम के छी अहाँक

अहाँ के छी हमर

बाजू ने!

बाजू ने! हम के छी अहाँक

गुम्मी किए लधने छी

कहू ने!

कहु ने…हम के छी अहाँक

हमर हृदयक मुहथरि पर

ठाढ़ भ’ ओ

झकझोरि-झकझोरि

करैत रहली प्रश्न आ हम

बिधुआएल एकटक

निघारति रहलहुँ ओहि चन्नाकेँ

जकर सुन्दर आँखिमे

हवस नहि

भड़ल अछि उमटाम अगबे प्रेम

जकर आँचरसँ चुबैत अछि

टप-टप नेहक बुन्न

जकर भावनाक आँगनमे

उठैत-बैसैत, हँसैत-बजैत

जीबैत छी हम अपन जिनगी

जकरा देखिते हमरा ठोर पर

पसरि जाइए एकटा मुसकी

हृदयमे होइछ सुखद अनुभूति

जकर कानब लगैछ गीत

जकरा हँसबामे छै जीवनक संगीत

ठीके,

ओ हमर के छी

ओ हमर अपन नहि छी

मुदा, छी अपनोसँ बढ़ि क’

किछु सम्बन्ध—

मोनक ओहि आँगनसँ होइछ

जतए अपन-आनक भाव मेट जाइछ

आ तखन नहि रहि जाइछ

बुझब जरूरी

हम के छी अहाँक।

 

एखन आर बेसी जीबाक अछि

हमरा लग एकटा पुरान किताब अछि

ओहिमे फूल अछि एकटा बड़ पुरान

सुखाए गेल अछि फूल

चोकटि कारी स्याह भ’ गेलैक अछि ओकर गात-गात

किताबकेँ बचौने छल फूल

आ फूलकेँ किताब, परस्पर

एक-दोसराकेँ बचौने रहबाक सोन्हाउन गमक

घोरि रहल अछि नहुँ-नहुँ जीवनमे

निरवधि समयक नुकाएल एकटा सपना

मैलमुह पन्नासँ उपटि

दूभिक मूड़ीपर अड़कल ओसक बुन्नीक बरोबरि

ज्योति,

चुबैत अछि हमर चेतनामे

आ सभ्यताक नेहाइपर पिटाइत

हमर बासि देहमे

ब्रह्माण्ड बनि पसरि जाइत अछि

जखन पघिलैत अछि इतिहास

वर्तमानमे बड़ गहीँर धरि देखाइत अछि टघार

गढ़ाइत प्रेमक अकथित व्याकरण

हमर लेखनीसँ टघरल अछि

एखन किछु शब्द…

हम दुखकेँ बचाएकेँ रखलहुँ

आ दुख हमरा

हम फेकब नहि सुखाएल फूल

हमरा,

एखन आर बेसी जीबाक अछि।

 

जीवनमे घुरए चाहैत छलहुँ हम

शेष अछि जीवनक कैनवास पर

एकगोट रंग अहाँ लग…

उदास सेआह रातिक रंग

आँखिक काजर जेना घोरा गेल हो अहाँक

उघि रहल एकगोट सक्कत चुप्पी अपन काया पर

कए युगसँ…

रौद, बसात आ बर्खा गमओने

पतझड़मे झड़ल किछु पातक ओछानि पर

बेबस आ नाचार चिड़ैयक

अधखिज्जु सपना जेना

चितिर-बितिर

हमरो लग पड़ल छल एकगोट रंग

दूर

बहुत दूर

पिरथीक अंतिम  छोड़ पर

जतए धरती आ अकास

एक होइत देखाइत हो

जतए सुरुज अँकुरैत हो गुलाबी रंग लेने

अनंत अकास आ पिरथीक मिलन बिन्दु पर

हमर-अहाँक रंगक मिलनि

आलिंगन आ चुम्बन

जाहिमे घोरल अछि ईश्वरक आँखि

एकहि संग उधकब हमर-अहाँक रंगकेँ

रंगमे मिझ्झर आओर रंग जेना

कवितामे बिम्ब आ शिल्प

देहक धार अपटि, आत्माक गहमे

बहुत गहीँर धरि खहरब

रंगक सूत्र लेने

एक गोट नव चित्र गढ़ब

एक लप मुस्की आ आँखि भरि अकास

एक मात्र ओजह छल…

अहाँक प्रेममे घुरिआएब हमर

जीवनमे घुरए चाहैत छलहुँ हम।

 

देहक परिधिकेँ नाँघि

सभसँ पहिने स्पर्श कएने छल

अहाँक आँखि हमरा

साइंस डिपार्टमेंटक फिजिक्स सेशनमे

थर्मोडायनामिक्सक लेक्चर सुनैत

हमहूँ मुस्किया क’ देने रही

अपन सहमति

फेर,

कॉलेजक लाइब्रेरीमे

हमरा-अहाँक भेल छल बातचीत

हमर हाथ अपन हाथमे लैत

नहुएसँ सन्हिआएल रही अहाँ हमरा भीतर

ऐब्सोल्यूट जीरो टेम्परेचर पर

घोराए लागल रही हम पानिमे नोन जकाँ

किछु दिन बाद…

कहने रही अहाँ प्रेमिका आ

पहिल बेर लेने रही हमर हाथ पर चुम्बन

जेना हरीयर गाछ पर भोरका रौद

अहाँक स्पर्शसँ

सिहरि गेल छल सगर काया

आ खधकए लागल छल हृदयक गहमे प्रेम

भातक अदहन जकाँ

एकगोट अदृश्य डोरि बान्हति रहल हमरा

विज्ञानक क्वाण्टम एनटेंगलमेण्ट जकाँ

खीँचि रहल छल अहाँ दिस बरोबरि

आ हम अहाँक सिनेह-पाशमे गछारल

बिहुँस’ लागल रही जेना फूल

छिड़ियाए लागल रही  जेना सुगन्धि

बुनए लागल रही मोनमे इन्द्रधनुष

पएबाक हदमे सम्पूर्ण प्रेम

ओछा देलियैक स्वयंकेँ जखन

तखन, हमर देहक परिधिकेँ नाँघि अहाँ

स्त्री हेबाक निश्चित बिन्दु पर अटकि

देने रही वात्स्यायनक व्याख्यान आ

खजुराहोक बेजान मुरुत जकाँ

प्रेमकेँ अधुनिकताक अरगनी पर टाँगि

पसारि देने रही ओछानि पर हमर देह

हम त’ चाहने रही सम्मान!

आ अहाँ…?

बुझल अछि, आब अहाँ

कोन नजरिसँ देखब हमरा।

 

ठमकल समय

जहिया कहियो

भेटैत छी आब हम

नहि होइए कोनो गपसप

शब्द स्तब्ध भेल

रहि जाइए ठाढ़ एसगर

हमरा-अहाँक बीच आ

गुम्मे रहि जाइत छी हमहूँ

अहीँ जकाँ…

आ कनीकाल धरि

समूचा ब्रह्माण्डमे पसरि जाइए

एकटा चुपी

संग रहिओ क’ नहि रहैत छी संग

पाँजरमे बैसल अहाँ

बुझाइत रहैत छी

बहुत दूर…एतेक दूर

की आब नहि सुना सकैत छी

कोनो सुख-दुख

देखल आ भोगल अहाँकेँ…

जखन कि साँच ई छैक जे

हमर मोन कहियो

बेजाय नहि सोंचलक

अहाँ लेल…

ई दोसर बात जे,

बुझा नहि सकलहुँ हम

आ कि बुझि नहि सकलहुँ अहीँ

ओना,

हाशिया पर ठमकल समयकेँ

बटैत आपसमे…

एखनो पढ़ि लैत छी हम

अहाँक आँखि

सुनि लैत छी मोनक चुपी।

 

बाढ़ि : किछु छवि

एक

दहि गेलै

कतेक किछु दहि गेलै

माल-जाल

खेत-पथार

आँगन-घर

दहि गेलै

गामक-गाम

मुदा,

बाँचल अछि एखनो

जहिनाक तहिना

पेटक आगि

स्त्रीक नोर

आवाम केर संकट।

 

दू

देखैत छियैक

अपन आँखिक

नोर पीबि क’

घटैत छै की नहि!

