हेयौ, बेर बेर सवाल हमर याह रहै छै
ठोरमे मुस्की मुदा हृदय तर किए घाह रहै छै
गंगा नहाए लिअ जप तप कराए लिअ तइयो
ओहिसँ की हेतै जखन मोने मोलिछाह रहै छै
देखू कतेको बेर डुबकी लगा चुकल छी मुदा
सबदिन प्रेमक सागर किए अथाह रहै छै
नजरि गुजरिके त बाते नै पुछू हमरासँ मीत
आरे दिन देखारे प्रेमक राह छोटाह रहै छै
अहाँ त दुर गगनके परी बनि गेल छी प्रिय
मुदा अहीँक चाहमे ‘गजुर’ बताह रहै छै
गजेन्द्र गजुर