बाढ़िक पानि।

 

तीन

मंत्री जी,

नहि घटबियौक

पानिकेँ एतेक जल्दी

हम एखन अँगनेमे

मजि लैत छी

भाड़ा-बरतन।

 

चारि

अथाह पानिमे

डूबल अछि मिथिला

अकासमे…

मर्रा रहल अछि हेलीकॉप्टर

हाथ हिला रहल छथि

मंत्री जी,

काल्हि,

अखबारमे छपत…

‘संकट की घड़ी में हम आपके साथ हैं’

 

पाँच 

पानि

एतेक पानि

कि डूबि रहल अछि

गामक गाम

ओना,

ई दोसर बात जे

पुगल नहि अछि एखनो

कतेको आँखि धरि।

 

माएक लेल

लिखि नहि सकलहुँ हम

चाहियो क’

आइ धरि अहाँक लेल कविता

सोंचि-सोंचि क’

रहि गेलहुँ कए बेर

नहि फुराएल एकहुँ शब्द…

अहाँक चारु कात

एकटा भाषाक अनुभव करैत छी हम

नहि अभरल अछि जे आइधरि कोनो पोथीमे

सम्पूर्ण भाषा छी अहाँ आ

हम मात्र एकटा आखर

अपन कविताक वितानमे

जोगबए चाहैत रही अहाँकेँ…

मुदा, अहाँक कद

हमर कवितासँ बहुत पैघ अछि।

 

गाँती

कए ठामसँ चहकल

एकगोट नूआकेँ

बीचो-बीच दू टुकड़ी क’ फाड़ि

बान्हि देने रहथिन माय

दुनू भाइकेँ गाँती

तकरा बाद,

लाल भेल रहैक

बड़की काकीक आँखि

आ मायक माथ महक झोटा…

तहिएसँ हमरा—

पसिन नहि अछि जाड़ मास।

 

चोरनी

अपन बखरा

थारी हमक भातमेसँ

मुट्ठी भरि

गिलासमे राखि

ध’ देने रहथिन माय

कोठीक तख्खा पर नुका क’

एतबेक लेल…

कएल गेल रहैक

मुलके फेज्झति आ

कहने रहथिन बड़की काकी

हमरा मायकेँ

चोरनी।

 

माटि आ स्त्री

कोदारिसँ…

खनल गेल पहिले

मुक्कासँ गुथल

सानल गेल लातसँ

नचा-नचा चाक पर

बनाओल गेल बासन

सुखा, फेर रौदमे

भट्ठीमे पकाओल गेल

माटि बजैत नहि छैक तेँ की!

सहैत छैक बहुत

आ स्त्री सेहो।

 

निघेस

साँझ परिते अहाँ

भोरका अखबार जकाँ

रहैत छी निसबद

चौपेतल

जेना-जेना

बितैत जाइत अछि राति

उधेसल जाइत छी

अखबारे जकाँ

भोर होइते

सँझुका अखबार जकाँ

भ’ जाइत छी अहाँ निघेस।

 

भूख

ओ अबैत छल

आ हम ओकरा मारि दैत छलियै

ओ फेर अबैत छल

हम ओकरा

फेर मारि दैत छलियै

हम ओकरा

मारैत रहलियै

ओ जीवित होइत रहल

बेर-बेर

मुदा,

एक दिन कोनटा धएने आएल

पएर बाइग क’ आ

हमरे मारि देलक

भूख।

 

भूखक रेघा

हँ, ई सत्य थिक

जे हम लिखै छी, खाली

भूख आ पियास

हमर लेखनीसँ बहराइत अछि

कए दिनुका उपासल केर सोझा

भाँटाक चटनी आ सोहारी

हम लिखै छी…

राशनक बिल केर संग

अभावक गेठरी

‘हाटसँ घुरल माय हाथक खलिया झोड़ा’

लिखलियैक…

मोख धयने ठाड़ सदिखन

दुख-दर्द, अन्हार

जिनगीक गह्वरमे भोगल

सभ दुख-सुख केर हिसाब-किताब

हमरा मुह पर देखल जा सकैए…

भूखक रेघा

बहुत कोसिस केलियैक भाइ

भुखल पेट नहि लिखाइत छैक प्रेम।

 

दरमाहा

चुल्ही निपेतैक

बरतन मजेतैक

पान चिबबैत हमहूँ…

किछु काल बैसबै

बनियाँक दोकान पर

हाटसँ घुरल…

पिताक झोड़ामे रहतनि

नेना-भुटकाक लेल

फोंफी, झील्ली-मुरही, कचरी

खोंखैत छथि

कतेक दिनसँ माय

आब आनि देबै दबाइ

आइ श्रृंगार करती कनियोँ

दरमाहा आएल अछि !

 

हवाइ यात्राक बाद- 01

तड़ाक्…तड़ाक्…तड़ाक्

कए बेर लागल रहैक

हमरा गाल पर तबड़ाक

चिचिएनाइ भ’ गेल रहैक सद्यः बन्न

पिताकेँ बिहुँसल रहनि छाती

फाटल रहनि कुहेश

किनि नहि सकल रहथि

दसमीक मेलामे

हमरा लेल हवाइ जहाज

मायक पएरमे फाटल रहै बेमाय

चिकठ-मोइल नूआ पहिर

काटैत रहथि धान आ

कतेक पसहीकेँ हम

क’ देने रहियैक राइ-छिट्टी

किरताल भेल

अकासमे उड़ैत देखि

हवाइ जहाजकेँ

पितियौतक छोड़ल

ओहि फोटो बला किताबमे

असँ अमरूद, आसँ आम पढ़ैत अकसरहा

ठमकि जाइत छल हमर औँरी

हसँ हवाइ जहाज पर

फेर आगु

कहाँ ससरि पबैत छलहुँ हम

जखन प्राइमरी स्कूलक

पहिल कक्षाक अंतिम पाँतिमे बैसल

कागजकेँ बना हवाइ जहाज

करैत रही अकासमे उड़बाक तैयारी

कि शर्माजी सर हाथसँ छीनि हमर सपना

फारि देने रहथि टुकड़ी-टुकड़ी,

डेन पकड़ि बैसा देने रहथि आगाँ आ

चेतबैत बड़ी जोरसँ खिचने रहथिन कान

ठीके, पहिल बेर भीतरसँ कानल रहैक मोन।

भीड़केँ डरे

नहि जाए देने रहथि पिता

कक्काक संगे

खाजेडीह कॉलेजक फिल्ड पर

देखए लेल हेलिकॉप्टर

जे, आएल रहथि कोनो नेता

चुनावी दौरामे

ई सब गप आबि रहल अछि

एकाएकी माथमे

हवाइ जहाजक पहिल गगन विहारमे

खिड़कीसँ दुनियाँ देखैत काल।

 

हवाइ यात्राक बाद-02

पिताक आँगुर पकड़ि

धनखेतीक मछारि पर चलैत

एकटा बेदरा

अकासक छाती चिरैत

गड़गड़ाइत हवाइ जहाजकेँ देख

हाथ उठा-उठा देखबैत आ

खुश होइत खूब-खूब बहुत देर धरि

किनसाइत, एहू दुआरे

कि काल्हि

एहि पर चढ़ब

हवाक संग लड़ब

होएत ओकरो संग

पिताक नहि छन्हि पलखति मुदा,

सोचबाक लेल हवाइ जहाज

ओ खहरि जाइत छथि

देखबाक लेल धानक खाउर…

निकलि जाइत अछि हवाइ जहाज

माथक सिमानसँ बहुत दूर

धुर पर चढ़ि

अकासकेँ निघारति ओ बेदरा

सोचैत छैक उड़ान आ

हेरा’ जाइत छैक भविष्यक सपनामे।

 

पूर भेल रहए सेहन्ता

घरक टुटलहा चार महक

कोरोक बलधर पर बाँसक फट्ठीकेँ

मड़ुआक जौड़ीसँ मेढ़ि

ओसारा पर बनौने रही हम

मचान

आ,

गोनरि तर पुआरक गद्दा ओछा

करोटे ओंघराएल-ओंघराएल

पहिल बेर अनुभव कएने रही

भरि डाढ़ उपरसँ

धरती पर देखैत अकास,

पूर भेल रहए सेहन्ता

ओ, जे माँझिला कक्का ई कहि—

जे लहि जाएत हमर चौकी आ

उतारि देने रहथि हमरा।

 

घर

पिताक अरजल घराड़ी पर

बड्ड मनोरथे बनौने रही घर

घरकेँ भेटल रहैक

बालू, सीमटी, गिट्टी आ रड

भेटल रहैक राजमिस्त्री आ मजदूर

कतेको दिन धरि चलल रहैक

एहि घरसँ कतेकोक घर

तैयार भेलाक बाद

बहुत धूम-धामसँ

सत्यनारायण भगवानक पूजा

आ अष्टयाम संग

लेने रही हम घरडेरा

मुदा,

नहि भेट रहल अछि हमरा ओ घर

नेओँ लैसँ पहिने जकरा

तैयार कएने रही हम नक्शामे।

 

फेरसँ लिखबाक अछि पहिल कविता

कतेक सुन्दर दृश्य अछि ई—

हमर आँखिक सोझा

जखन केओ घर बनबैत छथि आ

हम साक्षी बनैत छी ओकर मेहनतिक,

ओकर सपनामे अपन सपना साटि

आँखि भरि देखैत छी संसार

लोलसँ बीछि-बीछि

खढ़-पात

लकड़ी-काठी…

अनैत अछि चिड़ै आ

गुलमोहरक दुफेर पर बनबैत अछि

बहुत कारीगिरीसँ अपन खोँता

तहिना बड़ सेहन्तासँ

सभटा स’खकेँ मारि

कोन-कोन जुगुतसँ नहि

बनओने रही हमहूँ घर

घर जकर देबाल

ठाढ़ कएने रही हड्डीसँ अपन

स्वयं खटल रही

राज मिस्त्रीक संग मजदूर जकाँ

सिमटी, बालू आ गिट्टीक मात्रामे

स्वयंकेँ मिज्झर होइत देखने छी हम कए बेर

मोन अछि एखनो पीठ परहक नोनी

से किए मोन अछि!

नहि अछि तकर उत्तर हमरा लग

इटा उघैत काल

तेगार उठबैत काल

बालू चालैत काल

पानि भड़ैत काल

हमरा देखलासँ अहाँ

नहि कहि सकैत छलहुँ घरक मालिक

लेबर संगे खाइ आ

लेबरे संग ओँघरा जाइ भुइँयामे

अप्रतिम शीतलताक अनुभव करैत

मिस्त्री आ मजदूर सभ

मकान बनबैत छल हमर

हम मुदा बनबैत रही घर

गढ़ैत रही एगोट सपना भविष्यक

कि पछबाक नोकसँ टूटैत अछि हमर भ’क

आ देखैत छी हम

उधिया गेल अछि खोँता

एकटक देखैत अछि चिड़ै

धरती पर राइ-छिट्टी भेल अपन सपना

सेहन्ता

मेहनति आ

जीवन अपन

हम कहि सकैत छी

एखन एहि चिड़ैयक

मनःस्थिति ठीक-ठीक हमरासँ

मेल खा रहल अछि…

हमरा किए एना सोचा रहल अछि

फेरसँ सभ समदा सभ जुटाओल होएत कि नहि

आब घर बनाओल होएत कि नहि

बहुत थोड़ अछि मनुखक जीवन

सलाइ महक एकटा काठीक जड़ै भरि मात्रा

एतबेटा जीवनमे बहुत किछु करबाक अछि

अन्तिम मृत्युसँ पहिने

कए बेर मरबाक अछि

सभसँ जरूरीयात काज

फेरसँ लिखबाक अछि पहिल कविता।

 

देशक भविष्य

गेटक-गेट

किताप आनि

इंग्लिश मिडियमक

कहैत छथि पिता…

बौआकेँ डॉक्टर बनेबाक अछि

आ माय इंजीनियर।

सम्हारति पीठ पर बस्ता

मुहचूरू भेल

विद्यालयक फील्डमे खहरैत

बेदराकेँ देख…

हमरा होइए,

देशक भविष्यकेँ एखन

कनेक आओर खेलबाक चाही

माटिमे।

 

घृणा आ प्रेम

प्रेम चाही

घृणा चाही

जे पनुघैत छैक स्वतः

कोनो गन्हाएल प्रयोगशालामे

कृत्रिम विधिसँ तैयार भेल

घृणा नहि चाही हमरा

जे परोसल जाइत अछि

स्वादिष्ठ व्यंजन जकाँ

ताज कि अशोका कि मेरेडियनक

डिनर टेबुल पर

आ कि इस्कुलिया नेनाक लांच बॉक्समे

आ कि अधिकारसँ बंचित

मधेसीक थरीयामे…

जेना जनमैछ

हरियर दुपतिया गहूमक बीच

अनगिनित नान्हि-नान्हिटा

सेनुरिया बथुआ

तहिना चाही प्रेम

कि तहिना चाही घृणा

जेना गन्हकी फतिंगा

सेबने रहैत अछि गन्ह।

 

कविताक वितानमे

हम नहि! अहूँ नहि!

एहि बातक पाछा

व्याकुल अछि

समुच्चा मानव जाति,

कौआ-चील

गाछ-वृक्ष, चुट्टी-पिपरी…

एहि फूल परहक फतिंगा सेहो

विकराल अछि ई समय

से ठीके!

हमरे-अहीँक लेल नहि

समुच्चा पिरथीक लेल…

पिरथीक अंतिम हिचकीसँ पहिने

नहि देखबामे आबि रहल अछि,

एखन ओ, कल्याणकारी नीलकंठ

जे उड़ि-उड़ि क’

अबैत छल बैसए लेल

हमरा घरक सोझाँमे

बिजलीक तार बला पोल पर

नहि पहुँचि रहल अछि कान धरि—

नमाजक आमंत्रणमे मुअज्जिनक अजानक टाहि,

महादेव मंदिरक घण्टा आ आरतीक स्वर सेहो

कू…कू…जतेक बेर कहैत छलियै हम

ततेक बेर हमर कू…कूक प्रत्युत्तरमे

आम गाछक फुनगी परसँ नित्तह

ओ कोइली अपन अवाज मिठाबए लेल

करैत रहैत छली हमरा संगे रियाज

कतए चलि गेली ओ ?

कियो नहि देखलखिन!

गाम-घर, शहर

देस-बिदेस

सिकुड़ि गेल अछि सभ

‘आइशोलेट’ भ’ चुकल छी हम

अपन घरमे, घरक एकटा कोनमे

आ दोसर कोनमे अहाँ

नहि जानि कतेक प्रकाश बर्खक दूरी पर

धर्म-अधर्म

युद्ध-महायुद्ध

अनु-परमाणु

क्रूज-मिसाइल

वर्ण-जाति

खण्ड-पाखण्ड

ढोंग-चमत्कार

भक्ति-अंधभक्ति

वेद, पुराण, उपनिषद

गीता, रामायण, कुरान…

एत’ धरि कि जासूसी उपन्यास पर्यन्त

निसबद अछि

फुटि नहि रहल छनि बकार

नहि सूझि रहल छनि कोनो उपाय

नहि लागि रहल छनि कोनो उक्ति

चौपेतले रही गेलैक उतरबरिया हन्नाक

पुबरिया कोन महक कोठीक कान्ह पर रक्षातंत्र

जेना पोखरिक पानिमे

ढेप मारलाक बाद…

डोलए लगैत छैक मुहक छाह

तहिना डोलि रहल अछि एखन पिरथी

भोरे-भोर हॉकर फेक जाइत अछि अखबार जेना

बिग देलकैक अछि कियो जुमा क’

सुरुजकेँ कारी समुद्रक बीच

ई मंगल वा कि चंद्रयात्रा नहि थिक

जकरा नापि लेबै रॉकेटसँ झट द’

ई चीन, अमेरिका, इटली

रूस, फ्रांस आ भारत… थिकि

ई पिरथी थीकि मीत

एतए दुनू पएर मात्र साधन छैक

जकरा एखन गछेर लेने अछि निठुर समय

समय एखन बटि गेल अछि

कए गोट खेमामे

आ ओ सभ खेमा आपसिमे

क’ रहल अछि वार्तालाप

तार्किक वार्तालाप !

ओहि वार्तालापसँ भ’ रहल अछि

नव-नव विचारक प्रस्फुटन

जकरा ओ सभ मौलिक कहि

बिदेसी लेबुल लागल लिफाफसँ बारह क’

पैक क’ रहल अछि पॉलोथिन बाला पन्नीमे

बात जे किछु हो मुदा,

सत्य आ बहुत कठिन वाक्य अछि—

ई समय धकिया रहल अछि हमरा सभकेँ

आ धकियबैत-धकियबैत

द’ आओत पाछू, बहुत पाछू

हमरा लोकनि चलि जाएब

आगुसँ पछिला शताब्दी दिस…

साँपक केँचुआ जकाँ

हमरा डर अछि

ताहिसँ बेसी हिम्मति अछि

ई जे अन्तिम वाक्य जे ओ कहि रलह छथि

से कोनो कवियेटा कहि सकैत छथि —

हम बचा लेबैक पिरथीकेँ अपन कविताक वितानमे

कविताकेँ डर नहि होइत छैक

बहुत निडर अछि!

ईश्वरसँ पैघ अछि कविता।

समयक घाओ पर पट्टी बन्हैत

बर्ख दू हजार बीसक पूर्वार्ध

आ लॉकडाउनक नव सभ्यतामे साँस लैत

हम किछु दिनसँ…

दस बाइ बारहकेँ एक किरायाक कोठलीमे

‘आइशोलेट’ क’ चुकल छी स्वयंकेँ

जखन कियो एसगर होइत अछि

त’ ओ स्वयंकेँ मोन पाड़ैत अछि वा ईश्वरकेँ…

 

समयक घाओ पर पट्टी बन्हैत

एहन विचार आएल हमरा मस्तिष्कमे

हम समयकेँ हैंगर पर खोँसि—

कोठलीमे हेर’ लगलहुँ किछु डायरी, फाइल्स आ किताबसभ

स्कूलक समयक पुरना डायरीक पँजरामे

तक्खा पर राखल भेटल—

ओ हम स्वयं रही

बहुत बर्खक बाद

ई कहि सकैत छी जे कए बिलियन बर्ख पहिले

पिरथीक इतिहास केर पहिल दिनसँ हमरा भीतर नुकाएल हम

फड़िच्छ भ’ क’ सोझा आएल अछि पहिल बेर

पहिल बेर साक्षात्कार भेल अछि हमरासँ हमरा

ओना हम स्वयंकेँ ताकएक प्रयास

पहिलहुँ क’ चुकल छी, कए बेर

साहित्य, समाज, नोकरी, परिवार आ

बन्ध-सम्बन्धक बीचि

ओझरा क’ समये नहि द’ सकलियै आइ धरि…

झोल-गर्दासँ बोदा भेल हमरा देखि

हमर हाथमे

समय रखलक हमर कान्ह पर हाथ आ

भावनाक बाढ़िमे भसियाइत हम

अतीतक स्मृतिमे टूटल खेलौना जकाँ

उदास देखैत छी स्वयंकेँ…

कि तखने खिड़की पर उगि अबैत छथि सुरुज

आ हमर हाथकेँ ल’ अपना हाथमे सोहरबैत

नहुँएसँ हमरा कानमे कहैत छथि…

बधाइ हो !

बीत गेल बहुत किछुमे तैयो रहैछ बहुत किछु शेष

एखने भरखर आँगनमे फुलाएल अछि

अपराजिताक पहिल फूल

नव दिनक संग…नवका उमंग लेल।

 

पैघ कवि

कविता नहि थिक अभिनय

शब्दकोश त’ किन्नहुँ नहि

एखनुक समयमे

बड़का ‘कंफ्यूजन’ अछि

कविता आ शब्दक कारीगरीमे

पत्रिकामे छपि गेलासँ

छपबा लेलासँ गतगर पोथी

लिखा लेलासँ भरिगर भूमिका

कि मंच पर चढ़ि

क’ लेलासँ कविताक पाठ…

आ की कोनो सम्मान आ पुरस्कारे

ई प्रमाणित नहि करैत अछि

कोनो कविकेँ कवि हैब

आ ने किनको कहि देलासँ

वा लिख देलासँ

भ’ जाइत छैक केओ

पैघ कवि

आ कि छोटे!

जिनका कवितामे

जतेक अछि कविता

ओ समयक ततेक पैघ कवि।

 

निठल्ला

एहन लोककेँ कि कहबै अहाँ ?

जे दोसराक औँरी पकरि क’

चलैत अछि

सदिखन अपेक्षाक बोझ माथ पर उघने

सिमसल किछु आस

किछु बेदना छातीमे दबओने

डेग बढ़बैत अछि

कखनो गिरैत अछि

उठैत अछि कखनो

कखनो रुकैत अछि

कखनो चलैत अछि

दोसराक औँरीकेँ अपन पैर बुझैत अछि!

 

साँच बाजएसँ पहिने

हमर बाजब

बेजाए भ’ गेल अछि

आइ-काल्हि

से मात्र किछु दिनसँ…

हमहूँ बहुत नीक रहियैक

साँच बाजएसँ पहिने।

 

पेपरवेट

केओ अबथि

बइसथि कुर्सी पर

बतियाथि आ चलि जाथि…

किछु नहि बजैत अछि

निर्विकार, निर्लिप्त

देखैत रहैत अछि

गुनैत रहैत अछि

चुप-चाप

कतेकोक आस

कतेकोक जीवन

कतेकोक पेंशन आ कि

कतेको रौदी-दाहीक

कतए लागल छैक अरंगा

रुकल अछि कतेक माससँ

प्रमोशनक फाइल,

ट्रांसफर प्रपोजलमे छैक कोन लफड़ा,

कतेक गेलै ऑफिस

घर कतेक

उपरसँ नीचा धरि

कोन-कोन बाबूक मुँहमे

लागल छै खून…

कहि सकैत अछि

बहुत किछु…

मुदा, टेबुल पर पड़ल

चुपी लधने

मौन साधनामे

लीन अछि पेपरवेट।

 

दिल्ली दंगाक बाद…

एक

शहरक एहि दंगामे

झरकि गेलैए

चूल्हि

पजरलै नहि कए दिनसँ

सुनगैत रहलैक मुदा

एकगोट मायक

करेज।

 

दू

एहि बेरुका दंगा

काज केलकैक किछु

जमकल छैक किछु लेहू

एमरीदा छापल जेतैक एहिसँ

चुनाव केर पर्चा।

 

तीन

क्रिकेटक कमेंट्री जकाँ

गला फारि क’

पढ़ि रहल अछि समाचार

टी.वी. स्क्रीन पर रिपोर्टर

‘मरने बालों की संख्या अबतक अड़तीस’

कैमरासँ हेरैत शहर…

शहरमे दंगा

दंगामे लोक

जखन कि

किछु शेष नहि अछि

आगि आ धुआँक बीच

सिवाय शव-गृहकेँ।

 

चारि

एहि बेरुका दंगामे

हुनक चूड़ी

फूटि गेलनि हाथ महक

खुण्डी सम्हारि क’

रखने छथि

तहियेसँ…

 

पाँच

ककर घर जरलैक

ककर दोकान

के ककरा मारलकै

किएक?

ककरा लेल के मरलैक

के हिन्दु के  मुसलमान

कतएसँ आएल छल

कोन ठामसँ उठल ई दंगाक बिड़रो

कविता नहि

सवाल अछि हमर ई

दिल्लीसँ।

 

एकतीस दिसम्बरक राति

…की गोधूलिकेँ करोट फेरिते

अन्हार गुज्ज रातिमे निसभेर भेल

सुतल अछि चारू भर दुनियाँ

आ हम एसगर बैसल छी उनीन्ने

ओह!

हम किछु आर रहितहुँ

कतेक निचेन रहितहुँ हमहूँ

हमर मोसकिल ई अछि

की हम कवि छी

जगएबाक अछि हमरा

सभ सुतलाहा सभकेँ…

मध्यमा औँरीमे, बुन्नी भरि सुनौली भोर नेने

जागहे पड़तै

तखने हेतैक एकटा

विशाल सुरुज केर प्रस्फुटन

नहि त’

पुरने साल जकाँ…

‘ग्लोबल वार्मिंग’सँ त्रस्त हएत जीवन

घोट’ पड़त आतंकवादक बिख

भ्रष्टाचारक जाँतमे पिसाइत

आत्महत्या करत किसान

धर्म, जाति आ भाषाक जुन्नामे गछारल देस

मोहनजोदड़ोक देबाल पर पीठ अड़कौने

पाँच सालक बेटीक देह पर देखि हवसकेँ चेन्ह

डेराएत लहासक शिनाख्तसँ…

एहनामे कतबा सुखद अछि ई देखब

जे तीन सए पैंसठ गोट घाओकेँ भोगैत ई पिरथी

कतेक आगि समेटने अपना भीतर

आइ आएल अछि सोझा

नया सालक देहरि पर आ

पिरथीक जनबाक प्रक्रियामे

कतबा दुख अङेजने हम लिखैत छी कविता

तखन, ई कोन नयका साल

हमरा साल नया नहि चाही

चाही हमरा

नया समय !

जेना, बीत जाइत छैक

जाड़, गर्मी आ बरसात

गाछ आ चिड़ै-चुन्मुन्नी

दिन, सप्ताह आ मास

बीत गेल ई साल जेना,

जेना, बीत रहल छी हम

इहो साल तहिना बीत जाएत

एहनामे कोना कहू…

नया सालक शुभकामना !

रातिक बारह बाजएमे एखन,

बहुत देर अछि

एकतीस दिसम्बरक ई आधा राति

एतेक भयाओन किएक

लागि रहल अछि भाइ।

 

नबका साल

आँखिसँ लहू चुअबैत

जेना-तेना बीतल

ई पुरना साल

एक-एक दिन

अभावक थारीमे

बातक अन्न भोकसति देस

आ, घरसँ

गामक चौबटिया धरि

बघनखा पहिरने लोक…

बेकार,

ई कवितामे नव-नव

बिम्ब-प्रतीकक प्रयोग

जखन कि शहर

लहास भेल अछि आ

मना रहल अछि

गिद्ध सभ महाभोज

तखन, कोना कहू

नव बर्षक शुभकामना

देबाल पर नयका कलेंडर

टाङि देलासँ की

लिखलाहा मेट जाइत छैक।

 

अपंग समाज

जखन सड़क पर ठाढ़ भ’

उद्दण्डताक सीमा नाँघि

खिड़की पर चेपा बरसबैत ओ

गँजेड़ी छौड़ासभ

मुहसँ बाहर फेकति धुँआँक संग…

बेटीक नामे अभद्र गारि देने रहैक

कि भेलैक?

खिड़की बंन्न क’

गुब्दी लाधि देलखिन चौधरी जी आ

मूड़ी गोतने रहि गेलखिन पाण्डे जी

जखन सोझामे बैसल बेटीक अंतर-अंग केर

उच्चारण चिबबैत चलि गेलैक लेहँगड़ासभ

काल्हि खन एगोट अबोध नेनाकेँ

सरेआम मारि क’

फेक देल गेल रहैक धारमे

किछु नहि भेलैक

प्रशासनोकेँ भेटल रहैक जबाबमे मात्र

किछु नापल-जोखल शब्द-

‘हमरासभ किछु नहि देखलहुँ

आ ने ककरो पर अछि सुबहा

नहि जएबाक अछि हमरा

थाना-फौदारीमे

एकर कुंडलीएमे दोख छलैक’

एतबे नहि,

स्कूलसँ घुरैत

बारहमीं किलासक बचियाकेँ

लूटि गेलैक इज्जति

ककरो डेग नहि उठलै

सिंह जी सुनबे नहि केलखिन किछु

हमरो नहि फुटल बकार

आँखि मुनि लेलखिन महतो जी

जहिया शान्तिक जरा देने रहैक

दहेजक आगिमे आ

ममताक मुह पर फेकल गेल रहैक तेजाब

तहियो एहिना भेल रहैक

अन्यायक विरुद्ध आब

किछु नहि क’ सकैत छी

इतिहासक सभसँ गहीँर मृत्यु

मर’ चाहैत छी हमरालोकनि

मुह त’ देने अछि भगवान

मुदा, बकार नहि अछि

आँखि आ कान अछि सेहो

मुदा, आन्हर आ बहीर छी

अछि त’ दिमागो मुदा, सुन्न

लोथ अछि हाथ-पैर दुनू

ई पुरा समाज अपंग अछि

हमहूँ आ अहूँ।

 

पानिक समर्थनमे

ई मेघक मोन जेना बहुत व्याकुल लागि रहल अछि आइ

सुनलियैक जे,

दम्माक बेमारीसँ त्रस्त अछि बसात

खटिया पर पड़ल औद्योगिक अस्पतालमे

साँसक देहरि पर छटपटा रहल अछि

ठकमूड़ी लागल अछि जेना गाछ-वृक्षसभकेँ

चिड़ै-चुनमुन्नीसभक सेहो मंद अछि सुगबुगाहटि

ई मकानसभ एखने जागल अछि निन्नसँ

भोरे-भोर दुपहर अंगेजने सुरुजक आँखि सेहो

फुजल अछि एखने

एखने,

आमक फुनगी परसँ हेठ भेल अछि सुरुज आ

खिड़कीसँ द’ रहल छथि हुलकी

हम देखैत छी,

सुरुज, किछु देरसँ गरमा रहल छथि लोहा

क’ रहल छथि काज पर जेबाक तैयारी

जखन कि,

सैंतालीस डिग्री सेल्सियसमे

वाष्पित भ’ हमर कविता…

घोरा जाए चाहैत अछि समुच्चा ब्रह्मांडमे

भरतीय दण्ड प्रक्रिया संहिताक धारा

एक सए चौआलीसकेँ तहत

घरसँ बहराएब अछि मनाही

ऐहि समयमे

एकगोट अनजान शहरमे

आँखिमे भरने आगिक पिण्ड

भरि दुपहरिया…

कखनो,

धारक कछेरमे

कखनो,

पोखरिक मोहार पर

कखनो,

इनारक दूबि पर

आ कि,

कोतवाली चौकसँ सोझे पीच धएने

डी. एम. आवास होइत

थाना मोड़, स्टेशन, शंकरचौक आ

चभच्चा मोड़सँ खुरपेरिया धएने

कविताक धुर पार करैत

घामे-पसीने तर-बतर

गरदनि सुखाएल, मुहचुरू भेल

थाकल-हारल

माथ पर गमछी लपेटने

मुठ्ठीमे दबौने पियास

लहेरियागंज, इन्द्र परिसरमे

एखने आएल अछि सुरुज हमरा अँगना

एक चुरूक पानि माँगए !

पानि !

जे कि बाँचल नहि अछि आब कतहु पिरथी पर

सभसँ पहिने लोकक आँखिमे सुखा गेलैक

फेर सुखएलै धार, पोखरि आ इनार

आइ त’ हमर क’ल सेहो

एनीमियाक गंभीर बेमारीसँ चित भेल अछि

ई बहुत खतरनाक समयमे बीत रहल छी हमरा लोकनि

जखन लोक नहि जानि रहल छथि पानिक मोल

नीलामीक लेल सुखल धारकेँ सेहो लागि रहल अछि बोली

पानि पर राजनीति करैत लोक पर हँसि रहल अछि पानि

ठीके,

ई बहुत खतरनाक समयमे बीत रहल छी हमरा लोकनि

जतए किछु शिष्ट मंडल

क’ रहल छथि पानि बचेबाक वार्ता कए दसकसँ…

आ बीच-बीचमे फ्रीजरसँ निकालि पारदर्शी गिलासमे परोसल जाइत अछि पानि

आओर त’ आओर…

एहि पानिक रंग लाल अछि

आ ई लाल रंग मिलैत-जुलैत अछि हमरा सोनितसँ

ई हमर सोनित अछि आ

हुनका सभक लेल

शीतल पेय

जेना बिला गेल अछि चिठ्ठी आ तार

तहिना बीला रहल अछि पिरथी परसँ पानि

पिरथी परसँ पानि नहि

जीवन बिला रहल अछि

हमरा सभ आब किछुए दिन बाद…

गूगल पर सर्च क’ क’ देखब पानि

पोखरि, धार आ इनारक पेंटिंग बना क’

टाँगब देबाल पर…

जकरा जीबाक अछि कविता

तकरा बचाब’ पड़त पानि

जखन हम बचा’ रहल हेबैक पानि

तखन हम बचा रहल हेबैक कविता

जीवन बचा रहल हेबैक हम तखन

जेना, विचारक बिना नहि भ’ सकैत अछि कविता

पानिक बेतरे तहिना नहि भ’ सकैत अछि जीवन

घुरए पड़त हमरा लोकनिकेँ

पिरथी दिस

प्रकृति दिस…

करए पड़त सुरूआति

पानिक समर्थनमे हस्ताक्षर अभियान

मुठ्ठीमे दबौने पियास

एखने आएल अछि सुरुज हमरा आँगना

एक चुरूक पानि माँगय!

दरअसल पानि नहि!

जीवन माँगय आयल अछि।

 

अथबल ईश्वर

ईश्वर !

की चाही अहाँकेँ?

फरिछा क’ कहू

की चाही अहाँकेँ?

एकगोट निरीह प्राणीक रक्त

पाखण्डक उद्योग चलबैत

हाड़-मासुक देहकेँ नोचि-नोचि खाइत

त्रिपुण्डधारीक आडम्बर युक्त पूजा पाठ

सोना चानीक चढ़ौना आ कि रं… नाच

की चाही?

जनेऊ धारीक चापलूसी

आदमीसँ आदमीक छुआछूत

भेदभाव, ऊँच-नीच, दुराचार

फूल-पात गंगाजल पूरित

ताम्र पात्रसँ स्नान

धूप-दीप नैवेद्य दूध-घी संग

चरणामृतक पान!

ईश्वर!

की चाही अहाँकेँ?

अच्छा ओ बुधनी !

जे डेन पकड़ने अबोध नेनाकेँ

दू क’र अन्न आ दूटा टकाक आसमे

स्वयंकेँ परताड़ि सदिखन

घरे-घर करैत छैक

लोकक चूल्हि चौका, भाड़ा बर्तन

ओहि बर्तनक चमकमे देखैत अछि

नेनाक पढ़ेबाक सपना

आ एहि सभसँ पहिने नीत्तह निपैछ

मंदिरक कोना-कोना

मोने-मोन करैत मिनती-निहोरा

एहि भरोसमे किंवा एकदिन

मेट लेबैक अहाँ सभटा लिखलाहा बिपति

आँखिमे हेलैत सपना, भाप जकाँ उड़ियाइत

देखा रहल छैक अकासमे

भरोसक सही अर्थ ठीक-ठीक

भरोसे छैक एखन धरि शब्दकोशमे

से केकरा साहस छैक

जे बुझौतैक बुधनीकेँ जा क’

कोन अनर्गल काज केलकैक बुधनी?

जे सुन्नहटि पाबि ओ चाननधारी

खींची लेलकैक डाँड़सँ नूआ…

मंदिरक कोनमे

अधर्म आ पापक भालासँ बेधल

श्रद्धासिक्त अबलाक लेहूक टघार

माँटिकेँ सोंखैत अहाँ नहि देखलियैक?

कतए गेल रही अहाँ?

किएक ने बचौलियैक बुधनीक इज्जति

किएक ने देलियैक सौसेँ गामक मुहमे झीक

जखन बुधनीकेँ कहल गेलैक बदचलनि

किएक ने पकड़लियैक ओहि पाखण्डी

बड़का पगड़ी बला इज्जतिदार

त्रिपुण्डधारीक हाथ महक छौंकी

जे मंदिरक मोख नाँघला उतर

फोरि देलकैक सौसेँ देह दू दालि क’ दोदरा

ओहि अबोध नेनाकेँ अछूत कहि

बुद्धक एतेक दिनक बाद…

ई प्रश्न फेरसँ ठाढ़ करब

कि हएत उचित?

ईश्वर!

की अहाँ छी?

जँ अहाँ छी!

त’ कतए गेल रही अहाँ?

साँच-साँच कहू

किएक ने ठाढ़ भेलियैक

अत्यचारक खेलाप

अथबल ईश्वर।

 

कविता हमर प्रेमिका अछि

लालटरेस आँखिक नीचा

माउस फूलि गेल अछि हमरा

पीपनी पर ओँघा रहलि अछि निन्न

बहुत निनवासलि अछि जेना

खसि रहलि अछि

ध’ब-ध’ब पिरथी पर

हम छी जे

सुतबाक नामे नहि ल’ रहल छी

कए दिन, कए रातिसँ…

हमरा भीतर एकटा युद्धक

शुरुआत भ’ चुकल अछि

विचारक युद्ध !

मारए नहि चाहैत छी हम

ओहि सभ विचारसभकेँ

हृदयमे भरि लेबए चाहैत छी आ

सहेज लेबए चाहैत छी ओ किताब बला रैक

लेकिन, हम जतेक ओकरा स्पर्श करै छी

जतेक ओकरा चाहैत छी हम प्रेम करए

शब्दक आँखिये हम हुलकी मारए चाहैत छी

ओकर आँखिक ब्रह्माण्डमे जतेक

कि ओ ततेक आओर

छितनारे भेल जा रहलि अछि

भरि राति अपन लाइब्रेरीमे बैसल

बुनैत रहलहुँ एकटा गहीँर चिन्तन

शून्यक अंतिम छोड़ धरि

जाइत रहलहुँ बेर-बेर

घुमैत रहल मस्तिस्कक चारू कात अकासगंगा

हम ओकरामे आ ओ हमरामे

करैत रहलि यात्रा

हजारो मीलक यात्रा

बेर-बेर टकराइत रहल

मस्तिष्कक भीतसँ विचारक थोका

विचारसँ कविता आ

कवितासँ ब्रह्माण्ड रचबाक क्रम

चलैत रहल हमरा भीतर लगातार

आ अनुभव करैत रहलहुँ एगोट अजीब छटपटाहति…

कहाँदनि प्रेम होइत छैक त’

एहिना बउर जाइत छैक लोक अनन्तमे

एहिना राति-राति भरि निन्न नहि अबैत छैक

किछु एहने सन होइत छैक छटपटाहटि

भीतर किछु थिर नहि रहि जाइत छै साइत

हमर कविता हमर प्रेमिका अछि

आ हमर प्रेमिका हमर जीवन

आ ईश्वर सेहो

कोइ जीवन आ ईश्वरक बिना

की जीवि सकैत अछि ?

जीवि सकैत अछि कविताक बिना।

 

पुरान कविताकेँ पढ़ैत 

अपन लाइब्रेरीक बुकसेल्फसँ

किताब नहि

बहार कएलहुँ अछि पुरना डायरी,

एकदम्म शुरुआती दिनुका।

पुरना डायरी महक

अपन एकटा पुरान कविताकेँ उनटेलहुँ अछि

आ थाह’ लगेलहुँ अछि

आजुक अपन कविताक कथ्य आ विचारकेँ

आइ अपन ओजन फड़िच्छ भेल अछि—

भाषा आ शिल्पक

न’ब खोज कएलहुँ अछि आइ हम

पुरान कविताकेँ उनटाएब

मोन पाड़ब थिक पुरान अनुभवकेँ,

बीतल समयकेँ

फेरसँ जीयब थिक

पुरान कविताकेँ पढ़ब।

 

माथमे घुरियाइए कविता

कए दिनसँ…

बड्ड मोन करैए

फोन लगा क’ करी अहाँसँ

भरि मोन गप

कए दिनसँ…

माथमे घुरियाइए कविता

अहाँक प्रेम पर

हमर कविता

भारी पड़ि रहल अछि आब।

 

विचारक आँच पर कविता

चिक्कसमे जेना पानि मिज्झर क’

खूब सनलाक बाद…

बेलल जाइछ चकला पर

पूरा नाप-तोल आ गोलाइक संग

फेर आगि पर ताबामे सेक

फुलाओल जाइछ रोटी,

रोटी सुगन्धि छिड़ियबैत छैक तब

पहिले भीतर फेर बाहर

जीवन संघर्ष आ भूखक चढ़ान पर

भावमे शब्द मिज्झर क’ तहिना

पूरा नाप-तोल आ गोलाइक संग

सेदल जाइछ…

विचारक आँच पर कविता

कविता रोटी जकाँ होइत छैक

रोटीक फूल जकाँ सुन्दर

कविता करबाक लेल

रोटी सेदएमे दक्ष होबाक चाही पहिने

रोटी कविता अछि भूखक।

 

अहाँ बाँचल रहब

(प्रिय कवि नारायणजीक लेल)

अन्तसमे लगा’ लेने अछि खोँता

तेहन ने स्थायी-भाव बनि

जे घोरैत रहैत छी अहाँ सदति कवितामे उजास।

कविता छथि  संजीवनी अहाँक लेल

जाहिमे जिबैत छी अहाँ अहर्निश

गहिओने स्नेह-दीप्तिकेँ

जे आलोकित कएने अछि अहाँक जीवनक बाट

आ अदनामे देखैत छी अहाँ मूल्य

जेना,

माटिक त’रसँ माटि ताकि अनैत अछि कुम्हार।

चानक शीतलतामे जीवन-रससँ डगडग

अमा माय जकाँ…

जे ककरो लेल कोनो भेद नहि करैत छथि

हे हमर प्रिय कवि,

धरती पर जखन देखैत छी इजोरिया।

फूलमे, पातमे

गामक बाट-घाटमे

चानमे, सुरुजमे

उत्तर-दक्षिण, पुरुब आ पच्छिममे

असाध्य शून्यमे सेहो

कविते देखैत छी अहाँ।

अहाँ सेबैत छी कविता

कविते सपनाइत छी,

ओछबैत छी कविता,

कविते नहाइत छी

बिम्ब आ प्रतीक त’ सिरहना थिक अहाँक

बहैत अहाँक कविता अहाँक धमनीक लेहूमे

अनवरत विद्यमान अछि

श्वास-उच्छवासमे,

मनोरथ आ आसमे

रचने कतोक सुन्दर सृष्टि।

अनेक पीढ़ीक कथा कहैत अहाँक कविता

आठो पहर सुतैत नहि,

अपना लेल सपनाक घर तकैत अछि

रुमाल पर फूल काढ़ैत

सियान भेलि सुजाता

चढ़ैत दिनक धाह पिबैत

कवितामे नाम पाबि,

बिहुँसैत छथि कवितामे

उचिते कहैत छथि युगचेता रचनाकार तारानन्द वियोगी—

‘अख्यास करबाक लेल अहाँक कविताक पृष्ठभूमि

पहुँचए पड़त हमरा लोकनिकेँ यात्रीजी लग।’

वैश्विक स्पर्धाक घोड़दौड़मे

ड्यौढ़ी पर आएल बाजारसँ दुखित

अपनाकेँ हेरैत सहजताक संग

कविताक लैत छी सहारा।

हे हमर श्रेष्ठ कवि!

कविता जीवित राखत अहाँकेँ

जाधरि जीवित रहत विश्वसनीय डेग उठबैत मनुष्यता

अहाँ बाँचल रहब कवितामे एनक-एन

सूर्य-किरणमे उपस्थित ऊष्मा

आ आँखिमे बसल जल सन।

 

गामक इतिहास

सुन्न भ’ गेलैक

कोयला पोखरिक मोहार

डिहुलिया परहक आमक गाछ

जे तीन कठ्ठा मे चतरल छलै

काटि देल गेलै…

गाछ,

जकर छाहमे…

कए पुस्ता खेलने छलै

चिक्का-चिक्का

जेठ- बैसाखक टटहवा रौदमे

जलखै खाइ छलै जोन- हरबाह

सुस्ताइ छलै बाट-बटोही छाहमे

कएन जुगसँ दैत रहलैक जे…

नेहक गवाही

‘वसुधैब कुटुम्बकम्’ केर समाद

अन्हर-बिहारिमे

भीषण बाढ़िमे

असंख्य चिड़ै-चुनमुन्नीक आश्रय…

गाछ जे

देखैत आएल छल

पीढ़ी-दर-पीढ़ीकेँ

बच्चासँ सियान आओर

फेर बूढ़ होइत आ

एक दिन ओकरा अपन

असली गंतव्य धरि जाइत सेहो

जाहि गाछसँ गाछ नहि!

गाम जानल जाइत छलै

हहा क’ आइ ओ गाछ खसि पड़लैक

असलमे गाछ नहि

गामक इतिहास खसि पड़लैक।

• मिथिलाक एकटा गाम भटचौड़ाक कोयला पोखरिक डिहुलिया परहक आमक गाछ कटलाक बाद…  

 

परदेस

ई दागक कपड़ा

काँचे बाँसक रंथी

ई कोहा, कौड़ी

कुश-तील, गंगौट

गोइठाक आगि

अचिया

ई छौड़झप्पी

नह-केस

श्राद्ध, सम्पिण्डन…

ई सभटा रीत

एहि दुनियाँक छै

मीत!

लोक ओना मरि त’ तखने जाइए

घर छोड़ि जखन

जाइए परदेस।

 

कि होबाक चाही आजुक हमर शब्द

(पुलवामा हमलामे भेल शहिद जवानसभकेँ समर्पित)

एकटा अजीब तरहक छटपटाहटि अछि

हमरा भीतर कए दिनसँ…

स्वयंसँ अछि कए गोट सवाल

की होबाक चाही आजुक हमर शब्द ?

की हमर कविताक विषय

होबाक चाही ओ

जे अछि हमरा जनति अवर्णनीय

स्वयं अपन लेहूसँ लिख देलक अछि जे

देशक सिमान पर एगोट अंतहीन कविता

फेर शब्दकोशसँ कोन शब्द लाबि ताकि क’ हम

मुदा,

हम कहए चाहैत छी एगोट मायक किछु शब्द —

‘नेनपनमे चोरा क’ खएलहा माटिक रिनसँ त’

उरिन भ’ गेलहुँ अहाँ

मुदा, हमर की?

जे नाङटे लेटाइत नुका रहैत छलहुँ आँचरिमे

आ हम ओँघाएत चलि जाइत छलहुँ एकटा दोसर दुनियाँमे

ई तीन रंगा चदरि ओढ़ि किए एलहुँ अँगना आइ

हमर आँचरि एखनो अहाँ लेल ओछ नहि छल

जकर सुगबुगाहटि मात्रसँ

चेहा क’ उठि जाइत छलहुँ हम

कतेक कालसँ करैत छी कौलति

उठि नै रहल छी अहाँ’

जखन ई सुनैत छी कोनो मायक विलाप…

तखन थरथराए लगैत अछि हमर हाथ

एक-एक वाक्य गढ़बाक क्रममे

ठमकि जाइत अछि हमर कलम आ

अगिला पाँति धरि जाइत-जाइत

छोड़ि दैत अछि शब्द हमर संग

आ फेर उमड़ैत अछि मोनमे बहुत रास प्रश्न

सिंधु आ झेलम नदी केर पानि किएक भ’ गेल अछि ललोन

उज्जर दप-दप गाँती बन्हने प्रकृति

लगैत अछि मलीन किएक

केसर आ गुलाबक कियारीमे

कोना उगए लागल बारूद

धरतीक स्वर्ग आइ शूल जेना गरैत अछि हृदयमे

उरीसँ पुलवामा धरि कतेक बदलल अछि देस

हम युद्ध त’ जीत लेलहुँ

की जीत पेलहुँ आतंकवाद?

पाँच आखरक एकगोट शब्द नहि जानि

लील लेलक कतेक जीवन

किछु लिखबाक मोन नहि क’ रहल अछि आइ

गुनधुन्नीमे छी

ई जे उजड़लैक अछि कतेको घर

फुटलैक अछि बम-बारूद

बहलैक अछि लेहूक घार

देसक हिफाजत लेल

आ कि…

हरान करैत अछि ई सभ प्रश्न

तखन, हमरा होइत अछि

अपने देशप्रेम पर संदेह।

 

अर्जीनामा

मी लॉर्ड!

गीता पर हाथ राखि क’ कहैत छी

हम जे कहब सुप्पत कहब—

आइ फेर अजीब तरहक

घिघिएनाइकेँ स्वर आएल अछि

हमरा लाइब्रेरीसँ…

फेर शब्दकोशमे

एकटा शब्दकेँ गरदनि मोकि

क’ देने छैक हत्या आ

कतेको भेल अछि खूने-खुनाम

तोड़ि देने छैक पैर-हाथ कतेकोक

मुह, कान, नाक, आँखि, कपार

भसकल छैक।

चौक-चौराहा, बाट-घाट,

मन्दिर-मस्जिद

मॉल हो वा सिनेमाघर

रेलवे स्टेशन वा हाट-बाजार

शब्दक संग कएल जाइत अछि दुर्व्यवहार

अर्थक अनर्थ भ’ रहल अछि

मी लॉर्ड!

जेना, एही शब्दक अर्थ देख लेल जाउ हजूर

लॉर्ड, माने भगवान

कोनो मनुखकेँ भगवान सम्बोधित करब

कतेक उचित अछि ?

कि ठीक-ठीक मेल खा रहल अछि एकर अर्थ शब्दकोशसँ

हत्या पर हत्या भ’ रहल अछि शब्दकेँ

एकटा नमहर असमसान होबाक

ओरिआओनमे अछि शब्दकोश

आइ धरि एकहुँटा केश दर्ज नहि भेलैक शब्दक पक्षमे

नहि भेलैक तैयार केओ दैक लेल गवाही

कानसँ ठोकराइत अश्लील ध्वनि हमरा

निन्नसँ जगा दैत अछि बेर-बेर

शब्द ककरो बपौती नहि अछि मी लॉर्ड !

जे, जकरा जेना मन हेतैक

तेना खेलेतैक शब्दक जीवनसँ…

हमर याचिका दर्ज कएल जाउ

हमर न्यायक गुहारि पर विचार कएल जाउ

मी लॉर्ड!

हम कविता सुनब’ नहि एलहुँ अछि

हमरा केश दर्ज करेबाक अछि

अपन पीढ़ी बचेबाक अछि हमरा।

 

हमरा भीतर पहाड़ अछि

पहाड़ पर चढ़ैत

दू बर भेल देखैत छी हम पिरथीकेँ

अपन छाती पर अङेजने

समुच्चा पहाड़ आ

पहाड़क तरहथीमे

सुस्ताइत दार्जिलिंग भेटैत अछि हमरा

हम ओकर पत्तीकेँ छूबि क’ देखैत छी

आत्मविश्वाससँ भरल अछि

गात-गात ओकर…

पहाड़क कान्ह पर चढ़ैत मेघ आ

निहुरल अकास

चारु भरिसँ बतियाइत

ग्रह, नक्षत्र, चान-तरेगन आ

ऋचाक उच्चारण करैत बसात

भेतैट अछि हमरा

देवदारक गाछसँ अड़कल शून्यमे विचारमग्न

हम हेल रहल छलहुँ अकासमे

कि मस्तिष्कसँ टकराइत अछि एगोट विचार—

‘कालीदासक कामर्त यक्ष

अपन विरहाकुल प्रेमिका धरि पहुँचेबाक लेल समाद,

विचरैत श्याम वर्णी एही मेघक कोनो

वंशजकेँ त’ नहि बनौने छलथि

अपन समदिया’

एहि अप्रतिम कल्पनाकेँ जिबैत

प्रसन्ताक वायुमंडलसँ घेराएल

आगु बढ़ैत छी हम आ

पहाड़क तरहथीमेसँ उठा क’

कनमाभरि पहाड़ बिग दैत छीयै अकासमे

कि घाराजोड़ी करए लगैत अछि

बसात आ मेघ

एकटा सौँस उदासी ओढ़ने

भेटैत अछि हमरा

कनिके आगू…

एकटा झड़ना अपन आत्मकथा कहैत

गति दैत अछि हमरा झड़ना आ विस्तार सेहो

हम खहरि जाइत छी ओकरा भीतर आ

बढ़ल जाइत छी ओकरामे डूबि क’

अपन गन्तव्य दिस

अदृश्य पदचिन्ह अंकित करैत…

पहाड़ अछि

पहाड़ पर अन्हार अछि आ

हमरा हाथमे कलम अछि

हम इजोत करबाक बेओँतमे छी

बाहर कम आ हमरा भीतर

बेसी अछि पहाड़

शान्त, स्थिर आ गंभीर

पहाड़ संकल्प बनि क’ ठाढ़ अछि हमरा भीतर

भीतरक पहाड़मे सेहो लहलहाइत अछि

एकगोट दार्जिलिंग

अकासमे पहाड़ पर भेटैत अछि कविता आ

कवितामे खहरबा लेल आतुर नदी

पहाड़ परसँ घुरि क’ आएल छी हम

हृदयमे भरि क’ लाएल छी हम

पहाड़, जंगल, अकास ,गाछ-वृक्ष आ कविता

जीबाक लेल शेष जीवन।

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